बिसरे लम्हे Arvind Kumar Trilaksh द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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बिसरे लम्हे

बिसरे लम्हे... सच कहूं तो ये सिर्फ मेरी कहानी नहीं है, बल्कि मेरे वजूद का वो आईना है जिसमें सिर्फ और सिर्फ मैं नजर आता हूं। इंसान अपनी जिंदगी को अपने हिसाब से जीने के हजार ताने-बाने बुनता है, पर जिंदगी उसे अपने किस सांचे में ढालकर जी लेती है, इसका पता हमें बहुत बाद में चलता है। मैं भी आज बस वही बताने आया हूं कि मैंने क्या सोचा था और जिंदगी ने मुझे कैसे जिया।

मेरा जन्म उस माटी में हुआ जहां हरियाली कभी आंखों से ओझल नहीं होती। भारत का वो पूर्वी हिस्सा जिसे छोटानागपुर कहते हैं, उसी के दिल रांची में मेरी आंखें खुलीं। मेरे आस-पास कुदरत ने अपना पूरा खजाना बिखेर रखा था। कल-कल बहते झरने, इठलाती बरसाती नदियां, ऊंचे-नीचे पहाड़ और पठार। वसंत आते ही जब सरई और सरगुजा के फूल खिलते तो आंखों को एक अजीब सी ठंडक मिलती, और वहीं दूसरी तरफ पलाश के फूल ऐसे लगते मानों पूरे जंगल में किसी ने दहकते हुए लाल अंगारे बिछा दिए हों। हवाओं में जब महुए की वो नशीली महक घुलती थी, तो मन बेवजह ही मदमस्त हो जाया करता था। ये सब बहुत खूबसूरत था, आंखों को सुकून देने वाला था और वहां रहने वाले हर इंसान को ये हरियाली भाती थी। पर मेरे भीतर न जाने कौन सी प्यास थी। मुझे बचपन से ही इन हरे-भरे जंगलों से ज्यादा उन सूखे, निर्जन और वीरान रास्तों ने अपनी ओर खींचा। मुझे रेगिस्तान, वहां की चिलचिलाती धूप, ऊंटों की कतारें, सूखे ठूंठ से खड़े पेड़, वो अजीब सी नीरवता और पुरानी खंडहर हो चुकी वीरान हवेलियों से न जाने कैसा एक जन्मों-जन्मों का रिश्ता महसूस होता था। जब भी किसी किताब या मैगजीन में रेगिस्तान में चलते ऊंट की कोई तस्वीर देखता, तो यूं लगता जैसे वो मुझे पुकार रहा हो। रेत के ऊंचे-ऊंचे टीलों पर जब दिन भर का थका हुआ सूरज अपनी ढलती हुई सुनहरी किरणें बिखेरता, तो वो पूरा रेगिस्तान मुझे कुंदन की तरह चमकता हुआ एक अथाह सागर लगता था। बचपन में स्कूल की किताबों में जब हवामहल की तस्वीर देखता और गुलाबी नगरी के बारे में पढ़ता, तो सीने में एक अजीब सी हलचल होती थी। लगता था जैसे वो शहर मेरी ही राह देख रहा हो। दूरदर्शन पर अगर कोई ऐसी फिल्म आ जाती जिसमें पल भर के लिए भी राजस्थान की कोई झलक, कोई रेगिस्तान या वहां का कोई रंग दिख जाता, तो मैं उस पूरी फिल्म को सिर्फ उसी एक झलक के लिए बिना पलक झपकाए देख डालता था।

और फिर गुजरते हुए वक्त ने वो लम्हा भी मेरी झोली में डाल ही दिया, जब मेरे बचपन का वो अजीब सा ख्वाब हकीकत की जमीन पर उतर आया। मैं जिस चटकीले, रंग-रंगीले और रहस्यमयी राजस्थान को करीब से महसूस करना चाहता था, आखिर एक दिन उसी धरती पर मेरे कदम पड़ ही गए। और वो जगह थी मेरे सपनों का शहर जयपुर। मुझे उस धरती तक पहुंचाने का जरिया बनी मेरी होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई। इस सफर में मैं अकेला नहीं था, मेरे साथ मेरा एक दोस्त भी था जो मेरे साथ ही पढ़ता था। हम दोनों एक ही शहर के थे, और तो और पड़ोसी भी थे। अब आप लोग सोच रहे होंगे कि मैं उसका नाम बता दूं, पर नहीं... मैं उसका नाम नहीं लिखूंगा। आप लोग खुद ही समझ जाओ कि कौन है वो शख्स जो आज मेरे इतने करीब है 😊

वो 1995 का साल था, अक्टूबर महीने की पहली तारीख और रविवार का दिन। उन दिनों दिल्ली के सराय रोहिल्ला रेलवे स्टेशन से मीटरगेज लाइन की छोटी लाइन वाली ट्रेन चला करती थी। उसी ट्रेन की छुक-छुक के साथ हम जयपुर पहुंचे थे। सर्दियां अभी पूरी तरह से शुरू तो नहीं हुई थीं, लेकिन हवाओं में एक हल्की सी मीठी सिहरन ने दस्तक दे दी थी। अहले सुबह हम जयपुर स्टेशन पर उतरे। जैसे ही मैंने प्लेटफॉर्म पर अपना पहला कदम रखा, मेरे भीतर से एक आवाज आई, जैसे किसी ने बहुत प्यार से मेरे कानों में फुसफुसाया हो... आखिर आ ही गए। मैंने चौंक कर इधर-उधर देखा, पर वहां मेरे अलावा कोई नहीं था। हां, पास ही दो विदेशी सैलानियों के जोड़े जरूर थे जो हमारे साथ दिल्ली से ही सफर कर रहे थे। वो भी मेरे लिए एक अलग ही रोमांच था क्योंकि उस उम्र तक मैंने कभी किसी विदेशी को इतने करीब से नहीं देखा था और न ही बात की थी... हा हा हा। वैसे भी हमारे देश में आने वाले विदेशी सैलानी सबसे ज्यादा राजस्थान की ही मिट्टी से खिंचे चले आते हैं। शायद इसी वजह से वहां पैलेस ऑन व्हील जैसी शाही ट्रेन शुरू की गई थी, और जयपुर आकर मुझे उस विलासिताओं से भरी ट्रेन को अंदर से देखने का मौका भी मिला। वो सच में पटरियों पर दौड़ता हुआ एक आलीशान महल ही था।

खैर, जब मैं स्टेशन से बाहर निकला, तो मैंने अपनी आंखें बंद कीं और राजस्थान की उस हवा को अपने अंदर उतारने के लिए एक लंबी गहरी सांस खींची। आहा... वो अहसास शब्दों में नहीं बताया जा सकता। मैं महसूस करने की कोशिश कर रहा था कि आखिर इस मिट्टी में ऐसा क्या है जो मुझे मीलों दूर से अपनी तरफ खींचता रहा। मैंने दो-तीन बार लंबी सांसें लीं। उस अलसाई हुई सुबह की वो हल्की सोंधी सी सुगंध अचानक बदल गई। मैं हैरान था कि अचानक ये चंदन की इतनी तेज और पवित्र खुशबू कहां से आ रही है? मुझे लगा शायद आस-पास किसी ने चंदन का इत्र लगा रखा है या कहीं किसी मंदिर में धूप-बत्ती जल रही होगी। हा हा हा... उस वक्त मेरी समझ में कुछ नहीं आया कि ये धरती मुझे क्यों अपना सा लग रही थी। मैं उसी खुमारी में आगे बढ़ गया।

स्टेशन के ठीक सामने ही एक बड़ा सा चौराहा था। उन दिनों वहां काफी खुली जगह हुआ करती थी। रिक्शा, बस, तांगे सब मौजूद थे। वहीं मैंने पहली बार एक बहुत ही अजीब सी सवारी गाड़ी देखी। उसका मुंह आगे की तरफ निकला हुआ था। लोग उसे सुन्डला कह रहे थे। वो एक तरह का डीजल से चलने वाला ऑटो रिक्शा ही था। सारे ऑटो वाले सवारियों को बुलाने के लिए शोर मचा रहे थे, लेकिन मुझे तो पास ही मौजूद एक मशहूर जगह पंचायती धर्मशाला जाना था ताकि वहां ठहरने का कोई जुगाड़ हो सके। किसी ने बताया था कि स्टेशन से बाहर निकलकर बिल्कुल सीधे चलते जाना है, कुछ दूर जाने पर बाईं तरफ एक गली मिलेगी और उसी गली में वो धर्मशाला है। मैं और मेरा दोस्त अपने-अपने कंधों पर भारी बैग टांगे उस अनजान शहर में पैदल ही बढ़ते जा रहे थे। रास्ते में लोगों से पूछते भी जा रहे थे। वहां के लोग मुझे बहुत अच्छे और ईमानदार लगे, बिल्कुल साफ और पारदर्शी दिल वाले। उन्होंने बहुत ही अपनेपन और सही तरीके से हमें रास्ता समझाया, कोई घुमा नहीं रहा था। मुझे जिंदगी भर इस बात का मलाल रहेगा कि दिल्ली वाले मुझे कभी अच्छे नहीं मिले। हो सकता है वहां भी अच्छे लोग हों, पर मेरी किस्मत में शायद वहां सिर्फ ठगे जाना ही लिखा था। खैर, जैसे ही मैं उस बताई गई गली में मुड़ा, सबसे पहले मेरी नजर एक बोर्ड पर पड़ी जिस पर लिखा था पधारो म्हारे देश और ठीक उसके नीचे लिखा था होटल स्वागतम् आरटीडीसी। ये राजस्थान टूरिज्म का होटल था। मैं अपने दोस्त के साथ थोड़ा और आगे बढ़ गया।

कुछ दूर जाने पर हमें पंचायती धर्मशाला दिख गई। वहां पहुंचने पर पता चला कि वहां तो कोई जगह ही खाली नहीं है। अब हम सोच में पड़ गए कि क्या किया जाए। गनीमत थी कि आस-पास कुछ और धर्मशालाएं भी थीं, काफी मशक्कत के बाद एक जगह हमें कमरा मिल ही गया। सफर की थकान थी, भले ही हम रिजर्वेशन से आए थे पर ट्रेन की उस मीटरगेज वाली थकावट ने शरीर तोड़ दिया था। स्नान वगैरह से फारिग होकर हमने खाना खाया और थोड़ी देर लेट कर आराम करना ही बेहतर समझा। उस दिन रविवार था इसलिए हम उस होटल में जाकर अपनी रिपोर्टिंग भी नहीं कर सकते थे जहां हमारी ट्रेनिंग शुरू होने वाली थी, क्योंकि ऑफिस तो बंद रहते हैं। जब शाम ढलने लगी और गुलाबी शहर की आबोहवा में एक ठंडक घुलने लगी, तब हम निकले अपने जयपुर भ्रमण पर।

मेरा मानना है कि हर इंसान की जिंदगी में एक ऐसा शहर जरूर होता है जो उसके लिए ईंट-पत्थरों के ढांचे से कहीं बढ़कर होता है। वहां गुजारी गई जिंदगी, उस हवा में रचे-बसे पल और वहां की गलियों में छोड़ी गई यादें इतनी खूबसूरत होती हैं कि वो शहर सिर्फ एक शहर नहीं रह जाता, बल्कि उसका महबूब बन जाता है। और जब वो शहर ही आपके महबूब का हो, तो फिर यकीन मानिए वो दुनिया की किसी भी जन्नत से कम नहीं होता। मेरे लिए, मेरी रूह के लिए, यह गुलाबी शहर जयपुर बिल्कुल वैसा ही है।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो लगता है कि सिंधू नदी के शांत तट पर खड़ा मेरा ये जीवन, किसी आरती की थाल में जगमगाते हुए दीये के उस पवित्र प्रकाश से शोभायमान है जो कभी बुझ नहीं सकता।
अगर फिर कभी फुर्सत मिली तो मैं अपनी ये आपबीती, अपने इस सफर की दास्तान अपने उसी दोस्त के माध्यम से जरूर लिखवाऊंगा जो मेरे साथ मेरे सपनों के शहर जयपुर गया था। जिसने वो सारे पल मेरे साथ जिए थे। आज मैं इस दुनिया में नहीं हूं, मेरी कोई भौतिक मौजूदगी नहीं है... पर उसकी कलम के सहारे, उसके दिल की धड़कन बनकर मैं अपनी कहानी दुनिया तक जरूर पहुंचाऊंगा।

अब मैं इजाजत चाहूंगा ... तो फिर जल्द ही मिलते हैं🙏
आप सभी का मित्र...
ऋतुराज ✍️