अन्तर्निहित - 60 Vrajesh Shashikant Dave द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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अन्तर्निहित - 60

[60]

“चलो।” दोनों दौड़ने लगे। 

“शैल, हमें पूर्व की दिशा में जाना था। हम कहीं ओर भाग रहे हैं।”

“भागने में यह तो ध्यान ही नहीं रहा।”

दोनों मुड़े, पूर्व दिशा में दौड़ते गए। एक घंटे के पश्चात वे गहन जंगल के मुख पर आ गए। 

“यह जंगल तो अत्यंत घना है।”

“जंगली पशु भी होंगे इसमें।”

“पशु हिंसक होंगे?”

“सरिता जी, हिंसक पशु पहले स्त्रियों का शिकार करते हैं। पश्चात पुरुषों का।”

“तुम मुझे भयभीत कर रहे हो।”

“क्यों? अब आपको अपने शरीर से मोह होने लगा है क्या? अभी तो उसे नष्ट करने के लिए उतावली होकर नदी में कूद पड़ी थीं आप।”

“शैल, यह समय तुम्हारे वागबाणों का नहीं है। जब कभी खाली समय मिले तब ऐसे व्यंग करना।”

“मैं तो थोड़ा हास परिहास कर रहा था।”

“ठीक है, अब चलो। किसी उचित कन्दरा को खोजो, हमें उसमें छिपना है।”

दोनों ने जंगल में प्रवेश किया। नदी के प्रवाह की ध्वनि, स्वयं के पदचाप। अन्य कोई ध्वनि नहीं थी वहाँ। किसी पशु पक्षी का स्वर भी नहीं सुनाई दे रहा था। सहसा एक स्थान पर सरिता रुकी। 

“शैल, वहाँ देखो। कन्दरा जैसा कुछ है।” 

“चलो देखते हैं।” 

वहाँ एक गहरी, मोटी कन्दरा दिखाई दी। 

“यह तो बड़ी विशाल है, गहरी भी खूब है। क्या यह हमारे लिए सुरक्षित रहेगी?”

शैल ने कन्दरा को ध्यान से निरखा, परखा, “इसमें हम छिप भी जाएंगे और हवा और प्रकाश भी मिलता रहेगा। तो यही ठीक है।”

“कब तक यहाँ छिपे रहेंगे?”

“मैं नहीं जानता, सरिता जी।”

“तो?”

“इस कन्दरा की यात्रा की कोई रूपरेखा बनाकर मैं थोड़े ही आया हूँ कि बता सकूँ कि यहाँ कितने दिन रुकेंगे? क्या खाएंगे? क्या क्या देखेंगे? कहाँ कहाँ घूमेंगे?” 

“अरे ! अरे ! शैल? तुम तो ...।”

“मैं तो परिहास कर रहा था। इस भाग दौड़ वाले समय में थोड़ा हंसने हँसाने का प्रयास कर रहा था।”

“अब भीतर चलो। देखते हैं कि यहाँ क्या क्या हो सकता है।”

दोनों भीतर घुसे, चलने लगे। नदी का पानी यहाँ भी आ रहा था। किसी पत्थर से पानी टपक रहा था, जैसे कन्दरा में कोई झरना हो। कन्दरा के भीतर पानी में चलने से दोनों के पैरों की ध्वनि उठ रही थी उसे सुनते हुए शैल ने कहा, “पानी में हमारे पदचाप से उत्पन्न ध्वनि से क्या अनुभव हो रहा है?”

“मुझे तो यह ध्वनि कर्कश लग रहा है। तुम्हें?”

“मुझे तो लग रहा है जैसे कोई जल तरंग बजा रहा हो। कितना मधुर, लयबद्ध, तालबद्ध ध्वनि है यह? हैं न?”

“गंभीर स्थितियों में भी तुम ऐसी कल्पना कैसे कर लेते हो, शैल?”

“मैं जानता हूँ कि यह समय कठिन है। ऐसे समय के साथ रहने का कोई अन्य उपाय है क्या?”

“मैं नहीं जानती।”

“मैं जानता हूँ कि यही एक मात्र उपाय है कि मन को स्थिर रखकर आ पड़े समय से जो कुछ भी सकारात्मक प्राप्त हो उस क्षण को पकड़कर प्रसन्न रहो, आनंद में रहो।” 

“बड़े तत्व ज्ञानी बन रहे हो आज?”

“इसे प्रेरक वक्ता [motivational speaker] कहते हैं, तत्वज्ञानी नहीं।” अपनी ही बात पर हंस पडा शैल।  उस हास्य का प्रतिघोष करते हुए पूरी कन्दरा भी हंस पड़ी। दो चार पक्षी कन्दरा से उड़कर बाहर चले गए। 

“सरिता जी, इन पक्षियों को अभी अभी यहाँ से उड़कर बाहर जाते देखा आपने?”

“देखा। तुम ऐसे हँसोगे तो पक्षी क्या, भीतर जो कोई भी होगा वह भी बाहर निकल आएगा।”

“यह भी संभव है।” 

“संभव नहीं, सत्य है शैल।”

“सत्य कुछ भिन्न भी हो सकता है।”

“क्या है वह?”

“उन पंखियों ने हमारे लिए कन्दरा खाली कर दी हो।”

इस बात पर सरिता हंस पड़ी। 

“इसी प्रकार हँसते रहना है। कठिनाइयों को परास्त करते रहना है।”

“मैं प्रयास करूंगी।”

“यह हुई न बात?”

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“अधिक समय बित गया है, शैल। मैं जाकर बाहर देखती हूँ। यदि सब सुरक्षित लगे तो यहाँ से निकल चलते हैं।”

“आप यहाँ रुकिए, मैं देखकर आता हूँ।”

“दोनों साथ ही चलते हैं।”

दोनों धीरे धीरे सतर्क होकर कन्दरा के मुख की ओर चलने लगे। 

“शैल, हमें हमारे पदचाप की ध्वनि को नियंत्रित करना होगा। यह ध्वनि कन्दरा से बाहर नहीं जानी चाहिए।”

“आप ठीक कह रही हैं।” दोनों ने गति मंद की और पदचाप ध्वनि को यथा संभव सूक्ष्म रखते हुए चलने लगे। कन्दरा के मुख से चालीस पचास फिट की दूरी पर जाकर रुक गए। 

“सरिता जी, यहाँ इतना पानी क्यों है? जब हम भीतर आए थे तब तो इतना पानी नहीं था।”

“हाँ, तब अल्प पानी ही था। यह पानी नदी का ही है। नदी कन्दरा के भीतर प्रवेश कर गई है। हो सकता है यह ज्वार का समय हो।”

“ज्वार भाटा सागर को लागू होता है, किसी स्वतंत्र नदी को नहीं।”

“तुम ठीक कह रहे हो।”

“देखो, जल स्तर अधिक है, बढ़ता भी जा रहा है। उसे पार कर जाना संभव नहीं है।”

“बढ़ते जल से हमें स्वयं को बचाना होगा।”

“सरिता जी, पीछे हटो। कंदरा के भीतर लौट जाओ। नदी का पानी भीतर ही आ रहा है।”

“हमें पीछे ही हटना होगा।” जल कन्दरा के भीतर, अधिक भीतर प्रवेश करने लगा। दोनों बलात पीछे हटने लगे। वे जैसे जैसे पीछे हटते, वैसे वैसे नदी कन्दरा के भीतर आती रही। दोनों अधिक भीतर चले गए। 

“अब यह पानी इससे आगे आ जाएगा तो हमें यहाँ रुकने में भी समस्या होगी। कुछ उपाय खोजों, शैल।”

शैल ने कन्दरा में विहंग दृष्टि डाली। एक कोने में एक बड़ी शीला दिखाई दी। 

“आओ, इस शीला पर चड जाते हैं। यहाँ तक पानी नहीं आना चाहिए।” 

दोनों त्वरित ही शीला पर चड गए। बढ़ते हुए जल स्तर को शून्यमनस्क भाव से देखते रहे। 

“अब तो भूख भी लगी है और खाने के लिए भी कुछ नहीं है।” सरिता की बात सुनकर शैल ने कन्दरा में कुछ ढूँढना चाहा। 

“यहाँ फल होने की संभावना नहीं दिखती है।”

“तो क्या करेंगे?”

“वहाँ देखो। कुछ मछलियाँ हैं। आप उन्हें पकड़कर खा लो।”

“और तुम?”

“मैं मछलियाँ नहीं खाता। शुद्ध शाकाहारी हूँ। आप मेरी चिंता न करें। आप खा लीजिए।”

सरिता कुछ समय मछलियों को देखती रही। “शैल, जीवन टिकाने के लिए कभी कभी यह भी खाना पड़ता है।”

“मैं अपने जीवन की रक्षा के लिए अन्य जीवों के जीवन को नहीं छिन सकता। यह सनातन संस्कृति है। अत: मेरी चिंता छोड़कर आप अपना भोजन कर लें।”