घुमक्कड़ जिज्ञासा - 1 Dharmendra Kumar द्वारा रोमांचक कहानियाँ में हिंदी पीडीएफ

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घुमक्कड़ जिज्ञासा - 1

"नमस्कार दोस्तों! स्वागत है, आप सभी का "मातृभारती" के एक बेहद अनोखे और आपके होश उड़ा देने वाले सफ़र में।

मैं हूँ, आपका दोस्त..."धर्मेंद्र कुमार"......अपने यात्रा के अनुभवों को आपसे साझा करने के लिए और आपके ही जज़्बातों को आपसे रूबरू कराने के लिए हाज़िर हूँ....
तो चाहिए शुरू करते हैं "घुमक्कड़ जिज्ञासा" के इस सफ़र को!

"हर किताब एक सवाल से शुरू होती है। यह किताब भी। फर्क बस इतना है कि यह सवाल आपसे पूछा जा रहा है!- क्या आप सच में वही जिंदगी जी रहे हैं, जो आप जीना चाहते थे?

घुमक्कड जिज्ञासा कोई यात्रा-मार्गदर्शिका नहीं है। और इसमें ना तो सस्ते होटल बताये गये हैं, और ना ही कोई परफेक्ट इटिन-एरेरी। यह किताब उन पलों के बारे में है, जब मन रोजमर्रा की जिंदगी से थोडा आगे देखना चाहता है। जब भीतर कहीं से आवाज आती है- "चलो, कुछ अलग देखते हैं"।

हम सबके भीतर एक घुमक्कड रहता है. बचपन में यह ज्यादा बोलता है- नये रास्ते, नई जगहें, नये लोग करता है। फिर धीरे-धीरे जिम्मेदारियां उसे शान्त रहना सिखा देती है। यह किताब उसी घुमक्कड को फिर से जगा देने की कोशिश है- बिना किसी जोर के, बिना किसी उपदेश के।

इस किताब के अध्याय किसी क्रमबद्ध यात्रा की तरह नहीं हैं. ये वैसे ही हैं जैसे जिंदगी चलती है- कभी तेज, कभी धीमी, कभी स्पष्ट, और कभी उलझी हुई. आप चाहें तो इसे शुरुआत से अन्त तक पढें, या किसी भी अध्याय से शुरू करें. सफर हर बार नया ही लगेगा।

अगर आप यह किताब इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि कहीं जाना चाहते हैं- तो आप सही जगह पर हैं। और अगर इसलिए उठा रहें हैं क्योंकि कहीं से लौट आयें हैं- तो भी। क्योंकि सफर केवल निकलने का नाम नहीं, लौटकर बदल जाने का नाम भी है।

इस किताब को पढते समय कोई जल्दबाजी न करें. इसे उसी रफ्तार से पढ़िए जिस रफ्तार से आप अपनी चाय पीते हैं, या खिडकी से बाहर देखते हैं। कुछ पंक्तियाँ आपको आगे बढाएंगी, कुछ आपको रोकेंगी. दोनों ठीक हैं। और अगर अन्त तक पहुँचते- पहुँचते आपके भीतर सवाल थोडे बढ जायें, जवाब थोडे शान्त हो जाएं, और दुनिया थोडी-सी बडी लगने लगे- तो समझिए यह किताब अपना काम कर चुकी है।

तो, आइये पन्ना पलटिए, सफर आपका इंतजार नहीं कर रहा- लेकिन वह हमेशा आपके लिये तैयार है।

समर्पण:-

उन सभी के लिये- जो सवाल पूछने से नहीं डरते, जो रास्ते में सीखने को तैयार रहते हैं, और जो मानते हैं कि दुनियां देखने से सोच बडी होती है।

आभार:-

मैं अपने माता-पिता और गुरुजनों के साथ ही साथ उन सभी यात्राओं का आभारी हूं, जिन्होंने मुझे रुककर देखना सिखाया। उन लोगों का जो रास्ते में मिले और बिना जाने कुछ सिखा गये. उन पुस्तकों का जिन्होंने मेरे अन्दर सवाल बोए, और उन यात्राओं का जिन्होंने उनके उत्तर खोजने की हिम्मत दी. और सबसे ज्यादा-उस जिज्ञासा का जो आज भी मुझे सीखते रहने के लिये प्रेरित करती है।

घुमक्कड जिज्ञासा के सीरीज में आपका यात्री साथी धर्मेन्द्र!
तो....मिलते हैं 'घुमक्कड़ जिज्ञासा?' सीरीज़ के अगले एपिसोड में, नए सबक, एक और झकझोर देने वाले सच के साथ। तब तक के लिए बने रहिए मातृभारती ऐप पर!