मौत का परमिट - 2 Gujaratinu Gaurav द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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मौत का परमिट - 2

पुराना गवाह

बारिश की टप-टप के बीच मंदिर के अंदर सन्नाटा पसरा हुआ था। विक्रम की निगाहें उस कोने में बैठे आदमी पर जमी हुई थीं। अंधेरे में उसकी आँखें चमक रही थीं—डरावनी नहीं, बल्कि ऐसी मानो वह बहुत कुछ जानता हो और बोलने का सही मौका ढूंढ रहा हो।

"तुम कौन हो?" विक्रम ने आवाज दी।

आदमी उठा। उसकी उम्र करीब पचास साल रही होगी, चेहरा झुर्रियों से भरा, बाल सफेद हो चुके थे, और उसने एक मोटा पुराना कोट पहना हुआ था जो पूरी तरह भीग चुका था। उसके हाथ में कागज़ों का एक बंडल था—वैसे ही पीले, वैसे ही पुराने, जैसे मंदिर के बक्से में मिले थे।

"तुम्हारे पास वही कागज़ क्यों हैं?" मेघा ने पीछे से आकर पूछा।

आदमी ने धीरे-धीरे आगे बढ़कर अपना परिचय दिया, "मेरा नाम रघुवीर सिंह रावत है। मैं इसी इलाके का रहने वाला था। गाँव सुरन से बारह किलोमीटर दूर एक पुराने फॉरेस्ट चौकी का रेंजर था।"

"थे?" विक्रम ने पूछा। "यानी अब नहीं हो?"

रघुवीर ने एक गहरी साँस ली। "साल 2011 के बाद मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। झूठे आरोप लगाए गए।"

विक्रम के दिमाग में बिजली कौंधी। 2011—वही साल, वही रिपोर्ट। उसने अपनी जेब से वह कागज निकाला जो बक्से में मिला था और उसे रघुवीर की तरफ बढ़ाया।

"यह रिपोर्ट 2011 की है। इसमें सुरन गाँव के पास 47 यात्रियों की मौत का जिक्र है। क्या तुम्हें इसके बारे में पता है?"

रघुवीर ने कागज को नहीं छुआ। उसने बस उसे देखा और फिर विक्रम की आँखों में देखा। "मैंने वह रिपोर्ट खुद लिखी थी।"

मंदिर के अंदर फुसफुसाहट फैल गई। कुछ लोग उठकर खड़े हो गए, कुछ ने और करीब आकर सुनना शुरू किया।

"तो तुम सच जानते हो?" सुशील ने आगे बढ़कर पूछा। "क्या हुआ था उस साल?"

रघुवीर ने अपनी जेब से एक पुरानी फोटो निकाली—धुंधली, पानी से खराब हुई, लेकिन उसमें एक टूटा हुआ रास्ता, बिखरे सामान, और कुछ शव स्पष्ट दिख रहे थे।

"यह तस्वीर मैंने 2011 की 12 सितंबर को ली थी," रघुवीर ने कहा। "उस दिन बिल्कुल आज की तरह बादल फटे थे। करीब चार सौ यात्री फँस गए थे। मुख्य रास्ता टूट गया था। लोगों ने यही पुराना ट्रैक पकड़ा—जो उस वक्त भी 'बंद' बताया जाता था। लेकिन बंद नहीं था। उसे जानबूझकर खोला गया था।"

"किसने?" विक्रम ने पूछा।

रघुवीर ने अपने कोट की जेब से एक और कागज निकाला। उस पर एक नाम लिखा था—प्रकाश चंद्र जोशी। नाम के नीचे लिखा था—तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट।

"यह वह आदमी था जिसने सुरन गाँव के पास एक नया डैम बनाने का प्रस्ताव रखा था। उसे उस प्रोजेक्ट के लिए फंड चाहिए था। और फंड पाने के लिए उसे एक 'बड़ी आपदा' चाहिए थी—ताकि केंद्र सरकार से अनुदान मिल सके।"

मेघा ने आश्चर्य से पूछा, "तो उसने जानबूझकर लोगों को मरने के लिए भेजा?"

"उसने जानबूझकर परमिट की सीमा तोड़ी। चार गुना ज्यादा परमिट बेचे। लोगों को इसी पुराने ट्रैक की तरफ धकेला। जब आपदा आई और 47 लोग मारे गए, तो उसने फंड माँगा। लेकिन जाँच के डर से उसने सारे रिकॉर्ड नष्ट करने का आदेश दे दिया।"

विक्रम ने वह कागज पढ़ा जो उसकी जेब में था—"सभी दस्तावेज़ नष्ट किए जाएं" और उसके नीचे अस्पष्ट हस्ताक्षर। अब उसे समझ आया कि वह हस्ताक्षर किसके थे।

"यह आदेश प्रकाश चंद्र जोशी ने ही दिया था," रघुवीर ने कहा। "और अब वही जोशी साहब इस राज्य के पर्यटन मंत्री हैं।"

मंदिर में एक गहरी सिसकी सुनाई दी। कोई रो रहा था। कोई भगवान का नाम ले रहा था। विक्रम के हाथ काँप रहे थे—गुस्से से या डर से, वह खुद नहीं बता सकता था।


बाहर अचानक एक तेज चीख सुनाई दी। सब चौंककर उछले। विक्रम ने तुरंत टॉर्च उठाई और बाहर भागा। चीख मंदिर के ठीक ऊपर से आ रही थी—जहाँ पहाड़ का एक खड़ा हिस्सा था।

"कौन है?" विक्रम चिल्लाया।

अंधेरे में कोई आवाज आई—महिला की, बेहद डरी हुई। "हमें बचाओ! हम फँस गए हैं!"

विक्रम ने ऊपर देखा। टॉर्च की रोशनी में चार लोग दिखे—तीन महिलाएँ और एक आदमी। वे एक टूटी हुई चट्टान के किनारे लटके हुए थे। बारिश की वजह से मिट्टी फिसल रही थी और वे धीरे-धीरे नीचे खिसक रहे थे।

"रुको! हिलना मत!" विक्रम ने चिल्लाया। उसने पीछे मुड़कर देखा। "अरुण, सुशील—तुम लोग आओ। किसी के पास रस्सी है?"

सुशील ने अपनी थैली खोली और एक मोटी रस्सी निकाली। "मैं हमेशा रखता हूँ," उसने कहा।

विक्रम ने रस्सी ली और अपनी कमर के चारों ओर बाँधी। ऊपर चढ़ना खतरनाक था—चट्टानें ढीली थीं, बारिश से गीली थीं, और कोई सहारा नहीं था।

"मैं भी आता हूँ," अरुण ने कहा।

"नहीं, तुम यहाँ रुको। अपनी बेटी को संभालो," विक्रम ने कहा और चढ़ने लगा।

हर कदम पर उसके पैर फिसल रहे थे। उसने अपनी उँगलियाँ चट्टानों में गड़ाईं और धीरे-धीरे ऊपर बढ़ा। पानी उसके चेहरे पर बराबर गिर रहा था, ठंड इतनी थी कि उसके हाथ सुन्न पड़ रहे थे। लेकिन वह रुका नहीं। दस मिनट की कठिन चढ़ाई के बाद वह उन चारों के पास पहुँचा।

पहली महिला ने उसका हाथ पकड़ा। उसकी उम्र शायद पच्चीस साल थी, और उसके हाथ में एक छोटा सा नोटबुक था जिसे उसने कसकर पकड़ रखा था।

"मैं अंजलि हूँ," उसने काँपती आवाज में कहा। "मैं एक पत्रकार हूँ। ये तीनों मेरे साथ थे—हम सब एक ट्रैवल ग्रुप में थे।"

विक्रम ने बाकी तीनों को रस्सी से बाँधा और उन्हें नीचे उतारा। सबसे आखिरी में उसने अंजलि को नीचे भेजा। जब वह खुद नीचे उतरा, तो उसकी साँसें तेज थीं और शरीर थकान से लद गया था।

"बहुत धन्यवाद," अंजलि ने कहा, और विक्रम से कसकर हाथ मिलाया। "तुमने हमारी जान बचाई।"

"बताओ, तुम लोग कहाँ से आ रहे थे?" विक्रम ने पूछा।

"हम मुख्य रास्ते पर थे जब बादल फटे। सब भागने लगे। हम चारों यहाँ आ गए, लेकिन रास्ता भूल गए। फिर चट्टान फिसली और हम ऊपर फँस गए।"

"क्या तुम्हें कुछ पता है—परमिट की गड़बड़ी के बारे में?" मेघा ने आगे बढ़कर पूछा।

अंजलि ने अपनी जेब से वह नोटबुक निकाली। "मैं इसी वजह से यहाँ आई थी। मुझे कुछ सूचनाएँ मिली थीं कि पिछले तीन सालों से इस तीर्थ यात्रा के परमिटों में बड़ा घोटाला चल रहा है। मैं उसकी जाँच कर रही थी।"

उसने नोटबुक खोली और विक्रम को कुछ पन्ने दिखाए। उसमें नाम, तारीखें, परमिट नंबर और पैसे के लेन-देन के हिसाब थे—सब स्पष्ट, सब संख्याओं में।

"यह रिकॉर्ड मुझे एक ट्रैवल एजेंट से मिला था जिसने अपनी जान का डर होने के बावजूद यह जानकारी लीक की," अंजलि ने कहा। "पिछले साल अकेले इस रूट पर 12,000 से ज्यादा परमिट बेचे गए—जबकि आधिकारिक सीमा केवल 3,000 थी। इस साल तो संख्या और भी बढ़ गई।"

रघुवीर ने अंजलि की ओर देखा और फिर विक्रम से बोला, "देखा? यह कोई नई बात नहीं है। 2011 में भी ऐसा ही हुआ था। जोशी साहब ने वही पैटर्न दोहराया है।"

"लेकिन क्यों?" विक्रम ने पूछा। "अगर 2011 में उन्हें पकड़े जाने का डर था, तो फिर से ऐसा करने की हिम्मत कैसे हुई?"

रघुवीर ने करीब आकर धीमी आवाज में कहा, "क्योंकि 2011 में उन्होंने सबकुछ दबा दिया था। कोई गवाह नहीं बचा। मुझे नौकरी से निकाल दिया गया और बाकी सबको चुप करा दिया गया। एकमात्र व्यक्ति जो बचा था—वह मैं हूँ। और अब जोशी साहब मंत्री हैं। वे चाहते हैं कि इस बार और बड़ी आपदा आए—ताकि वे और भी बड़ा फंड पा सकें। नए डैम प्रोजेक्ट के लिए, जिसमें करोड़ों का घोटाला होगा।"

"और इस बार उन्होंने और भी ज्यादा परमिट बेचे," अंजलि ने कहा। "ताकि मौतों की संख्या इतनी बड़ी हो कि कोई भी सरकार इस त्रासदी को नज़रअंदाज न कर सके। और फिर वे आपदा राहत कोष के नाम पर भारी-भरकम राशि हड़प सकें।"

विक्रम खड़ा था और उसके पैरों के नीचे की जमीन हिल रही थी—या तो पहाड़ हिल रहा था, या फिर उसका खुद का विश्वास। उसने सोचा—मैं एक सामान्य आदमी हूँ। मैं तो बस शांति पाने आया था। लेकिन अब मैं उस सबके बीच हूँ जो मैंने कभी सोचा भी नहीं था।


रात भर बारिश होती रही। मंदिर में सब लोग एक-दूसरे से सटकर बैठे, ठंड से बचने की कोशिश कर रहे थे। विक्रम ने अपनी जैकेट उतारकर आराध्या को ढक दी, क्योंकि बच्ची का बुखार अभी भी नहीं उतरा था।

"तुम्हारी बहुत मेहरबानी," अरुण की पत्नी ने कहा, उसकी आँखों में आँसू थे। "हम आपको कभी नहीं भूलेंगे।"

विक्रम ने कुछ नहीं कहा। वह थका हुआ था, और उसके दिमाग में सवालों का अंबार था। उसने रघुवीर को बुलाया और पूछा, "गाँव सुरन में अभी क्या है?"

"बिल्कुल खंडहर," रघुवीर ने कहा। "लेकिन वहाँ एक पुराना फॉरेस्ट कार्यालय है। मैंने उसमें 2011 के सारे असली दस्तावेज़ छिपा दिए थे—जो जोशी ने नष्ट करने का आदेश दिया था। वे आज भी वहाँ हैं।"

"तो हम उन्हें ले सकते हैं?"

"हाँ। लेकिन रास्ता बहुत खतरनाक है। और अब बारिश की वजह से वह और भी मुश्किल हो गया है। इसके अलावा... मुझे नहीं पता कि जोशी के आदमी वहाँ पहुँच गए हैं या नहीं।"

"क्या मतलब?"

रघुवीर ने चारों ओर देखा और फिर धीरे से बोला, "पिछले हफ्ते मैंने सुना था कि जोशी के कुछ निजी सहायक सुरन की तरफ गए हैं। शायद वे दस्तावेज़ ढूंढ रहे हैं। अगर वे मुझसे पहले वहाँ पहुँच गए, तो सारा सबूत नष्ट हो जाएगा।"

विक्रम ने फैसला किया। "सुबह होते ही हम सुरन की ओर बढ़ेंगे। हमें वे दस्तावेज़ लाने ही होंगे।"

"तुम पागल हो?" अरुण ने विरोध किया। "हमारी बच्ची बीमार है, लोग थके हैं—और तुम एक पुराने गाँव की ओर जाना चाहते हो? वहाँ तो कुछ नहीं है!"

"अगर हमने सबूत नहीं लाए तो यह त्रासदी फिर से होगी," विक्रम ने कहा, उसकी आवाज दृढ़ थी लेकिन थकान साफ झलक रही थी। "तुम्हारी बेटी आज बीमार है, कल कोई और होगा। परमिट की गड़बड़ी ने हजारों लोगों को इस पहाड़ पर फँसाया है। अगर हम सच को नहीं उजागर करेंगे, तो यह त्रासदी दोबारा होगी। और अगली बार शायद तुम्हारी बेटी उन 47 लोगों में से एक हो।"

अरुण चुप हो गया। उसने अपनी बेटी को गोद में उठाया और उसके सिर पर हाथ फेरा।

"मैं तुम्हारे साथ हूँ," अरुण ने कहा। "लेकिन मेरी बेटी की ज़िम्मेदारी मेरी है।"

"और मेरी ज़िम्मेदारी तुम सबकी है," विक्रम ने कहा, हालाँकि उसे पता था कि वह शायद यह वादा पूरा न कर सके।


सुबह पाँच बजे, बारिश कम हुई थी लेकिन बादल छाए हुए थे। सूरज नहीं निकला था। अंधेरा कम हुआ था, लेकिन आसमान सीसे जैसा भारी लग रहा था।

विक्रम ने सबको इकट्ठा किया। उसने रघुवीर, मेघा, सुशील और अंजलि को अपने साथ लेने का फैसला किया। बाकी लोग—जिनमें अरुण, उसकी पत्नी और बच्ची शामिल थे—मंदिर में रुकने वाले थे जब तक कि उन्हें कोई रास्ता न मिल जाए।

"हम जल्दी लौटेंगे," विक्रम ने अरुण से कहा। "बच्ची का ख्याल रखना।"

"तुम सावधान रहना," अरुण ने कहा। "विक्रम जी... मेरी बेटी को तुमने बचाया। अगर तुम्हें कुछ हुआ..."

"कुछ नहीं होगा," विक्रम ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन मुस्कान अधूरी रह गई।

पाँचों ने पुराने ट्रैक पर आगे बढ़ना शुरू किया। रास्ता बहुत खराब था—कीचड़, पत्थर, टूटी शाखाएँ, और कहीं-कहीं तो पूरा रास्ता ही नहीं बचा था। रघुवीर सबसे आगे चल रहा था, क्योंकि उसे यह इलाका अच्छी तरह याद था।

"बस दो किलोमीटर और," रघुवीर ने कहा। "उस पहाड़ी के पार सुरन है।"

लेकिन जैसे ही वे पहाड़ी की चोटी पर पहुँचे, विक्रम ने नीचे कुछ देखा—धुआँ। गाँव सुरन से धुआँ उठ रहा था।

"रुको!" विक्रम ने रघुवीर का हाथ पकड़ा। "नीचे देखो।"

सबने नीचे देखा। सुरन गाँव के खंडहरों के बीच एक जीप खड़ी थी, और तीन-चार आदमी किसी इमारत के पास आग जला रहे थे—कागज़ों को जला रहे थे।

"वे दस्तावेज़ जला रहे हैं!" रघुवीर चिल्लाया। "हमने देर कर दी!"

विक्रम ने देखा। आग तेज थी, लपटें आसमान को छू रही थीं। अगर वे रुके तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा। उसने अपनी टॉर्च बुझाई और कहा, "हमें नीचे उतरना होगा। अभी।"

"लेकिन हम पाँच हैं और वे चार हैं," सुशील ने कहा। "और उनके पास शायद हथियार भी हों।"

"तो भी," विक्रम ने कहा। "हमें सच को बचाना है।"

वह नीचे उतरने लगा। उसके पीछे बाकी भी आए। हर कदम पर पत्थर खिसक रहे थे, लेकिन उसने नजरें उस आग पर जमा रखी थीं जो उनके जीवन के सबूतों को भस्म कर रही थी।

जब वे गाँव के करीब पहुँचे, तो विक्रम ने एक खंडहर की दीवार के पीछे छिपकर देखा। चार आदमी थे—सभी ने सफेद कमीज़ और काली पैंट पहनी थी, जैसे सरकारी अधिकारी हों। उनमें से एक ने कुछ फाइलें उठाईं और आग में फेंक दीं।

"बहुत हो गया," रघुवीर ने फुसफुसाया। "अब बचा क्या है?"

तभी अंजलि ने अपनी नोटबुक में कुछ लिखा और कहा, "मैंने पहले ही कुछ दस्तावेज़ फोटो कर लिए थे जो मुझे ट्रैवल एजेंट से मिले थे। लेकिन मुख्य रिकॉर्ड—2011 का—जल गया तो सब खत्म है।"

विक्रम ने एक गहरी साँस ली। "नहीं, सब खत्म नहीं हुआ। मेरी जेब में वह रिपोर्ट है—2011 की। और रघुवीर के पास वह फोटो है। लेकिन सबसे बड़ा सबूत—वह उस फाइल में होगा जिसमें जोशी के आदेश हैं।"

"वह तो जल गया," सुशील ने कहा।

"हो सकता है," विक्रम ने कहा। "लेकिन देखो—वह आदमी जो आग पर खड़ा है... उसने एक फाइल अपनी जेब में रखी है। वह सबसे जरूरी फाइल है।"

सबने देखा। विक्रम सही था—एक आदमी ने अपनी जेब में एक पीली फाइल रख ली थी, शायद वह जो सबसे महत्वपूर्ण थी।

"हमें वह फाइल चाहिए," विक्रम ने कहा।

"और तुम इसे कैसे लोगे?" मेघा ने पूछा। "वे चार हैं, हम पाँच हैं, पर वे सशस्त्र हैं और हम खाली हाथ हैं।"

विक्रम ने सोचा। उसने कुछ पत्थर उठाए और दूसरी तरफ फेंके। पत्थरों की आवाज़ से उन चारों का ध्यान वहाँ गया। जैसे ही वे उस तरफ मुड़े, विक्रम दौड़कर उस आदमी के पास गया जिसकी जेब में फाइल थी, उसे पीछे से धक्का दिया, और फाइल छीन ली।

आदमी जमीन पर गिरा और चिल्लाया। बाकी तीनों पलटे। विक्रम भागा, उसके पीछे मेघा, अंजलि, सुशील और रघुवीर दौड़ने लगे।

"पीछा मत करो!" विक्रम ने चिल्लाया। "हमें निकलना है!"

वे खंडहरों के बीच भागे। पीछे से चीखें आ रही थीं, और किसी ने एक गोली चलाई—धमाके की आवाज पहाड़ों में गूँज उठी। गोली विक्रम के सिर के ऊपर से निकल गई।

"नीचे झुको!" रघुवीर चिल्लाया।

वे सब नीचे झुककर भागे। विक्रम का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसकी साँसें तेज थीं, पैरों में जान नहीं थी, लेकिन उसने हार नहीं मानी। वह उस फाइल को कसकर पकड़े हुए था—मानो उसकी अपनी जिंदगी उस फाइल पर टिकी हो।

गाँव से बाहर निकलकर वे ट्रैक पर आ गए। पीछे कोई नहीं आया—शायद डर गए, या शायद उन्हें पता था कि बारिश फिर से शुरू होने वाली है और यह ट्रैक खतरनाक हो जाएगा।

विक्रम ने रुककर फाइल खोली। उसमें 2011 की पूरी रिपोर्ट थी—नाम, तारीखें, जोशी के आदेश, और सबसे ऊपर एक पुराना मुहर लगा हुआ था—जिला मजिस्ट्रेट, जोशी के नाम से।

"हमें यह मिल गया," विक्रम ने हाँफते हुए कहा। "अब असली लड़ाई शुरू होगी।"

लेकिन अभी भी वह पहाड़ पर थे। उन्हें मंदिर लौटना था, सबको सुरक्षित जगह ले जाना था, और इस सबूत को बाहर लाना था—बाहर की दुनिया तक। वह खड़ा हुआ, थकान से लड़खड़ाया, लेकिन उसके चेहरे पर पहली बार एक दृढ़ता आई।

"चलो," उसने कहा। "हम लौटते हैं।"

जैसे ही वे पलटे, आसमान से बारिश फिर शुरू हो गई—इतनी तेज कि दस फीट आगे कुछ दिखना बंद हो गया।

और तभी ऊपर पहाड़ से एक भयानक आवाज आई—बड़ी-बड़ी चट्टानें खिसक रही थीं। उन्होंने ऊपर देखा। पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा ढह रहा था—सीधे उनके ट्रैक पर।


EPISODE 2 END


अगले एपिसोड में:
पहाड़ ढह रहा है—क्या विक्रम और उसकी टीम बच पाएगी? मंदिर में फँसे बाकी लोगों का क्या होगा? और जोशी के आदमी अब उनका पीछा करने के लिए और आदमी भेजेंगे—क्योंकि एक बार सबूत हाथ लग गया तो उनकी पूरी साजिश खतरे में है।