अहमदाबाद के चर्चे Devendra Kumar द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

अहमदाबाद के चर्चे

अहमदाबाद के चर्चे          

 अहमदाबाद में बिताये उन दिनों को भुलाना बड़ा मुश्किल है. तब वह मुसीबत थी कठिन समय था  केवल मेरा ही नहीं बल्कि सभी का. वे कोई सामान्य दिन नहीं थे साधारण समय नहीं था. उन दिनों की यादों पोटली से ज्यादा वह यादों की ऐसी गुल्लक है  तरह जिसमे  तरह तरह के पुराने सिक्के हों, जो अब बाज़ार नहीं चलते पर पर उनकी खनक मन में गुदगुदी करती है.  

   बावन साल यूँ ही गुजर गए है. इतनी पुरानी बातें हैं जो अभी तक मन के तहखानों के किसी कोने में बंधी पड़ी थी. उन्हें ही निकाल कर यह लिख रहा हूँ. समय है नवनिर्माण आन्दोलन का. चलो अब सिलसिले से  उनके चर्चे शुरू करता हूँ

  मैं कई बरस त्रिपुरा के मुश्किल हालातों में तीन साल अपनी सबसे पहली और कठिन फील्ड सर्विस कर  पीस स्टेशन पोस्टिंग पर  नए नए ग्रुप सेंटर सीआरपीएफ दिल्ली में पोस्टिंग पर आया ही था. आशा थी कि अगले दो तीन साल खतरों से दूर चैन से काम करते गुजरेंगें. त्रिपुरा में मैं और मेरी इ0 कम्पनी 25 बटालियन ने भारत पाक युद्ध में अगरतला एअरपोर्ट सुरक्षा में अच्छा काम किया था, पुलिस मैडल मिलने के साथ साथ, यह घर के पास की राजधानी पोस्टिंग मेरे लिए दूसरा बड़ा इनाम ही तो था. ग्रुप सेंटर उस समय  नज़फगढ़ गाँव से आगे झडोदा कलां गाँव के ग्रामीण क्षेत्र में था, चारों तरफ बस खेत ही खेत थे.

 मुझे आते ही कंपनी कमांडर हेड क्वार्टर की ड्यूटी मिली जहाँ काम तो काफी करना पड़ता था पर त्रिपुरा की तरह कोई  जान का खतरा, गोलियों डर, भाषा की दिक्कत या इधर उधर के मूवमेंट का जिसमें बिस्तर बंधा रहता था, का कोई डर नहीं था. उम्र में मैं सबसे छोटा अफसर था, सीओ भी कभी कभी  मुझे ‘बेबी’ कहते थे, बाकी सभी अफसर मुझ से बड़े और शादीशुदा थे व परिवार के साथ रह रहे थे.

अचानक जनवरी 1974 के पहले सप्ताह में बड़ा अलग तरह का आर्डर आया कि हमारे तथा कुछ अन्य ग्रुप सेंटरों को एक एक अल्पकालिक या ‘एड होक कंपनी’ बना कर अगले 48 घंटे में क़ानून व्यवस्था के लिए गुजरात  की राजधानी अहमदाबाद  में  ड्यूटी के लिए भेजना था. वहीँ  छ कंपनियों को मिला कर  यह एक ‘एड होक’ बटालियन कर्नल छतर सिंह कमांडेंट, ग्रुप सेंटर, देवली, की कमांड में कार्य करना था.

 ग्रुप सेंटर से  इस तरह की कम्पनी  बनाने में बिना ट्रेड्स-मेन जैसे मोची, धोबी, कारपेंटर, टेलर आदि को,  पूरी करने के लिए जनरल ड्यूटी  वालों के साथ साथ  शामिल करना पड़ा. यह एक खिचड़ी कंपनी बन पाई थी.

 ग्रुप में बाकी सभी कंपनी कमांडर मेरे से ज्यादा अनुभवी थे पर सभी ने इस ड्यूटी से बचने के लिए सरकारी काम या परिवार की समस्या बता कर अपना  पीछा छुड़ाना शुरू कर दिया, सो जूनियर मोस्ट मुझे, ‘बची कुची का यार मुकन्दा’ समझ यह जिम्मेदारी लाद दी गयी थी.

चलने से पहले मैंने अख़बार या रेडियो पर जो अहमदाबाद गुजरात के विद्यार्थियों के आंदोलन के बारे में पढ़ा  गुना था सबको ब्रीफ किया, यह समझाया कि विद्यार्थी कम उम्र के जोशीले और भावुक होते हैं, वे अपराधी नहीं हैं सो हमें ठंडे दिमाग से उनसे पेश आना है, हमारा व्यवहार और आचरण ठीक होना चाहिए, ड्रेस हमेशा ठीक पहनें, अपनी सीआरपीएफ  की सिखलाई और ड्रिल अपनाएं जिसमें ‘यूज़ ऑफ़ मिनिमम फ़ोर्स’ है, गोली भी  किसी  को मारने के लिए नहीं होती, केवल उपद्रवी को अशक्त या ज़ख़्मी करने के लिए पैरों पर  चलानी है. जोश रहे पर होश न खोएं, फालतू उत्तेजित न हों. और सबसे ज़रूरी ट्रेड्स-मेन को उनकी रैंक का सम्मान देकर ड्यूटी करनी है. एक  मोची हवलदार रैंक का था, एक टेलर सब इंस्पेक्टर था, वैसे थोड़ी ट्रेनिंग तो सभी की होती ही है. पर इस तरह की ड्यूटी के लिए पहले लगाने पड़े थे.   

 मैं इस मिली जुली खिचड़ी कंपनी का कंपनी कमांडर बन उसे लेकर  ट्रेन से गुजरात के उस समय चल रहे  नव निर्माण  आन्दोलन से त्रस्त राजधानी अहमदाबाद दिए समय से पहुंचा था. हमारी ऑपरेशन ब्रांच ने गुजरात पुलिस को हमारे चलने की पूर्व सूचना भेज दी थी. मैं इस  तरह की क़ानून व्यवस्था  स्थापित करने की ड्यूटी करने पहली बार निकला था.

  अहमदाबाद  स्टेशन पर सीआरपीएफ का बड़ी बेसब्री से इंतजार हो रहा था. रेलवे स्टेशन पर गुजरात पुलिस की दो बसों एक जीप के साथ एक पुलिस इंस्पेक्टर ने हमारा स्वागत किया, वहां से हमें सीधे  सबसे अधिक संवेदन शील कालूपुर दरियापुर एरिया में ले गए. यहाँ भी मैंने चलने से पहले इंस्पेक्टर से इलाके और ड्यूटी के बारे में पूरी जानकारी देने को पूछ लिया था, जो  इंस्पेक्टर ने हमें  गुजराती मिक्स्ड हिंदी में समझाया था. जितनी भी दूसरी जगह से कम्पनी आनी थी, वे सब हमारे बाद पहुंची थी अतः हम सबसे पहले थे. इसलिए सबसे संवेदन शील एरिया दिया था.

दोपहर का समय था हमारी गाड़ियाँ कालूपुर पुलिस स्टेशन पर जाकर रुकी वहां उन्हें छः सेक्शन की ज़रूरत थी हमने उन्हें उतारा गया, हमारे लोग ड्रेस और हथियार में खट खट कर गाडी से उतरे, सेक्शन वाइज लाइन में खड़े हुए, लोग बागों ने  यह सब देखा और हमें सुनाई दे रहा था चिल्ला कर दूसरों को उत्तेजित हो कर कह रहे थे –“सीआर पी  लश्कर आवी गई छे , ओ मोटा भाई, लश्कर आवी गई छे ”  शायद गुजरात में सीआरपीएफ को पहले ड्यूटी पर आने की कभी ज़रूरत नहीं पड़ी होगी. ढीली ढाली अहमदाबाद पुलिस से हमारा चलना, मार्च कर चलना  जनता को अलग प्रभावित कर रहा होगा. हमारे पास एक भी गुजराती  जानने वाला सिपाही या अन्य रैंक नहीं था, सो मैंने पुलिस इंस्पेक्टर से अनुरोध किया कि कम से कम एक एक गुजराती भाषा जानने वाला  सिपाही हर पोस्ट पर दिया जाए ताकि यहाँ की  भाषा हमारी  ड्यूटी के आड़े न आये. तुरंत ही यह इंतजाम कर दिया. इस मामले में दोनों पुलिस इंस्पेक्टर हर मामले में रहने सहने या बात समझने समझाने और किसी भी ज़रूरत के लिए आगे  बढ़ कर सहायता दे रहे थे. शाम तक सभी पोस्टों को रहने की जगह ठीक से दी गयी. मेंरे लिए एक अच्छी पुलिस जीप जिसमें नीली लाइट तथा हूटर आदि लगे थे, पूरे समय के लिए दे दी गयी थी. इसका ड्राईवर कांस्टेबल इब्राहिम काफी चतुर चालाक अच्छा ड्राईवर था. मुझे रहने के लिए दरिया पुर पुलिस चौकी के नज़दीक एक छोटे प्राइवेट गेस्ट हाउस में जगह दी, इंस्पेक्टर खुद छोड़ कर आया था. वह काफी ख़राब इलाका माना जाता था, भीड़ भाड़ का मिक्स्ड पापुलेशन का इलाका था, कमरा ठीक था वहीँ एक केयर टेकर  या चौकीदार अपने परिवार के साथ नीचे रह रहा था, दंगा फसाद के कारण सारे कमरे खाली पड़े थे. मैं एक सिपाही को साथ ले कर आया था, उसने पहली मंजिल के कमरे में सामान रखा, सामान खुलवाया, बिस्तर आदि ठीक कराया व पानी आदि देकर अपने स्वयं के इंतजाम के लिए वह दरियापुर पुलिस चौकी चला गया. वहां भी दो सेक्शन का पोस्ट बनाया गया था. भीड़ भाड का इलाका था, वहां अन्दर काफी झगडे होते थे, हिंदू मुस्लिम दंगे भी वहां हो चुके थे अपराध के लिए लिये भी इलाका बदनाम था. वहीँ नाके पर एक पुलिस चौकी थी उसमें हमारी एक पोस्ट नियुक्त की गयी थी.

 उसी इलाके में एक छोटे दुमंज़ले मकान में मुझे रहने की जगह पुलिस ने दी. शाम हो गयी थी  मैं अकेला  सुनसान  व कुछ मनहूस से उस गेस्ट हाउस के दुमंज़ले के कमरे में था, पहले से ही थोडा असहज था. थोड़ी देर में नीचे से चौकीदार की एक  बीस बाईस वर्ष की जवान बेटी घुटने से ऊपर तक की मैली कुचेली स्कर्ट पहने खाने के लिए पूछने आयी, और मुझे ऐसे घूरती जा रही थी जैसे मैं आदमी न होकर कुछ दूसरे लोक का प्राणी हूँ, मैंने कहा सिर्फ पानी का एक जग और एक कप चाय  दे दो. और कुक को भेज दो, उसने बताया कि आजकल कोई कुक नहीं है, गाँव चला गया है. थोड़ी देर बाद चाय लेकर आई, दे कर गयी नहीं वहीँ मुझे चाय पीते पीते भी टेढ़े खड़े हो कर देखती ही जा रही थी और मैं उसका जाने का इंतजार कर रहा था. अनजान जगह, आन्दोलन चल रहा है, दंगों का समय और यह ऊंची स्कर्ट  पहने अजीब सा प्राणी, मैं मन में आशंकित सा हो गया. कहीं यह लड़की भी आन्दोलन कारी हो या कम से कम उनकी मददगार, या जासूस  हो सकती है . मैंने उसे बता दिया  कि ‘मुझे खाना नहीं चाहिये. वह अब खुद न आकर और अपने पिता को एक बार भेज दे.’

 मैंने लड़की को जाने के लिए कहा और पोस्ट कमांडर को वाकी-टाकी  से कहा लंगर से थोड़ी सब्जी और एक रोटी सहायक के साथ भेज दो और व सहायक अपना बिस्तर भी यहीं लेता आये और वह  बस उस रात रात ही  वहां सहायक के साथ रहने वाला है. मैं निर्णय ले चुका था मैं इस उजड़े गेस्टहाउस में  हरगिज़ नहीं रहूँगा. यहाँ रह कर ड्यूटी करना मुश्किल होगा असुरक्षित होगा.

असल में  अचानक  ही मैं वहां असहज और असुरक्षित महसूस कर रहा था भीड भाड और पतली गली दूसरी मंजिल के एक कमरे में बंद, एक लड़की और उसके मां बाप, पता नहीं लड़की को मेरी यूनिफार्म में, पास रखी होल्स्टर में मेरी पिस्टल, या मेरे ‘वाकी टाकी’ में धीरे धीरे चल रही ‘अल्फ़ा सीरा सीरा डेल्टा ’ जैसी  भाषा में चल रहे मेसेज और वार्तालाप की धीमी आवाज़, क्या चीज़ ऐसी अजूबा लग रही थी कि वह बस अजीब तरह से तकती जा रही थी जाने का नाम नहीं ले रही थी. थोड़ी देर में  सहायक आ गया था. मुझे  उस लड़की को वहां से जाने के लिए थोडा सख्ती से कहना पड़ा था. यात्रा के बाद अहमदाबाद की वह पहली रात अच्छी नहीं कटी थी. सुबह होते ही मैं सामान उठवा कर दरियापुर नाका पुलिस पोस्ट पर आ गया वहीँ लंगर की चाय पी.

 दरियापुर चौकी के बाहर खाली जगह देख कर मैंने वहीँ अपने लिए टेंट लगवा लिया सो रहने का काम चलाऊ  इंतजाम हो गया था, यहाँ से कालूपुर पुलिस स्टेशन भी नजदीक ही था, दूसरी पोस्टें भी आस पास ही थी, अतः कमांड कंट्रोल सुविधाजनक हो गया था, इस इलाके में हम सबकी उपस्थिति उपद्रवी लोगों को चुभ रही थी, उनके आवागमन और इकट्ठे होने पर नकेल डल रही थी, अतः सड़क पर न आकर उन्होंने घरों की छत से हमारे ऊपर खूब पथराव शुरू किया नारे बाजी की. शायद उन्हें लगता रहा होगा कि बचने के लिए हम चौकी वालों की तरह बिल्डिंग के अन्दर शरण लेंगे, मैंने पोस्ट कमांडर को आदेश दिया कि तुरंत एक्शन लो, हमारे सिपाहियां ने डंडा और बॉडी शील्ड लेकर और साथ में गुजरात पुलिस के सिपाहियों का लेकर उनको पकड़ने की ठानी, एक  पार्टी दो  गुजरात पुलिस के सिपाहियों के साथ पास  की छत जहाँ से पत्थर आ रहे  थे भेजी, और दूसरी पार्टी नीचे सड़क फैला दी, नीचे वाली पार्टी के साथ मैं भी रहा, उपद्रवी बचने के लिए एक छत से दूसरी छत पर कूदते भागते जा रहे थे और पकडे नहीं जा रहे थे. हमारी पार्टी भी उनका पीछा करती जा रही थी.

 गली के अंत में जैसे ही उनमें से कुछ  नीचे सड़क पर उतरे उन्हें  सड़क पर फैली हमारी  पार्टी ने पकड़ लिया और  हमने आकर उन्हें पुलिस चौकी के हवाले कर दिया. उस दंगा ग्रस्त इलाके में  ऐसा पहली बार हुआ था इसका बड़ा अच्छा असर पड़ा. पुलिस चोकी वाले गुजरात  पुलिस के सिपाही बड़े खुश थे, क्योंकि पहले उन पर जब पत्थर  बरसते थे वे ड़रते छिपते थे, पहली बार शेर को सवा शेर मिला था, उस शाम पकडे उपद्रवी जमीन पर उनके सामने बैठे उनको छोड़ने के लिए मिन्नत कर रहे थे. घरों और बालकोनियों से उन्हें देख देख हंसी उड़ा रहे थे.

 इसके बाद उस  दरियापुर चौकी  के हमारे इलाके में पथराव लगभग बंद हो गया था, उपद्रवी विद्यार्थियों ने अपनी उपद्रवी हरकतों  के लिए कोई अन्य इलाका ढूंढ लिया होगा. क्योंकि ओवर आल आन्दोलन तो  दिन ब दिन तेज़ होता ही जा रहा था, शाम को पुलिस कण्ट्रोल रूम से पता लगता था कि कितनी जगह आगजनी हुई, कहाँ  तौड़ फोड़ हुई, कहाँ कर्फ्यू लगे, कहाँ और कितनी बस फूंकी, तूफानी टोलों ने कहाँ पेट्रोल भरी बोतलों में बत्ती में आग लगा पुलिस कर्मियों को ज़ख़्मी किया.( इस देसी जुगाड़ का नाम ‘मोलोतोव कोकटेल था.), दैनिक मरने और ज़ख़्मी होने वालों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती जा रही थी. पर पुलिस कण्ट्रोल रूम का शाम को सिचुएशन रिपोर्ट वाले हेड कांस्टेबल कनुभाई पटेल का  सब कुछ  ख़राब ही ख़राब  बता कर आखिरी वाक्य फिर भी  होता था, ‘और सबे शांति छे ’  यह अंतिम वाक्य सुन कर हंसी आती थी, शांति वहां कहाँ थी.

हमारी  सीआरपीएफ  सभी कंपनिया आ गयी थी, कमांडेंट कर्नल छत्तर सिंह जो पुराने अनुभवी और कानून, हिदायतों और ड्रिल को मानने वाले थे, भी आ चुके  थे, सी ओ ने आकर सब पोस्टों को देखा भाला, उन्होंने बटालियन का  हेड क्वार्टर कमिश्नर ऑफ़ पुलिस से थोडा आगे शाही बाग  स्टेडियम के इलाके में रखा , वहां काफी सुविधाजनक जगह थी. दो अफसरों के बीच एक रूम भी मिल गया था, बटालियन हेड क्वार्टर  अच्छी तरह से सेट हो गया था.  इस प्रकार एक सप्ताह टेंट में रहने के बाद रहने मेरी  खाने पीने, रहने की व्यवस्था ठीक हो गयी थी.

हम सुबह ही ज़ल्दी ब्रेक फ़ास्ट कर अपने अपने जिम्मेदारी के इलाके में पहुँच जाते थे, मेरा कालूपुर दरियापुर इलाका सबसे संवेदनशील था मगर सारी पोस्टें पास पास थी, सो कालूपुर पुलिस स्टेशन में ही मैं देर शाम तक मौजूद रहता. इसी उग्र आन्दोलन के दौर में एक दिन अचानक सरप्राइज चेक करते करते पुलिस कमिश्नर एरिक रेनिसन आये, हम सब से बात चीत की, उस समय  पुलिस स्टेशन पर मैं और थाना प्रभारी एसएचओ जडेजा ही थे. हाल चाल पूछ कर उन्होंने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि हमारे  अत्यंत सवेंदन शील इलाके में सीआरपीएफ आने के बाद स्थिति अच्छी रही है पुलिस की  फायरिंग की ज़रूरत नहीं पड़ी. न ही मौंते हुई उन्होंने बताया जब कि गुजरात पुलिस द्वारा दूसरी जगहों पर बहुत अधिक फायरिंग होने से बहुत अधिक प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों मर और ज़ख़्मी हो गए हैं. और इस कारण से  स्थिति और बिगड़ती जा रही है जो बेहद चिंता का विषय है. पुलिस कार्यवाही की बहुत निंदा हो रही है. पब्लिक प्रॉपर्टी का नुकसान हुआ है वह कम है और पुलिस की फायरिंग नुक्सान को देखते न्याय संगत या उचित नहीं ठहराया का सकता, इस लिए मेरा आदेश है आज पूरे अहमदाबाद में ‘नो फायरिंग डे’ का आदेश दिया हुआ है. सभी अधिकारी डीसीपी समेत अपने अपने ऑफिस में न बैठ कर अपने अपने इलाके में गश्त करेंगे किसी भी हालत में पुलिस को गोली नहीं चलानी है. वे बड़े चिंतित नज़र आ रहे थे.

उनके चले जाने के बाद मैं अपनी पोस्टों पर एक बार फिर विजिट किया, सब को पूरे चौकस और सावधान रहने के लिए और कमिश्नर के हुकुम ‘नौ फायरिंग डे’ का सख्ती से पालन करने को बता दिया. मैं सब जगह बता कर कालूपुर पुलिस स्टेशन पहुंचा वहां इंस्पेक्टर जडेजा के अलावा डीसीपी खेमानी और एसीपी दारूवाल बैठे हुए थे, मैंने अपनी पोस्टों पर जो रेनिसन  साहेब के आदेश को नीचे तक ब्रीफ करने के बारे में उनको बता दिया था.

डीसीपी ने कुछ नीरस भाव से सुना और बेमन से कहा ‘ठीक है, ठीक है’. एस.एच.ओ. इंस्पेक्टर जडेजा ने सबके लिए चाय मंगवाई और उन्होंने अपनी अलमारी से बिस्किट और नमकीन, भुनी मूंगफली (सिंगदाना) निकाले. चाय चल रही थी, साथ साथ बातें  भी चल रही थी. डीसीपी खेमानी आन्दोलन के बारे में तथा गुजरात में चल रही राजनीति के बारे में अपनी राय बता रहे थे.

कुछ ही देर हुई थी उसी मुख्य सड़क के अगले बड़े चौराहे की तरफ से काफी जोर जोर नारेबाजी और शोर शराबे की आवाजें सुनाई दी. चौराहे से बिलकुल नजदीक भी हमारी एक बैंक के लिए स्टेटिक पोस्ट थी, मैं नारेबाज़ी  सुनते ही खड़ा हुआ, डीसीपी को बताया कि मुझे पोस्ट पर चले जाना चाहिए. वे अपने विचार बताने में इतने मशगूल थे, उन्होंने हाथ से इशारा कर बैठने के लिए कहा और अपना लेक्चर जारी रखा. मेरे कान आने वाली आवाजों  पर थे जिधर से नारेबाजी और शोर शराबा निरंतर बढता ही जा रहा था.

थोड़ी देर के बाद फिर जाने  के लिए उद्यत हुआ फिर से मुझे  बैठा दिया, मेरे पास बैठे एसीपी दारूवाला भी अब चिंतित दिख रहे थे, मौके पर जाना चाहते रहे होंगे पर डीसीपी के कारण चुप बैठे रहे. थोड़ी सी देर ही हुई की  ‘टक-टक-टक’  दो तीन राइफल  फायर की आवाज़ सुनते ही सब चौंक कर एक दम उठ कर अपनी गाड़ियों में भागे, सबसे पहले मैं ही पहुंचा था, फायरिंग हमारी पोस्ट से ही हुई थी, गार्ड कमांडर ने बताया कि उनके साथ जो गुजरात पुलिस का कांस्टेबल था वह घबरा कर ‘पेनिक’ हो गया था और  उसके रोकते रोकते उसने भीड़ में फायर कर दिये. नया नया सिपाही है, गोली कई के लगी होगी दो तीन तो लोग गिर पड़े थे. जिन्हें भीड़ उठा ले गई हैं.

 डीसीपी ने भी यह सुना फिर अपने सिपाही से पूछा, शु थयु हतु? उसका ज़बाब था,“सर, मने डर लाग्यो मारी राइफल छीनवी लेशे, नजीक आवता जता हता.

    उसकी बात  सुन कर डीसीपी ने मुझे से आदेश के लहजे में कहा,“ससपेंड गार्ड कमांडर जस्ट नाऊ” मैंने उनसे बताया कि ‘सीआरपी एफ गार्ड कमांडर ने अपनी ड्यूटी ठीक की है, कमिश्नर  के आदेश का पालन भी किया है, उसने कोई फायरिंग नहीं कराई , उसने तो रोकना भी चाहा था तो उसका कोई दोष नहीं है’ वे सुनने को तैयार न हुए. मैंने उन्हें यह भी याद दिलाया कि मैं तो स्वयं ही यहाँ आने के लिए कई बार  उठा आप ने ही उठने नहीं दिया. 

 मेरी बात सुन कर वे और भी  आग बबूला हो गए अपनी रैंक का रोब झाडने लगे. उन्हें लगता था कि एक सीआरपी हवलदार पर दोष मढ कर उनका व उनकी पुलिस का पीछा छूट जाएगा. बात बढती जा रही थी, ए.सी.पी. दारूवाला ने भी उन्हें शांत रहने का अनुरोध किया. पर वे कहाँ सुनते? कई नए नए आईपीएस अपने आप को खुदा मानने लगते हैं, मुझ से उम्र में भी दो तीन साल ज्यादा थे सर्विस में भी इतने ही होंगें.

 उनकी हठधर्मी देख मैंने अपने ‘वाकी टाकी सेट’ से कमांडेंट को घटना के बारे में सूचित कर दिया. वे कुछ ही मिनट में घटना स्थल पहुँच गए, उन्होंने पूरी बात सुनी और अपने से आधी उम्र के डीसीपी को समझाने की असफल कोशिश की. पर महोदय तो जिद पर कायम थे, उन्होंने इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया हुआ था.

कमांडेंट कर्नल छत्तर सिंह अपनी गाडी में मुझे बैठा कर सीधा अंग्रेज़ कमिश्नर ऑफ़ पुलिस श्री एरिक रेनिसन के पास पहुंचे. खुद न बता मुझ से पूरी घटना के बारे में विस्तार से उनको बताने को कहा.

 मैंने पूरी घटना जैसा हुआ था सच सच बिना लाग लपेट के बता दी. कमिश्नर साहेब ने ध्यान से सुना, थोड़ी देर चिंतन करते चुप रहे कुछ सोचते रहे.  

उन्होंने कर्नल साहेब से कहा,“ओके कर्नल साहेब आई  विल टेक केयर”

अब सी ओ ने पहली बार कुछ कहना आरम्भ किया, “ सर, अब मेरे आदमी आपके इन ‘डी सी पी’ के नीचे हरगिज़  काम नहीं करेंगे, हमें दूसरी जगह कोई भी ड्यूटी दे दीजिये या इन महाशय को बदल दीजिये, वरना मजबूर होकर मुझे अपने ट्रूप्स  विड्रा करने पड़ेंगे हम अपनी बेइज्जती नहीं करा सकते”

और तमतमाते हुए उठ खड़े हुए,और बिना कोई उत्तर सुने या इंतजार किये मुझे लेकर चल दिए.

 कमिश्नर एरिक रेनिसन समझदार थे उन्होंने क्या पूछा ताछा, किस किस से बात की, क्या इन्क्वायरी की या नहीं की, यह तो पता नहीं चला था पर अगले दिन ही हमारे पुलिस डिस्ट्रिक्ट का चार्ज दूसरे ज्यादा अनुभवी डीसीपी को दिला दिया गया था.

 1974 के बाद मेरी फिर गुजरात में दोबारा कोई ड्यूटी नहीं लगी न जाने का मौका मिला. न खेमानी साहेब के बारे में कभी कुछ सुनने को मिला था. 24 वर्ष  बाद 1998 में कैबिनेट सेक्रेटेरिएट में राष्ट्रपति के विशिष्ट पुलिस पदक (पी पी एम) के वितरण समारोह के अवसर पर  मैडल लेने की पंक्ति में खड़े अपने से पहले मिलने वाले का नाम खेमानी अनाउंस हुआ तो मुझे अहमदाबाद के पुराने दिनों की याद  के साथ और घटना याद आई. अपने नंबर पर मेरा नाम भी घोषित हुआ था. मैडल लेकर मैं भी उनके नज़दीक बैठ गया था.  हमारे उस पदक वितरण समारोह  में तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी मुख्य अतिथि थे.

 पदक वितरण समारोह के बाद मैंने  खेमानी साहब के पास जाकर उन्हें  मैडल के लिए बधाई दी, अपना नाम बताया, उन्होंने मुझे जरा भी नहीं पहचाना, पर जैसे ही मैंने याद दिलाया कि मैं नवनिर्माण आन्दोलन के समय सीआरपीएफ का कालूपुर  एरिया में कंपनी कमांडर था उनकी ट्यूब लाइट जली. बैठे से तुरंत फुदक खड़े हो गए, जैसे उनको करंट लगा हो. जोर से ‘हो’,‘हो’अट्टहास कर बड़े तपाक से गले मिले और हँसते हुए कहा, “तुम्हारे सीओ कर्नल साहेब और तुमने तो मेरी बस नौकरी ही ले ली होती. बड़ी मुश्किल से जान बची थी” और खूब आत्मीयता से घुलमिल कर पुराने दिनों के बारे में बातचीत हुई.

फरवरी आते आते गुजरात आन्दोलन चरम सीमा पर आ गया था, जनजीवन जैसे थम गया हो, आम जनता भी आन्दोलनकारियों का खुल कर समर्थन कर सड़क पर उतर आई थी, बड़े नेता जैसे जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई आदि खुल कर समर्थन पर आ गए थे, स्वतंत्रता के बाद का  सबसे बड़ा जन आन्दोलन माना जा रहा था, इस आन्दोलन से प्रेरित हो इसी की तर्ज़ पर देश के  वयोवृद्ध नेता जय प्रकाश नारायण ने बिहार में भी विद्यार्थी आन्दोलन शुरू कर दिया था. देखा जाये तो यह देश में जन आन्दोलन और आपातकाल या इमरजेंसी का कारण और देश में बहुत बड़े परिवर्तन का उत्प्रेरक और कारण बना था.

आन्दोलनकारियों से  सारी जेलें भर गयी थी उनमें कहीं जगह नहीं थी, ऐसे समय पुलिस आंदोलन करने वाले विद्यार्थियों को गिरफ्तार कर शाहीबाग इलाके में स्थित स्टेडियम में लाकर छोड देती थी ताकि कम से कम  सड़क से तो आन्दोलनकारी कम हों,  घटनाएं कम हो सकें. वहीँ पर  मुख्य स्टेडियम के साथ बने परिसर में हमारी बटालियन का हेड क्वार्टर था और कुछ कमरों में हम सब रह रहे थे, कुछ जगह कम पड़ती थी तो टेंट्स भी लगाए हुए थे. पकड़ कर लाये आन्दोलनकारी छात्रों को  सुबह लाकर शाम को धीरे धीरे छोड़ते रहते  थे. स्टेडियम के अन्दर तो कुछ खाने पीने का साधन नहीं था, इसलिए प्रशासन के पास इन विद्यार्थियों को शाम तक छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं था. यह कार्य और सिक्यूरिटी का काम गुजरात पुलिस का था, सीआरपीएफ केवल उनकी हर तरह से मदद कर रही थी.

उस दिन भी ऐसे ही दर्जनों बसें भर भर कर विद्यार्थियों को लाई थी. उस दिन मेरी स्टेडियम में ड्यूटी थी. वहां स्टेडियम के कैंप ऑफिस में बैठ कर मैं  इन गतिविधियों की देख रेख कर रहा था. दिन के लगभग दस बजे मुझे ऑफिस के बाहर तैनात संतरी ने बताया कि एक कॉलेज से पकड़ कर लाई लड़की अपनी एक अर्जेंट प्रॉब्लम के लिए मिलना चाहती है. मेरे साथ एक गुजरात पुलिस का सब इंस्पेक्टर भी उस समय वहां मौजूद था. अन्दर आने  पर मैंने  देखा कि  वह लड़की बड़ी थी, कॉलेज/या यूनिवर्सिटी की किसी बड़ी  कक्षा की छात्रा होगी, उसने बताया, “मै  न कोई नारेबाजी कर रही थी, न पथराव, मैं तो अपने घर से अपनी बीमार माँ के लिए  दवा लेने निकली थी, वहीँ आन्दोलनकारी भी नारे बाज़ी कर रहे थे, सड़क रोक रहे थे. आन्दोलनकारियों के साथ मुझे भी पुलिस ज़बरदस्ती बस में भर ले आई  है, मैं बहुत परेशान हूँ’ और गुहार की  कि उसे ज़ल्दी  घर जाने  दें.उसकी माँ को दवाई देने में देर हो जायेगी. उसके चेहरे पर भोलापन था, उसने एक दवाई का पर्चा भी निकाल कर दिखाया.

 मैंने पुलिस सब इंस्पेक्टर से पूछ कर उसकी राय ली कि  क्या करना चाहिए एक को छोड़ेंगें दस आकर खड़े हो जायेंगें ? उसने बताया कि नियम से शाम को छः बजे से पहले नहीं छोड़ना चाहिए, हो सकता है  ये बहाना  भी  बना रही हो. वरना जैसा आपका आदेश होगा वही कर देंगें.

ऐसा सुनते ही लड़की ने आंसुओं के साथ रोना शुरू कर दिया, हाथ जोड़ अपनी मां  के लिए छोड़ने की गुहार दोहराई. उसकी मां को चिंता हो रही होगी की दवाई लाने में इतनी देर क्यों हो रही है ?

 मुझे उसकी बात ठीक लगी, मानवीय पक्ष का भी ध्यान रखना चाहिए. मैंने  ड्यूटी सब इंस्पेक्टर को बताया कि इसे पीछे के गेट से बाहर छोड़ दीजिये. देर सबेर सभी को छोड़ना तो है ही. वैसे तो सच ही लग रहा अगर गलत भी हुआ एक व्यक्ति को छोड़ने से क्या फर्क पड़ता है? और उसे पीछे के गेट से बाहर जाने दिया. जाने से पहले मुझे थैंक्स करने के लिए आगे आई और हैंडशेक के लिए हाथ बढाया, मिला कर कई बार ‘थैंक यू  थैंक यू’ करती चली गयी. देखने में काफी सभ्य और सभ्रांत परिवार से लग रही थी. अपना नाम ममता व्यास बता कर गयी.

अगले दिन स्टेडियम में दूसरे ऑफिसर की ड्यूटी थी हम बारी बारी ही यह अतिरिक्त काम कर रहे थे.           

घटना के अगले दिन दोपहर बाद वही लड़की ममता अचानक फिर से हमारे बटालियन ऑफिस में आ धमकी, संतरी कोमेर नाम बता अन्दर आ गयी थी. अपने  साथ  कुछ गुजराती खाने की सामग्री लेकर आई थी.  उसने बताया “माँ ने भेजा है आपके धन्यवाद स्वरुप, घर के बने हैं ” एक छोटे बैग में गुजराती व्यंजन खांडवी, ढोकला, थेपला आदि बड़े सलीके से सजा कर रक्खे हुए थे. मुझे बड़ा अजीब लग रहा था, लेते हुए संकोच हो रहा था, पर वह लड़की बिलकुल संकोच नहीं कर रही थी. ऑफिस में मेरी बगल वाली मेज पर बैठा मेरा सीनियर सहयोगी एस पी सिंह तुरंत ही उस से खूब मजे से बात करने लगा, उसे मज़ा आ रहा था, वह भी आराम से मेरे सामने कुर्सी पर डट कर  बैठ गयी थी. कोई संकोच नहीं कोई झिझक नहीं.उधर एसपी सिंह उसे रिझाने के लिए बातें में लग गया.

 एस पी सिंह ने पहल की यूनिट कैंटीन से तीनों के लिए  चाय समोसे और ज़लेबी मंगवाए. ममता ने खूब मजे से उडाये और काफी  समोसों व ज़लेबी की तारीफ़ की. देर तक वहीँ ज़मी रह कर ही  गयी. मैं तो बस थोड़ी बहुत बात करता रहा, एस पी सिंह खूब जम कर उससे  बात कर रहा था. उसे इम्प्रेस करने की कर रहा था. उसे बता दिया की वह मुझ से सीनियर है.

 उसके जाने के बाद एस पी सिंह ने मेरी खूब टांग खिंचाई की. कैंटीन बिल भी मुझ से दिलवाया, और कहता रहा,“ तू तो बड़ा छुपा रुस्तम निकला रे,” उस के लाये व्यंजनों को भी छीन कर आधे से ज्यादा खुद ही हज़म कर गया. एसपी सिंह मुझ से कई साल सीनियर था, वह शादी शुदा था उसके बाल बच्चे भी थे पर उस गुजराती लड़की ममता से ऐसे बात कर रहा था जैसे कि वह बैचलर है.

  यह एपिसोड यहीं ख़त्म नहीं हुआ था, ममता ने हर दो या तीन दिन के अंतराल पर आना शुरू कर दिया था,  कुछ गुजराती खाने के लिए ले आती थी. तथा यहाँ भी बड़ी  बेतकल्लुफ़ी से समोसा चाय की फ़रमाइश करती. उसकी बडाई करती. आर्डर एसपी सिंह करता, मेरी मेहमान बता कर पेमेंट मेरे जिम्मे कराता. मैं भी उन दोनों की बातें सुनता रहता. ममता ने अपने बारे में बताया कि वह सेंट ज़ेवियर’स  कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स से बी.ए. फाइनल की पढाई के अलावा संगीत की शिक्षा भी ले रही है और आल इंडिया रेडियो की आर्टिस्ट है. उसके कई प्रोग्राम आ चुके है. दो बच्चों का पिता एसपी सिंह जो मुझसे  सीनियर तो था ही, उसे आने के लिए खूब उत्साहित करता रहा, मुझे मज़ा लेते रहने की सलाह देता रहता और  खुद उसे पटाने की कोशिश करता रहता. मुझे डर सता रहा था कि कैंप में इतनी आँख कान देख सुन रहे हैं, और जब कर्नल छतर सिंह को पता लगेगा तो वे मेरी गर्दन नाप देंगें और यह एसपी सिंह तो पतली गली से साफ़ निकल जाएगा. उस उम्र में मन भी डोलता है और डर भी पूरा लगता था. वह इस तरह चार पांच आ चुकी थी. मैं सोचता था कि उत्तर भारत की लडकियां इतनी स्वतंत्र  व स्वच्छंद नहीं होती जितना गुजरात में. वैसे भी मैं एक छोटे शहर का था वहां तो कम से कम ऐसा नहीं देखा था. चोरी छुपे तो था इस तरह खुले तो बिलकुल भी नहीं.

 एक दिन उसके कहने से कि मैं उसे कुछ दूर छुडवा दूं, मैं ड्राईवर के साथ जीप में उसे छोड़ने चला गया रास्ते में एक जगह रेस्टोरेंट में गाडी रुकवा कर मुझे अंदर चाय के लिए ले गयी, बहुत कम लोग थे कुछ खाने की सामग्री भी आर्डर की और फिर अचानक बिलकुल स्पष्ट रूप से उसने कहा कि वह मुझे बेहद पसंद करती है, उसे हमेशा से फौजी पसंद हैं. पहले दिन देखते ही उसे ‘लव इन फर्स्ट साइट’ हो गया था. मेरी हालत पतली हो रही थी. यहाँ तो सब उल्टा हो रहा था, लड़की पहल कर रही थी. 

  आगे बताया कि उसका पूरा नाम ममता एम्.व्यास  है उसके पिता महेंद्र भाई  व्यास अच्छे खासे धनी हैं, नवरंगपुरा में बड़ा मकान है, बस एक भाई है जो अमेरिका  में पढ़ कर जॉर्जिया स्टेट में एटलांटा में रह रहा है. उसने अपने माता पिता से मिलवाने के लिए उसके साथ  घर जाने का प्रस्ताव व आग्रह किया.

मैं  घबरा गया था बात आगे बढ़ाना नहीं चाहता था, मेरे में इतना बड़ा कदम इस तरह लेने की हिम्मत कहाँ थी? मैं घर का बड़ा बेटा था, अभी बड़ी कच्ची फेमिली थी. मुझे  छोटे भाई बहनों की पढाई का ध्यान था.पिताजी और अम्मा ने  कम आमदनी के बावजूद हम सब को पढ़ाया  लिखाया था और मेरा समय उनके बोझ को हल्का करने का ध्यान था सो ऐसे में मैंने बुद्धि से काम लेना ही उचित  समझा था. सो मैंने उसे उल्टा समझाया कि सीआरपीएफ  की लाइफ बहुत टफ है क्रूर कार्य करने पड़ते हैं, बरसों तक नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा में रहना पड़ता है.  मैंने अभी तक कोई भी गुजराती अपनी फ़ोर्स में नहीं देखा, तुम्हारा स्तर अलग है. संगीत और गायन का माहौल बिलकुल नहीं है. मैं स्वयं ही अपने आप को तुम्हारे लिए उपयुक्त नहीं समझता, हमारा परिवार बड़ा है, रहन सहन खाना पीना सब अलग है मेरा बहन भाईयों का बड़ा परिवार है, उन्हे पढ़ाना है , पहले कम से कम एक बहन की शादी करनी है, छोटा शहर छोटा घर है. हम लगभग ग्रामीण खेती क्यारी वाले हैं, भाषा अलग है वह बिलकुल भी एडजस्ट नहीं कर पायेंगी, न मेरी नौकरी में जहाँ महिलायें तो दूर गुजराती युवक ही नौकरी नहीं कर पाते. सो बाहरी आवरण पर मत जाओ. अतः इस मामले को हम दोनों को यहीं खत्म करना ठीक रहेगा. इसलिए मैं तुम्हारे घर नहीं जा सकता न ही तुम्हारे माता पिता से मिल पाऊंगा. तुम्हें  मुझ से बहुत अच्छे और बराबरी के योग्य और अमीर युवक मिल जायेंगे. मैं तुम्हारा आभारी हूँ पर मजबूर हूँ . पता नहीं यह एक सांस में कैसे कह गया, वैसे मेरा दिल जोर से धड़क रहा था, अजीब सा महसूस कर रहा था. मैंने एक गाने की दो लाइन भी सुना दी,

 ‘ चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों. वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन उसे एक खूब सूरत मोड़  दे कर छोड़ना अच्छा,’

 

 उसे मेरे गाने की लाइनें सुन बेसुरे ढंग से सुन कर फीकी सी हंसीआई. फिर एक दम चुप और गुम सुम हो गयी थी, उसकी आँख में आंसू आ गये, उसने आँखें बंद कर ली.  काफी देर चुप रहने के बाद उसने कहा था,“अच्छा अभी मित्र तो रह सकते हैं? बड़ा निर्णय बाद में हो सकता है, हमें ईश्वर ने अकारण नहीं मिलया था.”

  मैंने चुप रहना ठीक समझा, अन्दर बड़ी उठक पटक हो रही थी. मित्रता के लिए मैंने मना नहीं किया. जाते समय उसने ‘जय राधे कृष्णा’ कहा और फिर बिना मुड़े सीधे चली गयी थी.

  वैसे मैं भी खूब अन्दर तक हिल गया था, रात को नींद नहीं आई थी. करवटें बदलता रहा. कभी लगता मैंने बिना सोचे समझे अच्छा प्रस्ताव ठुकराया है, कभी लगता ठीक किया. कभी अपने को कायर समझा कभी समझदार और प्रैक्टिकल. उस के बाद वह मिलने नहीं आई. उसने मेरा पता और ग्रुप  सेंटर के ऑफिस का पता ले लिया था, मेरे वापिस जाने के एक दो संक्षिप्त पत्र आये, जिसमें उसके अपने आकाशवाणी पर आने वाले प्रसारण के प्रोग्राम की ता रीख व समय व बेंड की सूचना रहती और मैंने उसके प्रोग्राम  सुने,  गुजराती भाषा के गाने पूरी समझ में नहीं आते थे  पर गायन और कंठ अच्छा था. दूसरे अपने एक प्रोग्राम में एक हिंदी पुराना गाना भी गाया था, बोल थे, ‘टूटे हुए ख्वाबों ने हमको ये सिखाया है, दिल ने जिसे चाहा था आँखों ने गवांया है.  सुन कर थोडा सा अनमना हो गया था बस.

 धीरे धीरे मार्च  का महीना आ गया था, जनवरी से शुरू आन्दोलन का जो अहमदाबाद के एक इंजीनियरिंग कॉलेज की फीस में बढ़ोतरी से शुरू होकर पूरे गुजरात में फ़ैल चुका था. वहां स्थिति इतनी ख़राब थी कि लगने लगा कि वहां कभी सामान्य स्थिति नहीं आएगी  आन्दोलन कभी ख़त्म ही नहीं होगा. और यहाँ से  कभी छुट्टी नहीं मिलेगी.

 एक रात को आठ बजे लोगों ने अपने घरों से निकल निकल बर्तन पीट पीट  ‘मृत्यु घंट’ बजाये, यह आन्दोलन का नया तरीका था. सब  घर मुहल्लों से शायद पैगाम आ रहा था कि अहमदाबाद का घर घर आन्दोलन का समर्थन कर रहा है, सुन कर  देख कर रोमांच हो रहा था.  ऐसा कभी कहीं देखा न सुना था. उस दिन मेरा विचार बदल गया था, मुझे लगा था कि गुजरात में अब शीघ्र कुछ जल्दी  चमत्कार होगा उसी का यह नाद है और हुआ भी यही था.

   सामूहिक ‘मृत्यु घंट’ बजने के कोई तीन चार दिन हुए  थे कि हुए मुझे अपनी बटालियन से आदेश मिला कि दो सेक्शनों को सवेरे रेलवे गेस्ट हाउस में होने वाली एक महत्वपूर्ण प्रेस कांफ्रेंस के लिए तैनात करना है. मैंने  स्वयं ही अपनी इन सेक्शनों के साथ जाना ठीक समझा, वहां पहुँच मौजूद अधिकारियों की सलाह से  गेस्ट हाउस के मैंन हाल, मुख्य गेट वह बाहर सुरक्षा के लिए फ़ोर्स की  तैनाती कर दी थी , वहां पहले से भी कुछ सुरक्षा लगे थे. वहां लोगबाग आपस में कह रहे थे शायद चीफ मिनिस्टर आ रहें हैं कोई महत्वपूर्ण घोषणा करने जा रहे हैं. पर वहां ज्यादा लोग नहीं आए थे, मीडिया वाले भी ज्यादा नहीं आ पाए थे क्योंकि सभी को मीटिंग का बहुत कम नोटिस मिला था.

 कांग्रेस के गुजरात के उस समय के सबसे बड़े कद्दावर नेता और मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल अपने सुरक्षा कर्मियों व कुछ लोगों के साथ कई गाड़ियों में आये जिनमे कुछ और नेता भी थे. मैं भी ड्यूटी पर कम, जिज्ञासा के कारण अन्दर जाकर मंच के पास में ही मौजूद रहा, मुख्य मंत्री ने आते ही अपनी कांफ्रेंस स्वयं शुरू की,सबका हाथ जोड़ अभिवादन किया केवल दो तीन वाक्य कहे, जेब से एक कागज़ निकाला और पढ़ा जिसमें उन्होंने अपना अपने मंत्री मंडल का इस्तीफा देने की घोषणा की और कहा कि वे वहीँ से गवर्नर महोदय को इस्तीफ़ा सोंपने और विधान सभा को भंग करने की सिफारिश करने राजभवन जा रहें हैं. सुन कर सभी सन्न थे, और  इससे पहले पत्रकार सँभलते कुछ सवाल पूछते  वे और उनके साथ आये उनके साथी  कार में बैठ कर राजभवन के लिए चल दिए. मौजूद अखबारों और मीडिया के संवाददाता भी उनके पीछे गाड़ियाँ दौड़ चले थे.

 कुछ ही मिनटों में नव निर्माण आन्दोलन की मांगे एक झटके में मान ली जायेंगी कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था. मुझे अच्छा लगा कि मैंने यह सब कुछ इतने पास से देखा था, कुछ दिनों बाद 16 मार्च मार्च को गुजरात विधानसभा भंग किये जाने की विधिवत घोषणा तत्कालीन गवर्नर श्री के के विश्वनाथन ने कर दी थी.

इसके साथ  अहमदाबाद  क्या पूरे  गुजरात के हालात तेज़ी से  ठीक होते चले गये.  इस आन्दोलन की  सभी मांगे मान ली गयी थी, ऐसा आन्दोलन पहले कभी नहीं हुआ था न ऐसे केंद्र और प्रदेश की चुनी सरकारें ऐसे नहीं झुकी थी. इसके साथ, ‘अने अमदाबाद फरिथी शांति अवि गई      

  इस सब  के अनेक वर्षो बाद तक गुजरात में जाना नहीं हुआ. तीस साल बाद दिल्ली से आबू रोड के लिए ट्रेन में ऐ.सी. फर्स्ट क्लास में  सरकारी काम से यात्रा कर रहा था, सामने की सीट पर एक बड़ी उम्र की बड़ी शालीन महिला  की सीट थी, जिनके साथ एक हेल्पर भी थी, बातों बातों में पता चला की वे संसद सदस्य उर्मिलाबेन पटेल हैं- गुजरात के पूर्व मुख्य मंत्री  चिमन भाई पटेल की पत्नी, वे संसद  के सत्र में भाग लेने के बाद दिल्ली से अहमदाबाद जा रही थी. मैंने अपना परिचय देकर उन्हें नव निर्माण आन्दोलन के दौरान अहमदाबाद में ड्यूटी करने और उनके पति के इस्तीफे की घोषणा के समय वहां गेस्ट हाउस में मौजूद होने के बारे में बताया था. जान कर बड़ी प्रसन्न हुई और रास्ते में खूब बातें करती हुई गई, तब तक चिमन भाई  पटेल का निधन कई वर्षों  पहले हो चुका था. उनके अलावा उनका बेटा भी राजनीति में था. मैं उन्हें नमस्कार कर माउंट अबू जाने के लिए आबू रोड स्टेशन पर उतर  गया था और वे आगे अपने अहमदाबाद के लिए आगे बढ़ गयी थी. 

अहमदबाद के  ये चर्चे अब आधी शताब्दी पहले के हैं, अन्दर कही बसे पड़े थे, चिपके हुए थे, वे साथ ही मर जाते उन्हें बाहर निकाल कर हल्का महसूस कर रहा हूँ. जीवन में जो हुआ अच्छा हुआ. अब तो बस शायर  अमजद इस्लाम  की ये मशहूर लाइन्स ही ठीक लगती  हैं-

वो जो मिल गया उसे याद रख, जो नहीं मिला उसे भूल जा,

 वो तेरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गई,

 दिले बेखबर मेरी बात सुन उसे भूल जा उसे भूल जा....

 पर कुछ बातों को जीवन भर कहाँ भूल पाते हैं ?