Part 3 — जब दिल ने सही इंसान चुना
रोहन के साथ बिताया हर दिन आरोही को यह यकीन दिला रहा था कि शायद जिंदगी ने आखिरकार उसके लिए भी किसी को भेज दिया है। उसे लगता था कि रोहन उसके संघर्ष को समझता है, उसके सपनों की इज्जत करता है और सबसे बड़ी बात—वह उसके अतीत को लेकर कोई सवाल नहीं करता। आरोही को यह बात सबसे ज्यादा पसंद थी। उसे लगता था कि इतने सालों में पहली बार कोई ऐसा इंसान मिला है जिसके सामने उसे मजबूत बनने का नाटक नहीं करना पड़ता। लेकिन जिस भरोसे को वह अपनी जिंदगी की सबसे खूबसूरत चीज समझ रही थी, वही भरोसा उसके खिलाफ सबसे खतरनाक हथियार बन चुका था।
एक सुबह आरोही ऑफिस पहुंची तो वहां का माहौल बिल्कुल अलग था। कुछ कर्मचारी आपस में धीमी आवाज में बातें कर रहे थे। जैसे ही वह अंदर गई, सब चुप हो गए। उसने अपने मैनेजर से पूछा, "क्या हुआ?" मैनेजर ने घबराते हुए कहा, "मैम... कुछ लोग आए थे। उन्होंने कहा कि अब कंपनी का management बदल गया है।" आरोही कुछ समझ नहीं पाई। "कौन लोग?" मैनेजर ने एक फाइल उसकी तरफ बढ़ाई। "रोहन सर के लोग।"
आरोही ने फाइल खोली और जैसे उसके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। Documents में उसकी company की ownership बदल चुकी थी। Share transfer हो चुका था। उसके signatures भी थे। वह कुछ सेकंड तक उन कागजों को देखती रही। फिर उसने कांपती आवाज में कहा, "ये झूठ है। मैंने ऐसा कुछ sign नहीं किया।" मैनेजर ने धीरे से कहा, "मैम... signatures आपके ही हैं।"
आरोही तुरंत रोहन के पास पहुंची। वह अपने office में आराम से बैठा हुआ था। आरोही ने दरवाजा खोलते ही फाइल उसके सामने फेंक दी। "ये क्या है?" रोहन ने फाइल उठाई, उसे देखा और शांत स्वर में कहा, "तुम्हारी company।" आरोही की आंखों में गुस्सा था। "मेरी company?" रोहन कुर्सी से उठकर उसके पास आया और बोला, "अब नहीं।"
आरोही ने उसे घूरते हुए कहा, "तुमने मेरे साथ ऐसा कैसे किया?" रोहन हंसा। "मैंने कुछ नहीं किया। तुमने खुद किया है। हर document पर तुम्हारे signatures हैं। तुमने मुझे इतना भरोसा दिया कि तुम्हें पढ़ने की जरूरत भी नहीं लगी कि तुम क्या sign कर रही हो।" आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया। "तुमने मुझे धोखा दिया।" रोहन ने कहा, "नहीं आरोही। मैंने सिर्फ तुम्हारी कमजोरी का फायदा उठाया।"
वह शब्द आरोही के दिल में तीर की तरह लगे। जिस इंसान को वह अपना सबसे भरोसेमंद समझती थी, उसके लिए वह सिर्फ एक मौका थी।
आरोही ने उसे थप्पड़ मारने के लिए हाथ उठाया, लेकिन बीच में रोक लिया। उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे। "तुमने मेरा business नहीं छीना रोहन... तुमने मेरी जिंदगी के नौ साल छीन लिए।" रोहन ने ठंडी आवाज में कहा, "बिजनेस में emotions की कोई जगह नहीं होती।"
आरोही वहां से निकल गई।
उसने सबसे पहले आरव को फोन किया। लेकिन फोन नहीं उठा। फिर कबीर को किया। वह भी नहीं उठा। विवान भी किसी जरूरी काम से बाहर था। आरोही पहली बार बिल्कुल अकेली थी। उसे नहीं पता था कि तीनों दोस्त उसी समय अलग-अलग कारणों से शहर से बाहर थे। वह घर पहुंची और अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लिया।
उस दिन के बाद आरोही ने किसी से बात करना लगभग बंद कर दिया।
जिस लड़की ने कभी हार मानना नहीं सीखा था, वह अब अपने ही कमरे में बैठकर खिड़की से बाहर देखती रहती। उसकी डायरी, जिसमें कभी business plans और नए ideas होते थे, अब कई दिनों से खाली पड़ी थी। उसकी मां उसके कमरे के बाहर खाना रखतीं और वापस चली जातीं। कई बार खाना वैसे ही पड़ा रहता।
जब आरव, कबीर और विवान वापस आए और उन्हें सब पता चला, वे तुरंत उसके पास पहुंचे। कबीर ने दरवाजा खटखटाया। "आरोही, दरवाजा खोल।" कोई जवाब नहीं आया। उसने फिर कहा, "देख, मैं बाहर खड़ा हूं। अगर तू दरवाजा नहीं खोलेगी तो मैं खिड़की से अंदर आ जाऊंगा।" अंदर से पहली बार आवाज आई, "चले जाओ।"
कबीर चुप हो गया। आरव ने दरवाजे के पास बैठकर कहा, "हम कहीं नहीं जा रहे।" काफी देर बाद दरवाजा खुला। आरोही के चेहरे पर वह चमक नहीं थी जो कभी उसके चेहरे की पहचान थी। उसने सिर्फ इतना कहा, "मैं हार गई।"
आरव ने उसकी तरफ देखा और बोला, "नहीं। तू सिर्फ एक बार गलत इंसान पर भरोसा कर बैठी है।"
आरोही ने सिर हिलाया। "नहीं आरव। इस बार बात अलग है। मैंने सब खो दिया।"
विवान ने कहा, "तूने business खोया है। खुद को नहीं।"
आरोही ने कोई जवाब नहीं दिया।
कई दिनों तक तीनों दोस्त उसके साथ रहे। उन्होंने उसे अकेला नहीं छोड़ा। जब उन्हें लगा कि उसका दर्द बहुत गहरा है, उन्होंने परिवार के साथ मिलकर professional help लेने का फैसला किया। शुरुआत में आरोही ने मना किया, लेकिन धीरे-धीरे उसने treatment और counselling शुरू की। यह कोई जादुई बदलाव नहीं था। कई दिन अच्छे होते, कई दिन बहुत मुश्किल। कभी वह घंटों बात करती, कभी पूरे दिन चुप रहती। लेकिन आरव, कबीर और विवान हर बार उसके साथ खड़े रहे।
एक दिन कबीर उसके कमरे में आया और उसके सामने एक छोटी-सी प्लेट रख दी। आरोही ने पूछा, "ये क्या है?" कबीर ने कहा, "जिंदगी में दो चीजें कभी नहीं छोड़नी चाहिए—उम्मीद और खाना।" आरोही ने पहली बार हल्की मुस्कान दी। कबीर ने तुरंत कहा, "वाह! मुस्कान वापस आ गई। अब पैसे भी वापस आ जाएंगे।"
कुछ महीनों बाद आरोही ने फिर से अपनी डायरी खोली। पहला पन्ना अब भी वही था—"मेरी कंपनी।" उसने नीचे एक नई लाइन लिखी—
"दूसरी बार। लेकिन इस बार किसी पर आंख बंद करके भरोसा नहीं करूंगी।"
उसने फिर शुरुआत की।
पहली कंपनी से भी छोटी।
लेकिन इस बार उसका इरादा पहले से बड़ा था।
आरव ने legal matters संभाले। विवान ने finances और planning संभाली। कबीर ने marketing संभाली और अपनी वही अजीब-अजीब ideas फिर शुरू कर दीं। एक दिन उसने नया advertisement दिखाया। आरोही ने देखा और कहा, "ये क्या है?" कबीर ने गर्व से कहा, "नई marketing strategy।" विवान ने screen देखकर कहा, "इसे marketing strategy नहीं, public embarrassment कहते हैं।" आरोही इतने दिनों बाद जोर से हंसी कि तीनों कुछ पल उसे देखते रह गए।
धीरे-धीरे business फिर चल पड़ा।
एक साल...
दो साल...
तीन साल...
आरोही हर साल पहले से ज्यादा मजबूत होती गई।
अब वह सिर्फ अपना खोया हुआ business वापस नहीं चाहती थी। वह उससे कहीं बड़ा empire बनाना चाहती थी।
और आखिरकार नौ साल की मेहनत के बाद वह दिन आया जब देश की बड़ी business magazines में उसका नाम छपा।
"आरोही शर्मा — Self-made Businesswoman."
उसने अपनी पहली कंपनी से कई गुना बड़ा business खड़ा कर लिया था।
उस दिन उसके ऑफिस में तीनों दोस्त पहुंचे। कबीर ने magazine उठाई और बोला, "मैडम, autograph मिलेगा?" आरोही ने कहा, "पहले appointment लो।" कबीर ने तुरंत कहा, "अपनी दोस्त से मिलने के लिए appointment?" विवान बोला, "अब ये बड़ी आदमी हो गई है।" आरोही हंस पड़ी।
इसी बीच आरव, कबीर और विवान की अपनी जिंदगी भी बदल चुकी थी। तीनों ने शादी कर ली थी। उनकी पत्नियां भी आरोही को बहुत अच्छी तरह जानती थीं। चारों की दोस्ती अब भी वैसी ही थी। फर्क सिर्फ इतना था कि अब कबीर के साथ उसकी पत्नी भी होती थी जो हर बार कहती, "तुम दोनों की लड़ाई कभी खत्म नहीं होगी?" और कबीर जवाब देता, "हमारी दोस्ती ही ऐसी है।"
आरोही ने प्यार के बारे में सोचना लगभग बंद कर दिया था। उसके लिए अब career ही सब कुछ था।
तभी उसकी जिंदगी में अमन आया।
अमन उसी business field में काम करता था, लेकिन बाकी लोगों की तरह आरोही की success देखकर उसके करीब आने की कोशिश नहीं करता था। पहली मुलाकात में उसने आरोही से कहा, "आपकी company बहुत बड़ी है।" आरोही मुस्कुराई। "धन्यवाद।" अमन ने आगे कहा, "लेकिन आपकी presentation boring थी।" आरोही की मुस्कान गायब हो गई। "क्या?" अमन हंस पड़ा। "Presentation अच्छी थी, बस मैं आपको परेशान कर रहा था।"
आरोही ने उसे घूरकर देखा। "आपको पता है मैं कौन हूं?" अमन ने कहा, "हां। लेकिन मैं ये भी जानता हूं कि आप इंसान हैं।"
यह जवाब आरोही को अजीब लगा।
अमन के साथ उसकी दोस्ती धीरे-धीरे बढ़ने लगी। वह उससे business की बातें करती, अपनी परेशानियां बताती और कभी-कभी पुराने दिनों की बातें भी करती। अमन कभी उसकी जिंदगी में दखल नहीं देता। वह बस सुनता था।
एक दिन आरोही ने पूछा, "तुम मुझे कभी judge क्यों नहीं करते?" अमन ने कहा, "क्योंकि मैं तुम्हारी पूरी कहानी नहीं जानता। और बिना पूरी कहानी जाने किसी को judge करना मुझे पसंद नहीं।"
आरोही के दिल में फिर से एक हल्की-सी हलचल हुई।
लेकिन इस बार उसने खुद को रोक लिया।
उसने खुद से कहा, "नहीं। अब दोबारा नहीं।"
फिर एक दिन उसकी जिंदगी में अचानक मुश्किल आ गई। एक महत्वपूर्ण business deal में technical और legal problem आ गई। उसी समय आरव, कबीर और विवान तीनों शहर से बाहर थे। आरोही के पास पूरी रात में problem solve करने का समय था। वह अकेली office में बैठी थी और documents से घिरी हुई थी।
तभी अमन वहां पहुंचा।
"तुम अभी तक यहां हो?" उसने पूछा।
आरोही ने थके हुए स्वर में कहा, "मेरे पास time नहीं है।"
अमन ने chair खींची और बैठ गया। "तो मैं भी बैठता हूं।"
"क्यों?"
"क्योंकि तुम अकेली हो।"
उस रात दोनों ने साथ बैठकर पूरी problem solve की। सुबह तक deal बच गई।
आरोही ने बाहर निकलते हुए कहा, "Thank you."
अमन ने मुस्कुराकर कहा, "दोस्तों को thank you नहीं बोलते।"
आरोही वहीं रुक गई।
उसे अचानक एहसास हुआ कि अमन की मौजूदगी में उसे किसी चीज का डर नहीं लगता।
लेकिन वह इसे प्यार का नाम देने से डरती थी।
कुछ दिनों बाद आरव, कबीर और विवान को उस रात की पूरी कहानी पता चली। कबीर ने अमन को देखते ही कहा, "तो तुम वही हो?" अमन ने पूछा, "कौन?" कबीर बोला, "वही जो हमारी गैरमौजूदगी में hero बन गया।" अमन हंस पड़ा।
तीनों दोस्तों ने तय किया कि उन्हें अमन को थोड़ा test करना चाहिए।
उन्होंने एक business situation बनाई जिसमें अमन के पास आरोही के confidential information का इस्तेमाल करके खुद को फायदा पहुंचाने का मौका था। लेकिन अमन ने वह information इस्तेमाल नहीं की। उल्टा उसने आरोही को warning दी कि कोई उसकी company की confidential information तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है।
कबीर ने कहा, "पास।"
अमन ने पूछा, "क्या?"
विवान मुस्कुराया। "आरोही की जिंदगी में entry का test।"
अमन ने तीनों को देखा और कहा, "तुम लोग serious हो?"
आरव ने हाथ बढ़ाकर कहा, "हम उसके दोस्त हैं। हमें देखना था कि तुम उसके लिए सही हो या नहीं।"
अमन ने हाथ मिलाया।
लेकिन कहानी को फिर एक बार पुराने अतीत ने घेर लिया।
रोहन वापस आ चुका था।
नौ साल पहले जिस आदमी ने आरोही का business छीना था, अब उसे पता चल चुका था कि आरोही उससे भी बड़ी company बना चुकी है। उसके अंदर बदले की आग फिर जाग उठी।
उसने आरोही की नई company के खिलाफ rumours फैलाने शुरू कर दिए। कुछ investors पीछे हटने लगे। एक बड़ा contract cancel होने की स्थिति में था।
आरोही ने जैसे ही documents देखे, उसे शक हुआ कि इसके पीछे वही आदमी है।
"रोहन..." उसने धीरे से कहा।
इस बार उसने डरने की बजाय लड़ने का फैसला किया।
आरव ने legal team संभाली। विवान ने financial records खंगाले। कबीर ने पुराने employees और contacts से information जुटानी शुरू की। अमन ने आरोही के साथ रहकर उसे mentally strong रखा।
लेकिन रोहन की चाल बहुत बड़ी थी।
उसने एक पुराना document निकाला जिसमें दावा किया गया था कि आरोही की दूसरी company के कुछ intellectual assets भी उसके पुराने contract से जुड़े हुए हैं।
आरोही परेशान हो गई।
तभी विवान ने एक छोटी-सी inconsistency पकड़ ली।
"ये document असली नहीं है।"
सबने उसकी तरफ देखा।
विवान ने कहा, "इसमें जिस तारीख का reference है, उस दिन ये agreement अस्तित्व में ही नहीं था।"
आरोही की आंखों में उम्मीद आई।
उन्होंने पूरी investigation की और आखिरकार रोहन की कई पुरानी चालों के सबूत सामने आ गए।
आखिरी confrontation में आरोही उसके सामने खड़ी थी।
रोहन ने कहा, "तुम्हें लगता है तुम जीत गई?"
आरोही ने शांत आवाज में कहा, "नहीं। मैं तुमसे जीतने नहीं आई हूं। मैं बस अपनी जिंदगी से तुम्हारा नाम हटाने आई हूं।"
रोहन पहली बार चुप हो गया।
आरोही ने कहा, "तुमने मुझे एक बार तोड़ा था। लेकिन तुमने मुझे खत्म नहीं किया। तुमने मुझे सिखाया कि भरोसा आंखें बंद करके नहीं किया जाता।"
रोहन ने आखिरी बार कहा, "तुम फिर भी मुझसे प्यार करती थीं।"
आरोही मुस्कुराई।
"नहीं। मैं तुमसे नहीं, उस इंसान से प्यार करती थी जो मैंने तुम्हारे अंदर देखा था। असली तुमसे नहीं।"
उसके बाद रोहन की सारी साजिशें खत्म हो गईं।
आरोही ने अपनी जिंदगी से उस अध्याय को हमेशा के लिए बंद कर दिया।
लेकिन उसके सामने अब एक और सवाल था।
अमन।
वह उसके लिए क्या था?
एक दोस्त?
एक business partner?
या कुछ और?
एक रात आरोही अपनी छत पर बैठी थी। उसने अपनी पुरानी डायरी खोली। उसमें स्कूल के दिनों का एक पन्ना था, जिस पर उसने कभी लिखा था—
"शायद मैं आरव से प्यार करती हूं।"
उसने उस लाइन को देखा और मुस्कुराई।
फिर उसने नीचे नई लाइन लिखी—
"नहीं। अब समझ आया... वो प्यार नहीं था।"
उसने कुछ देर बाद अगली लाइन लिखी—
"लेकिन अब जो महसूस हो रहा है, उसे क्या नाम दूं?"
उसने अमन के बारे में सोचा।
उसकी मुस्कान।
उसका मुश्किल समय में साथ देना।
उसका कभी उसके पैसे या success के पीछे न भागना।
उसका उसे बदलने की कोशिश न करना।
और सबसे ज्यादा—उसका उसके कमजोर समय में भी उसी सम्मान से साथ खड़ा रहना।
आरोही की आंखों में आंसू आ गए।
उसे आखिरकार समझ आया।
वह अमन से प्यार करने लगी थी।
लेकिन उसी समय उसके फोन पर एक message आया।
अमन का message था—
"कल सुबह मिल सकती हो? मुझे तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है।"
आरोही का दिल अचानक तेज धड़कने लगा।
उसे नहीं पता था कि अगले दिन अमन उससे क्या कहने वाला है।
उसे सिर्फ इतना पता था कि नौ साल पहले जिस लड़की ने प्यार को attraction समझ लिया था...
वही लड़की आज पहली बार सच्चे प्यार के सामने खड़ी थी।
लेकिन इस बार...
दिल ने देर से चुना था।
और शायद...सही चुना था।