हर कहानी की एक शुरुआत होती है।
लेकिन कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं, जिन्हें इंसान नहीं — किस्मत खुद लिखती है।
कुछ रिश्ते यूँ ही नहीं बनते।
कुछ मुलाकातें संयोग नहीं होतीं।
और कुछ जुदाइयाँ… सिर्फ जुदाई नहीं — एक श्राप की छाया होती हैं।
यह कहानी सिर्फ प्यार की नहीं है।
न ही सिर्फ बदले की।
न ही सिर्फ धोखे और नफरत की।
यह कहानी है एक ऐसे श्राप की —
जो सदियों से प्रेम पर ग्रहण बनकर छाया हुआ है।
कहते हैं, जब भी कोई प्रेम अपनी पूर्णता के करीब पहुँचता है —
वक्त की कोई अदृश्य शक्ति उसे तोड देती है।
क्या इस सदी में भी प्यार पर ग्रहण लगेगा?
या फिर शुरू होगी ऐसी प्रेम कहानी —
जो आने वाली सदी के लिए मिसाल बन जाएगी?
कहानी शुरू होती है शहर के बीचों- बीच स्थित एक भव्य मंदिर से।
सुबह की पहली किरणें धीरे- धीरे आसमान के कोनों को सुनहरा कर रही थीं।
सड़क के किनारे बना सफेद संगमरमर का मंदिर धूप की हल्की आभा में चमक रहा था।
उसके शिखर पर लगा स्वर्णिम कलश सूरज की रोशनी से दमक उठा।
घंटियों की मधुर ध्वनि हवा में घुल चुकी थी।
जय माता दी।
हर- हर महादेव।
भक्तों की आवाजें वातावरण को पवित्र बना रही थीं।
धूप और अगरबत्ती की सुगंध मिलकर एक दिव्य आभा रच रही थी।
पंडित आरती कर रहे थे।
दीपक की लौ हवा में हल्की- सी कांपती— फिर स्थिर हो जाती।
उसी भीड में एक लडकी धीरे- धीरे मंदिर की सीढियाँ चढ रही थी।
उसके कदमों में जल्दबाजी नहीं थी।
हर कदम जैसे श्रद्धा से भरा हुआ था।
बेबी पिंक अनारकली सूट।
हल्की हवा में लहराते खुले लंबे बाल।
कमर तक गिरती काली लटें।
उसकी पायल की छन- छन सीढियों पर गूंज रही थी।
चूडियों की खनक जैसे आरती की धुन में शामिल हो गई हो।
वह पहली सीढी पर रुकी।
झुकी।
हाथों से सीढियों को छुआ।
फिर माथे से लगाया।
उसकी आँखें बंद थीं।
होंठों पर कोई अनकही प्रार्थना थी।
फिर वह धीरे से अंदर चली गई।
उसके चेहरे पर अजीब- सी शांति थी —
पर उसकी आँखों में गहराई थी।
जैसे उनमें कोई अधूरी दुआ तैर रही हो।
उसका नाम था — श्रावणी।
दुनिया ने जिसे जन्म के साथ ही छोड दिया था।
पर जिसने शिकायत करना नहीं सीखा।
मंदिर ही उसका घर था।
वहीं उसकी हँसी गूंजी थी।
वहीं उसके आँसू गिरे थे।
वहीं उसने पहली बार बोलना सीखा था।
आरती समाप्त हुई।
भीड धीरे- धीरे छंटने लगी।
पंडित जी ने उसे देखा और मुस्कुरा उठे।
श्रावणी बिटिया।
वह मुडी।
जी पंडित जी?
जाते वक्त प्रसाद लेना मत भूलना… आज तुम्हारा जन्मदिन है न?
उसके चेहरे पर हल्की- सी मुस्कान आई —
पर वह मुस्कान पूरी नहीं थी।
जी पंडित जी।
पंडित ने उसके सिर पर हाथ रखा।
माँ तुम्हें हर सुख दे।
क्षणभर को उसकी आँखें नम हो गईं।
सुख।
यह शब्द उसके लिए हमेशा अधूरा रहा था।
पूजा के बाद वह प्रसाद लेकर सीढियों से नीचे उतरने लगी।
तभी उसकी टक्कर एक महिला से हो गई।
श्रावणी घबरा गई।
माफ कीजिए… गलती से टकरा गई।
महिला लगभग पचास वर्ष की थीं।
रेशमी मरून साडी।
हाथों में डायमंड के कंगन।
गले में कुंदन का भारी हार।
चेहरे पर गरिमा।
आंखों में गहराई।
वे कुछ नहीं बोलीं।
बस एकटक श्रावणी को देखती रहीं।
ऐसा देखना।
जैसे कोई किसी पुराने चेहरे को पहचानने की कोशिश कर रहा हो।
जैसे स्मृतियाँ धुंध से बाहर आना चाहती हों।
श्रावणी ने हल्की मुस्कान दी…. और आगे बढ गई।
वह महिला वहीं खडी रहीं।
उनकी सांस थोडी भारी थी।
तभी पंडित जी पास आए और धीमे स्वर में बोले—
वह लडकी…. श्रावणी है। इक्कीस साल पहले उसे मंदिर की सीढियों पर छोड दिया गया था। तब वह सिर्फ एक दिन की थी।
ये सुनते ही महिला की उंगलियाँ साडी के किनारे को कसकर पकड लेती है।
किसी ने उसे गोद लेने की कोशिश नहीं की? उस औरत की आवाज बहुत धीमी थी।
नहीं. मंदिर ही उसका घर बन गया।
ये सुनते ही महिला की आँखों में एक पल को चमक उभरी।
फिर वह बुझ गई।
वे थीं — भूमिका सिंह।
शहर के सबसे समृद्ध परिवार की बहू।
उनकी नजरें दूर जाती श्रावणी पर टिक गईं।
जैसे कोई अतीत का पन्ना अचानक खुल गया हो।
पर अगले ही क्षण उन्होंने खुद को संभाला।
पूजा कर लीजिए, मैडम, पंडित बोले।
उन्होंने सिर हिलाया।
पर मन कहीं और था।
उधर दूसरी तरफ
मंदिर से निकलकर श्रावणी ने ऑटो लिया।
उसके हाथ में एक छोटी- सी फाइल थी।
उस फाइल में सिर्फ कागज नहीं थे —
उसमें उसका सपना था।
एक अच्छी नौकरी।
एक पहचान।
एक अपना घर।
ऑटो एक ऊँची कांच की इमारत के सामने रुका।
JS Group of Architectures
भव्य... आधुनिक…. प्रभावशाली।
कांच की दीवारों में आसमान का प्रतिबिंब चमक रहा था।
श्रावणी ने गहरी सांस ली।
माँ... साथ रहना, उसने मन ही मन कहा।
रिसेप्शन पर पहुँचकर उसने विनम्र स्वर में कहा—
मैम, मुझे Personal Assistant के इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था।
रिसेप्शनिस्ट मुस्कुराई।
Please बैठिए, Miss श्रावणी. Mister राजीव अभी दूसरे इंटरव्यू में हैं।
श्रावणी बैठ गई।
उसने फाइल कसकर पकडी हुई थी।
उसके दिल की धडकन तेज थी।
पर आँखों में डर से ज्यादा उम्मीद थी।
कुछ मिनट बाद आवाज आई—
Miss श्रावणी, please अंदर आइए।
उसने गहरी सांस ली।
दरवाजा खोला।
अंदर बैठे थे — Mister राजीव।
सूट में सजे, चश्मा लगाए, गंभीर व्यक्तित्व।
कृपया बैठिए, मिस?
श्रावणी, सर।
तो बताइए, आपने पढाई कहाँ तक की है?
सर, मैंने B. Com किया है. Computer skills में proficient हूँ।
वह बोलती रही।
पर हर शब्द के पीछे मेहनत की कहानी थी।
अनुभव?
वह एक पल को रुकी।
औपचारिक अनुभव नहीं है, सर। लेकिन मंदिर में accounts और donation register संभालती थी।
राजीव हल्के से मुस्कुराए।
यह नौकरी आसान नहीं है। हमारे Boss का schedule बहुत tight रहता है। संभाल लेंगी?
उसकी आँखों में दृढता उभरी।
सर, जिंदगी ने मुझे कठिन हालातों में जीना सिखाया है। अगर विश्वास किया जाए। तो मैं खुद को साबित कर दूँगी।
कुछ पल की खामोशी।
राजीव ने फाइल बंद की।
Welcome to JS Group of Architectures, Miss श्रावणी।
उसकी सांस जैसे रुक गई।
Th. Thank you, सर।
कल से report कीजिए। और हाँ… हमारे Boss थोडे सख्त हैं।
वह हल्का- सा मुस्कुराई।
मैं तैयार हूँ, सर।
ऑफिस से बाहर निकलते समय सूरज की रोशनी उसके चेहरे पर पड रही थी।
जैसे किस्मत फुसफुसा रही हो—
तेरी कहानी अब सच में शुरू होने वाली है।
पर उसे क्या पता था।
यह सिर्फ नौकरी की शुरुआत नहीं थी।
यह एक ऐसे रहस्य का दरवाजा था —
जो इक्कीस साल से बंद था।
अध्याय समाप्त
क्या श्रावणी और भूमिका सिंह के बीच कोई अनकहा रिश्ता है?
क्या यह नौकरी उसके सपनों की शुरुआत है।
या किसी पुराने श्राप का पहला संकेत?
और वह शख्स।
जिससे उसकी मुलाकात अभी बाकी है —
क्या वह उसकी जिंदगी बनाएगा।
या सब कुछ छीन लेगा?
To be continued…