बहन की शादी को अब करीब दो महीने ही बचे थे। शादी की शॉपिंग के लिए मैंने अपनी बहन को देहरादून बुला लिया। शादी की तैयारियाँ शुरू हुईं और देखते ही देखते कपड़ों से लेकर बाकी जरूरी सामान तक, हमने एक-एक करके सारे काम पूरे कर लिए।
फिर वह दिन भी आ गया, जिसका घर में सभी को इंतजार था। हम दोनों देहरादून से घर की तरफ चल दिए। बहन की शादी बड़ी धूमधाम से हुई। घर में खुशियों का माहौल था, रिश्तेदारों की भीड़ थी और कई दिनों तक घर हंसी-खुशी से भरा रहा।
मैं भी करीब तीन हफ्ते घर पर रहा।
लेकिन आखिरकार वापस देहरादून लौटने का समय आ गया।
देहरादून पहुंचा तो सब कुछ वैसा ही था—वही कमरा, वही सामान, वही नौकरी और वही रोज की भागदौड़… बस एक चीज नहीं थी, मेरी बहन।
बहन के बिना वह कमरा अचानक बहुत बड़ा और बहुत खाली लगने लगा।
पहले तो खुद को संभालने की कोशिश की, लेकिन रात होते-होते मन भर आया। और फिर वही मेरी पुरानी आदत…
बाथरूम में जाकर रोने की।
उस रात मैं खूब रोया। शायद बहन के जाने का दुख था, शायद घर से दूर होने का, या शायद उस अकेलेपन का जिसे मैं किसी के सामने बता नहीं पाता था।
रोने के बाद बाहर आया, खाना बनाया और खा लिया। सुबह जल्दी ड्यूटी पर जाना था, इसलिए ज्यादा सोचने का समय भी नहीं था।
अजीब है जिंदगी…
जिस इंसान की कमी एक रात हमें अंदर तक तोड़ देती है, अगले दिन वही जिंदगी हमें उठाकर फिर काम पर भेज देती है।
अगली सुबह मैं ड्यूटी पर चला गया।
काम में इतना व्यस्त हुआ कि धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य लगने लगा। न बहन की उतनी याद आई, न घर की। शायद इंसान भी कितना अजीब है—दर्द को खत्म नहीं करता, बस उसके साथ जीना सीख जाता है।
समय बीतता गया।
कुछ महीनों बाद मेरी तीसरे नंबर वाली बहन भी देहरादून आने की जिद करने लगी। मैंने मम्मी-पापा से बात की और उसे भी अपने पास बुला लिया।
उसके आने के बाद फिर वही कमरा रहने लायक लगने लगा। बातचीत, हंसी-मजाक और घर जैसी एक छोटी-सी खुशी वापस आ गई।
उसके साथ समय का पता ही नहीं चला कि कब छह महीने बीत गए।
तब समझ आया कि शायद अपनों का साथ जिंदगी में कितना जरूरी होता है। पैसे कमाने के लिए हम घर से दूर निकल जाते हैं, लेकिन कमाई के साथ-साथ कुछ रिश्तों की कीमत भी समझ में आती है।
प्राइवेट नौकरी में यही तो होता है—
एक कमरा होता है, एक नौकरी होती है और लंबी-लंबी ड्यूटी होती है।
सुबह कमरे से निकलो तो सिर्फ काम के लिए,
रात को लौटो तो सिर्फ सोने के लिए।
और इन दोनों के बीच अगर कोई अपना साथ मिल जाए,
तो वही छोटा-सा कमरा घर बन जाता है।
वरना…
कमरा तो वही रहता है,
बस उसमें रहने वाला इंसान अंदर से थोड़ा और अकेला हो जाता है।
घरवालों का बुलावा आ गया था। अब मुझे और मेरी बहन को घर जाना था, क्योंकि खेतों में धान की कटाई भी शुरू हो चुकी थी। रात को हम दोनों गाड़ी में बैठे और गाँव की तरफ निकल पड़े।
उस समय घर जाने की खुशी ही कुछ अलग हुआ करती थी। जैसे-जैसे गाड़ी देहरादून की भीड़-भाड़ और शोर से दूर होती जाती, मन भी वैसे-वैसे शांत होता जाता। शहर की भागदौड़ से निकलकर उस शांत-सुकून वाली जगह की तरफ जाना मुझे हमेशा अच्छा लगता था। लगता था जैसे कुछ समय के लिए जिंदगी फिर से अपनी पुरानी रफ्तार में लौट रही है।
घर पहुँचने के बाद भी मेरी एक आदत हमेशा से रही है। घर पहुँचते ही अगर दिन के बचे हुए चावल मिल जाएँ तो मैं भात-दाल जरूर खाता हूँ। पता नहीं उसमें ऐसा क्या स्वाद है, लेकिन घर के भात-दाल का स्वाद कहीं और नहीं मिलता।
भात-दाल खाने के बाद मुझे एक गहरी और सुकून भरी नींद चाहिए होती है। यह मेरे लिए लगभग रोज का नियम जैसा था। जब भी मैं घर जाता, घर पहुँचने वाले दिन किसी से खास मिलने नहीं जाता। रास्ते में कोई मिल गया तो उससे मिल लिया, बाकी लोगों से अगले दिन ही मुलाकात होती।
शायद शरीर से ज्यादा उस दिन मन थका होता था।
लेकिन घर पहुँचते ही एक काम मैं कभी नहीं भूलता था—अपने जानवरों से मिलना।
हमारे घर में दो बिल्लियाँ थीं, एक कुत्ता था, बैल थे, बकरी थी, गाय थी और गाय का एक छोटा-सा बच्चा भी था। मुझे ये सभी बहुत पसंद थे। पता नहीं क्यों, लेकिन बचपन से ही मुझे जानवरों से बहुत लगाव रहा है।
उनसे कोई बड़ी-बड़ी बातें तो नहीं होती थीं, लेकिन उनके पास बैठने से ही मन को एक अलग तरह का सुकून मिलता था। शायद इसलिए क्योंकि जानवरों का प्यार बहुत सीधा होता है—न कोई मतलब, न कोई शिकायत और न कोई सवाल।
जब भी मैं घर जाता, सबसे पहले उनसे मिलना मेरे लिए जरूरी होता था।
आज सोचता हूँ तो लगता है कि शायद मेरा गाँव से रिश्ता सिर्फ घर और परिवार तक सीमित नहीं था। उस घर की दीवारों के बीच रहने वाले वे बेजुबान जानवर भी मेरी यादों और मेरे बचपन का उतना ही हिस्सा थे।
देहरादून लौटकर मैं चाहे कितनी भी भीड़ में क्यों न रहूँ, लेकिन गाँव पहुँचते ही ऐसा लगता था जैसे जिंदगी कुछ देर के लिए रुक गई है।
वहाँ भात-दाल थी, गहरी नींद थी, अपनों का साथ था, खेत थे और मेरे वो बेजुबान साथी थे।
और शायद इन्हीं छोटी-छोटी चीजों की वजह से…
घर जाना मेरे लिए सिर्फ गाँव जाना नहीं था,
घर जाना मतलब अपने उस पुराने “मैं” से फिर से मिलना था। ❤️
मेरी पुरानी आदतें समय के साथ कहीं गई नहीं थीं।