जन्म से कॉलेज तक
मेरा नाम अंकित है। मैं उत्तराखंड के चमोली जिले के एक छोटे से गाँव, त्रिकोट, का रहने वाला हूँ।
मेरा जन्म 29 दिसंबर को मेरे मामा के गाँव में हुआ था। मेरे नाम की भी अपनी एक खास कहानी है—मेरा नाम मेरी नानी जी ने रखा था। शायद उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह छोटा-सा नाम आगे चलकर मेरी जिंदगी की इतनी सारी कहानियों का हिस्सा बनेगा।
मैं किसी बड़े शहर से नहीं आया हूँ। मेरी पहचान एक छोटे से गाँव से है, जहाँ रिश्ते, परिवार और अपनेपन की अपनी अलग अहमियत होती है।
मेरी जिंदगी भी बिल्कुल सीधी नहीं रही। इसमें प्यार आया, भरोसा आया, कुछ रिश्ते बने, कुछ टूटे और कुछ ऐसे अनुभव मिले जिन्होंने मुझे अंदर से बदल दिया।
लेकिन आज मैं अपने अतीत को सिर्फ दुख की तरह नहीं देखता। मैं उसे अपनी जिंदगी का एक सबक मानता हूँ।
मैं अंकित हूँ—त्रिकोट जैसे छोटे से गाँव से निकला हुआ एक इंसान, जिसने जिंदगी में कुछ खोया भी है, कुछ सीखा भी है और अब कुछ बनने का सपना देखता है।
मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है…
शायद असली कहानी तो अब शुरू हुई है।
मेरी कहानी सिर्फ मेरी नहीं है, इसके पीछे मेरे परिवार की भी एक छोटी-सी कहानी है।
मेरे दादा जी उस समय शिक्षक हुआ करते थे। मेरे लिए यह गर्व की बात है कि मेरे परिवार में शिक्षा और मेहनत की अपनी एक अहमियत रही है। मेरी दादी जी घर संभालती थीं और परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाती थीं।
उस समय मेरे पापा काम करने के लिए दिल्ली में रहते थे, जबकि मेरी माँ गाँव में ही रहती थीं। उस दौर में जिंदगी आज की तरह आसान नहीं थी। परिवार के बेहतर भविष्य के लिए पापा को घर से दूर रहकर मेहनत करनी पड़ती थी और माँ गाँव में रहकर घर-परिवार संभालती थीं।
मेरी माँ आज भी गाँव में ही रहती हैं। वह गाँव, जहाँ से मेरे परिवार की कहानी जुड़ी है और जहाँ से मेरी अपनी कहानी भी शुरू हुई।
शायद इसी वजह से मेरे लिए गाँव सिर्फ एक जगह नहीं है—वह मेरी पहचान है, मेरे परिवार की जड़ है और मेरी जिंदगी का वह हिस्सा है जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता।
मेरी जिंदगी की मुश्किलें शायद मेरे होश संभालने से भी पहले शुरू हो गई थीं।
मैं अभी एक साल का भी नहीं हुआ था, और उस छोटी-सी उम्र में ही एक भयंकर बीमारी से जूझ रहा था। उस समय मुझे शायद यह भी नहीं पता था कि जिंदगी क्या होती है और मुश्किल किसे कहते हैं।
लेकिन मेरे माता-पिता और परिवार के लिए वह समय कितना कठिन रहा होगा, इसका अंदाजा मैं आज लगा सकता हूँ। एक छोटा-सा बच्चा बीमारी से लड़ रहा हो और परिवार उसे ठीक होते देखने के लिए हर पल उम्मीद लगाए बैठा हो—वह दौर निश्चित ही आसान नहीं रहा होगा।
मुझे उस समय की बातें याद नहीं हैं, लेकिन मेरे जीवन की शुरुआत में ही एक ऐसी लड़ाई लिखी थी, जिसे मैंने अपनी इच्छा से नहीं चुना था।
शायद जिंदगी ने मुझे बचपन से ही एक बात सिखानी शुरू कर दी थी—
मुश्किलें उम्र देखकर नहीं आतीं, लेकिन इंसान की असली ताकत अक्सर उन्हीं मुश्किलों से निकलकर सामने आती है।
मैं अभी एक साल का भी नहीं हुआ था, जब जिंदगी ने मुझे पहली बड़ी लड़ाई के सामने खड़ा कर दिया था। मैं एक भयंकर बीमारी से जूझ रहा था और मेरा इलाज चल रहा था।
उस समय मेरा इलाज सफलतापूर्वक 27 दिसंबर को हुआ। शायद इसी वजह से 27 दिसंबर मेरे लिए सिर्फ एक तारीख नहीं रही। यही वह दिन है जिसे मैं अपना जन्मदिन भी मनाता हूँ। मेरे लिए यह दिन दो वजहों से खास है—एक तरफ मेरा जन्मदिन और दूसरी तरफ वह दिन, जब जिंदगी ने मुझे एक बड़ी मुश्किल से बाहर निकाला।
मेरी दादी आज भी उस समय की बातें बताती हैं। वह कहती हैं कि मेरे इलाज के लिए मेरे दादा जी को किसी से उधार पैसे माँगने पड़े थे, क्योंकि उनके पास अस्पताल जाने के लिए गाड़ी का किराया तक नहीं था।
उस समय मेरे दादा जी, मेरी माँ और मेरे पापा मेरे साथ अस्पताल में ही थे। एक तरफ मैं बीमारी से लड़ रहा था और दूसरी तरफ मेरा पूरा परिवार मेरे लिए अपनी पूरी ताकत लगा रहा था।
आज जब मैं यह बात सोचता हूँ तो महसूस होता है कि शायद उस उम्र में मैं कुछ समझ नहीं सकता था, लेकिन मेरे परिवार ने मेरे लिए बहुत कुछ सहा होगा।
मेरे लिए 27 दिसंबर इसलिए सिर्फ मेरा जन्मदिन नहीं है।
यह उस संघर्ष की तारीख भी है, जब मेरे परिवार की दुआओं, उनकी मेहनत और उम्मीदों के बीच मुझे जिंदगी दोबारा मिली।
शायद मेरी जिंदगी की पहली जीत वही थी—जिसके बारे में मुझे उस समय कुछ पता भी नहीं था।
उस समय मेरी दादी ने घर पर दो भैंस और एक बैल-गाय पाल रखी थी। गाँव की जिंदगी में पशुओं की जिम्मेदारी भी कम नहीं होती थी। सुबह उठकर उन्हें घास देना, चारा-पानी करना और कुंडा लगाना—ये सब रोज की जिम्मेदारियाँ थीं।
लेकिन उस समय मेरे लिए उनकी चिंता सबसे बड़ी थी।
मेरी दादी सुबह अपने पशुओं को घास देकर और उनकी देखभाल करके मुझे देखने अस्पताल आती थीं। उनके साथ मेरी बड़ी बहन भी मुझे मिलने अस्पताल आती थी।
आज जब मैं यह सब सोचता हूँ तो लगता है कि मेरे परिवार ने मेरे लिए कितना कुछ किया होगा। एक तरफ घर और पशुओं की जिम्मेदारी थी, दूसरी तरफ अस्पताल में मेरी जिंदगी की चिंता।
मेरी दादी उस समय खुद कितनी परेशान रही होंगी, यह मैं उस उम्र में समझ नहीं सकता था। लेकिन आज उनकी बातें सुनकर महसूस होता है कि मेरे लिए उनका प्यार और चिंता कितनी गहरी थी।
मैं शायद उस समय बहुत छोटा था, लेकिन मेरे लिए मेरा पूरा परिवार मेरे साथ खड़ा था।
और शायद मेरी जिंदगी की पहली लड़ाई मैंने अकेले नहीं, बल्कि अपने पूरे परिवार के प्यार, मेहनत और दुआओं के सहारे जीती थी।
आखिरकार मेरा इलाज सफल हुआ और मैं ठीक होकर अपने घर वापस आ गया।
उस समय मैं बहुत छोटा था, इसलिए मुझे उस संघर्ष की कोई याद नहीं है। लेकिन आज जब परिवार से उस दौर की बातें सुनता हूँ, तो समझ आता है कि मेरे लिए वह समय कितना मुश्किल रहा होगा और मेरे परिवार ने मेरे लिए कितनी चिंता और मेहनत की होगी।
मैं घर वापस आया और धीरे-धीरे जिंदगी फिर से अपनी सामान्य रफ्तार में चलने लगी।
दिन बीतते गए, महीने गुजरते गए और देखते ही देखते समय आगे बढ़ता गया।
मुझे उस समय यह बिल्कुल नहीं पता था कि जिंदगी आगे चलकर मुझे और भी कई तरह की चुनौतियाँ दिखाएगी। बचपन की वह पहली लड़ाई तो मैं जीत चुका था, लेकिन असली जिंदगी की कहानी अभी बाकी थी।समय बीतता गया… और मैं भी धीरे-धीरे बड़ा होता गया।
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया। फिर हमारे घर में मेरी दो छोटी बहनें आईं। घर में बच्चों की हँसी बढ़ गई और परिवार भी बड़ा होता गया।
इसी बीच मेरे चाचा की शादी तय हुई। घर में शादी की तैयारियाँ शुरू हुईं तो मेरे लिए भी सबसे बड़ा सवाल यही था कि बारात में मुझे भी जाना है।
मैंने बारात में जाने की ऐसी जिद पकड़ ली कि पूरा घर सिर पर उठा लिया। मुझे बस यही लग रहा था कि चाचा की बारात है और मैं उसमें जरूर जाऊँगा।
लेकिन आखिर में घरवालों ने मुझे बारात में नहीं ले जाने का फैसला कर लिया।
उस समय तो मुझे बहुत बुरा लगा होगा और लगा होगा कि सब जा रहे हैं, बस मुझे ही क्यों नहीं ले जा रहे। लेकिन आज उस बात को याद करता हूँ तो बचपन की वह जिद और मासूमियत याद करके हँसी आ जाती है।
बचपन भी कितना अजीब होता है—छोटी-सी बात उस समय पूरी दुनिया की सबसे बड़ी परेशानी लगती है, और सालों बाद वही बात जिंदगी की सबसे प्यारी याद बन जाती है।
हमारे गढ़वाल में शादी-ब्याह के समय हगरात की परंपरा होती है, जिसे कई लोग देरभात भी कहते हैं। चाचा की शादी के सिलसिले में मेरे पापा और चाचा मुझे अपने साथ चाची के घर ले गए।
चाची के घर पहुँचते ही मैं खेलते-खेलते कब सो गया, मुझे पता ही नहीं चला। लेकिन सुबह जब मेरी आँख खुली तो सबसे पहले मुझे अपने दादा जी की याद आई।
मैंने उठते ही दादा जी को ढूँढना शुरू कर दिया। इधर-उधर देखा, लेकिन दादा जी कहीं दिखाई नहीं दिए। उस छोटी-सी उम्र में मुझे यह समझ नहीं थी कि दादा जी कहाँ गए हैं या कब वापस आएँगे।
मैं उन्हें नहीं देख पाया तो रोने लगा।
आज उस घटना को याद करता हूँ तो लगता है कि बचपन में दादा जी से मेरा लगाव कितना गहरा था। उस समय मेरे लिए दादा जी का आसपास होना ही सुरक्षा और अपनापन था।
कभी-कभी बचपन की सबसे छोटी यादें ही इंसान के दिल में सबसे गहरी जगह बना लेती हैं।
समय के साथ मेरे पापा भी दिल्ली से वापस गढ़वाल आ गए। गढ़वाल आने के बाद उन्होंने अपनी हार्डवेयर की दुकान शुरू कर ली। अब परिवार के लिए जिंदगी का एक नया दौर शुरू हो चुका था।
तब तक मैं भी धीरे-धीरे बड़ा हो गया था और पढ़ाई करने की उम्र हो गई थी। मेरे पापा मुझे अपने साथ लेकर मेरी पहली पढ़ाई के लिए चले गए।
मेरे लिए यह एक नई शुरुआत थी। गाँव के माहौल और परिवार के बीच पले-बढ़े मेरे बचपन से अब मेरी जिंदगी में स्कूल, पढ़ाई और नई चीजें सीखने का दौर शुरू हो रहा था।
उस समय मुझे कहाँ पता था कि स्कूल का यह छोटा-सा कदम आगे चलकर मेरी जिंदगी की कहानी में कितने बड़े मोड़ लेकर आएगा।
बचपन पीछे छूट रहा था और जिंदगी मुझे धीरे-धीरे आगे की ओर ले जा रही थी।
शुरुआत में मैं और मेरे पापा ही साथ रहते थे। बाद में मेरी बड़ी दीदी भी हमारे साथ आ गईं। हम भाई-बहन की उम्र में काफी फर्क था, इसलिए बचपन में हमारा रिश्ता भी थोड़ा अलग था।
उस समय अगर सच कहूँ तो मुझसे ज्यादा जिद्दी और बिगड़ा हुआ शायद ही कोई था। मैं अपनी बात मनवाने के लिए जिद करता था और छोटी-छोटी बातों पर भी अड़ जाता था।
बचपन में मुझे यह समझ नहीं थी कि मेरी हर जिद के पीछे परिवार को कितनी परेशानी होती होगी। उस समय तो बस यही लगता था कि जो मैं चाहता हूँ, वह मुझे मिलना ही चाहिए।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो अपनी वही बचपन की जिद और शरारतें याद करके हँसी आती है।
शायद यही बचपन होता है—जहाँ इंसान गलतियाँ भी करता है, जिद भी करता है, शरारतें भी करता है और बिना समझे परिवार के प्यार का फायदा भी उठा लेता है।
लेकिन समय के साथ वही बच्चा धीरे-धीरे जिंदगी को समझना शुरू करता है।जैसे-जैसे मैं थोड़ा बड़ा हुआ, मेरी शरारतें भी बढ़ती गईं। मुझे पापा से नए-नए बहाने बनाकर पैसे माँगने की आदत हो गई थी।
कभी किसी चीज़ के लिए पैसे चाहिए होते, कभी किसी और बहाने से पापा से पैसे ले लेता। और कभी-कभी तो मैं बिना बताए भी पैसे निकाल लेता था।
उस उम्र में मुझे यह समझ नहीं थी कि पैसे कमाने के लिए पापा कितनी मेहनत करते हैं। मेरे लिए तो बस इतना मायने रखता था कि मुझे जो चाहिए, वह किसी तरह मिल जाए।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ आता है कि वह मेरी बचपन की एक गलत आदत थी। उस समय मैं इसे शरारत समझता था, लेकिन आज समझता हूँ कि माता-पिता की मेहनत और पैसों की कीमत समझना भी बड़ा होने का एक हिस्सा है।
बचपन में इंसान बहुत कुछ बिना समझे करता है, लेकिन जिंदगी धीरे-धीरे हर गलती का मतलब समझा देती है।
समय आगे बढ़ता गया। 2006 में मेरी दीदी और 2008 में मैं घर वापस आ गया। इसकी वजह मेरे दादा जी की तबीयत खराब होना था।
दादा जी की तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए परिवार के लिए उस समय घर के पास रहना और उनका साथ देना ज्यादा जरूरी हो गया था। इस वजह से मेरी पढ़ाई और जिंदगी का रास्ता भी कुछ समय के लिए बदल गया और मैं घर वापस आ गया।
उस समय मैं बहुत कुछ समझने की उम्र में नहीं था, लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो महसूस होता है कि परिवार में किसी अपने की तबीयत खराब हो तो बाकी सारी चीजें छोटी लगने लगती हैं।
जिंदगी में कुछ फैसले हम अपनी इच्छा से नहीं लेते, परिस्थितियाँ हमें वह रास्ता चुनने पर मजबूर कर देती हैं।
लेकिन शायद जिंदगी को अभी मुझे और कुछ सिखाना था।
दिसंबर 2009 में मेरे दादा जी हमें हमेशा के लिए छोड़कर चले गए।
जिन दादा जी को बचपन में मैं हर जगह खोजता था, जिनके न मिलने पर रोने लगता था, वही दादा जी अब हमारे बीच नहीं थे। उस उम्र में शायद मैं मौत और हमेशा के लिए चले जाने का मतलब पूरी तरह नहीं समझता था, लेकिन घर में आई उस कमी को जरूर महसूस किया।
दादा जी सिर्फ हमारे परिवार के बड़े नहीं थे, वह हमारे घर की एक मजबूत छाया थे। उनके जाने के बाद परिवार की जिंदगी में एक ऐसा खालीपन आया, जिसे कोई भर नहीं सकता था।
आज इतने साल बाद भी जब मैं अपने बचपन को याद करता हूँ, तो दादा जी की याद उसमें बहुत गहराई से जुड़ी हुई है।
कुछ लोग जिंदगी से चले जाते हैं, लेकिन हमारी यादों से कभी नहीं जाते।
दादा जी के जाने के बाद जिंदगी धीरे-धीरे आगे बढ़ती रही। इसी दौरान पापा की दुकान का क्या हुआ, मुझे ठीक से पता नहीं चला। सच कहूँ तो मैंने कभी उनसे यह पूछा भी नहीं कि दुकान क्यों बंद हुई या उसके साथ क्या हुआ।
मैं उस उम्र में शायद इतना समझदार नहीं था कि इन चीज़ों के बारे में सोचूँ या पापा से सवाल करूँ।
मुझे बस इतना याद है कि एक समय ऐसा आया जब पापा घर पर ही रहने लगे।
उस वक्त मुझे यह नहीं पता था कि इसके पीछे क्या वजह थी, दुकान का क्या हुआ और पापा ने किन परिस्थितियों का सामना किया। शायद उस समय मैं सिर्फ अपने बचपन और अपनी छोटी-सी दुनिया में ही व्यस्त था।
लेकिन आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि माता-पिता अपनी जिंदगी में कितनी ऐसी बातें चुपचाप सह लेते हैं, जिनका एहसास बच्चों को बहुत बाद में होता है।
बचपन में हम सिर्फ माता-पिता का साथ देखते हैं, उनकी परेशानियाँ नहीं।
मेरे दादा जी उस जमाने में शिक्षक थे। इसलिए वह सिर्फ स्कूल के बच्चों को ही नहीं, बल्कि घर के हम सभी भाई-बहनों को भी पढ़ाया करते थे।
दादा जी की वजह से पढ़ाई पर मेरा भी अच्छा ध्यान रहने लगा था। वह हमें प्यार से पढ़ाते और समझाते थे। शायद उनकी मेहनत और सिखाने के तरीके का ही असर था कि मैं कक्षा 4 में प्रथम आया।
आज सोचता हूँ तो उस सफलता में सिर्फ मेरी मेहनत नहीं थी, बल्कि मेरे दादा जी की सीख और उनका आशीर्वाद भी शामिल था।
मेरी पढ़ाई की पहली बड़ी प्रेरणा मेरे दादा जी ही थे।
दादा जी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन मुझे आज भी लगता है कि उनका आशीर्वाद मेरे साथ है।
उनकी एक खास बात थी—वह मुझे जो भी चीज़ एक बार समझा देते थे, वह मेरे दिमाग में ऐसे बैठ जाती थी कि फिर उसे भूलना मुश्किल होता था। शायद यही वजह है कि आज भी उनकी सिखाई हुई कई बातें मुझे याद हैं।
समय बीत गया, दादा जी हमें छोड़कर चले गए, लेकिन उनकी दी हुई सीख आज भी मेरे साथ चल रही है।
इंसान चला जाता है, लेकिन उसकी दी हुई शिक्षा और संस्कार हमेशा हमारे साथ रहते हैं।
मेरे लिए दादा जी सिर्फ मेरे दादा नहीं थे, बल्कि मेरे पहले शिक्षक, मेरी प्रेरणा और मेरी जिंदगी की उन मजबूत नींवों में से एक थे, जिन पर आज भी मैं खड़ा हूँ।
मैंने आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई गाँव के स्कूल से ही की। गाँव का स्कूल और वहाँ का माहौल मेरे बचपन का एक अहम हिस्सा रहा।
लेकिन आठवीं के बाद पढ़ाई का अगला पड़ाव थोड़ा अलग था। नौवीं कक्षा में दाखिला लेने के लिए मुझे करीब 2 किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था।
आज 2 किलोमीटर की दूरी शायद बहुत बड़ी नहीं लगती, लेकिन उस समय रोज़ पैदल स्कूल जाना मेरे लिए जिंदगी की दिनचर्या का एक नया हिस्सा था।
गाँव की पगडंडियों से पैदल स्कूल जाना, पढ़ाई करना और फिर वापस घर लौटना—इन्हीं छोटी-छोटी यात्राओं के साथ मेरी जिंदगी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।
शायद मुझे तब पता नहीं था, लेकिन हर कदम मुझे मेरे भविष्य की तरफ ले जा रहा था।
नौवीं कक्षा में पहुँचते ही मेरे लिए सब कुछ नया था—नया स्कूल, नए दोस्त और बिल्कुल नया माहौल।
लेकिन मेरे नए दोस्तों का माहौल पढ़ाई से बिल्कुल अलग था। सच कहूँ तो उनमें से ज्यादातर को पढ़ाई से कोई खास मतलब नहीं था। उनकी बातें, उनका रहन-सहन और उनका बोलने का तरीका मेरे लिए बिल्कुल नया था।
मैंने उस उम्र में ऐसी-ऐसी गालियाँ पहली बार सुनीं, जिन्हें मैंने अपने गाँव के स्कूल में कभी नहीं सुना था। शुरुआत में मुझे यह सब अजीब लगता था, लेकिन धीरे-धीरे मैं भी उसी माहौल का हिस्सा बनने लगा।
यह मेरे जीवन का एक ऐसा दौर था, जहाँ मुझे पहली बार समझ आने लगा कि दोस्त और संगत इंसान की जिंदगी पर कितना असर डालते हैं।
उस समय शायद मुझे इसका अंदाजा नहीं था कि मैं किस तरह बदल रहा हूँ। लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ आता है कि जिंदगी में कुछ दौर हमें इसलिए मिलते हैं, ताकि बाद में हम यह पहचान सकें कि कौन-सी संगत हमें आगे ले जाती है और कौन-सी हमें अपने रास्ते से भटका देती है।
एक समय था जब मैं स्कूल में पहली बेंच पर बैठने वाला बच्चा था। पढ़ाई में मेरी रुचि थी और दादा जी की सीख का असर भी मुझ पर था।
लेकिन नए स्कूल और नई संगत के साथ धीरे-धीरे मैं बदलने लगा।
अब वही मैं था जो पहली बेंच से उठकर आखिरी बेंच पर बैठने लगा था।
मेरी जगह ही नहीं बदली थी, मेरे अंदर भी बहुत कुछ बदल रहा था। पढ़ाई से ध्यान हटने लगा और दोस्तों की बातें, उनका माहौल और उनकी संगत ज्यादा अच्छी लगने लगी।
उस समय शायद मुझे यह बदलाव बहुत सामान्य लगता था। लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ आता है कि यह मेरी जिंदगी का एक ऐसा मोड़ था, जहाँ से मैं धीरे-धीरे उस रास्ते पर जाने लगा था, जो मेरी पढ़ाई और भविष्य के लिए सही नहीं था।
पहली बेंच से आखिरी बेंच तक का यह सफर सिर्फ सीट बदलने का सफर नहीं था—यह मेरे बदलते हुए स्वभाव की शुरुआत थी।
मेरे दोस्त भी ऐसे बन गए थे, जिन्हें पढ़ाई से ज्यादा लड़कियों में दिलचस्पी थी। धीरे-धीरे मैं भी उसी संगत का हिस्सा बनता चला गया।
हमारी क्लास भी स्कूल की सबसे बिगड़ी हुई क्लास मानी जाती थी। पढ़ाई को लेकर किसी में खास गंभीरता नहीं थी। शरारतें, मस्ती और बेवजह की बातें ही ज्यादा होती थीं।
जो बच्चा कभी पहली बेंच पर बैठकर पढ़ाई किया करता था, अब वही आखिरी बेंच पर बैठकर दोस्तों के साथ समय बिताने लगा था।
उस समय मुझे लगता था कि यही जिंदगी है—दोस्त, मस्ती और बेफिक्री।
लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ आता है कि संगत इंसान को धीरे-धीरे बदल देती है। इंसान को पता भी नहीं चलता कि वह कब अपने पुराने स्वभाव से दूर हो गया।
यही वह दौर था, जहाँ मेरी जिंदगी ने एक नया मोड़ लेना शुरू किया।
अब संगत का असर तो होना ही था।
एक दिन मैं भी उसी जोश और उस माहौल में बह गया। मैंने एक लड़की से कुछ ऐसा कह दिया, जो मुझे उस समय शायद सामान्य लगा होगा, लेकिन बात वहीं खत्म नहीं हुई।
वह लड़की सीधे प्रिंसिपल के पास चली गई।
इसके बाद स्कूल में जो हुआ, उसे आज याद करता हूँ तो लगता है कि वह मेरे लिए बहुत बड़ा सबक था। उस समय शायद मुझे समझ नहीं थी कि मेरी एक बात इतनी बड़ी परेशानी खड़ी कर सकती है।
उस दिन पहली बार मुझे महसूस हुआ कि गलत संगत और बिना सोचे-समझे की गई हरकत का असर सिर्फ कुछ मिनटों तक नहीं रहता—कभी-कभी उसका परिणाम बहुत दूर तक जाता है।
उस दिन जो हुआ, उसने मुझे अंदर तक हिला दिया।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि वह घटना मेरी जिंदगी के उन मोड़ों में से एक थी, जिसने मुझे धीरे-धीरे अपनी गलतियों को पहचानना सिखाया।
उस दिन जो हुआ, उसके बाद मैंने खुद से एक बात कह दी—अब मैं लड़कियों से बात नहीं करूँगा।
और सच कहूँ तो मैंने अपनी उस बात को निभाया भी। पूरे चार साल तक मैंने लड़कियों से लगभग बात नहीं की। ऐसा नहीं था कि बिल्कुल कभी बात ही नहीं हुई, लेकिन जितनी बातचीत मेरे बाकी दोस्त करते थे, उतनी मैंने कभी नहीं की।
मैंने खुद को उनसे थोड़ा दूर रखा और अपनी जिंदगी को दूसरी चीजों में लगाने की कोशिश की।
उस समय शायद यह फैसला मेरी उम्र के हिसाब से थोड़ा कठोर था, लेकिन मेरे लिए जरूरी था। मैं नहीं चाहता था कि दोबारा किसी ऐसी स्थिति में पड़ूँ, जहाँ मेरी एक गलती मेरे लिए परेशानी बन जाए।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उस घटना ने मुझे एक बात जरूर सिखाई—
कभी-कभी इंसान को खुद पर लगाम लगानी पड़ती है, ताकि वह अपनी गलतियों से बाहर निकल सके।
समय बीतता गया और मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा। फिर मैं 12वीं कक्षा में पहुँचा।
उसी दौरान मैंने अपनी क्लास पर एक कविता लिखी। शायद यह पहली बार था जब मैंने अपने आसपास के लोगों और अपने अनुभवों को शब्दों में उतारने की कोशिश की।
उस समय मुझे यह अंदाजा नहीं था कि शब्दों के साथ मेरा यह जुड़ाव आगे चलकर मेरी जिंदगी में इतनी अहमियत रखेगा।
कभी-कभी इंसान अपने अंदर छुपी किसी खूबी को अचानक पहचानता है। मेरे लिए वह पल भी कुछ ऐसा ही था।
जिस लड़के ने कभी पढ़ाई से दूरी बना ली थी, वही अब अपने अनुभवों को शब्दों में लिखने लगा था।
मेरी वो कविता कुछ ऐसी थी
अनोखी थी हमारी 12th की Class ❤️
एक आखिरी याद… उन खूबसूरत दिनों के नाम
अनोखी थी हमारी 12th की Class,
जहाँ हर दिन एक नई कहानी थी,
कभी हँसी थी, कभी शरारत थी,
तो कभी आँखों में नादानी थी।
नैनवाल मैम पूरी Class की जान थीं,
तो कोठियाल सर पूरे School की शान थे।
डाँट में भी अपनापन था,
और उनकी बातों में हमारा भविष्य छुपा था।
वो मेरी छोटी-छोटी नादानियाँ,
और उन पर आरती-पिंकी की हँसी की पिचकारियाँ।
वो बिना वजह हँसना,
बिना बात के रूठना,
और फिर अगले ही पल सबका साथ बैठ जाना।
गौरव रावत की Class में Selfie लेने की आदतें,
वो सोनम का लाल रंग का टीका,
आशीष और रविंद्र कुमार का
Roll Number झाड़ू मारने का ठेका।
वो रोशन का चश्मा,
जिसे पूरी Class ने अपना समझ लिया था,
किसी का अपना कुछ नहीं था,
सबने सबको अपना बना लिया था।
प्रमिला का काजल,
और उस पर लड़के हो गए घायल,
वो मनीष का संगीत,
और पूरी Class के फ़िल्मी गीत।
वो Hindi के Period की अंगड़ाइयाँ,
वो Rahul और Laxman की लड़ाइयाँ,
वो विजय और नागेंद्र की गप्पें,
जिनके बिना अधूरी लगती थीं हमारी बातें।
वो पूनम की Farewell वाली चप्पलें,
वो दिव्या के लंबे बाल,
और किरण-बबीता की अपनी ही चाल।
वो Chemistry की Class में मस्ती,
कभी पढ़ाई, कभी हँसी-मजाक,
कभी Teacher से बचने की कोशिश,
तो कभी पूरी Class का एक साथ पकड़ा जाना।
वो अंकित का शर्माना,
और हर्षित का उसे चिढ़ाना,
वो छोटी-छोटी बातों पर हँसना,
और फिर उन्हीं बातों को सालों तक याद रखना।
वो Hindi की Class में सोना,
और अपने House के दिन School Late आना,
वो 15 August के Program की मस्तियाँ,
और हमारी 12th Class की हस्तियाँ।
कभी सोचा नहीं था
कि ये दिन भी एक दिन खत्म हो जाएँगे,
जो दोस्त रोज सामने बैठते थे,
वो एक दिन इतने दूर हो जाएँगे।
कल तक जो साथ बैठकर हँसते थे,
आज उनकी तस्वीरों में चेहरे ढूँढते हैं,
कल तक जिनसे रोज बातें होती थीं,
आज उनकी खबरें कभी-कभी पूछते हैं।
किसी ने नौकरी पकड़ ली,
किसी ने आगे पढ़ाई शुरू कर दी,
किसी ने अपना शहर बदल लिया,
और किसी ने जिंदगी की नई राह चुन ली।
अब अलग-अलग दिशाओं में हैं
सबकी अपनी-अपनी कश्तियाँ,
मगर दिल के किसी कोने में
आज भी साथ हैं वो सारी हस्तियाँ।
समय हमें कितना भी दूर ले जाए,
ये यादें कभी दूर नहीं होंगी।
12th की वो आखिरी घंटी,
वो आखिरी दिन, वो आखिरी मुलाकात—
शायद जिंदगी में फिर कभी वैसी नहीं होगी।
आज भी कभी पुराने School के पास से गुजरूँ,
तो लगता है जैसे आवाज आएगी—
“अरे अंकित! कहाँ जा रहा है?”
और पीछे मुड़कर देखूँगा,
तो पूरी Class मुस्कुराती हुई दिखाई देगी।
काश…
एक बार फिर वही Uniform पहन पाते,
वही Classroom में बैठ पाते,
वही Attendance के समय नाम सुन पाते,
वही दोस्तों के साथ बेवजह हँस पाते।
काश…
वक्त थोड़ा पीछे लौट जाता,
और हम फिर से 12th के बच्चे बन जाते।
लेकिन जिंदगी में कुछ पल
वापस नहीं आते,
बस याद बनकर
हमारे साथ हमेशा चलते जाते हैं।
हमारी वो Class,
हमारे वो दोस्त,
हमारे वो Teachers,
हमारी वो छोटी-छोटी शरारतें—
सब हमारी जिंदगी का वो हिस्सा हैं
जिसे हम चाहकर भी कभी नहीं भूल पाएँगे।
G.I.C. KOTI CHANDPUR ❤️
आज हम सब अलग हैं,
मगर हमारी कहानी एक है।
हम सबकी राहें अलग हैं,
मगर हमारी यादें एक हैं।
Student नहीं रहे हम,
पर उस Class के दोस्त
हमेशा रहेंगे। ❤️
Love You All Friends…
जहाँ भी रहो, खुश रहो।
और कभी वक्त मिले तो
एक बार फिर मिलकर
उसी तरह हँस लेना…
जैसे हमारी 12th की Class में हँसा करते थे। ❤️🥹
12वीं में मैंने अपनी क्लास पर एक कविता लिखी थी। वह कविता मेरे लिए सिर्फ कुछ पंक्तियाँ नहीं थीं, बल्कि हमारी पूरी 12वीं की यादों का एक छोटा-सा हिस्सा थी।
उस समय वह कविता इतनी वायरल हुई कि मेरी क्लास के बहुत से दोस्तों ने उसे अपने-अपने सोशल मीडिया पर शेयर किया। किसी ने उसे स्टेटस लगाया, किसी ने पोस्ट किया, तो किसी ने अपनी यादों के साथ उसे आगे बढ़ाया।
आज जब मैं उस कविता को याद करता हूँ, तो एक बात जरूर महसूस होती है—वह कविता जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही अधूरी भी थी। उसमें हमारी क्लास के बहुत से दोस्त छूट गए थे। कई नाम लिखे ही नहीं जा सके, कई किस्से शब्दों में नहीं आ पाए और कई ऐसी यादें थीं जिन्हें उस वक्त शायद मैं खुद भी भूल गया था।
लेकिन शायद यही उस कविता की सबसे खूबसूरत बात थी।
क्योंकि उसमें सिर्फ मेरे लिखे हुए शब्द नहीं थे, उसमें हमारी 12वीं की हँसी, शरारतें, दोस्ती, टीचर्स की डाँट और वो आखिरी साल था, जिसे हम उस वक्त जी तो रहे थे, लेकिन उसकी कीमत समझ नहीं पा रहे थे।
आज उन दिनों को याद करता हूँ तो लगता है—काश उस कविता में हर दोस्त का नाम लिख पाता, हर किस्सा जोड़ पाता और उन आखिरी दिनों को थोड़ा और जी पाता।
क्योंकि 12वीं खत्म हुई थी सिर्फ एक क्लास की तरह नहीं…
हमारी जिंदगी का एक ऐसा अध्याय खत्म हुआ था, जिसे दोबारा कभी उसी तरह लिखा ही नहीं जा सकता।
एक अच्छी बात ये भी थी कि दोस्तों ने जबरदस्ती मेरे लिए एक girlfriend भी ढूँढ ली थी। 😂
मेरी छोड़ो, हमारी क्लास में तो लगभग सबकी girlfriend थी, बस कुछ गिने-चुने लोगों को छोड़कर। और उन कुछ लोगों में मैं भी शामिल था।
दोस्तों को शायद मेरी single life बिल्कुल पसंद नहीं थी, इसलिए उन्होंने मेरे लिए भी ये जिम्मेदारी अपने सिर ले ली थी कि भाई की girlfriend तो होनी ही चाहिए। 😄
मैं उस समय इन सब चीज़ों से थोड़ा दूर ही रहता था, लेकिन दोस्तों की अपनी ही दुनिया थी। कभी किसी का नाम जोड़ना, कभी किसी से बात करवाने की कोशिश करना और फिर पूरी क्लास का उस बात पर मज़ाक बनाना…
आज सोचता हूँ तो लगता है, वो भी क्या दिन थे।
तब जिन बातों पर शर्म आती थी, आज वही बातें चेहरे पर मुस्कान ले आती हैं।
12वीं के पेपर शुरू होने से पहले हमारे क्षेत्र में एक बहुत प्राचीन मंदिर है। वहाँ हमारे क्षेत्र के लगभग सभी लोग पूजा करने जाते थे।
तो हमने भी सोचा—जब सब जा रहे हैं, तो हम भी चलते हैं। आखिर 12वीं के पेपर थे, थोड़ा भगवान का आशीर्वाद लेना तो बनता ही था। 😄
हम दोस्तों ने मिलकर मंदिर जाने का मन बना लिया। उस समय मन में एक तरफ बोर्ड परीक्षा का डर था और दूसरी तरफ दोस्तों के साथ घूमने की खुशी।
किसी को अच्छे नंबरों की चिंता थी, किसी को पास होने की, और किसी को शायद इस बात की कि मंदिर जाकर भगवान से क्या माँगना है।
लेकिन आज सोचता हूँ तो लगता है कि उस दिन हम सिर्फ पूजा करने नहीं गए थे…
हम अपनी 12वीं की जिंदगी के आखिरी दिनों की कुछ यादें बनाने गए थे।
क्योंकि हमें कहाँ पता था कि कुछ ही दिनों बाद हम सब अपनी-अपनी जिंदगी में अलग-अलग रास्तों पर निकल जाएंगे और फिर यही छोटी-छोटी बातें सबसे ज्यादा याद आएँगी।
विदाई का वो दिन… 🥹
और आखिरकार वो दिन भी आ गया, जिसका शायद हमें इंतज़ार भी था और डर भी…
कक्षा 11 के बच्चे और हमारे टीचर हमें, यानी 12वीं के बच्चों को विदाई दे रहे थे।
वो पल सच में बहुत अजीब था।
एक तरफ खुशी थी कि अब स्कूल की पढ़ाई खत्म हो गई, अब कॉलेज जाएंगे, नई जगह होगी, नए दोस्त होंगे और जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू होगा…
लेकिन दूसरी तरफ दिल के किसी कोने में ये एहसास भी था कि जिस स्कूल को इतने सालों से अपना दूसरा घर समझा, अब शायद यहाँ रोज़ आना नहीं होगा।
मेरी क्लास की लड़कियों का तो बुरा हाल था।
कोई चुपचाप बैठी थी, तो कोई सच में रो रही थी। उनकी आँखों में स्कूल की यादें साफ दिखाई दे रही थीं।
लेकिन मेरे दोस्त…
😂😂
हम लोगों की आँखों से तो एक बूंद आँसू भी नहीं निकला।
हमारे दिमाग में उस समय भावनाओं से ज्यादा कुछ और ही चल रहा था—
"चलो भाई, अब स्कूल नहीं आना पड़ेगा!"
"अब कॉलेज जाएंगे!"
"नए-नए दोस्त बनाएंगे!"
"अब अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जिएंगे!"
हम हँस रहे थे, बातें कर रहे थे और भविष्य के सपने देख रहे थे।
हमें कहाँ पता था कि कुछ साल बाद यही स्कूल, यही क्लास, यही दोस्त और यही शरारतें हमारी जिंदगी की सबसे खूबसूरत यादें बन जाएँगी।
उस दिन हमें लग रहा था कि हम स्कूल को छोड़ रहे हैं…
लेकिन सच तो ये था कि हम अपने बचपन का एक हिस्सा वहीं छोड़कर जा रहे थे।
उस समय आँखों में आँसू नहीं थे…
लेकिन आज जब उन दिनों को याद करता हूँ, तो दिल बस यही कहता है—
काश… वो विदाई का दिन एक बार फिर लौट आता।
काश… एक बार फिर वही क्लास होती,
वही दोस्त होते,
वही टीचर होते,
और हम सब फिर से 12वीं के बच्चे बन जाते। ❤️🥹
12वीं के बाद जिंदगी का पहला बड़ा फैसला
और देखते ही देखते 12वीं के पेपर भी खत्म हो गए।
अब स्कूल की टेंशन खत्म थी और अगला इंतज़ार था—रिजल्ट का।
लेकिन रिजल्ट आने से पहले ही जिंदगी ने मेरे सामने एक नया सवाल खड़ा कर दिया था—
अब आगे करना क्या है?
मेरा मन था कि मैं नौकरी करने के लिए देहरादून चला जाऊँ। मुझे लग रहा था कि अब बड़ा हो गया हूँ, अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए और कुछ नया शुरू करना चाहिए।
लेकिन जब मैंने घर पर ये बात बताई तो पापा और दादी दोनों ने साफ मना कर दिया।
मेरी उनसे बहस भी हो गई।
मैं अपनी बात पर अड़ा हुआ था और घरवाले अपनी जगह सही थे।
काफी देर तक समझाने-बुझाने के बाद आखिरकार मुझे भी समझ आ गया कि शायद अभी देहरादून जाकर नौकरी करना सही फैसला नहीं होगा।
बड़ी मुश्किल से मैंने खुद को समझाया और घरवालों की बात मान ली।
फिर फैसला हुआ कि—
अभी नौकरी के लिए बाहर नहीं जाऊँगा, पहले कंप्यूटर का कोर्स करूँगा।
उस समय मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि ये छोटा-सा फैसला आगे चलकर मेरी जिंदगी को किस दिशा में ले जाएगा।
12वीं तक जिंदगी बहुत सीधी थी—
स्कूल → दोस्त → पढ़ाई → शरारतें।
लेकिन अब स्कूल खत्म हो चुका था।
दोस्त अपनी-अपनी राह पर जाने वाले थे,
रिजल्ट आने वाला था,
और मेरे सामने जिंदगी का एक नया रास्ता खुल रहा था।
बचपन पीछे छूट चुका था…
और अब असली जिंदगी धीरे-धीरे सामने आ रही थी।
कंप्यूटर कोर्स और रहने की नई चिंता
अब मैं कंप्यूटर का कोर्स करने के लिए तैयार हो चुका था।
फैसला तो हो गया था कि नौकरी के लिए देहरादून नहीं जाना है और पहले कंप्यूटर का कोर्स करना है, लेकिन अब एक नई दिक्कत सामने खड़ी थी—
रहूँगा कहाँ?
कोर्स करने के लिए मुझे घर से बाहर जाना था और रहने की कोई व्यवस्था नहीं थी। मैं इसी सोच में था कि अब क्या किया जाए।
तभी अचानक मेरे मन में एक बात आई—
"दादी के रिश्तेदार देहरादून में रहते हैं… क्यों न मैं उनके यहाँ चला जाऊँ?"
बस फिर क्या था, मुझे लगा कि समस्या का हल मिल गया।
मैंने सोचा कि रहने की चिंता भी खत्म हो जाएगी और साथ-साथ कंप्यूटर का कोर्स भी कर लूँगा।
उस समय मुझे क्या पता था कि यही फैसला मेरी जिंदगी में आगे चलकर एक नई कहानी की शुरुआत करने वाला है।
स्कूल की दुनिया पीछे छूट चुकी थी…
अब बारी थी घर से बाहर निकलकर नई दुनिया देखने की।
नई जगह, नए लोग, नया माहौल और मन में हजारों सपने…
12वीं के बाद मेरी जिंदगी अब एक नए मोड़ पर आ चुकी थी। ❤️
नई जगह, नया जीवन
आखिरकार मैं अपनी दादी के रिश्तेदारों के घर रहने चला गया।
शुरुआत में सब कुछ थोड़ा नया-नया सा लग रहा था।
नया घर, नए लोग और नया माहौल…
लेकिन धीरे-धीरे समय बीतने लगा और मैं भी उस घर के माहौल में ढलता चला गया।
मैं वहाँ सिर्फ रहने वाला नहीं था, बल्कि घर के कामों में भी हाथ बँटाता था।
कभी घास लाने जाना,
कभी पेड़ काटने का काम,
तो कभी घर के दूसरे छोटे-बड़े काम…
जो काम सामने आता, मैं अपनी तरफ से करने की कोशिश करता।
उस समय शायद मुझे ये सब बहुत सामान्य लगता था।
मैं बस यही सोचता था कि जिस घर में रह रहा हूँ, वहाँ के कामों में हाथ बँटाना भी मेरी जिम्मेदारी है।
दिन बीतते गए…
सुबह होती, काम में लग जाता और फिर दिन कब खत्म हो जाता, पता ही नहीं चलता।
लेकिन मेरे मन में एक बात हमेशा रहती थी—
मैं यहाँ सिर्फ समय बिताने नहीं आया हूँ।
मुझे अपना कंप्यूटर कोर्स भी करना है और जिंदगी में आगे बढ़ना है।
मुझे नहीं पता था कि आगे क्या होगा…
लेकिन इतना जरूर पता था कि 12वीं के बाद शुरू हुई ये नई जिंदगी मुझे बहुत कुछ सिखाने वाली थी।
करीब दो महीने बीत चुके थे। मेरे कंप्यूटर सीखने और बाकी खर्चों का पैसा घर से ही आता था। मैं जिनके घर रह रहा था, उनके घर के कामों में भी हाथ बँटाता था।
एक दिन उन्होंने शायद मज़ाक में, या शायद सच में, मुझसे कहा—
“तू अपने घर चला जा, मेरी बस की बात नहीं है तुझे खिलाना।”
शायद उनके लिए वो बस एक साधारण-सी बात थी, लेकिन न जाने क्यों वो बात सीधे मेरे दिल में उतर गई।
मैंने उस वक्त उनसे कुछ नहीं कहा। बस मन ही मन तय कर लिया कि अब यहाँ नहीं रहना है।
मैं वापस अपने घर चला आया।
घरवालों ने पूछा कि अचानक वापस क्यों आ गया, तो मैंने उन्हें असली वजह नहीं बताई। मैं बस इतना कहकर बात टाल गया—
“आने-जाने का खर्चा बहुत ज्यादा हो रहा था, इसलिए अब कोई कमरा ले लूँगा। वहीं रहकर कंप्यूटर भी करूँगा और कॉलेज भी।”
घरवालों को शायद मेरी बात ठीक लगी होगी, लेकिन मेरे मन में उस दिन की वो एक बात कहीं गहराई तक बैठ गई थी।
कभी-कभी किसी इंसान की कही हुई छोटी-सी बात भी हमारे जीवन का बड़ा फैसला बन जाती है। मेरे लिए भी वो एक ऐसी ही बात थी—जिसने मुझे अपने पैरों पर खड़े होने की तरफ पहला कदम बढ़ाने पर मजबूर कर दिया।
मैंने आखिरकार एक कमरा ले लिया। कंप्यूटर का कोर्स तो ठीक से चल रहा था, लेकिन कॉलेज के एडमिशन अभी शुरू नहीं हुए थे।
अब मेरे पास अपना कमरा था, अपनी एक छोटी-सी दुनिया थी और पहले से ज्यादा आज़ादी भी।
कमरा लेने के बाद नए दोस्त भी बनने लगे। शुरुआत में तो सब कुछ अच्छा ही लगता था। दोस्ती धीरे-धीरे बढ़ती गई और फिर पता चला कि उन दोस्तों का पढ़ाई-लिखाई से दूर-दूर तक कोई खास मतलब नहीं था।
उनकी अपनी ही दुनिया थी—शराब, बीड़ी, लड़कियाँ और ऐसी ही कई आदतें।
मैं भी उस समय इतना समझदार नहीं था कि संगत का असर कितनी दूर तक जाता है। मुझे लगता था कि दोस्ती तो बस दोस्ती है, इंसान अपनी जगह खुद रहता है।
लेकिन शायद मैं भूल गया था—
इंसान जैसा सोचता है, उससे ज्यादा वह वैसा बनने लगता है जैसी उसकी संगत होती है।
और अब मेरी जिंदगी में एक ऐसा दौर शुरू होने वाला था, जहाँ मुझे धीरे-धीरे समझ आने वाला था कि दोस्त सिर्फ हँसी-मजाक के साथी नहीं होते, वे कभी-कभी हमारी जिंदगी की दिशा भी बदल देते हैं।
संगत का असर तो होना ही था… और हुआ भी।
लेकिन इतना भी नहीं हुआ कि मैं पूरी तरह गया-गुजरा बन जाऊँ। 😄
कुछ बातें अपनाईं, कुछ से दूरी बनाए रखी और जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही।
फिर आखिरकार वो इंतजार भी खत्म हुआ, जिसका हम सबको बेसब्री से इंतजार था।
12वीं का परीक्षा परिणाम आ गया।
हमारी पूरी क्लास पास हो गई थी… और मैं भी पास हो गया था।
उस दिन खुशी सिर्फ पास होने की नहीं थी, बल्कि इस बात की भी थी कि अब स्कूल की वो दुनिया पीछे छूट चुकी थी और जिंदगी का अगला सफर सामने खड़ा था।
अब सवाल था—आगे करना क्या है?
मेरे मन में एक सपना था—मैं होटल मैनेजमेंट करना चाहता था।
लेकिन पापा चाहते थे कि मैं B.Sc. करूँ।
बस फिर क्या था…
मेरी पसंद और पापा की पसंद आमने-सामने आ गई।
इसी बात को लेकर घर में बहस भी हो गई। मैं अपनी बात पर अड़ा था कि मुझे होटल मैनेजमेंट ही करना है, और पापा चाहते थे कि मैं B.Sc. करूँ।
उस समय शायद मुझे लगता था कि पापा मेरी इच्छा नहीं समझ रहे हैं…
और शायद पापा को लगता था कि मैं अभी इतना बड़ा नहीं हुआ हूँ कि अपने भविष्य का सही फैसला खुद कर सकूँ।
दोनों अपनी जगह सही थे।
लेकिन उस उम्र में कहाँ समझ आता है कि माता-पिता की चिंता और हमारी अपनी ख्वाहिशों के बीच की लड़ाई कितनी गहरी होती है।
12वीं तक का सफर खत्म हो चुका था…
अब जिंदगी का असली सफर शुरू होने वाला था।
आखिरकार काफी सोच-विचार और बहस के बाद फैसला हुआ कि मैं कोई कोर्स करूँगा।
उस समय पॉलीटेक्निक के फॉर्म की तारीख निकल चुकी थी, लेकिन Industrial Training Institute (ITI) के फॉर्म खुले हुए थे।
मैंने ज्यादा कुछ सोचा नहीं। मन में बस यही आया—
“चलो, फॉर्म भर देते हैं… जो होगा, देखा जाएगा।”
न कोई बड़ी योजना थी, न भविष्य का कोई साफ नक्शा।
बस एक छोटा-सा फैसला था, जिसके बारे में उस वक्त मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि आगे चलकर यही फैसला मेरी जिंदगी को एक नई दिशा देने वाला है।
मैंने ITI का फॉर्म भर दिया…
अब इंतजार था कि आगे क्या होता है।
ITI के पेपर दे दिए थे और अब बस रिजल्ट आने का इंतज़ार था।
वक्त जैसे धीरे-धीरे गुजर रहा था और हमारे पास करने को कुछ खास था नहीं। लेकिन खाली बैठना भी तो हमारी फितरत में नहीं था। 😄
इसी बीच हमने खूब खुराफाती काम किए। उस समय की जिंदगी में न ज्यादा चिंता थी, न भविष्य की इतनी फिक्र… बस दोस्तों के साथ मस्ती थी और हर दिन कोई नया कारनामा।
उन्हीं दिनों हम लोग कर्णप्रयाग संगम पर नहाने जाया करते थे। गर्मियों के दिन थे और मई का महीना था। पानी उस समय काफी कम था, इसलिए एक दिन मन में आया कि क्यों न अलकनंदा नदी को तैरकर पार किया जाए।
बस फिर क्या था… जवान खून और दोस्तों का जोश था। नदी में उतर गए और तैरते-तैरते अलकनंदा को पार भी कर लिया। 😄
उस समय हमें यह एक बहुत बड़ा कारनामा लगता था। लेकिन आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है—वो उम्र भी क्या उम्र थी, जब खुराफात करने से पहले यह नहीं सोचते थे कि सामने क्या खतरा है।
मई में पानी कम था, इसलिए हम पार कर गए थे। लेकिन आज उसी जगह को देखकर शायद कोई पार करने की सोच भी नहीं सकता।
वक्त के साथ नदी वही रही, किनारे वही रहे…
बस हम बदल गए और वो बेफिक्र वाला बचपन कहीं पीछे छूट गया।
आज उन दिनों को याद करता हूँ तो लगता है कि जिंदगी में सबसे कीमती चीज शायद वही थी—
दोस्तों के साथ बिताया हुआ वो समय, जिसमें जेब खाली थी लेकिन दिल खुशियों से भरा रहता था।
आखिरकार ITI का रिजल्ट भी आ गया। शायद मेरी रैंक करीब 3000 के आसपास थी। रैंक देखकर मन में एक उम्मीद जगी कि अब शायद आगे कुछ अच्छा हो जाएगा।
फिर आई काउंसलिंग की बारी। पहली काउंसलिंग में मुझे रुद्रप्रयाग में सेंटर मिल गया। लगा कि चलो, अब आगे की राह आसान हो जाएगी और जिंदगी एक नई दिशा में बढ़ने लगेगी।
लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था।
कुछ कागज़ी गड़बड़ी की वजह से वह सेंटर मुझे नहीं मिल पाया। जिस चीज को लेकर मन में खुशी थी, वही अचानक हाथ से निकल गई।
उस समय थोड़ी निराशा जरूर हुई, लेकिन उम्मीद अभी बाकी थी।
सोचा—कोई बात नहीं, दूसरी काउंसलिंग भी तो होगी।
बस फिर शुरू हुआ एक और इंतज़ार…
रिजल्ट के बाद काउंसलिंग का इंतज़ार, काउंसलिंग के बाद सीट मिलने का इंतज़ार और अब दूसरी काउंसलिंग का इंतज़ार।
जिंदगी शायद धीरे-धीरे मुझे यह सिखा रही थी कि हर चीज पहली कोशिश में नहीं मिलती…
कुछ मंजिलों तक पहुँचने के लिए थोड़ा इंतज़ार भी करना पड़ता है।
आखिरकार दूसरी काउंसलिंग का इंतज़ार भी खत्म हो गया।
इस बार मुझे जोशीमठ के तपोवन में सेंटर मिल गया। सबसे अच्छी बात यह थी कि मेरे साथ मेरा एक दोस्त भी था—वही दोस्त, जो आज इस दुनिया में नहीं है।
हम दोनों का सेंटर मिल गया था। मुझे Electronics Mechanic में सीट मिली और उसे Wireman में।
उस समय मन में एक अलग ही खुशी थी। लगता था कि अब हमारी जिंदगी भी कुछ नया करने वाली है। अब हम भी कुछ बनेंगे, कुछ करेंगे और अपने पैरों पर खड़े होंगे।
बस फिर क्या था… घर से कमरे का सारा जरूरी सामान समेटना शुरू कर दिया। जो सामान पहले से कमरे में पड़ा था, उसे भी साथ ले लिया। ऐसा लग रहा था जैसे सामान नहीं, बल्कि अपने साथ नई जिंदगी की शुरुआत लेकर जा रहे हों।
दोनों दोस्तों के मन में अपने-अपने सपने थे।
किसी को नहीं पता था कि आने वाले साल हमें कहाँ ले जाएंगे और जिंदगी हमारे साथ क्या-क्या करवाएगी।
आखिरकार वो दिन भी आ गया…
हमने ITI में प्रवेश ले लिया।
एक तरफ मन में खुशी थी कि अब पढ़ाई के बाद कुछ करने का रास्ता खुल गया है, और दूसरी तरफ अंदर ही अंदर एक नई दुनिया को लेकर उत्सुकता भी थी।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो उस दिन की खुशी याद आती है…
और उसी खुशी के साथ उस दोस्त की याद भी आ जाती है, जो उस वक्त मेरे साथ नई जिंदगी की शुरुआत करने निकला था, लेकिन आज मेरी यादों में ही रह गया है।
कुछ लोग सफर में हमारे साथ चलते हैं,
और फिर एक दिन सफर से चले जाते हैं…
लेकिन उनकी यादें जिंदगी भर हमारे साथ चलती रहती हैं।
नया पाठ — ITI कॉलेज के वो 2–3 साल
ITI में प्रवेश लेते ही लगा जैसे जिंदगी ने एक नया मोड़ ले लिया हो।
अब तक की जिंदगी कुछ और थी—स्कूल, दोस्त, शरारतें, गाँव की गलियाँ और बेफिक्र दिन। लेकिन अब सामने एक नई दुनिया थी। नया कॉलेज, नया कमरा, नए लोग और सबसे बड़ी बात—अपने भविष्य को लेकर पहली बार एक गंभीर सोच।
जोशीमठ के तपोवन में ITI के वो 2–3 साल मेरी जिंदगी का एक ऐसा अध्याय बन गए, जिसे आज भी याद करता हूँ तो चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और दिल थोड़ा भावुक भी हो जाता है।
हम दो दोस्त साथ आए थे। दोनों के सपने थे, दोनों कुछ बनना चाहते थे। मुझे Electronics Mechanic मिला था और उसे Wireman।
कमरे में सामान तो आ गया था, लेकिन असली जिंदगी अब शुरू होनी थी।
सुबह कॉलेज जाना, दिनभर पढ़ाई और प्रैक्टिकल करना, फिर दोस्तों के साथ बैठना, खाना बनाना, घूमना और कभी-कभी वही पुरानी खुराफातें…
धीरे-धीरे कॉलेज के दोस्त परिवार जैसे लगने लगे और तपोवन की गलियाँ अपनी-सी।
इन 2–3 सालों में हमने सिर्फ किताबों और मशीनों के बारे में नहीं सीखा।
हमने दोस्ती निभाना, अकेले रहना, जिम्मेदारी उठाना, कम पैसों में गुजारा करना और जिंदगी को अपने दम पर जीना भी सीखा।
उस वक्त शायद हमें अंदाजा नहीं था कि ये दिन एक दिन हमारी जिंदगी की सबसे खूबसूरत यादें बन जाएंगे।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है—
स्कूल की यादें अपनी जगह थीं,
लेकिन ITI के वो 2–3 साल जिंदगी की किताब का एक बिल्कुल नया पाठ थे।
एक ऐसा पाठ जिसमें दोस्ती भी थी, मस्ती भी थी, संघर्ष भी था, सपने भी थे…
और कुछ ऐसी यादें भी थीं, जिन्हें वक्त चाहे जितना आगे निकल जाए, दिल कभी पुराना नहीं होने देता।
ITI का पहला दिन — नई जगह, नए लोग और एक खास दोस्त
कॉलेज का पहला दिन था।
सब कुछ नया-नया था—नया कॉलेज, नए चेहरे, नया माहौल और एक ऐसी जगह जहाँ अभी किसी को ठीक से जानता तक नहीं था। धीरे-धीरे परिचय हुआ और नए-नए दोस्त बनने लगे।
कहते हैं ना, दोस्तों के एक ग्रुप में एक ऐसा दोस्त जरूर बनता है जो बाकी सब से थोड़ा अलग होता है…
जो धीरे-धीरे हमारे दिल के बहुत करीब आ जाता है।
मेरी जिंदगी में भी ऐसा ही एक दोस्त बना।
आज भी वह मेरे साथ जुड़ा हुआ है और शायद मेरी कॉलेज लाइफ की सबसे अच्छी चीजों में से एक वही दोस्ती है।
मेरी एक आदत है—जिसने मुझे उसका भाई बना दिया। शायद इसी वजह से आज भी हमारे बीच वह अपनापन बना हुआ है। रोज-रोज बात नहीं होती, लेकिन महीने में एक बार ही सही, फोन पर बात जरूर हो जाती है… और जब बात होती है तो एक घंटे का पता ही नहीं चलता।
कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें रोज निभाने की जरूरत नहीं पड़ती।
बस दिल में जगह होनी चाहिए।
कॉलेज का पहला दिन वैसे भी खास था। कहते हैं—“First impression is the last impression.”
मैंने इस बात को आज तक अपने जीवन में अपनाकर रखा है।
पहले ही दिन मैंने कॉलेज के शिक्षकों के साथ अच्छी bonding बना ली थी। दोस्तों के साथ भी पहला introduction हुआ। हर किसी के बारे में थोड़ा-थोड़ा जानने को मिला—कोई कहाँ से आया था, किसी का सपना क्या था, कोई पहले से किसी को जानता था तो कोई मेरी तरह बिल्कुल नया था।
मेरे लिए वह सिर्फ कॉलेज का पहला दिन नहीं था…
वह मेरी जिंदगी के एक नए अध्याय का पहला पन्ना था।
नई जगह थी, नया वातावरण था, नए चेहरे थे…
और मुझे क्या पता था कि इन्हीं नए चेहरों में से कुछ लोग आगे चलकर मेरी जिंदगी की पुरानी और सबसे खूबसूरत यादें बन जाएंगे।
नए चेहरे, नई दोस्ती और भाई जैसा रिश्ता
कॉलेज में नया एडमिशन हुआ था। नए लड़के आए, नई लड़कियाँ आईं और कॉलेज का माहौल फिर से थोड़ा बदल गया।
हम अपना पहला सेमेस्टर पूरा कर चुके थे। अब तक कई दोस्त बन चुके थे और कॉलेज की जिंदगी भी धीरे-धीरे अपनी-सी लगने लगी थी।
नए एडमिशन में कुछ ऐसी लड़कियाँ भी आईं, जिनसे मेरी अच्छी दोस्ती हो गई। धीरे-धीरे हमारी दोस्ती इतनी अच्छी हो गई कि वे मुझे अपना भाई मानने लगीं।
वो जोशीमठ की ही रहने वाली थीं। और जोशीमठ की बात हो तो वहाँ की कुछ चीजों का जिक्र न हो, ऐसा कैसे हो सकता है—सेब, राजमा की दाल और पहाड़ के आलू।
उनके घर में अगर सेब ज्यादा हुए, राजमा की दाल बनी या अच्छे पहाड़ी आलू आए, तो मैं मजाक में कह देता—
“भाई को भी कुछ मिलेगा या सब खुद ही खा जाओगे?” 😄
और मेरा इतना कहना होता कि कुछ न कुछ मेरे लिए आ ही जाता था।
कभी सेब, कभी राजमा की दाल तो कभी पहाड़ी आलू…
रिश्ता खून का नहीं था, लेकिन अपनापन बिल्कुल अपने घर जैसा था।
आज सोचता हूँ तो लगता है कि कॉलेज में हमें सिर्फ पढ़ाई नहीं मिली थी। वहाँ हमें ऐसे रिश्ते भी मिले थे, जिनका कोई नाम नहीं था, लेकिन उनमें अपनापन बहुत था।
कुछ दोस्त जिंदगी में दोस्त बनकर आते हैं,
कुछ भाई-बहन बन जाते हैं…
और कुछ रिश्ते बिना किसी नाम के भी दिल में हमेशा के लिए अपनी जगह बना लेते हैं।