प्रतीकोपासना - भाग 3 kalpesh द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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प्रतीकोपासना - भाग 3



प्रतीकोपासना :-आत्मज्योति से नाद और लय तक

भाग ३ : नाद का अनुभव और चित्त का विलय

प्रतीकोपासना की साधना अब उस बिंदु पर पहुँच चुकी है जहाँ साधक का ध्यान बाहरी प्रतीक से आगे बढ़कर भीतर की ओर स्थिर हो चुका है। पहले अपने प्रतिबिंब को स्वप्रतीक बनाकर उसका अभ्यास किया गया, फिर उसी प्रतीक का आकाश में दर्शन, हृदयाकाश में उसके भान की अवस्था, इंद्रिय-निरोध और वायु-निरोध के द्वारा चित्त को अंतर्मुख करने की प्रक्रिया आई। इसके बाद आत्मा को ज्योतिरूप में देखने और निरंतर अभ्यास के द्वारा आत्मस्वरूप में अभिन्न होने की बात कही गई।

अब शिवसंहिता साधना के एक और सूक्ष्म चरण का वर्णन करती है नाद।

यहाँ साधना का आधार देखने से सुनने की ओर आता है। लेकिन यह केवल किसी बाहरी ध्वनि को सुनने की बात नहीं है। ग्रंथ जिस नाद का वर्णन करता है, उसके साथ साधक के चित्त के संबंध और आगे होने वाले लय को समझना इस पूरे चरण की कुंजी है।

१. नाद का उत्पन्न होना

शिवसंहिता कहती है कि जो साधक इस अभ्यास को निरंतर करता है, उसके भीतर क्रमशः नाद उत्पन्न होता है।

यहाँ “क्रमशः” शब्द साधना के स्वभाव को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। नाद का वर्णन अचानक होने वाली किसी घटना के रूप में नहीं किया गया है। इससे पहले प्रतीकोपासना, इंद्रिय-निरोध, वायु-निरोध और अंतर्मुखता का अभ्यास बताया जा चुका है।

अर्थात् नाद उस क्रम में आता है जो साधक को धीरे-धीरे बाहरी विषयों से हटाकर भीतर की ओर ले जाता है।

इसलिए नाद-साधना को पहले के अभ्यास से अलग करके नहीं देखना चाहिए। यह उसी साधना की अगली अवस्था है।

२. नाद के विभिन्न स्वरूप

शिवसंहिता नाद के अनुभव को समझाने के लिए विभिन्न ध्वनियों के उदाहरण देती है।

प्रारंभिक ध्वनि को मत्त भृंग, अर्थात् गुंजार करते हुए भौंरे के समान बताया गया है। इसके साथ वेणु, यानी बाँसुरी, और वीणा के समान ध्वनि का भी उल्लेख मिलता है।

आगे अभ्यास के क्रम में घंटानाद के समान ध्वनि का वर्णन आता है।

इसके बाद ध्वनि को मेघगर्जन के समान बताया गया है।

इस प्रकार ग्रंथ नाद को एक ही प्रकार की ध्वनि के रूप में प्रस्तुत नहीं करता। साधना के क्रम में उसके विभिन्न स्वरूपों का वर्णन किया गया है।

इन्हें समझने का एक सरल तरीका यह है कि साधक का अनुभव एक ही प्रकार की ध्वनि तक सीमित नहीं रहता। ग्रंथ अलग-अलग परिचित ध्वनियों के उदाहरण देकर उस अनुभव को समझाने का प्रयास करता है।

३. नाद का उद्देश्य क्या है?

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न आता है यदि नाद का अनुभव हो जाए, तो साधक को करना क्या है?

शिवसंहिता का उत्तर बहुत स्पष्ट है।

उस नाद में मन को स्थिर करना है।

ग्रंथ कहता है कि जब योगी उस नाद में अपना मन लगाकर स्थिर रहता है, तब उसके लिए लय उत्पन्न होता है।

इसलिए नाद स्वयं अंतिम अवस्था नहीं है। नाद यहाँ चित्त को स्थिर करने का आधार बनता है।

सामान्य अवस्था में हमारा मन लगातार विषय बदलता रहता है। एक विचार समाप्त होने से पहले दूसरा विचार आ जाता है। एक दृश्य से दूसरे दृश्य पर ध्यान चला जाता है। एक स्मृति के बाद दूसरी स्मृति उठती है। मन किसी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहता।

लेकिन नाद-साधना में मन को एक ही आधार दिया जाता है।

वह आधार है नाद।

जब साधक अपने चित्त को उसी नाद में बार-बार स्थापित करता है, तब मन की बाहरी गति धीरे-धीरे शांत होने लगती है।

४. नाद में चित्त की स्थिरता

यहाँ “नाद में मन लगाना” केवल कुछ क्षणों के लिए ध्यान देना नहीं है।

शिवसंहिता कहती है कि जब योगी का चित्त उस नाद में भृशम् रमते, अर्थात् अत्यंत रूप से रमण करने लगता है, तब आगे की अवस्था आती है।

इसका अर्थ है कि साधक का ध्यान नाद में इतना स्थिर हो जाए कि बाहरी विषय उसके चित्त को पहले की तरह आकर्षित न करें।

यहाँ साधना का केंद्र एक बार फिर बदलता है।

प्रतीकोपासना के प्रारंभ में आँखें एक प्रतीक पर स्थिर थीं।

अब मन एक नाद पर स्थिर है।

पहले साधना का आधार दर्शन था।

अब साधना का आधार नाद है।

लेकिन दोनों के पीछे मूल उद्देश्य एक ही है चित्त को एकाग्र और अंतर्मुख करना।

५. बाहरी विषयों का विस्मरण

शिवसंहिता आगे कहती है कि जब योगी का चित्त उस नाद में रमण करता है, तब वह सकल बाहरी विषयों को भूलकर नाद के साथ शांत हो जाता है।

यहाँ “भूलना” साधना के संदर्भ में समझना आवश्यक है।

साधक बाहरी संसार को नष्ट नहीं कर देता। बल्कि उसका चित्त बाहरी विषयों में उसी प्रकार उलझा हुआ नहीं रहता जैसे सामान्य अवस्था में रहता है।

उसका ध्यान भीतर के नाद में स्थिर है।

बाहर की वस्तुएँ मौजूद हो सकती हैं, लेकिन साधक की चेतना उनका अनुसरण नहीं कर रही।

इस प्रकार नाद धीरे-धीरे चित्त के लिए ऐसा आधार बन जाता है जिसमें मन अपनी सामान्य चंचलता से हटकर स्थिर होने लगता है।

६. नाद से लय

अब शिवसंहिता जिस अवस्था की ओर संकेत करती है, वह है लय।

जब चित्त नाद में स्थिर होता है और बाहरी विषयों से हट जाता है, तब मन की गतिविधि शांत होने लगती है। इसी से लय की अवस्था का वर्णन आता है।

यहाँ लय का अर्थ साधना के संदर्भ में चित्त का अपने सामान्य विषयगत प्रवाह से शांत होकर एकाग्र अवस्था में विलीन होना है।

इसलिए नाद और लय का संबंध बहुत सीधा है।

नाद आधार है और लय उसका परिणाम।

साधक नाद को पकड़ता है।

चित्त नाद में स्थिर होता है।

बाहरी विषयों की गति कम होती है।

मन शांत होता है।

और इसी से लय की अवस्था उत्पन्न होती है।

७. अभ्यासयोग की अगली अवस्था

शिवसंहिता इसके बाद कहती है कि इस प्रकार के अभ्यासयोग द्वारा साधक विभिन्न गुणों को जीतकर और सभी आरंभों का त्याग करके चिदाकाश में विलीन हो जाता है।

यहाँ फिर से साधना के व्यापक क्रम की ओर लौटना आवश्यक है।

प्रतीकोपासना की शुरुआत बाहरी प्रतिबिंब से हुई थी।

फिर साधक भीतर की ओर गया।

आत्मज्योति का अनुभव हुआ।

अब नाद के माध्यम से चित्त और अधिक सूक्ष्म अवस्था में प्रवेश करता है।

और अंततः चिदाकाश में विलय की बात कही जाती है।

इसलिए नाद साधना इस पूरी यात्रा की अंतिम कड़ी नहीं, बल्कि चित्त के लय की ओर ले जाने वाला महत्वपूर्ण माध्यम है।

८. चिदाकाश में विलय

“चिदाकाश” शब्द इस पूरे प्रसंग का अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द है।

टीका इसे चैतन्यस्वरूप हृदयाकाश से जोड़ती है। अर्थात् यहाँ बात केवल बाहरी आकाश की नहीं है। यह साधना के उस आंतरिक क्षेत्र की ओर संकेत करती है जहाँ साधक का चित्त चैतन्यस्वरूप में लय होने की अवस्था तक पहुँचता है।

जब साधक नाद में स्थिर होकर चित्त की चंचलता को शांत करता है, तब वह आगे चिदाकाश में विलीन होने की बात कही गई है।

इस अवस्था में साधक की चेतना बाहरी विषयों में नहीं बिखरी रहती।

उसका मन किसी एक दृश्य या बाहरी वस्तु का अनुसरण नहीं करता।

नाद में भी उसका चित्त अंततः लय की ओर जाता है।

और वहाँ से चिदाकाश का वर्णन सामने आता है।

९. प्रतीकोपासना का पूरा आंतरिक क्रम

अब तक के तीन चरणों को एक साथ देखें तो प्रतीकोपासना की यात्रा अत्यंत स्पष्ट हो जाती है।

सबसे पहले साधक अपने स्वप्रतीक, अर्थात् अपने प्रतिबिंब को देखता है।

फिर उसी प्रतीक को आकाश में देखने का अभ्यास करता है।

निरंतर अभ्यास से स्वप्रतीक का भान हृदयाकाश में होने की बात आती है।

इसके बाद इंद्रियों को रोकने और वायु का निरोध करने की विधि बताई जाती है।

फिर आत्मा को ज्योति के रूप में देखने का अनुभव आता है।

निरंतर अभ्यास से साधक देहादि के भाव से ऊपर उठकर आत्मा से अभिन्न होने की दिशा में जाता है।

इसके बाद नाद उत्पन्न होता है।

नाद के विभिन्न स्वरूपों का अनुभव होता है।

साधक अपना मन उसी नाद में स्थिर करता है।

बाहरी विषयों का विस्मरण होता है।

चित्त नाद के साथ शांत होता है।

और अंततः चिदाकाश में लय की अवस्था का वर्णन आता है।

इसलिए पूरी साधना को एक सूत्र में रखें तो यह क्रम बनता है

स्वप्रतीक → आकाश में प्रतीक → हृदयाकाश → आत्मज्योति → नाद → लय → चिदाकाश।

१०. नाद क्यों महत्वपूर्ण है?

शिवसंहिता के अगले श्लोक में नाद को विशेष महत्व दिया गया है। ग्रंथ आगे कहता है कि सिद्धासन के समान कोई दूसरा आसन नहीं, कुम्भक के समान कोई दूसरा बल नहीं, खेचरी के समान कोई दूसरी मुद्रा नहीं और नाद के समान कोई दूसरा लय नहीं।

यह कथन नाद के महत्व को स्पष्ट करता है।

नाद को यहाँ केवल एक अनुभव के रूप में नहीं देखा गया है। उसे लय का आधार कहा गया है।

सिद्धासन आसन के रूप में विशेष है।

कुम्भक योगिक बल के रूप में विशेष है।

खेचरी मुद्रा के रूप में विशेष है।

और नाद चित्त के लय के संदर्भ में विशेष है।

इस प्रकार नाद-साधना का स्थान प्रतीकोपासना के पूरे क्रम में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

११. नाद से आगे की यात्रा

यहाँ तक पहुँचकर साधना का एक महत्वपूर्ण चरण पूरा होता है।

अब साधक का ध्यान बाहरी प्रतिबिंब पर नहीं है।

वह केवल आकाश में दिखाई देने वाले प्रतीक पर भी नहीं है।

वह भीतर की आत्मज्योति की ओर बढ़ चुका है।

और अब नाद में चित्त को स्थिर करके लय की अवस्था की ओर जा रहा है।

इस प्रकार प्रतीकोपासना की शुरुआत जहाँ दृष्टि से हुई थी, वहीं आगे चलकर साधना नाद पर केंद्रित हो जाती है।

पहले आँखें साधना का माध्यम थीं।

अब चित्त स्वयं साधना का केंद्र बन गया है।

और नाद उस चित्त को लय की ओर ले जाने वाला आधार बनता है।

१२. भाग ३ का सार

इस पूरे चरण का सार बहुत सरल रूप में समझें तो

साधक पहले भीतर की ओर जाता है।

फिर उसे नाद का अनुभव होता है।

नाद के अलग-अलग स्वरूपों का वर्णन किया जाता है।

साधक उस नाद में अपना मन स्थिर करता है।

बाहरी विषयों का प्रभाव कम होता है।

चित्त शांत होने लगता है।

नाद के माध्यम से लय की अवस्था आती है।

और आगे साधक के चिदाकाश में विलय की बात कही जाती है।

इस प्रकार प्रतीकोपासना अब अपने अंतिम चरण की ओर पहुँचती है।

अगले भाग में हम इस पूरी साधना को एक साथ रखकर समझेंगे स्वप्रतीक से आरंभ होकर आत्मज्योति, नाद, लय और चिदाकाश तक पहुँचने वाले पूरे क्रम को, और अंत में शिवसंहिता द्वारा सिद्धासन, कुम्भक, खेचरी मुद्रा तथा नाद को दिए गए विशेष महत्व को भी समझेंगे।

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