रहस्यमयी जंगल का दरवाज़ा — भाग 1
लेखक: संदीप बिन्द
शाम के लगभग सात बज रहे थे। सूरज पहाड़ियों के पीछे छिप चुका था और गाँव के चारों ओर अँधेरा धीरे-धीरे फैल रहा था। हवा में हल्की ठंडक थी और दूर जंगल से झींगुरों की आवाजें लगातार सुनाई दे रही थीं।
गाँव के आखिरी छोर पर रहने वाला आर्यन अपनी साइकिल लेकर घर लौट रहा था। रास्ता सुनसान था। चारों तरफ पेड़ों की लंबी परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।
अचानक उसे जंगल की तरफ से किसी के चिल्लाने की आवाज सुनाई दी।
“बचाओ... कोई है?”
आर्यन ने तुरंत साइकिल रोक दी।
उसने ध्यान से सुना।
कुछ क्षण तक शांति रही।
फिर वही आवाज दोबारा आई—
“बचाओ...!”
आर्यन के मन में डर पैदा हो गया। जंगल में इस समय जाना गाँव के लोग हमेशा मना करते थे। कहा जाता था कि जंगल के अंदर बहुत सालों से एक रहस्य छिपा हुआ है।
लेकिन उस आवाज में ऐसी बेचैनी थी कि आर्यन खुद को रोक नहीं पाया।
उसने साइकिल रास्ते के किनारे खड़ी की और धीरे-धीरे जंगल की ओर बढ़ने लगा।
जैसे-जैसे वह अंदर जाता गया, जंगल और घना होता गया। पेड़ों की शाखाएँ आपस में इस तरह जुड़ी थीं जैसे आसमान को ढक रही हों।
कुछ दूर जाने के बाद आर्यन की नजर जमीन पर पड़ी।
वहाँ एक पुराना लोहे का डिब्बा पड़ा था।
डिब्बे पर जंग लगी हुई थी, लेकिन उसके ऊपर एक अजीब निशान साफ दिखाई दे रहा था—
एक गोल घेरे के बीच तीन तारे।
आर्यन ने डिब्बा उठाया।
उसने चारों तरफ देखा। वहाँ कोई नहीं था।
फिर उसने डिब्बा खोल दिया।
अंदर एक पुराना कागज रखा था।
कागज को खोलते ही आर्यन की आँखें फैल गईं।
उस पर लिखा था—
“जिसे यह पत्र मिलेगा, वह जान ले कि जंगल के अंदर छिपा खजाना सोना नहीं है।”
आर्यन ने अगली पंक्ति पढ़ी।
“वह खजाना पूरे गाँव का भविष्य बदल सकता है।”
अचानक उसके पीछे सूखी टहनी टूटने की आवाज आई।
चर्र...!
आर्यन तुरंत पीछे मुड़ा।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
उसने कुछ कदम पीछे हटकर चारों तरफ देखा।
तभी पेड़ों के बीच उसे एक आदमी की परछाईं दिखाई दी।
आर्यन ने काँपती आवाज में पूछा—
“कौन हो तुम?”
परछाईं धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ने लगी।
आर्यन पीछे हटने लगा।
तभी वह आदमी अचानक रुक गया।
और जंगल के अंदर से एक भारी आवाज गूँजी—
“आर्यन... अगर सच जानना है, तो मेरे पीछे आओ।”
आर्यन हैरान रह गया।
उसे उसका नाम कैसे पता था?
फिर भी उसके अंदर का डर उसकी जिज्ञासा के सामने हार गया।
वह उस रहस्यमयी आदमी के पीछे चल पड़ा।
कुछ देर बाद वे जंगल के सबसे घने हिस्से में पहुँचे। वहाँ एक बहुत बड़ी चट्टान खड़ी थी।
आदमी ने चट्टान पर बने उसी तीन तारों वाले निशान पर हाथ रखा।
अचानक—
धड़ाम!
चट्टान के पीछे छिपा एक पत्थर का दरवाज़ा खुल गया।
आर्यन की आँखें खुली की खुली रह गईं।
“यह दरवाज़ा यहाँ कैसे हो सकता है?”
आदमी ने उसकी ओर देखा।
“यह दरवाज़ा पिछले सौ वर्षों से बंद था।”
आर्यन ने पूछा—
“तो आज क्यों खुला?”
आदमी ने गंभीर आवाज में कहा—
“क्योंकि आज तुम यहाँ आए हो।”
आर्यन के चेहरे पर सवाल साफ दिखाई दे रहे थे।
“लेकिन मेरा इससे क्या संबंध है?”
आदमी ने कुछ नहीं कहा।
वह धीरे-धीरे दरवाज़े के अंदर चला गया।
आर्यन भी उसके पीछे हो लिया।
अंदर एक लंबी अंधेरी सुरंग थी। दीवारों पर पुराने चित्र बने हुए थे। कहीं राजा दिखाई दे रहे थे, कहीं युद्ध के दृश्य और कहीं एक विशाल महल।
अचानक आर्यन की नजर एक चित्र पर पड़ी।
चित्र में एक युवा राजकुमार खड़ा था।
आर्यन उसके चेहरे को देखकर सन्न रह गया।
वह राजकुमार बिल्कुल उसी जैसा दिखता था।
“यह कौन है?”
आदमी ने धीमे स्वर में कहा—
“तुम्हारे अतीत का एक हिस्सा।”
आर्यन कुछ समझ पाता, उससे पहले सुरंग के आखिरी हिस्से से किसी की आवाज आई।
“आर्यन...”
आर्यन का दिल जोर से धड़कने लगा।
यह आवाज उसे जानी-पहचानी लग रही थी।
वह आवाज फिर आई—
“आर्यन... मेरे बेटे...”
आर्यन के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसने काँपते हुए पूछा—
“पिताजी?”
सुरंग के अंत में एक विशाल पत्थर का दरवाज़ा था।
उसके पीछे से वही आवाज आ रही थी।
उसके पिता की आवाज।
लेकिन उसके पिता को मरे हुए दस साल हो चुके थे।
आर्यन दरवाज़े की ओर बढ़ा।
उसने जैसे ही दरवाज़े पर हाथ रखा, पूरी सुरंग काँपने लगी।
और दरवाज़े पर बने तीनों तारे अचानक नीली रोशनी से चमक उठे।
तभी अंदर से आवाज आई—
“आर्यन... दरवाज़ा मत खोलना।”
आर्यन वहीं रुक गया।
उसके सामने अब केवल एक सवाल था—
अगर उसके पिता सच में अंदर थे, तो पिछले दस वर्षों से वे कहाँ थे?
और सबसे बड़ा रहस्य यह था—
आखिर जंगल के इस दरवाज़े का आर्यन के परिवार से क्या संबंध था?