तुम्हें सिर्फ एक रात के लिए मेरे पोते की दुल्हन बनना होगा नैना! बदले में तुम्हारी मां के इलाज का सारा खर्चा हमारा होगा। बोलो, क्या तुम्हें यह सौदा मंजूर है?"शहर के सबसे बड़े और रसूखदार बिजनेसमैन धनराज सिंघानिया के इन भारी शब्दों ने 21 साल की नैना के पैरों तले से जमीन खिसका दी थी। नैना एक बेहद गरीब लड़की थी, जो लोगों के घरों में झाड़ू-पोछा करके और बर्तन मांजकर किसी तरह अपना और अपनी बीमार मां का पेट पाल रही थी। लेकिन आज किस्मत ने उसे ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था जहाँ उसके पास रोने का भी वक्त नहीं था। अस्पताल के आईसीयू (ICU) के बाहर खड़ी नैना को डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि अगर चौबीस घंटे के अंदर पांच लाख रुपयों का इंतजाम नहीं हुआ, तो उसकी मां की सांसें हमेशा के लिए टूट जाएंगी।बेबसी, लाचारी और गरीबी के इस खौफनाक दलदल में फंसी नैना के सामने धनराज सिंघानिया एक मसीहा बनकर तो आए थे, लेकिन उनकी शर्त इतनी अजीब और रूह कंपा देने वाली थी कि नैना का पूरा बदन कांप उठा।सिंघानिया खानदान का इकलौता वारिस और करोड़ों की संपत्ति का मालिक, कबीर सिंघानिया, पिछले छह महीनों से एक भयानक कार एक्सीडेंट के बाद कोमा में था। वह जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था और डॉक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिए थे। ऐसे में धनराज सिंघानिया के पारिवारिक गुरुजी ने उन्हें एक गुप्त और प्राचीन उपाय बताया था। गुरुजी के अनुसार, अगर किसी परम पवित्र, निष्कलंक और साफ दिल की गरीब लड़की से कबीर की शादी करवा दी जाए और साइंटिफिक मेडिकल प्रोसीजर (IVF) के जरिए वह लड़की उनके खानदान के चिराग को अपनी कोख में धारण करे, तो कबीर के ऊपर मंडरा रहा मौत का साया टल जाएगा और उसके ग्रह शांत हो जाएंगे।नैना के पास सोचने या किसी से सलाह लेने का वक्त बिल्कुल नहीं था। एक तरफ उसकी जन्म देने वाली मां की जिंदगी थी, जो वेंटिलेटर पर आखिरी सांसें गिन रही थी, और दूसरी तरफ उसका अपना आत्मसम्मान, उसका कौमार्य और उसकी पूरी जिंदगी की पवित्रता थी। अपनी मां के भीगे आंसुओं और बचपन की यादों को जेहन में लाते हुए, नैना ने अपनी आंखें बंद कीं और भारी मन से अपना सिर 'हां' में हिला दिया। उसने अपनी आत्मा का, अपने वजूद का सबसे बड़ा सौदा कर लिया था।अस्पताल का वो बंद कमरा और वो रहस्यमयी रातउसी रात, अस्पताल के एक बेहद सुरक्षित और आलीशान वीआईपी कमरे को किसी दुल्हन के कमरे की तरह लाल गुलाब के फूलों से सजाया गया। बाहर पहरा कड़ा था ताकि सिंघानिया खानदान का यह राज दुनिया के सामने न आ सके। कोई बाजा नहीं बजा, कोई शहनाई नहीं गूंजी, और न ही कोई बारात आई। नैना को एक चमकीले लाल जोड़े में सजाया गया था। उसकी आंखों में काजल के साथ-साथ आंसुओं की एक अनवरत धारा बह रही थी। उसे कबीर के बिस्तर के पास लाकर बैठा दिया गया। कबीर, जो बेहद हैंडसम, कसरती बदन और रौबीले चेहरे का मालिक था, आज बेजान होकर कई तरह की मशीनों और पाइपों के सहारे सो रहा था।बूढ़े पंडित जी ने कांपते हाथों से मंत्र पढ़े। कबीर के बेजान और ठंडे हाथ को सहारा देकर, धनराज सिंघानिया ने नैना की मांग में सिंदूर भरवाया और कबीर की तरफ से उसके गले में एक बेशकीमती मंगलसूत्र पहना दिया। जैसे ही सिंदूर नैना की मांग में सजा, वह कानूनी और धार्मिक रूप से कबीर की पत्नी बन गई, लेकिन यह शादी किसी आम शादी जैसी नहीं थी।शादी की रस्में पूरी होते ही डॉक्टरों की एक विशेष टीम कमरे के अंदर आई। उन्होंने अत्यंत सावधानी से साइंटिफिक मेडिकल प्रोसीजर (IVF) की प्रक्रिया शुरू की, ताकि कबीर का अंश नैना के गर्भ में स्थापित किया जा सके। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान नैना ने अपनी आंखें बंद कर रखी थीं और वह लगातार भगवान से अपनी मां की सलामती की भीख मांग रही थी।जब डॉक्टर और घर के लोग कमरे से बाहर चले गए, तो उस सुनसान और खामोश रात में नैना अकेली रह गई। कमरे में सिर्फ वेंटिलेटर की 'बीप-बीप' की आवाज गूंज रही थी। नैना धीरे से कबीर के करीब बैठी। उसने कबीर के ठंडे पड़े दाहिने हाथ को अपने दोनों हाथों में ले लिया। उसकी आंखों से गर्म आंसू बहकर कबीर की हथेली पर टपक रहे थे।नैना ने रोते हुए और सिसकते हुए कबीर के शांत चेहरे को देखा और कहा, "लोग कहते हैं कि शादी सात जन्मों का पवित्र बंधन होती है, दो दिलों का मिलन होती है। लेकिन मेरी बदकिस्मती तो देखिए, मेरी शादी सिर्फ एक रात की है। कल सुबह की पहली किरण के साथ मैं यहाँ से हमेशा के लिए चली जाऊँगी। आप जब होश में आएंगे, तो आपको कभी पता भी नहीं चलेगा कि नैना कौन थी, आपकी पत्नी कौन थी। आप मुझे कभी नहीं जान पाएंगे, लेकिन मेरे वजूद में, मेरे शरीर में हमेशा आपका एक हिस्सा धड़केगा। मैं आपके बच्चे को दुनिया की हर खुशी दूंगी, कबीर जी।"पूरी रात नैना कबीर का हाथ थामे, उसके सीने पर सिर रखकर रोती रही। उसे बिल्कुल भी अहसास नहीं था कि उसकी बेदाग मोहब्बत, उसके आंसुओं की गर्मी और उसकी आवाज़ का कबीर के अवचेतन मन पर गहरा असर हो रहा था। भोर के ठीक पहले, कबीर की बंद आंखों के कोने से भी एक आंसू छलक कर तकिए पर गिर गया और उसकी उंगलियों में एक बहुत ही हल्का सा कंपन हुआ, जिसे थकान और रोने के कारण बेहाल हो चुकी नैना महसूस नहीं कर पाई।
एक नई सुबह और अधूरी जुदाई
सुबह की पहली किरण जैसे ही कमरे की खिड़की से अंदर आई, कमरे का भारी दरवाजा खुला। धनराज सिंघानिया ने कमरे में प्रवेश किया। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। उनके हाथ में रुपयों से ठसाठस भरा एक बड़ा सा सूटकेस था। उन्होंने उस सूटकेस को पास की टेबल पर रखा और बेहद ठंडे और सख्त स्वर में कहा, "नैना, वादे के मुताबिक तुम्हारी मां के लिवर का ऑपरेशन शुरू हो चुका है और सारे पैसे अस्पताल में जमा कर दिए गए हैं। और यह जो सूटकेस है, इसमें बाकी के पचास लाख रुपये हैं, जो तुम्हारी आगे की पूरी जिंदगी को ऐशो-आराम से गुजारने के लिए काफी हैं। अब हमारी शर्त का दूसरा हिस्सा याद रखो। तुम्हें इसी वक्त यह शहर छोड़कर हमेशा-हमेशा के लिए दूर जाना होगा। कबीर को अपनी जिंदगी में कभी यह पता नहीं चलना चाहिए कि उसकी कोई पत्नी भी थी या उसका कोई बच्चा इस दुनिया में है। समझ गईं तुम?"नैना ने सूटकेस की तरफ देखा भी नहीं। उसके लिए उसका आत्मसम्मान पैसों से बड़ा था। उसने टेबल से सिर्फ अपनी मां के इलाज की चुकता रसीद उठाई। उसने पलटकर कबीर के शांत और खूबसूरत चेहरे को आखिरी बार जी भरकर देखा। उसने अपने आंसू पोंछे, कबीर के पैर छुए और भारी कदमों से, अपने कांपते बदन को संभालते हुए उस वीआईपी कमरे से बाहर निकल गई।वह सिर्फ एक रात की दुल्हन बनी थी, लेकिन उसकी मांग का वो सिंदूर, गले का वो मंगलसूत्र और उसके पेट में पल रहा कबीर का वो अनजान अंश अब उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी और नई हकीकत बन चुके थे। वह एक अमीर की दुनिया से निकलकर फिर से अपनी उसी गरीबी की दुनिया में जा रही थी, लेकिन इस बार वह अकेली नहीं थी, उसके साथ एक नन्हीं सी जान का सफर शुरू हो चुका था।
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