राज़ के सात फेरे - 1 jaisy singh द्वारा रोमांचक कहानियाँ में हिंदी पीडीएफ

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राज़ के सात फेरे - 1

मुंबई...
सपनों की नगरी...
एक ऐसा शहर जो कभी सोता नहीं।
जहाँ रातें भी रोशनी से जगमगाती हैं और हर सुबह अपने साथ हजारों नए ख्वाब लेकर आती है।
इस शहर में हर आँख में एक सपना पलता है...
कुछ बनने का सपना...
कुछ हासिल करने का सपना...
अपनी खोई हुई पहचान पाने का सपना...
लेकिन...
उसी मुंबई में एक ऐसी लड़की भी थी...
जिसकी आँखों में न कोई मंजिल थी...
न कोई ख्वाब...
और न ही किसी मुकाम को पाने की चाह।
उसकी आँखों में अगर कुछ था...
तो सिर्फ एक आग...
एक ऐसा जुनून...
जो किसी को मिटाने के लिए जल रहा था।
किसी को बर्बाद करने के लिए...
और उस आग का नाम था...
अन्विका मल्होत्रा।
छब्बीस साल की उम्र...
बेमिसाल खूबसूरती...
तेज दिमाग...
और मल्होत्रा ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज की सीईओ।
वही मल्होत्रा ग्रुप...
जो सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरे एशिया की टॉप पाँच कंपनियों में शामिल था।
और जिसकी नींव को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया था...
उस औरत ने...
जिसे बिजनेस वर्ल्ड में लोग सिर्फ एक नाम से जानते थे—
लेडी डॉन... कुसुम मल्होत्रा।
वो औरत...
जिसने पति के जाने के बाद कभी आँसूओं को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
जिसने अकेले ही करोड़ों के बिजनेस को संभाला।
जो हर मुश्किल के सामने चट्टान बनकर खड़ी रही।
जिसके एक फैसले से शेयर मार्केट हिल जाता था।
जिसकी एक मीटिंग के लिए बड़े-बड़े बिजनेस टाइकून महीनों इंतजार करते थे।
जिससे दुश्मन भी डरते थे...
और दोस्त भी।
कुसुम मल्होत्रा...
एक ऐसा नाम...
जिसके आगे लोग सिर झुकाते थे।
लेकिन...
आज वही औरत...
अपनी बेटी की जिद के आगे हार चुकी थी।
क्योंकि आज...
अन्विका मल्होत्रा की शादी थी।
और उसका दूल्हा...
कोई आम इंसान नहीं था।
वो था—
रुद्रांश राठौर।
राजनीति की दुनिया का बेताज बादशाह।
जिसके नाम से विरोधियों की साँसें अटक जाती थीं।
जिसका पूरा परिवार सत्ता और ताकत के उस दलदल में धँसा हुआ था...
जहाँ से बाहर निकलना लगभग नामुमकिन था।
कुसुम कभी नहीं चाहती थी कि उसकी बेटी उस दलदल का हिस्सा बने।
वो नहीं जानती थी...
कि आखिर अन्विका इस शादी के लिए इतनी जिद क्यों कर रही है।
क्या वजह है?
क्या मकसद है?
लेकिन वो एक बात जरूर जानती थी...
उसकी बेटी...
रुद्रांश राठौर से प्यार नहीं करती।
और यही बात उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी।
मुंबई के सबसे आलीशान और सात सितारा बैंक्वेट—
द क्रिस्टल क्राउन ग्रैंड पैलेस।
आज पूरा होटल किसी जन्नत से कम नहीं लग रहा था।
बाहर से लेकर अंदर तक लाखों सफेद और लाल गुलाबों से सजावट की गई थी।
मुख्य द्वार पर विदेशी ऑर्किड्स की मेहराबें बनी थीं।
पूरा प्रवेश द्वार सुनहरी रोशनी में नहा रहा था।
फव्वारों के बीच उड़ती पानी की बूंदें किसी सपने जैसा दृश्य बना रही थीं।
चारों तरफ हजारों फेयरी लाइट्स चमक रही थीं।
बाहर दर्जनों लग्जरी कारों की कतार लगी हुई थी।
रोल्स रॉयस...
बेंटले...
लैम्बॉर्गिनी...
रेंज रोवर...
और ना जाने कितनी करोड़ों की गाड़ियाँ।
मीडिया की दर्जनों ओबी वैन बाहर खड़ी थीं।
कैमरों की फ्लैश लगातार चमक रही थी।
"सर इधर देखिए..."
"मैम एक पोज प्लीज..."
"सर शादी के बाद पॉलिटिक्स में क्या बदलाव आएगा?"
"मैम, रुद्रांश सर को लेकर आपका क्या कहना है?"
देश के बड़े-बड़े बिजनेसमैन...
फिल्म इंडस्ट्री के सितारे...
और राजनीति के नामी चेहरे...
सब एक ही छत के नीचे मौजूद थे।
क्योंकि ये कोई आम शादी नहीं थी।
ये था...
दो सबसे ताकतवर परिवारों का मिलन।
अंदर विशाल हॉल में हजारों क्रिस्टल झूमर चमक रहे थे।
बीचोंबीच बना शाही मंडप किसी राजमहल जैसा दिखाई दे रहा था।
वहीं दूसरी तरफ...
हजारों लोगों के शोर और संगीत के बीच...
एक कमरा ऐसा भी था...
जहाँ अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी।
उस कमरे की बड़ी सी कांच की खिड़की के सामने...
लाल जोड़े में सजी एक लड़की खड़ी थी।
खुले बाल...
गले में हीरों का हार...
हाथों में गहरी मेहंदी...
माथे पर मांग टीका...
और चेहरे पर ऐसी शांति...
जिसे देखकर कोई नहीं कह सकता था कि उसके भीतर कैसा तूफान चल रहा है।
वो थी...
अन्विका।
उसकी आँखें सामने उठती समुद्र की लहरों को देख रही थीं।
लेकिन उसका मन...
कहीं और भटक रहा था।
अचानक...
कमरे का दरवाजा खुला।
आहट सुनकर अन्विका पलटी।
और सामने अपनी माँ को देखकर उसकी आँखें झुक गईं।
कुसुम धीरे-धीरे अंदर आईं।
उन्होंने दरवाजा बंद किया।
कुछ पल तक बस अपनी बेटी को देखती रहीं।
और फिर धीमी आवाज में बोलीं—
"अन्वी बेटा... एक बार फिर सोच लो।"
अन्विका ने सिर उठाया।
कुसुम की आँखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
"अभी भी वक्त है।"
"अगर तुम चाहो तो सब रोक सकते हैं।"
"एक बार अगर तुमने ये शादी कर ली..."
"तो वापस लौटना आसान नहीं होगा।"
अन्विका बस चुप रही।
कुछ सेकंड बाद वो आगे बढ़ी और अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया।
"मम्मा..."
"क्या मैं आपसे एक सवाल पूछ सकती हूँ?"
कुसुम ने हल्की मुस्कान के साथ उसके चेहरे को सहलाया।
"हाँ बेटा... पूछो।"
अन्विका की आँखें सीधे अपनी माँ की आँखों में जा टिकीं।
"क्या आपको अपनी बेटी पर भरोसा है?"
ये सवाल सुनकर कुसुम कुछ पल के लिए शांत हो गईं।
उनकी आँखों में नमी उतर आई।
उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की।
"अगर मुझे अपनी बेटी पर भरोसा नहीं होगा..."
"तो फिर दुनिया में किस पर होगा?"
"ठीक है..."
"अब मैं तुमसे कोई सवाल नहीं करूँगी।"
"तुम्हारा दिल जो कहे..."
"वो करो।"
"लेकिन एक बात जरूर सोच लेना..."
उन्होंने अन्विका का चेहरा अपने हाथों में लिया।
"कल..."
"तुम रुद्रांश राठौर को खुद के करीब आने से कैसे रोकोगी?"
उनके ये शब्द सुनते ही...
पहली बार अन्विका का चेहरा बदल गया।
उसकी आँखों में हल्की बेचैनी उतर आई।
और उसका दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया।
क्योंकि...
शायद उसने इस बारे में सोचा ही नहीं था।
तभी...
टॉक... टॉक...
दरवाजे पर दस्तक हुई।
कुसुम ने जाकर दरवाजा खोला।
और सामने खड़ी महिला को देखकर उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
लगभग तीस साल की बेहद खूबसूरत और स्टाइलिश महिला...
क्रीम कलर की डिजाइनर साड़ी...
गले में डायमंड सेट...
और चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान।
"अंदर आओ चंचल बेटा।"
लेकिन चंचल हँसते हुए बोली—
"नहीं आंटी जी।"
"मैं तो बस अपनी देवरानी को नीचे ले जाने आई हूँ।"
और ये कहते हुए उसकी नजर अन्विका पर पड़ी।
कुछ पल के लिए वो भी उसे देखती रह गई।
"हे भगवान..."
"आज तो सच में चाँद जमीन पर उतर आया है।"
"अगर मेरे देवर जी तुम्हें देखकर बेहोश नहीं हुए..."
तो समझ लेना वो इंसान नहीं पत्थर है।"
उसकी बात सुनकर पहली बार अन्विका के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
लेकिन उसकी आँखों में छिपा राज...
अब भी एक रहस्य बना हुआ था।
उधर...
द क्रिस्टल क्राउन ग्रैंड पैलेस की अट्ठाईसवीं मंजिल पर मौजूद प्रेसिडेंशियल सूट के एक कमरे में बिल्कुल अलग माहौल था।
कमरे की रोशनी हल्की थी।
कांच की दीवारों से बाहर पूरा मुंबई शहर दिखाई दे रहा था।
दूर समुद्र की लहरें रात की रोशनी में चमक रही थीं।
और कमरे के बीचों-बीच रखी एक कुर्सी पर बैठा था...
रुद्रांश राठौर।
अट्ठाईस साल का...
छह फीट से ज्यादा लंबा कद...
गोरा रंग...
चौड़े कंधे...
मजबूत मांसपेशियाँ...
और चेहरे पर ऐसा आकर्षण कि लड़कियाँ एक झलक पाने के लिए बेताब रहती थीं।
उसने सिर्फ सफेद पायजामा पहन रखा था।
उसकी खुली मस्कुलर बॉडी साफ दिखाई दे रही थी।
एक हाथ में सिगार था।
और दूसरे हाथ की उंगलियाँ कुर्सी के हत्थे पर लय में चल रही थीं।
उसके चेहरे पर वही बिंदास मुस्कान थी...
जो हर वक्त उसके साथ रहती थी।
तभी पीछे से एक आवाज आई—
"रुद्रांश भैया... आप अभी तक तैयार नहीं हुए?"
"नीचे सब आपका इंतजार कर रहे हैं।"
आवाज सुनकर रुद्रांश ने बिना पीछे देखे सिगार का कश लिया और मुस्कुराते हुए बोला—
"क्या यार शेखर..."
"दूल्हा हूँ..."
"थोड़ा इंतजार करवाना तो बनता है।"
उसकी बात सुनकर सामने खड़ा शेखर सिर पकड़कर उसके सामने आ खड़ा हुआ।
"भाई..."
"ये एटीट्यूड बाद के लिए बचाकर रखो।"
"अगर पाँच मिनट में आप नीचे नहीं गए..."
"तो मामा जी आपकी बैंड बजाने के साथ-साथ मेरी भी बजा देंगे।"
रुद्रांश जोर से हँस पड़ा।
सिगार बुझाते हुए बोला—
"कितनी अजीब बात है ना शेखर।"
"जिस इंसान से पूरा शहर डरता है..."
"वो अपने बाप के सामने आँख उठाकर भी बात नहीं कर पाता।"
शेखर भी मुस्कुरा दिया।
"ये तो सही कहा भाई आपने।"
"लेकिन इससे भी मजेदार बात पता है क्या है?"
रुद्रांश अलमारी से शेरवानी निकालते हुए बोला—
"क्या?"
शेखर सामने बेड पर बैठ गया।
"आज उस इंसान की शादी है..."
"जो हर रात एक नई लड़की के साथ बिताता है।"
"अब देखने वाली बात ये होगी कि वो पूरी जिंदगी सिर्फ एक ही लड़की के साथ कैसे गुजारेगा।"
"व्हाट?"
रुद्रांश ने आँखें बड़ी कर दीं।
"पूरी लाइफ?"
"तेरा दिमाग खराब है क्या?"
"यू नो ना..... मैं ये शादी क्यों कर रहा हूँ।"
"फिर ये बेकार की बातें क्यों कर रहा है?"
"बस आज रात की बात है।"
"कल से रुद्रांश अपनी पुरानी जिंदगी जिएगा।"
शेखर एकदम उछलकर खड़ा हो गया।
"क्या?"
"भाई आपका दिमाग तो सही है?"
"कल आपकी सुहागरात है।"
"और आप कल भी उसी जगह जाने की सोच रहे हैं?"
रुद्रांश शेरवानी के बटन बंद करते हुए हँस पड़ा।
"अपने छोटे से दिमाग पर ज्यादा जोर मत डाल।"
"तेरे पाँच मिनट पूरे हो चुके हैं।"
"चल नीचे..."
"वरना तेरे मामा जी ऊपर आ गए तो मुझे कुछ नहीं होगा, तेरी खैर नहीं।"
दोनों हँसते हुए कमरे से बाहर निकल गए।
---
नीचे पूरा बैंक्वेट हॉल मानो किसी राजा के दरबार में बदल चुका था।
सैकड़ों विदेशी फूलों की खुशबू पूरे माहौल में फैली हुई थी।
चारों तरफ हजारों मोमबत्तियाँ और क्रिस्टल लाइटें जगमगा रही थीं।
बड़ी-बड़ी एलईडी स्क्रीन पर रुद्रांश और अन्विका की तस्वीरें चल रही थीं।
दुनिया के मशहूर शेफ्स द्वारा तैयार किए गए व्यंजन सज चुके थे।
इटालियन...
फ्रेंच...
मुगलई...
राजस्थानी...
जापानी...
और ना जाने कितनी तरह के पकवान।
एक तरफ लाइव ऑर्केस्ट्रा धीमी धुन बजा रहा था।
तो दूसरी तरफ मीडिया वाले वीआईपी मेहमानों के इंटरव्यू लेने में व्यस्त थे।
देश के बड़े उद्योगपति...
फिल्मी सितारे...
केंद्रीय मंत्री...
मुख्यमंत्री...
राज्यसभा सांसद...
और कई बड़े चेहरे उस शादी का हिस्सा बने हुए थे।
लेकिन तभी...
हॉल के मुख्य द्वार पर हलचल हुई।
सारे कैमरे एक तरफ घूम गए।
रुद्रांश राठौर नीचे आ चुका था।
काले और सुनहरे रंग की शेरवानी में वो किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहा था।
उसे देखते ही कई लड़कियों की साँसें थम गईं।
"ओह माय गॉड..."
"रुद्रांश राठौर..."
"आज तो और भी हैंडसम लग रहा हैं।"
"काश दुल्हन मैं होती।"
लड़कियों की धीमी फुसफुसाहटें सुनाई दे रही थीं।
उसी समय सामने बैठी कुर्सी से एक रौबदार शख्स उठा।
करीब साठ साल की उम्र...
घनी मूंछें...
सफेद कुर्ता-पायजामा...
ऊपर शॉल...
और चेहरे पर ऐसा रुतबा कि बड़े-बड़े लोग भी सामने आने से पहले दो बार सोचें।
यशवर्धन राठौर।
रुद्रांश के पिता।
उन्होंने आगे बढ़कर अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखा।
उनकी आँखों में गर्व साफ दिखाई दे रहा था।
"आज मेरा शेर..."
"किसी हीरो से कम नहीं लग रहा।"
रुद्रांश मुस्कुराया।
"हीरो नहीं पापा..."
"विलेन।"
उसकी बात सुनकर यशवर्धन ठहाका लगाकर हँस पड़े।
"हीरो हो या विलेन..."
मंच पर राज तो हमेशा राठौरों का ही होता है।"
उधर...
अचानक पूरे हॉल में फुसफुसाहट शुरू हो गई।
सभी की निगाहें सीढ़ियों की तरफ उठ गईं।
रुद्रांश ने भी पलटकर देखा।
और अगले ही पल...
वो बस देखता रह गया।
ऊपर से...
चंचल और कुसुम मल्होत्रा के साथ...
अन्विका नीचे उतर रही थी।
लाल रंग का भारी लहँगा...
हीरों और रूबी का सेट...
हल्का मेकअप...
खुले बाल...
और चेहरे पर चाँद जैसी चमक।
मानो कोई अप्सरा धरती पर उतर आई हो।
पूरा हॉल कुछ पल के लिए शांत हो गया।
हर लड़के की नजर अन्विका पर टिक गई।
यहाँ तक कि मीडिया कैमरे भी उसी तरफ घूम गए।
लेकिन...
सबसे ज्यादा असर अगर किसी पर हुआ था...
तो वो था...
रुद्रांश राठौर।
एक पल के लिए वो भी उसे देखता रह गया।
लेकिन अगले ही पल...
न जाने कौन सी याद उसके मन में कौंधी।
उसकी आँखों की चमक गायब हो गई।
उसने अपनी मुट्ठियाँ कस लीं।
जैसे अपने अंदर उठते किसी तूफान को रोक रहा हो।
उसकी साँसें अचानक भारी हो गई थीं।
और उसने तुरंत अपनी नजरें फेर लीं।
ये बदलाव शेखर ने साफ महसूस किया।
लेकिन इससे पहले कि वो कुछ पूछता...
यशवर्धन राठौर आगे बढ़ गए।
उन्होंने हाथ से इशारा किया।
तुरंत उनका बड़ा बेटा...
प्रणव राठौर...
एक काला सूटकेस लेकर उनके पास आया।
यशवर्धन ने सूटकेस खोला।
अंदर नोटों की गड्डियाँ भरी हुई थीं।
उन्होंने कुछ गड्डियाँ हाथ में लीं और अन्विका की नजर उतारते हुए मुस्कुराकर बोले—
"आज तो मेरी बहू बिल्कुल चाँद का टुकड़ा लग रही है।"
"किसी की नजर ना लगे।"
फिर प्रणव की तरफ देखकर बोले—
"ये पैसे ले जाओ..."
"और गरीबों में बाँट दो।"
"आज राठौर परिवार के घर लक्ष्मी आ रही है।"
प्रणव ने आदर से सिर झुकाया।
"जी पापा।"
और सूटकेस बंद करके वहाँ से चला गया।
उधर...
"यशवर्धन की बात सुनकर, अन्विका अपनी मुट्ठी कसते हुए खुद से कहती है– लक्ष्मी नहीं आज तुम्हारे घर काली आ रही है। जो बहुत जल्द तुम सबका सर्वनाश कर देगी।"
तभी चंचल अन्विका को धीरे-धीरे मंडप की तरफ लेकर बढ़ जाती है।
हर कदम के साथ उसके पायल की मधुर आवाज गूँज रही थी।
लेकिन...
उसके चेहरे की मुस्कान के पीछे...
एक गहरा रहस्य छिपा था।
जो बीतते वक्त के साथ और गहरा होता जा रहा था।
उधर अन्विका जाकर मंडप में बैठ जाती है।
और उसी पल...
उसके कानों में अपनी माँ की कही बात फिर से गूँज उठी—
"कल..."
"तुम रुद्रांश को खुद के करीब आने से कैसे रोकोगी?"
उसके हाथ अनजाने में कस गए।
उसकी आँखों में एक पल के लिए बेचैनी उतर आई।
जबकि दूसरी तरफ...
रुद्रांश अब भी खड़ा था।
सब कुछ देख रहा था।
लेकिन उसके चेहरे पर मुस्कान के पीछे भी...
कुछ ऐसा छिपा था...
जिससे शायद अभी तक पूरी दुनिया अनजान थी।
दो लोग...
दो चेहरे...
दो मुस्कानें...
और दोनों के सीने में दफन थे...
कुछ ऐसे राज...
जो सिर्फ उनकी जिंदगी नहीं...
बल्कि सात फेरों के बाद कई जिंदगियों को तबाह करने वाले थे...
और शायद...
यही वजह थी कि...
ऊपर बैठा वक्त...
मुस्कुरा रहा था...
क्योंकि उसे पता था—
ये शादी...
सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं...
बल्कि...
एक ऐसे खेल की शुरुआत थी...
जिसमें हर रिश्ता...
हर भरोसा...
और हर प्यार...
एक दिन सवाल बनकर खड़ा होने वाला था...।

🌙 Chapter ending lines:
आखिर क्या था रुद्रांश राठौर का असली मकसद, जिसके लिए उसने अन्विका से शादी करने का फैसला लिया?
आखिर क्यों अन्विका राठौर परिवार से इतनी नफरत करती थी कि उनके सर्वनाश की ठान चुकी थी?
और सबसे बड़ा सवाल...
जिस शादी का हर रिश्ता झूठ और राज़ की नींव पर खड़ा था...
उस शादी के बाद अन्विका रुद्रांश को खुद के करीब आने से कैसे रोकेगी?
क्या ये सात फेरे दो ताकतवर परिवारों की बर्बादी का कारण बनेंगे...
या फिर इसी बर्बादी के बीच जन्म लेगी एक ऐसे रिश्ते की कहानी...
जो हर नफरत, हर दर्द और हर राज़ से ज्यादा मजबूत होगी?
जानने के लिए पढ़ते रहिए...
"राज़ के सात फेरे"

To Be Continued...

❤️ Dear lovely Reader's ❤️
"राज़ के सात फेरे" का पहला अध्याय आपके सामने है। उम्मीद है कि आपको इसकी शुरुआत पसंद आई होगी।
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अन्विका, रुद्रांश, कुसुम या कोई और?
⭐ अपना Review देना मत भूलिए, क्योंकि आपके Review और Support से ही मुझे और बेहतर लिखने की प्रेरणा मिलती है।
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तब तक के लिए,
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