बनारस की ख़ामोशी - 2 Neha kariyaal द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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बनारस की ख़ामोशी - 2

सुनीता ने बात को टालते हुए कहा… जैसा तुम सोच रही हो, वैसा कुछ भी नहीं है।

 देखो… ये नीला आसमान जो शाम ढलते ढलते कितने रंगों को खुद में गढ़ लेता है। ये पंछी जो अपने अपने घोंसले में वापस लौट रहे हैं।
कहीं दूर से आती, ये सुहावनी हवाएं जो मन को सुकून दे रही है
पता है ये हमारी दिन भर की थकान अपने साथ उड़ा ले जाती है।
नैना जानती थी, उसकी बुआ उसकी बात को टाल रही है।
वो मुस्कुराई… बुआ आप बात को बदलो मत।
कोई बात तो है? जिसे आप सब से छुपा कर जी रही हैं। 
बुआ बताओ ना क्या हुआ था? नैना ने जिद्द करते हुए पूछा? 

नैना के बार बार पूछने पर,
सुनीता ने सोचा, लगता है आज ये सुनकर ही मानेंगी। 
उसने आज तक ये बात नैना से छुपा कर रखी थी।
वो नहीं चाहती थी, उसके जीवन पर इससे कोई भी फर्क पड़े।
लेकिन आज उसकी ज़िद के आगे, वो हार गई।
आख़िर कोई राज कब तक राज रह सकता है।

अच्छा, ठीक है, मैं तुम्हें बताती हूँ पर तुम किसी को मत बताना, सुनीता बोली।
नैना.. ठीक है नहीं बोलूंगी।
उसने ने एक गहरी साँस ली,
फिर बोली। 
जब मैं तुम्हारी उम्र की थी तो कॉलेज में मेरी मुलाकात  दीपक से हुई। 
हम दोनों एक ही क्लासमेट थे।
वो हमारे कॉलेज का टॉपर हुआ करता था।

सब लोग उसे बहुत पसंद करते थे, लड़कियां उसके पीछे रहती थीं

वो देखने में खूबसूरत था।
सबकी तरह मुझे भी वो पसंद था,
पर मैं सब लड़कियों की तरह नहीं थी, मुझे अपने काम से मतलब रहता था।
 
नैना जब सुनीता से उनकी कॉलेज की कहानी सुन रही थी, तो वो खुशी से थी।

, बोली,  अच्छा आगे क्या हुआ?
नैना के कान खींचते हुए,  प्यार से सुनीता ने कहा। बताती हूँ… पहले चल कर खाना खालो।
तुमने सुबह से अभी तक कुछ नहीं खाया,
और अब अंधेरा भी हो गया है।

यह कहकर… वह नीचे चली गई।
नैना वहीं बैठी सोच रही थी, आगे क्या हुआ होगा? क्या बुआ ने दीपक को बताया? या नहीं?
उसके दिमाग में बहुत खुराफात मची हुई थी।
वह बैठी थी, कि सुनीता ने उसे फिर आवाज लगाई।

आ जाओ खाना तैयार है।

नैना बार बार सुनीता से एक ही बात पूछ रही थी। बुआ बताओ ना आगे क्या हुआ?

सुनीता अपने काम में व्यस्त थी,
उसने टेबल पर खाना लगाया, और नैना से पहले खाना खाने को कहा ।
और बोली आराम से सारी कहानी सुनाऊंगी,
पर उससे पहले तुझे खाना खाना पड़ेगा।

फिर क्या था? नैना को कहानी सुनने में मज़ा आ रहा था।
उसने अपने हाथ धुले और खाना खाने बैठ गई।
उसे देख कर ऐसा लग रहा था, जैसे आज वो सच सुनकर ही साँस लेगी।

उसने जल्दी से अपना खाना खत्म किया, और घर के काम में बुआ का हाथ बटाने लगी।

सुनीता सब समझ रही थी कि नैना ये सब क्यों कर रही है,
उसके मन में एक सवाल था क्या उसे नैना को सच बता देना चाहिए?
अगर नहीं बताएगी तो, आख़िर ये बात कब तक छुपी रहेंगी।
चुप चाप वह अपना काम करती रही।

सारा काम खत्म होने के बाद, वह अपने कमरे में चली गई।
थोड़ी देर में नैना भी उसके पीछे पीछे कमरे में आ गई । 
कमरे में हल्की सी रोशनी थी। वहीं एक कोने में एक कुर्सी पर सुनीता चुप चाप बैठी थी।
जैसे किसी ने उसके बीते जख्मों को कुरैल दिया हो, वे सालों पुरानी यादें,
जिन्हें वो याद करना नहीं चाहती थी।
आज फिर से ताजा हो गई। 

नैना को नहीं पता था, जो बात वो बार बार सुनीता से पूछ रही है।
जो उसके लिए सिर्फ एक कहानी है। वो सुनीता की जिंदगी का सच है?
उसके लिए दीपक ही सब कुछ था।
इन सब बातों से अंजान, वह सुनीता के पास जाकर बैठ गई।
 सुनीता का हाथ पकड़ कर उसने बड़े प्यार से कहा…बुआ बताओ न आगे क्या हुआ? 
 क्या दीपक को पता चला कि आप उन्हें पसंद करते हो? 
अपनी भावनाओं को छिपते हुए।
सुनीता ने बोली…  पहले तो हम सिर्फ कॉलेज के काम से बात किया करते थे,।
फिर धीरे धीरे हम बहुत अच्छे दोस्त बन गए।
लेकिन दीपक को इस बात से अंजान था कि मैं उसे पसंद करती हूं। 
हालांकि मेरे सभी दोस्तों को इस बारे में पता था, क्योंकि मैं अक्सर उनसे दीपक की बात करती थी।

कॉलेज का प्रोजेक्ट हो या फिर कोई भी काम हम साथ में करते थे।
कभी कभी कॉलेज के बाद बाहर घूमने भी चले जाते थे।

हमारी सोच बहुत मिलती थी।
फ़िर एक दिन दीपक ने मुझे अपने दिल की बात बताई। 
उसने मुझे प्रपोज़ किया।

मैं बहुत खुश थी, क्योंकि मैं दीपक को बहुत प्यार करती थी।
सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था।

मैंने दीपक के बारे में अपने घर पर भी बता दिया था। 
एक दिन कॉलेज के बाद मैं दीपक को अपने घर ले गई।

मेरे मां पापा उससे मिलकर बहुत खुश हुए।
उसकी सोच सबको पसंद आई।

फ़िर हम दोनों बनारस घाट पर,  गंगा आरती देखने चले गए। 
शाम होने को थी।
सूरज धीरे धीरे गंगा के पार उतर रहा था।
उसकी किरणें पानी की लहरों पर ऐसे बिखर रही थीं, जैसे कोई पुरानी दास्तान आख़िरी शब्द कह रही हो। घाट की सीढ़ियों पर आरती की तैयारी हो रही थी – शंख की ध्वनि, दीपक की लौ, और हवा में घुलती चन्दन की खुशबू। 
मैं उस पल में खोई थी, उसकी आँखों में सूरज का आख़िरी रंग उतर आया। 

हर बार की तरह ऐसा लग रहा था, जैसे समय ने खुद को धीमा कर लिया हो।

गंगा का किनारा और वो मन को सुकून देने वाली हवाएं वो ढलता हुआ सूरज जो दिन को और भी खुबसूरत बना रहा था। 

घाटों पर बैठे साधु, हवा में जलते धूप, और दूर से आती घंटियों की धुन – सब मिलकर एक ऐसा संगीत बना रहे थे , जो आत्मा को छू ले।

 दीपक के साथ मैं अपने ख्यालों में खोई उस आसमान को देख रही थी,
और उस संगीत को महसूस कर रही थी जो मेरी रूह को छू रहा था।

मैंने उससे कहा… देखो उस डूबते सूरज को उसकी रोशनी को जो ये आसमान को अपने रंग में रंग रहा है मानो ऐसा लग रहा है, जैसे किसी ने चित्रकारी की हो। ये सब कितना सुकून देने वाला है।

सुबह की सारी थकान इस पल को देख कर मिट गई है। 
आज का दिन और ये पल मेरे लिए बहुत ख़ास और यादगार बन गया है।
मैं हमेशा से यही सोचती थी, क्या सच में गंगा के किनारे मन को सुकून मिलता है?
क्यों बनारस को शांति और प्रेम के लिए जाना जाता है?
लेकिन आज महसूस किया, तो जाना लोग सच ही कहते हैं।
ये गंगा की लहरें जो देखने में बहुत तेज लगती है। कौन जानता है?
कि ये कितनी खामोश है। 
दीपक ने सिर हिलाया, तभी तो लोग दूर दूर से यहां सुकून की तलाश में आते हैं।
बनारस की यही खास बात है, सब को अपने रंग में रंग लेता है।
 तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगे?
थोड़ी चिंता के साथ मैंने उससे पूछा।
दीपक हंसते हुए बोला… तुम आज कैसी बातें कर रही हो?
मैं हमेशा तुम्हारे पास तुम्हारे साथ रहूंगा। 
उसकी बात सुनकर मेरे मन को सुकून मिला।

 हम दोनों घंटों बैठे रहे, गंगा के पानी में सूरज डूब चुका था। 
हम भी अपने घर की ओर चल पड़े।
घर लौटते वक्त दीपक ने बताया… उसे किसी काम से वापस कोलकाता जाना है,
काम खत्म होते ही वह लौटे आयेगा।
 
चलते चलते जैसे मेरे पांव ठहर गए।
वो पहली बार था, जब दीपक ने अपने घर जाने के लिए बोला था।
मैं चुपचाप खड़ी दूर एक रोशनी को देख रही थी।

दीपक का हाथ मेरे हाथों में था, और मन में न जाने कैसे कैसे ख़्याल आ रहे थे। 

सिर्फ दो तीन दिनों की बात है, मैं वापस लौट आऊंगा। 
तुम मेरा इंतजार करना।
गंगा के किनारे, जहां आज हमने सबसे कीमती पल बिताए हैं,
दीपक मेरे बालों को सहलाते हुए बोला।

न जाने क्यों? पर मेरा मन अंदर से बैठा जा रहा था। फिर भी मैं मुस्कुराकर बोली ठीक है जल्दी आना।

अगली सुबह…

 दीपक अपने घर कोलकाता के लिए चला गया।

धीरे धीरे उसे जाए, एक हफ्ता बीत चुका था।
मैं रोज उसका इंतजार करती।

और हर शाम गंगा की सीढ़ियों पर जा बैठती।
मेरे अंदर एक बैचेनी ने घर कर लिया था, शायद इसलिए मैं उससे बहुत प्यार करती थी। 
पहली बार उससे दूर भी हुई थी।

मैं उस डूबते सूरज और गंगा की लहरों से बातें करती।
कि कोई जाकर उसे बताए,
मैं उसका इंतजार कर रही हूं।
जहां उसने कहा था।

कभी कभी अपने ही मन को तसल्ली देती,
शायद उसे काम ज्यादा है।
वो आ जायेगा। 

दो हफ्तों के बाद… मैं अकेली उदास अस्सी घाट पर बैठी, अपने सवालों का जवाब ढूंढ रही थी,
कि अचानक से किसी ने मेरा नाम पुकारा सुनीता, आवाज जानी पहचानी थी।

मैंने जैसे ही पीछे पलट कर देखा तो सामने दीपक खड़ा था।
मुझे लगा, मैं कोई सपना देख रही हूं, इसीलिए मैं गंगा के पार देखने लगी।
 दीपक सीढ़ियों पर मेरे पास आकर बैठ गए।
उसने जैसे ही मेरे हाथ को अपने हाथ में लिए, तो मेरा भ्रम टूट गया।
मेरी आंखो से आंसू गिरने लगे।

 मैं कुछ बोल पाती उससे पहले उसने मेरे आंसू पूछे। मैंने उससे बहुत से सवाल किए, पर उसने एक ही जवाब दिया। 
कि मैं किसी काम में फंसा हुआ था इसलिए आ नहीं पाया पर अब तुम परेशान मत हो ।
मैं यहीं हूँ तुम्हारे साथ और हमेशा रहूंगा। 

ये कह कर गंगा की तेज लहरों को देखने लगा। बनारस बहुत दिनों बाद जो आया था।
सब कुछ ठीक था, लेकिन मुझे दीपक की आंखो में कुछ और ही नजर आ रहा था जैसे वो कुछ छिपा रहा हो।
आख़िर क्या बात है जो उसके मन में है।
एक पल को मुझे लगा।
फिर सोचा शायद ये मेरा भ्रम है, उससे दूर होने का डर है।

मैंने देखा… जैसे उसकी नजरें गंगा की लहरों को नहीं, किसी अपने अतीत को देख रही हो। 
देखो न सुनीता, ये शहर जैसे बोलता नहीं… पर सब कह देता है। 
और तुम?
मैंने मुस्कुराते हुए उससे पूछा… क्या तुम भी कुछ कहना चाहते हो, या बस सुनना चाहते हो? 

दीपक मुस्कुरा दिया, मगर उसकी मुस्कान में एक अजीब सी खामोशी थी— शायद वही खामोशी, जो बनारस के घाटों में सदियों से बहती आ रही हैं। 

जलते दीये गंगा की लहरों के साथ बह रहे थे।
पर उनके दिलों में एक कहानी जन्म ले चुकी थी— जो उस शाम की तरह अधूरी, मगर अनंत थी।

क्या सुनीता का सक सही था।