एपिसोड 1: अनकही आवाज़ और एक नया मोड़
शहर के सबसे व्यस्त चौराहे पर स्थित उस कैफे का माहौल हमेशा शोर-शराबे से भरा रहता था। हर कोई अपनी दुनिया में खोया था—किसी को फोन पर बात करने की जल्दी थी, तो कोई अपने लैपटॉप पर तेजी से उंगलियाँ चला रहा था। इसी भीड़ के बीच एक कोने में सीमा बैठी थी। उसकी ज़िंदगी भी इस शहर की रफ़्तार की तरह ही बेतहाशा भाग रही थी। एक बड़ी कॉरपोरेट कंपनी में मैनेजर होने के नाते उसके पास सब कुछ था—अच्छा पद, बेहतरीन वेतन और एक शानदार घर। लेकिन अगर कुछ नहीं था, तो वह था सुकून।
सीमा हमेशा से मानती थी कि इंसान के रिश्ते सिर्फ शब्दों और वादों पर टिके होते हैं। जो दिख नहीं सकता या जिसे कहा नहीं जा सकता, उसका उसकी दुनिया में कोई अस्तित्व नहीं था। उसके लिए प्यार और परवाह का मतलब था महंगे उपहार देना या बड़ी-बड़ी बातें करना।
उस दिन एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रेजेंटेशन के बाद वह मानसिक रूप से पूरी तरह थक चुकी थी। अपने दिमाग को शांत करने के लिए वह पास के एक पार्क में जाकर एक बेंच पर बैठ गई। शाम ढल रही थी और सूरज की नारंगी किरणें नीले आसमान में सिमट रही थीं।
तभी सीमा की नज़र पार्क के एक कोने में बैठे एक बुजुर्ग व्यक्ति पर पड़ी। उनकी उम्र लगभग पैंसठ-सत्तर वर्ष होगी। सफेद दाढ़ी, ढीले-ढाले साधारण कपड़े और आँखों में एक असीम शांति। उनके सामने एक कैनवास रखा था और हाथ में ब्रश था। वे ढलते सूरज की तस्वीर बना रहे थे। सीमा काफी देर तक उन्हें देखती रही। उनके चेहरे पर जो सुकून था, वह उसने बड़े-बड़े अमीर और सफल लोगों के चेहरे पर भी कभी नहीं देखा था।
उत्सुकता के मारे सीमा अपनी जगह से उठी और चुपचाप उनके पीछे जाकर खड़ी हो गई। बुजुर्ग चित्रकार पूरी तरह अपनी चित्रकारी में मग्न थे। हर एक स्ट्रोक के साथ कैनवास पर ढलता सूरज और भी खूबसूरत नज़र आने लगा था। जब उन्होंने चित्र पूरा किया, तो सीमा से रहा नहीं गया।
"बहुत खूबसूरत पेंटिंग है!" सीमा ने तारीफ़ करते हुए कहा।
बुजुर्ग ने मुड़कर सीमा को देखा, हल्की सी मुस्कान दी, लेकिन कुछ बोले नहीं। उन्होंने इशारे से धन्यवाद कहा।
सीमा को थोड़ा अजीब लगा। उसने फिर पूछा, "आप हर शाम यहाँ आते हैं? आपका नाम क्या है?"
बुजुर्ग ने अपनी जेब से एक छोटी सी डायरी और पेन निकाला। उन्होंने लिखा—"मेरा नाम राघव है। मैं बोल नहीं सकता।"
सीमा यह पढ़कर चौंक गई। उसे थोड़ा मलाल भी हुआ कि उसने बिना जाने पूछ लिया। उसने कहा, "मुझे माफ कीजिएगा। लेकिन मुझे एक बात समझ नहीं आई। आप बिना कुछ बोले अपनी पेंटिंग में इतना कुछ कैसे कह लेते हैं? ऐसा लगता है जैसे यह तस्वीर खुद मुझसे बात कर रही हो।"
राघव जी ने मुस्कुराकर डायरी पर फिर से पेन चलाया। इस बार उन्होंने लिखा:
"इंसान की असली भाषा उसकी जुबान नहीं, उसका अहसास होती है। जो बातें शब्द कभी नहीं कह पाते, वे दिल का अहसास बड़ी सादगी से कह देता है।"
सीमा उस पन्ने पर लिखे शब्दों को पढ़ती रह गई। वह कागज़ का पन्ना सीमा के दिल के किसी कोने में एक अजीब सा अहसास जगा गया था—एक ऐसा अहसास जो उसने सालों से महसूस नहीं किया था।