जंगल के बीचों-बीच गोदाम दूर से जितना शांत दिखाई देता था, पास से उतना ही खतरनाक था।
चारों दिशाओं में कड़ी निगरानी थी। गोदाम के चारों ओर सैकड़ों हथियारबंद आदमी तैनात थे।
कोई ऊँचे पेड़ों की ओट में छिपा था ,कोई चट्टानों के पीछे छुपा था, कुछ लोग लकड़ी के बने चौकीदार टावरों पर दूरबीन लिए हर दिशा पर नज़र रखे हुए थे। हर आने-जाने वाले रास्ते पर पहरा था। गोदाम तक पहुँचने वाली हर पगडंडी पर आदमी तैनात थे। हाथ में राइफल और बंदूके थी I उनके चेहरों पर कला कपड़ा बंधा हुआ था जिससे सिर्फ उनकी आंखे ही दिखाई पड़ रही थी! गोदाम के मुख्य द्वार के बाहर भी दो कतारों में हथियारबंद लोग खड़े थे।
जो भी भीतर जाता...पहले उसको उनसे निबटना पड़ता ,उसके बाद ही वो अंदर घुस पाता I और तो और छत पर भी कई निशानेबाज़ तैनात थे। उनकी बंदूके जंगल के हर कोने पर घूम रही थीं। ज़रा-सी हलचल होते ही..सीधे गोली चलने की आवाज सुनाई देती । एक आदमी जो नकाबपोश सरगना जैसा लग रहा था, उसने अपने आदमियों से कहा—आज कोई गलती नहीं होनी चाहिए।"रणजीत यहाँ कबीभी पहुंच सकता है..."वह कुछ पल रुका।
उसकी आँखों में ठंडी चमक उभरी।...लेकिन यहाँ से जिंदा वापस नहीं जाएगा।"उसके शब्द पूरे गोदाम में गूंज रहे थे I हर आदमी ने अपने हथियारो को और कसकर पकड़ लिये I रणजीत की गाड़ियाँ जैसे ही गोदाम के मुख्य रास्ते पर पहुँचीं...अचानक जंगल की खामोशी टूट गई,धाँय...! पहली गोली हवा को चीरती हुई आगे निकली।
अगले ही पल...धाँय! धाँय! धाँय!चारों तरफ़ से गोलियों की बौछार शुरू हो गई।"कवर लो!" रणजीत के एक अंगरक्षक ने चिल्लाते हुए कहा। सभी लोग तुरंत गाड़ियों के पीछे मोर्चा लेकर झुक गए।रणजीत ने अपनी रिवॉल्वर निकाली।"आगे बढ़ो! पिताजी और कल्याणी अंदर हैं!"उसके आदेश के साथ ही उसके अंगरक्षकों ने जवाबी फायर शुरू कर दी।गोदाम के चारों ओर तैनात हथियारबंद लोग लगातार गोलियाँ चला रहे थे।जंगल गोलियों की आवाज़ से गूँज उठा। पेड़ों के तनों पर गोलियाँ टकरा रही थीं। धूल और धुआँ हवा में फैल गया।
रणजीत के अंगरक्षक धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए उस की ढाल बनाकर गोदाम की ओर चल रहे थे। उनके हर कदम पर दुश्मन रास्ता रोकने की कोशिश कर रहा था। लेकिन रणजीत के मन में अब सिर्फ़ एक ही लक्ष्य था I उसे किसी भी हाल में अपनी पत्नी और अपने पिता को बचाना था I रणजीत ने एक विशाल पेड़ की आड़ ली। उसके साथ उसके छह सबसे भरोसेमंद अंगरक्षक थे। दो टीमें बनाओ!" रणजीत ने आदेश दिया। एक मेरे साथ... दूसरी पीछे से गोदाम को घेरो।" जी, साहब! दोनों टीमें अलग-अलग दिशाओं में बढ़ने लगीं।उधर गोदाम के बाहर खड़े हथियारबंद लोगों ने भी अपनी जगह बदल ली।उनका सरदार चिल्लाया—उसे अंदर मत आने देना!"एक साथ कई लोग आगे बढ़े।
तभी रणजीत के अंगरक्षक ने ज़मीन पर धुआँ फैलाने वाला गोला फेंका।कुछ ही क्षणों में चारों ओर धुआँ छा गया।
इसी मौके का फायदा उठाकर रणजीत और उसके साथी आगे बढ़े।लेकिन तभी...धुएँ में से तीन हथियारबंद आदमी निकल आए।एक अंगरक्षक ने रणजीत को पीछे धकेल दिया।साहब, आप आगे बढ़िए!"वह उनके सामने दीवार बनकर खड़ा हो गया। बाकी अंगरक्षकों ने तुरंत मोर्चा संभाल लिया।जंगल में गोलियों की आवाज़ लगातार गूँज रही थी। रणजीत ने मौका देखकर गोदाम की ओर दौड़ लगा दी। वह अब मुख्य दरवाज़े से कुछ ही दूरी पर था। उसी वक़्त गोदाम का भारी लोहे का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला। और उसके अंदर से लगभग बीस हथियारबंद आदमी बाहर निकले। उनके बीच खड़ा नकाबपोश सरगना मुस्कुरा रहा था। उसने ऊँची आवाज़ में कहा—शाबाश, रणजीत!"जितना सोच था तुम उससे भी कही अधिक वहादुर निकले"मुझे पता था... अपने परिवार के लिए तुम मौत के मुँह तक चले आओगे।"पर इतनी जल्दी मौत के मुंह में आने की .... वह जोर से हँसा उसकी वो क्रूर आँखों में नफरत साफ दिखाई दे रही थी I रणजीत ने अपनी बंदूक उसकी ओर तान दी। उसकी आँखों में गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था।"मेरे पिता और पत्नी कहाँ हैं?"नकाबपोश ने हल्की हँसी के साथ गोदाम के अंदर को हाथ से इसरा किया"बस... कुछ ही कदम दूर।""लेकिन पहले... तुम्हें मुझ तक पहुँचना होगा।"दोनों पक्ष फिर आमने-सामने खड़े हो गए। एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। दोनों की आंखों से आग बरस रही थी I और फिर...आदेश गूँजा,
"हमला!"और दोनों ओर के लोग एक साथ भिड़ गए। रणजीत का लक्ष्य केवल एक था—गोदाम के अंदर पहुँचकर अपने परिवार को बचाना। एक बार फिर जंगल गोलियों की गूँज से भर गया। अंगरक्षको के कवार के बीच रणजीत एक चट्टान की आड़ लेकर लगातार आगे बढ़ रहा था। उसके दो अंगरक्षक उसके आगे ढाल बनकर चल रहे थे, जबकि बाकी पीछे से जवाबी फायर कर रहे थे। अचानक...गोदाम की छत से एक आवाज़ आई—वो दाईं तरफ़ जा रहा है! रोक लो उसे!"और मार दो उसे अंदर मत आने देना I कुछ हथियारबंद लोग तुरंत उस दिशा में दौड़ पड़े।
रणजीत ने देखा कि सामने का रास्ता बंद हो चुका है।उसने अपने सबसे भरोसेमंद अंगरक्षक की ओर देखा।"महेश... मुझे अंदर पहुँचना ही होगा।" महेश उसका एक बाल सुधार गृह का एक साथी था I जिसे आप उसका एक मात्र। दोस्त मान सकते हो I महेश ने बिना एक पल गँवाए सिर झुका दिया। आप जाइए, सर... जब तक मैं ज़िंदा हूँ, कोई आपके पीछे नहीं आएगा।"इतना कहकर वह अपने साथियों के साथ दूसरी दिशा में दौड़ पड़ा, ताकि दुश्मनों का ध्यान अपनी ओर खींच सके। यही मौका था। जब रणजीत जंगल की झाड़ियों के बीच से निकलकर गोदाम की पिछली दीवार तक पहुँच गया। दीवार पुरानी थी। उसमें एक टूटी हुई खिड़की दिखाई दे रही थी। रणजीत सावधानी से भीतर कूद गया। अंदर चारों ओर अँधेरा था।पुरानी लकड़ी के बक्से, लोहे के ड्रम और जंग लगी मशीनें बिखरी पड़ी थीं। उस सन्नाटे में दूर कहीं किसी के कराहने की आवाज़ सुनाई दे रही थी I रणजीत का दिल ज़ोर से धड़क उठा। यह उसके पिता की आवाज थी I वह आवाज़ की दिशा में बढ़ा।वह जैसे ही बड़े हॉल के पास पहुँचा...उसने देखा...श्री मलोत्रा कुर्सी से बँधे हुए थे। उनके कपड़े धूल और खून के धब्बों से सने थे। पास ही कल्याणी भी बँधी हुई थी। उन दोनों के सामने खड़ा नकाबपोश सरगना मुस्कुरा रहा था।
उसने धीरे-धीरे ताली बजाई। वाह... रणजीत "तुम जितना सोच था उससे भी तेज यहाँ तक पहुँच गए।"रणजीत ने रिवॉल्वर उसकी ओर तान दी। उसकी आवाज़ गूँज उठी—"उन्हें छोड़ दो!"नकाबपोश हँसा। "छोड़ दूँ? उन्हें इतनी आसानी से?"उसने अपनी जेब से एक -घड़ी निकाली और समय देखा...समय देख कर वो मुस्कुराया।"तुम पाँच मिनट देर से आए हो, रणजीत...उसने कहा I उसके ये शब्द सुनते ही श्री मलोत्रा ने पूरी ताकत से सिर उठाया।
उनकी आँखों में बेटे के लिए चिंता थी...और होंठों पर आख़िरी बार एक ही शब्द आया ...भाग..."मेरे बेटे श्री मलोत्रा की आवाज़ पूरे गोदाम में गूँज उठी। "भाग... रणजीत...!"यहाँ से दूर लेजाओँ उसे उन्होंने रणजीत के पीछे खड़े अंगरक्षक से कहा I उसने मुझे बम लगाया है , वो कुछ मिनिट में फट जाएगा! रणजीत की आँखें भर आईं।
"नहीं, पिताजी! मैं आपको लेकर ही जाऊँगा।"नकाबपोश सरगना धीमे-धीमे हँसने लगा।
देख मल्होत्रा देख अपना कमजोर बेटा उसकी भी कमजोरी तुम्हारी तरह ही है..."परिवार।" उसने अपनी घड़ी बंद की और अपने आदमियों की ओर देखा। "दरवाज़े बंद कर निकलो यह से इतना कहकर वह निकल गया।" धड़ाम से गोदाम के भारी लोहे के दरवाज़े बंद हो गए। बाहर लड़ाई अब भी जारी थी। रणजीत के अंगरक्षक पीछे से दीवार तोड़ कर अंदर घुसने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन्हें रोका जा रहा था। और अंदर...अब रणजीत और उसके दो अंगरक्षक श्री मालोत्रा और कल्याणी को छुड़ाने की कोशिश कर रहे थे I पर अगर वे जरा सी भी लापरवाही करते तो बम फट जाता और वे सभी उसी जग मर जाते I रणजीत बम के लगे लाल हरे और नीले तारों को संभलकर कट करने की कोशिश कर रहा था , उसके हाथ कांप रहे थे उसके माथे से ठंडा पसीना टपक रहा था और उसकी सांसे इतनी तेज चल रही थी जैसे अभी अभी मैराथन दौड़ कर आया हो I एक तरफ उसके पिया की जिंदगी दांव पर लगी थी दूसरी तरफ उसकी पत्नी और उसके अजन्मे बच्चे की जिंदगी की बात थीं I श्री मलोत्रा ने एक गहरी साँस ली।
उन्होंने काँपती नज़रों से पहले रणजीत को देखा..फिर. पास में बेहोश लेती कल्याणी को...और उनके चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान उभरी। धीरे से उन्होंने कहा—"बेटा... अपने परिवार को बचाओ मेरा पोता और मेरी बेटी को बचाओ। गोदाम में कुछ पल के लिए बिल्कुल सन्नाटा छा गया। रणजीत की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने टूटी हुई आवाज़ में पुकारा—"पिताजी...में आप तीनाें को बचाऊंगा बस मुझ पर भरोसा रखो I पर वक्त एक एक गुजरता जा रहा था I बम की टिक टिक भी चालू थे I अब बस एक मिनिट बाकी था सब खत्म होने में ! श्री मालोत्रा को समाज आगय था कि अगर अब रणजीत उसकी बेटी को लेकर नहीं गया तो बे सब यही मर जायेंगे. उन्होंने पर में पड़ी रणजीत की पिस्टल उठाई और खुद में गोली मार ली तुरन्त उनके पेट से गरम तरल बहने लगा I
रणजीत की चीख पूरे जंगल में गूँज उठी। पिताजी आप ने ये क्या किया .. श्री मालोत्रा टूटती हुई सांसों के बीच रुक रुक कर बोले बेटा मेरी बेटी ओर पोते का ख्याल रखना ....... इतना कहते ही उनकी गर्दन एक तरफ लुढ़क गई ।श्री मलोत्रा का निश्चल शरीर कुर्सी पर झुक गया। कुछ क्षणों के लिए पूरा गोदाम मौन हो गया।
रणजीत की आँखें अपने पिता से हट ही नहीं रही थीं। उसके होंठ काँप रहे थे।…पिताजी…"उसकी आवाज़ टूट चुकी थी। उस क्षण उसके आदमी दीवार तोड़ अंदर आये उन्होंने अपने मालिक ओर मालकीन ओर बड़े मालिक की लाश देखी I उन्होंने रणनीत को पकड़ा एक आदमी ने कल्याणी के बेहोश शरीर को देखा जो अब खून से लथपथ थी I
सर हमे निकलना होगा नहीं तो हम मैडम ओर बच्चे को भी खो देंगे I wo खामोश हो गया था I उसकी आँखों में आँसू बह रहे थे... अंगरक्षक उसे खींचकर बाहर ले गए तभी एक धमाका हुआ और सब बदल गया I बाहर से वो बिलकुल खामोश हो गया था...लेकिन उनके अंदर अब एक अलग ही आग जल रही थी। उसने धीमी आवाज़ में कहा,"आज के बाद... तुम जहाँ भी छिपोगे... मैं तुम्हें ढूँढ़ निकालूँगा "तुमने मेरे पिता मुझसे छीने हैं..."अब मैं तुम्हारा चैन छीन लूँगा I तभी कल्याणी दर्द से कराह उठी। रणजीत ने पलटकर देखा।उसके चेहरे पर दर्द साफ़ दिखाई दे रहा था। "कल्याणी!" आंखे खोलो रणजीत बिजली की तरह उसकी ओर दौड़ा और उसे अपनी बाँहों में संभाल लिया।"कल्याणी... आँखें खोलो... मेरी तरफ़ देखो!"कल्याणी की साँसें तेज़ चल रही थीं।रणजीत ने अपने एक अंगरक्षक की ओर देखा और गरजकर बोला—"डॉक्टर को बुलाओ! गाड़ी घुमाओ! उसने कल्याणी का हाथ कसकर थाम लिया।"कुछ नहीं होगा...""मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा।"