अंश, कार्तिक, आर्यन - 16 Renu Chaurasiya द्वारा क्राइम कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अंश, कार्तिक, आर्यन - 16

कल्याणी के सिर पर बंदूक ताने हुए उस आदमी ने अपने साथी की ओर देखा और ठंडी आवाज़ में कहा—
"गाड़ी मोड़ो... इन्हें गोदाम ले चलो।"
श्री मलोत्रा कुछ समझ पाते, उससे पहले ही सब कुछ हो चुका था।
कार ने अचानक अपना रास्ता बदल लिया।
अब वह शहर की ओर नहीं, बल्कि एक सुनसान इलाके की तरफ़ दौड़ रही थी।
खिड़कियों के बाहर घना जंगल था।
दूर-दूर तक कोई इंसान, कोई घर, कोई वाहन दिखाई नहीं दे रहा था।
कुछ देर बाद कार जंगल के बीच एक ऐसे स्थान पर पहुँची, जहाँ ऊपर से देखने पर केवल घने पेड़ों का झुंड दिखाई देता था।
लेकिन उन पेड़ों के बीच लोहे का एक विशाल छिपा हुआ गोदाम बना था।
बाहर से वह जगह वीरान लगती थी, मानो वर्षों से वहाँ कोई आया ही न हो।
अंदर कदम रखते ही सीलन, जंग और नमी की तीखी गंध हवा में महसूस हो रही थी।
ऊँची छत, लोहे के पुराने खंभे और चारों ओर फैला अँधेरा उस जगह को और भी भयावह बना रहे थे।
गोदाम के अलग-अलग कोनों में कई लंबे-चौड़े आदमी खड़े थे।
सबने काले कपड़े पहन रखे थे।
उनके हाथों में आधुनिक हथियार थे और उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
मानो वे इंसान नहीं, सिर्फ़ आदेश मानने वाली परछाइयाँ हों।
कल्याणी और श्री मलोत्रा को बेरहमी से कार से उतारा गया।
उनके हाथ पीछे की ओर हथकड़ियों से बाँध दिए गए।
आँखों पर मोटी काली पट्टी बाँध दी गई, जिससे उन्हें कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
दोनों को घसीटते हुए गोदाम के बीचों-बीच लाया गया।
वहाँ दो पुरानी लोहे की कुर्सियाँ रखी थीं।
जंग से भरी हुई...
जिनका पेंट जगह-जगह से उखड़ चुका था।
उन्हें उन्हीं कुर्सियों पर बाँध दिया गया।
पैरों के नीचे की ज़मीन उबड़-खाबड़ और धूल से भरी थी, जैसे वर्षों से उस हिस्से की किसी ने सफाई तक न की हो।
श्री मलोत्रा बार-बार बेचैन होकर पुकार रहे थे—
"तुम लोग कौन हो?"
"क्या चाहते हो?"
"मेरी बेटी को कोई नुकसान मत पहुँचाना..."
उनकी आवाज़ काँप रही थी।
"जितने पैसे चाहिए, ले लो..."
"मेरी सारी संपत्ति ले लो..."
"लेकिन मेरी बेटी को हाथ मत लगाना।"
उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि अचानक गोदाम में किसी की दर्दभरी चीख गूँज उठी।
"आऽऽह...!"
वह आवाज़ पहचानने में उन्हें एक पल भी नहीं लगा।
वह उनके ड्राइवर की आवाज़ थी।
कुछ ही दूरी पर उसे पकड़े दो हथियारबंद आदमी लगातार पीट रहे थे।
वह दर्द से कराह रहा था, फिर भी एक ही बात दोहरा रहा था—
"सेठ जी का... कोई दोष नहीं है..."
"उन्हें छोड़ दो..."
उसकी हर पुकार गोदाम की दीवारों से टकराकर वापस लौट रही थी।
श्री मलोत्रा का दिल बैठ गया।
उन्होंने पूरी ताकत से कुर्सी से छूटने की कोशिश की, लेकिन हथकड़ियाँ और रस्सियाँ उन्हें जकड़े हुए थीं।
उन्होंने भर्राई हुई आवाज़ में चिल्लाकर कहा—
"बस करो... उसे छोड़ दो!"
"अगर बदला लेना है तो मुझसे लो..."
"उसका कोई कसूर नहीं है..."
लेकिन उनकी आवाज़ सुनने वाला वहाँ कोई नहीं था।
गोदाम में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
फिर...
लोहे के फर्श पर किसी के जूतों की आवाज़ गूँजने लगी।
ठक... ठक... ठक...
हर कदम के साथ ऐसा लग रहा था मानो मौत उनकी ओर बढ़ रही हो।
आवाज़ उनके सामने आकर रुक गई।
किसी ने धीमे से ताली बजाई।
"श्याम मालोत्रा..."
"शहर का सबसे ईमानदार व्यापारी..."
"आज तुम्हें अपनी अच्छाई की कीमत चुकानी होगी।"
श्री मलोत्रा ने दहाड़ते हुए कहा—
"सामने आओ! अगर हिम्मत है तो चेहरा दिखाओ।"
उस आदमी ने हल्की हँसी हँसी।
"चेहरा...?"
"नहीं... आज तुम्हें सिर्फ अपना अंत देखना है।"
उसने इशारा किया।
एक आदमी आगे बढ़ा और श्री मलोत्रा की आँखों से काली पट्टी हटा दी।
तेज़ रोशनी उनकी आँखों पर पड़ी।
उन्होंने चारों ओर देखा।
दर्जनों हथियारबंद लोग...
बीच में उनकी बेटी...
डरी हुई...
लेकिन अब भी अपने पिता को देखकर खुद को संभालने की कोशिश कर रही थी।
"पापा..."
उसकी काँपती हुई आवाज़ सुनकर श्री मलोत्रा की आँखें भर आईं।
"डर मत बेटा..."
"जब तक मैं ज़िंदा हूँ..."
"तुझे कुछ नहीं होने दूँगा।"
यह सुनते ही वह नकाबपोश आदमी ज़ोर से हँस पड़ा।
"यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी भूल है।"
"आज तुम किसी को बचा नहीं पाओगे।"
उसने धीरे से कल्याणी की ओर देखा।
"और तुम्हारा होने वाला उत्तराधिकारी..."
"उसी से आज मलोत्रा परिवार खत्म होगा।"
श्री मलोत्रा पूरी ताकत से कुर्सी से छूटने की कोशिश करने लगे।
"नहीं!"
"मेरी बेटी को छोड़ दो!"
"जो चाहिए मुझसे ले लो!"
उनकी आवाज़ पूरे गोदाम में गूँज उठी।
लेकिन सामने खड़े लोगों के चेहरों पर कोई असर नहीं हुआ।
तभी...
गोदाम के बाहर अचानक गाड़ियों के रुकने की आवाज़ आई।
नकाबपोश आदमी ने मुस्कुराकर कहा—
"समय हो गया... 3आदमी गोदाम के अंदर आये उनके चेहरे ढके हुए थे!
एक आदमी बोला 
"अब तुम्हारे बेटे को भी पता चल जाएगा कि उसने हम से पंगा क्यों लिया ।"
उसने अपने आदमियों की ओर देखा।
"याद रखना..."
"आज सिर्फ दो लोग नहीं मरेंगे..."
"श्याम मलोत्रा... आखिरकार तुम्हारे साम्राज्य का अंत देखने का दिन आ ही गया।"
श्याम जी ने गुस्से से उसकी ओर देखा।
"अगर दुश्मनी मुझसे है...
तो मेरी बेटी को छोड़ दो।"
वे आदमी हँस पडए।
"यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी है...
परिवार।"
उसने कल्याणी की ओर देखा। अगर तुम उस अनाथ को न चुन कर मुझे चुनती तो तुम्हारा अगम आज ये नहीं होता!
कल्याणी अपने पेट पर हाथ रखे बैठी थी।
उसकी आँखों में डर था...
लेकिन अपने बच्चे के लिए वह खुद को संभाले हुए थी।
उसने धीमी आवाज़ में कहा—
"पापा..."
श्याम जी की आँखों से आँसू बह निकले।
"डर मत बेटा...
सब ठीक होगा।"
लेकिन शायद...
उन्हें खुद भी अपने शब्दों पर विश्वास नहीं था।
नकाबपोश आदमी ने अपनी जेब से एक छोटी रील-टू-रील टेप निकाली।
उसने अपने आदमी की ओर देखकर कहा—
"इसकी आवाज़ रिकॉर्ड करो।"
एक आदमी ने टेप रिकॉर्डर चालू किया।
दूसरे ने श्री मलोत्रा की आँखों की पट्टी हटा दी।
नकाबपोश आदमी उनके सामने झुककर बोला—
"श्याम मलोत्रा... अपने बेटे से आख़िरी बार बात कर लो।"
श्री मलोत्रा ने उसकी ओर घूरकर देखा।
"तुम लोग बचोगे नहीं..."
नकाबपोश आदमी हँसा।
"जो कहना है, टेप में कहो।"
उसने इशारा किया।
टेप घूमने लगी।
कुछ क्षण चुप रहने के बाद श्री मलोत्रा बोले—
"रणजीत..."
"अगर ये आवाज़ तुम्हारे कानों तक पहुँचे..."
"तो मेरी एक बात याद रखना..."
"यहाँ मत आना।"
"ये लोग तुम्हें मारने के लिए बुलाएँगे।"
"अगर मेरी मौत से तुम्हारी जान बचती है..."
"तो मुझे खुशी होगी।"
उनकी आवाज़ भर्रा गई।
उन्होंने कल्याणी की ओर देखा।
"बेटा... अगर मेरा पोता इस दुनिया में आए..."
"तो उसे कहना..."
"...उसका नाना उससे बहुत प्यार करता था।"
कल्याणी की आँखों से आँसू बहने लगे।
"रणजीत..."
"अपना ध्यान रखना..."
"और..."
वह अपने पेट पर हाथ रखकर रो पड़ी।
"हमारे बच्चे को बचा लेना..."
नकाबपोश आदमी ने टेप बंद कर दी।
"बस..."
"इतना काफी है।"
उसने टेप अपने आदमी को दी।
"इसे रणजीत के दफ़्तर पहुँचाओ।"
उसी समय...
शहर में।
रणजीत अपने दफ़्तर में एक महत्वपूर्ण बैठक कर रहा था।
तभी रिसेप्शनिस्ट घबराई हुई अंदर आई।
"सर..."
"अभी-अभी एक आदमी ये पैकेट देकर गया है।"
रणजीत ने पैकेट खोला।
अंदर एक रील टेप थी...
और एक छोटा-सा कागज़।
उस पर लिखा था—
"अगर अपने परिवार को ज़िंदा देखना चाहते हो, तो पहले यह टेप सुनो।"
रणजीत का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा।
उसने तुरंत अपने केबिन में रखा टेप रिकॉर्डर चालू किया।
रील घूमने लगी...
और अगले ही पल...
उसने श्री मलोत्रा की आवाज़ सुनी—
"रणजीत..."
रणजीत का चेहरा सफेद पड़ गया।
उसके हाथ काँपने लगे।
टेप खत्म होने से पहले ही...
ऑफिस का लैंडलाइन फोन बज उठा।
ट्रिंग... ट्रिंग... ट्रिंग...
रणजीत ने काँपते हाथों से रिसीवर उठाया।
दूसरी तरफ़ वही ठंडी आवाज़ थी—
"टेप सुन ली?"
"अगर अपने पिता और पत्नी को ज़िंदा देखना चाहता है..."
"तो आज रात..."
"अकेला..."
"पुराने जंगल वाले गोदाम में पहुँच।"
"पुलिस लाई..."
"...तो तेरे पहुँचने से पहले दो चिताएँ जल चुकी होंगी।"
टक...
लाइन कट गई।
कुछ पल तक रणजीत रिसीवर हाथ में लिए खड़ा रहा।
रणजीत ने रिसीवर धीरे से नीचे रखा।

उसके हाथ काँप रहे थे।

लेकिन उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

उसने टेप एक बार फिर सुनी।

श्री मलोत्रा की आख़िरी आवाज़ उसके कानों में गूँज रही थी—

"यहाँ मत आना... यह जाल है..."

लेकिन...

वह कैसे न जाता?

वहाँ उसका पिता था।

उसकी पत्नी थी।

और उसका अजन्मा बच्चा।

अगले ही पल वह अपने केबिन से बाहर निकला।

उसकी तेज़ आवाज़ पूरे दफ़्तर में गूँज उठी—

"गाड़ी निकालो... अभी!"

उसके सबसे भरोसेमंद अंगरक्षक दौड़ते हुए बाहर आए।

"जी, साहब!"

कुछ ही मिनटों में तीन गाड़ियाँ हवेली से निकल चुकी थीं।

रणजीत सबसे आगे वाली कार में बैठा था।

उसके साथ उसके चार सबसे विश्वसनीय अंगरक्षक थे।

बाकी लोग पीछे-पीछे आ रहे थे।

पूरे रास्ते किसी ने एक शब्द तक नहीं बोला।

सिर्फ़ इंजन की तेज़ आवाज़ सुनाई दे रही थी।

रणजीत की नज़रें सड़क पर थीं।

उसके हाथ बार-बार स्टीयरिंग को कसकर पकड़ रहे थे।

उसके मन में बार-बार एक ही प्रार्थना उठ रही थी—

"भगवान... बस मेरे परिवार को सुरक्षित रखना।"

जैसे-जैसे कार जंगल के करीब पहुँचती गई...

वैसे-वैसे रास्ता सुनसान होता गया।

घने पेड़ों ने सड़क को लगभग ढक लिया था।

सूरज की रोशनी भी मुश्किल से ज़मीन तक पहुँच रही थी।

अचानक...

रणजीत के सबसे पुराने अंगरक्षक ने धीमे स्वर में कहा—

"साहब... कुछ ठीक नहीं लग रहा।"

"इतनी बड़ी वारदात के लिए सिर्फ़ चार-पाँच लोग नहीं होंगे।"

"मुझे लगता है यह पहले से बिछाया हुआ जाल है।"

रणजीत ने उसकी ओर देखा।

उसकी आँखों में दृढ़ निश्चय था।

"मुझे पता है।"

"लेकिन अगर मैं नहीं गया..."

"तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगा।"

उसने गहरी साँस ली और कहा—

**"अगर आज मेरी जान भी चली जाए..."

"तो भी मैं अपने पिता और अपनी पत्नी को अकेला नहीं छोड़ूँगा।"**

इतना कहकर उसने एक्सीलेटर और ज़ोर से दबा दिया।

तीनों गाड़ियाँ धूल उड़ाती हुई...

जंगल के उस अंधेरे की ओर बढ़ने लगीं,