वह बैठकर शराब की बॉटल खाली करने में लगा हुआ है।
उसका हर रोज़ का सबसे कर्तव्य होता है कि वह दारू पिए फिर पत्नी से लड़ाई करे। उसे मारे, पीटे, धमकाए। असल मायनों में यह संघर्ष में उसकी आर्थिक तंगी से उपजा है, जो उसे कई चीज़ों में जकड़े हुए है। एक मर्तबा तो चीख-चिल्लाहट इतनी ऊँची उठी कि उसके अंत में मदन की माँ ने उसके बाप का सिर फोड़ दिया। उस दिन उसने ज़्यादा पी ली थी, तब भी वह उसे गालियाँ देता रहा। जब माथे की गर्मी गुस्से के साथ ठंडी हुई और सिर भारी हुआ, तो वह उसे डॉक्टर के पास ले गई। उस दिन से वह उससे थोड़े लहजे में बात करता और अब तो उसकी कमर भी जवाब देने लगी है।
(पिछले भाग का)
उसकी माँ ने पूछा, "आज तो तू लेट हो गया, स्कूल का टाइम तो आधा हो गया है।"
उसके बाप ने नशे में सिर घुमाते हुए टोका, "मैंने बात कर रखी है, ये उसे आधे दिन भी पढ़ा सकते हैं।"
उसने कोई जवाब नहीं दिया और उन दोनों को उसी स्थिति में छोड़कर स्कूल के लिए निकल पड़ा।
वैसे तो स्कूल में सभी आधुनिक सुविधाएँ हैं—गार्डन है, प्लेग्राउंड है, सुसज्जित बिल्डिंग है, स्टाफ है और वेल-एजुकेटेड टीचर्स हैं। जैसे ही उसने स्कूल का गेट धकेला, स्कीम्स और पेपर्स पर बना स्कूल काफ़ूर हो गया और रंगे पुते लेकिन चंद बच्चों को अपनी गोद में बिठाए स्कूल में वह आया।
जहाँ गिनती भर के बच्चे हैं और दो टीचर। जो कि अधिकांश समय अपने फोन या स्टॉक मार्केट में लगे रहते हैं। कई बार तो दोनों भूल ही जाते कि उन्होंने अब तक क्या पढ़ाया है। इसके बावजूद वे दोनों टाइम पर अपनी सैलरी उठाते हैं।
दोनों ने उसे घूर कर देखा और अंदर आकर बैठने का इशारा किया। अंदर से दीवारों पर बारिश की उतरी हुई पानी की लकीरें अब तक मौजूद थीं। काले बोर्ड के एक कोने में काई जम गई थी। दीवारें इस बादलों के दौर में बची-कुची साँसे ले रही हैं। कुछ बातें करते, कुछ ज्ञान देते, बाक़ी समय देश को समझाने में दोनों का समय निकल गया। फिर उन्होंने उबासी लेते हुए विद्यालय से रब्ता किया।
चंद बच्चों के माँ-बाप उनसे शिकायत भी करते कि आप लोग बच्चों को अच्छे से पढ़ाते नहीं। इस पर उनका कहना होता कि आजकल बच्चे फ़ोन से पढ़ लेते हैं। सभी तो कोचिंग जाते हैं।
तुम भी अपने बच्चे की मेरे यहाँ कोचिंग लगवाओ। इस धाँधली से मदन का कोई वास्ता नहीं, वह जैसे आया था वैसे ही बाहर निकल गया।
मदन ने रास्ते में कूड़े के ढेर को देखा। जहाँ पर हरियाली होनी चाहिए। वह इन सभी चीज़ों को दूर छोड़कर घर आया। घर के अंदर कदम रखा ही था कि उसकी माँ ने उससे कहा कि उसका बाप अब नहीं रहा। उसे हार्ट अटैक आया और वह चल बसा। मदन के अंदर कुछ टूटा, लेकिन उसकी आँखों से आँसू नहीं आए। उसने जब अपनी गर्म पलकों को छुआ, तो वहाँ पर भी गैस जम चुकी थी। अब धुआँ उसके जीवन का हिस्सा है। फेफड़े कुछ सालों के मेहमान।