कहानी: सुनहरा फलक
उसके चारों ओर एक सुनहरे रंग की परत है जो कि आसमान तक जाती है। जितनी ऊँची उसकी निगाहें फैल सकती हैं, वहाँ तक सब कुछ अस्पष्ट नज़र आता था। कालापन अब और भी बढ़ गया था। पास में एक चिमनी से ऊँचे-ऊँचे काले बादल निकल रहे थे। मदन को यही लगता था कि इसी से बादल बनते हैं, क्योंकि कुछ ऊँचाई के बाद यह धुआँ भी बादल का हिस्सा हो जाता था।
वह उस चिमनी को देखे जा रहा था। तभी उसे एक मज़दूर ने आकर कहा, जो कि अपने मुँह में गुटका भरे हुए था, "मदन, तू यहाँ क्या कर रहा है? तेरा काम हो गया ना? जा, घर जा। स्कूल भी जाना।" इतना कहकर वह चला गया।
मदन अपनी नन्हीं आँखों से उसी चिमनी को देखता रहा। शर्ट के कुछ बटन टूटे थे, कुछ खुले और बाकी बंद थे। उसके लंबे और घुँघराले बाल उसके चेहरे पर खूब फबते थे। कृष्णमयी रंग और गोल सा चेहरा, फटी हुई पैंट जिस पर आड़े-तिरछे सुई से टाँके मारे गए थे, जिससे कुछ फटी हुई जगह छिप गई थी। उसके लगातार देखने पर उसे खाँसी का एक दम उठा और वह बाहर आ गया।
फलक पर वही तपन बढ़ती रहती, तपन तो उसके पिताजी के काम में भी है। अकस्मात् जब भी वे सर्फ फैक्ट्री से लौटते, खुद के साथ पास वाले शराबखाने से एक बॉटल शराब ले आते। पूरी शिफ्ट में सामान उठाना और रखना यही उनका काम था, यही वे सालों से करते आए हैं। अब उनसे यह काम बनता नहीं, बाज़ार में पिछले कई सालों से बेरोज़गारी की दर तेज़ी से उमड़ी है। ठेकेदार उन्हें निकालने की फ़िराक में है, नए लड़के उनसे तेज़ हैं। वे अपने घर की तंगी और काम से बड़े परेशान रहते।
मदन को भी उन्होंने एक पाइप फैक्ट्री में लगवा दिया। वैसे तो उसकी उम्र चौदह साल से कम है, फिर भी उसे आधे पैसे में झोंक दिया। हालाँकि काम उससे कम ही लिया जाता, लेकिन गैस के बादलों में ज़्यादा रहने से कई बीमारियाँ पनप जाती हैं। मदन ने इसकी मनाही की, पर ज़ोर-ज़बरदस्ती और तीन-चार चाटों में वह मान गया। वह डुलता हुआ वापस अपने घर आया, तब तक उसका बाप वहाँ पर आ चुका था। वह बैठकर शराब की बॉटल खाली करने में लगा हुआ है।
उसका हर रोज़ का सबसे कर्तव्य होता है कि वह दारू पिए फिर पत्नी से लड़ाई करे। उसे मारे, पीटे, धमकाए। असल मायनों में यह संघर्ष में उसकी आर्थिक तंगी से उपजा है, जो उसे कई चीज़ों में जकड़े हुए है। एक मर्तबा तो चीख-चिल्लाहट इतनी ऊँची उठी कि उसके अंत में मदन की माँ ने उसके बाप का सिर फोड़ दिया। उस दिन उसने ज़्यादा पी ली थी, तब भी वह उसे गालियाँ देता रहा। जब माथे की गर्मी गुस्से के साथ ठंडी हुई और सिर भारी हुआ, तो वह उसे डॉक्टर के पास ले गई। उस दिन से वह उससे थोड़े लहजे में बात करता और अब तो उसकी कमर भी जवाब देने लगी है।
वह घर आया और स्कूल जाने की तैयारी करने लगा।