विरासत: एक रहस्यमयी वसीयत DANIEL CHANDEL द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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विरासत: एक रहस्यमयी वसीयत

विरासत
अध्याय 1 : एक अजीब वसीयत
सावन अपने पूरे यौवन पर था। रात भर हुई वर्षा ने देवपुर गाँव की गलियों को धो दिया था। पेड़ों की पत्तियों से टपकती बूँदें सुबह की शीतल हवा के साथ मिलकर एक मधुर संगीत रच रही थीं। दूर मंदिर से आती घंटियों की ध्वनि वातावरण में शांति घोल रही थी। पर उस दिन यह शांति केवल प्रकृति तक सीमित थी। गाँव के लोगों के मन में एक अनकही हलचल थी।

सूरज की पहली किरणें अभी धरती पर पूरी तरह फैली भी नहीं थीं कि गाँव के सबसे बड़े मकान के बाहर लोगों की भीड़ जुटने लगी। किसी की आँखों में शोक था, किसी के चेहरे पर जिज्ञासा, तो कुछ लोग अपने भीतर छिपे स्वार्थ को दुख के आवरण में ढकने का प्रयास कर रहे थे। पूरे गाँव में एक ही समाचार फैल चुका था— हरिनाथ बाबा अब इस संसार में नहीं रहे।

लगभग पचहत्तर वर्ष के हरिनाथ बाबा वर्षों से अकेले जीवन बिता रहे थे। पत्नी का देहांत बहुत पहले हो चुका था और उनकी कोई संतान भी नहीं थी। गाँव के बाहर फैली उपजाऊ ज़मीन, आम के बाग और कई खेत उनके नाम थे। संपन्न होने के बावजूद वे सादगी से जीवन जीते थे। वे कम बोलते थे, पर गाँव में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति रहा हो जिसकी किसी कठिन समय में उन्होंने सहायता न की हो।

समय के साथ उनके घर का वातावरण बदलने लगा था। जो दूर के रिश्तेदार वर्षों तक कभी मिलने नहीं आए, वे अचानक सेवा के बहाने उनके घर में रहने लगे। कोई दवा देता, कोई भोजन कराता, तो कोई दिन-रात देखभाल का दावा करता। गाँव वाले सब समझते थे कि यह सेवा कम और भविष्य की संपत्ति पर नज़र अधिक है, पर किसी ने कभी खुलकर कुछ नहीं कहा।

अंतिम संस्कार के बाद जब लोग लौटे, तो शोक की चर्चा धीरे-धीरे संपत्ति की चर्चा में बदल गई। चाय की दुकान पर बैठा हर व्यक्ति अपनी-अपनी कल्पनाओं का हिसाब लगाने लगा। कोई कहता, "हरिनाथ बाबा के पास पचास करोड़ की ज़मीन होगी।" दूसरा दावा करता, "शहर में भी उनके कई मकान हैं।" कुछ लोगों ने तो यह तक कहना शुरू कर दिया कि उन्होंने कहीं सोने के बर्तन छिपाकर रखे हैं। सच क्या था, यह किसी को नहीं मालूम था, फिर भी हर व्यक्ति अपने अनुमान को ही सत्य मान बैठा था।

तीसरे दिन पंचायत भवन में सभी रिश्तेदारों को बुलाया गया। गाँव के वरिष्ठ अधिवक्ता देवव्रत मिश्र अपने हाथ में एक सीलबंद लिफाफा लिए हुए पहुँचे। कमरे में ऐसा सन्नाटा था कि लिफाफा खुलने की आवाज़ भी स्पष्ट सुनाई दे रही थी। सबकी निगाहें उसी कागज़ पर टिक गईं। सभी को विश्वास था कि अब हरिनाथ बाबा की अंतिम इच्छा सबके सामने होगी।

देवव्रत मिश्र ने कागज़ खोला। कुछ क्षण तक उसे ध्यान से देखते रहे। अचानक उनके चेहरे के भाव बदल गए। उन्होंने धीमे स्वर में कहा, "यह पूरी वसीयत नहीं है।" इतना सुनते ही कमरे में हलचल मच गई। लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। कुछ ने वकील पर ही संदेह करना शुरू कर दिया।

देवव्रत मिश्र ने सबको शांत रहने का संकेत दिया और कागज़ पढ़ना शुरू किया। उस पर केवल एक पंक्ति लिखी थी—

"मेरी वास्तविक वसीयत उचित समय आने पर स्वयं सामने आएगी। तब तक मेरी किसी भी संपत्ति पर कोई दावा न किया जाए।"

नीचे हरिनाथ बाबा के हस्ताक्षर थे। इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं लिखा था।

एक ही वाक्य ने पूरे गाँव को उलझन में डाल दिया। किसी ने इसे मज़ाक कहा, किसी ने चाल, तो किसी ने षड्यंत्र। उसी शाम हरिनाथ बाबा की हवेली का कोना-कोना खंगाल डाला गया। अलमारियाँ खोली गईं, संदूक उलट दिए गए और दीवारों की दरारों तक की जाँच हुई। घंटों की तलाश के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगा। हवेली पहले जैसी ही थी, पर उसे देखने वालों के मन अब पहले जैसे नहीं रहे।

दिन बीतते गए और अफवाहें बढ़ती चली गईं। किसी ने कहा कि वकील ने असली वसीयत छिपा दी है, तो किसी ने रिश्तेदारों पर आरोप लगाया। धीरे-धीरे मामला गाँव की सीमा पार कर जिला प्रशासन तक पहुँच गया। शिकायतें इतनी बढ़ीं कि अंततः इस पूरे प्रकरण की आधिकारिक जाँच कराने का निर्णय लिया गया।

हरिनाथ बाबा की रहस्यमयी वसीयत को तीन दिन बीत चुके थे, पर देवपुर गाँव में बेचैनी कम होने के बजाय और बढ़ती जा रही थी। हर चौपाल, हर चाय की दुकान और हर आँगन में केवल एक ही चर्चा थी—आख़िर असली वसीयत कहाँ है?

दिन बीतने के साथ अफवाहों ने भी नया रूप लेना शुरू कर दिया। कोई कहता कि वकील ने असली दस्तावेज़ छिपा दिए हैं, तो कोई रिश्तेदारों पर आरोप लगाता। कुछ लोगों का विश्वास था कि हवेली में कहीं कोई गुप्त तहखाना है, जहाँ हरिनाथ बाबा ने अपनी अंतिम इच्छा छिपाकर रखी है। सच किसी के पास नहीं था, पर अनुमान सबके पास थे।

शिकायतें इतनी बढ़ गईं कि मामला जिला प्रशासन तक पहुँच गया। अंततः जिलाधिकारी कार्यालय में इस विवाद की एक अलग फ़ाइल तैयार की गई। उसके ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा था—

"देवपुर संपत्ति विवाद — विशेष जाँच"

वह फ़ाइल युवा प्रशासनिक अधिकारी अगम रानी की मेज़ पर रखी गई। कठिन मामलों को धैर्य और निष्पक्षता से सुलझाने के लिए वे पूरे जिले में जानी जाती थीं। उन्होंने बिना किसी जल्दबाज़ी के पूरी फ़ाइल पढ़ी। शिकायतें अलग-अलग लोगों ने लिखी थीं, पर लगभग हर शिकायत में एक ही बात थी—संपत्ति किसे मिले?

फ़ाइल बंद करते हुए अगम रानी कुछ देर तक खिड़की के बाहर देखती रहीं। उनके मन में एक ही प्रश्न बार-बार उठ रहा था—

"क्या किसी ने यह जानने की कोशिश की कि हरिनाथ बाबा वास्तव में चाहते क्या थे?"

यही प्रश्न उन्हें सबसे अधिक विचलित कर रहा था। फ़ाइल में हर व्यक्ति ने ज़मीन, धन और अधिकार की बात लिखी थी, लेकिन किसी ने भी उस व्यक्ति के जीवन, उसके विचारों या उसकी अंतिम इच्छा का उल्लेख नहीं किया था।

उन्होंने अपने सहायक को बुलाया और शांत स्वर में कहा—

"कल सुबह हम देवपुर चलेंगे। कई बार सच कागज़ों में नहीं, लोगों की यादों में छिपा होता है।"


अगली सुबह ठीक नौ बजे जिला प्रशासन की सफेद गाड़ी देवपुर की सीमा में पहुँची। सरकारी वाहन पर लगा राष्ट्रीय चिह्न देखते ही पूरे गाँव में हलचल मच गई। बच्चे उत्सुकता से गाड़ी के पीछे दौड़ने लगे और बड़े लोग अपने-अपने घरों से बाहर निकल आए। कुछ ही मिनटों में यह समाचार फैल गया कि प्रशासन स्वयं हरिनाथ बाबा की वसीयत की जाँच करने आया है।

गाड़ी पंचायत भवन के सामने रुकी। सबसे पहले अगम रानी उतरीं। साधारण सूती साड़ी, कंधे पर फ़ाइलों का बैग और चेहरे पर गम्भीर शांति। उनके पीछे राजस्व विभाग के अधिकारी, लेखपाल और पुलिस निरीक्षक भी उतर आए। उनकी उपस्थिति में ऐसा आत्मविश्वास था कि शोर मचाने वाले लोग भी धीरे-धीरे शांत हो गए।

पंचायत भवन के भीतर गाँव के प्रमुख लोग और सभी रिश्तेदार इकट्ठा थे। अगम रानी ने किसी पर आरोप लगाने के बजाय केवल इतना कहा—

"मैं यहाँ किसी का पक्ष लेने नहीं आई हूँ। मेरा काम केवल सत्य तक पहुँचना है। इसलिए जो भी कहिएगा, सोच-समझकर कहिएगा। सत्य को प्रमाण की आवश्यकता होती है, शोर की नहीं।"

 
पंचायत भवन में हुई बातचीत के बाद अगम रानी सीधे हरिनाथ बाबा की हवेली पहुँचीं। कभी रौनक से भरा रहने वाला वह विशाल घर अब अजीब-सी ख़ामोशी में डूबा था। बरामदे में रखी पुरानी चारपाई अब भी वहीं पड़ी थी, जहाँ हरिनाथ बाबा शाम के समय बैठकर गाँव के बच्चों को खेलते देखा करते थे। हवेली के खुले दरवाज़े और बिखरा सामान बता रहे थे कि पिछले कुछ दिनों में यहाँ कई बार तलाशी ली जा चुकी थी।

अगम रानी धीरे-धीरे हर कमरे का निरीक्षण करने लगीं। उनकी नज़र किसी छिपे ख़ज़ाने पर नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के जीवन पर थी जिसने अपनी मृत्यु से पहले पूरे गाँव को एक प्रश्न देकर चला गया था। अनुभवी जाँच अधिकारी होने के कारण वे जानती थीं कि कई बार सबसे बड़ा प्रमाण किसी तिजोरी में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की छोटी-छोटी वस्तुओं में छिपा होता है।

हवेली का अंतिम कमरा सबसे अलग था। कमरे में एक पुरानी लकड़ी की मेज़, लोहे की अलमारी और किताबों से भरी एक छोटी-सी रैक थी। अधिकांश पुस्तकों पर धूल जमी थी, लेकिन एक पुस्तक ऐसी थी जिसे हाल ही में किसी ने हाथ लगाया था। अगम रानी ने उसे सावधानी से उठाया। वह भारतीय संविधान की प्रति थी। उसके बीच में पीपल का एक सूखा पत्ता रखा था। पत्ते पर पेंसिल से केवल तीन शब्द लिखे थे—

"वचन कभी नहीं..."

अगम रानी कुछ क्षण तक उन शब्दों को देखती रहीं। वाक्य अधूरा था, पर उन्हें विश्वास था कि हरिनाथ बाबा जैसा व्यक्ति बिना कारण कोई संकेत नहीं छोड़ सकता। उन्होंने पत्ता उसी स्थान पर वापस रख दिया। वे किसी भी वस्तु को उसकी मूल स्थिति से हटाना नहीं चाहती थीं।

तभी उनकी दृष्टि मेज़ के नीचे रखे एक पुराने लोहे के संदूक पर पड़ी। संदूक पर धूल की मोटी परत जमी थी, लेकिन उसके ताले पर ताज़ी खरोंचें साफ़ दिखाई दे रही थीं। किसी ने हाल ही में उसे खोलने का प्रयास किया था।

"इस संदूक की चाबी मिली?" अगम रानी ने पुलिस निरीक्षक से पूछा।

"नहीं, मैडम," निरीक्षक ने उत्तर दिया। "पूरे घर की तलाशी ली गई, लेकिन चाबी नहीं मिली। ताला तोड़ने की भी कोशिश हुई थी, पर सफल नहीं हो सके।"

अगम रानी कुछ देर तक ताले को देखती रहीं। फिर शांत स्वर में बोलीं—

"इसे अभी मत खोलिए। कई बार बंद ताला, खुले संदूक से ज़्यादा सच छिपाए रहता है। पहले यह पता लगाइए कि इसे आख़िरी बार किसने छुआ था।"

अधिकारी उनकी ओर देखने लगे। उन्हें आश्चर्य हुआ कि जहाँ सब लोग संदूक खोलने की जल्दी में थे, वहीं अगम रानी उस व्यक्ति को ढूँढ़ना चाहती थीं जिसने उसे खोलने की कोशिश की थी।

शाम ढलने लगी थी। हवेली से बाहर निकलते समय उनकी नज़र सामने बने प्राथमिक विद्यालय पर पड़ी। कुछ बच्चे टूटी हुई दीवार के सहारे बैठकर फटी-पुरानी किताबों से पढ़ रहे थे। उनके पास न पर्याप्त पुस्तकें थीं, न बैठने की व्यवस्था। फिर भी उनकी आँखों में सीखने की चमक थी।

अगम रानी कुछ देर तक चुपचाप उन्हें देखती रहीं। फिर उन्होंने एक बार पीछे मुड़कर हरिनाथ बाबा की विशाल हवेली की ओर देखा। एक ओर अपार संपत्ति थी, दूसरी ओर संसाधनों के बिना शिक्षा पाने के लिए संघर्ष करते बच्चे।

उन्हें लगा मानो इन दोनों के बीच कोई ऐसा संबंध है, जिसे अभी तक किसी ने समझा ही नहीं...

 
अगले दिन सूर्योदय से पहले ही अगम रानी फिर हवेली पहुँच गईं। रात भर उन्होंने हरिनाथ बाबा की डायरी, पंचायत के पुराने अभिलेख और रजिस्ट्री कार्यालय से मँगाए गए दस्तावेज़ों का अध्ययन किया था। अब उनके मन में कई बिखरे हुए सूत्र एक-दूसरे से जुड़ने लगे थे।

हवेली के अध्ययन-कक्ष में पहुँचकर उन्होंने फिर उसी संविधान की पुस्तक को उठाया। इस बार उन्होंने केवल पुस्तक नहीं देखी, बल्कि उसके प्रत्येक पन्ने को ध्यान से पलटना शुरू किया।

अचानक एक पृष्ठ पर उनकी दृष्टि ठिठक गई।

किनारे पर हरिनाथ बाबा की लिखावट में केवल एक पंक्ति दर्ज थी—

"संपत्ति मनुष्य को बड़ा नहीं बनाती, उसका उपयोग उसे महान बनाता है।"

अगम रानी मुस्करा उठीं।

उन्हें लगा कि वे सही दिशा में बढ़ रही हैं।

उसी समय उनके सहायक ने सूचना दी—

"मैडम, रजिस्ट्री कार्यालय से माँगी गई फ़ाइलें आ गई हैं।"

कुछ ही देर में पुराने दस्तावेज़ उनके सामने रख दिए गए। कई घंटे तक एक-एक पन्ना देखने के बाद उन्हें एक पंजीकृत ट्रस्ट-समझौता मिला, जिसे वर्षों पहले गोपनीय रखने का निर्णय लिया गया था।

उस दस्तावेज़ में स्पष्ट लिखा था कि हरिनाथ बाबा ने अपनी अधिकांश संपत्ति ग्रामीण बच्चों की शिक्षा के लिए समर्पित कर दी थी। शर्त केवल इतनी थी कि उनकी मृत्यु से पहले इस निर्णय की जानकारी किसी को नहीं दी जाएगी।

अगम रानी ने गहरी साँस ली।

अब रहस्य लगभग सुलझ चुका था।

उसी दोपहर पंचायत भवन में पूरे गाँव की सभा बुलाई गई।

रिश्तेदार, ग्रामीण, अधिकारी और गाँव के बच्चे—सभी वहाँ उपस्थित थे।

कमरे में पहले जैसी बेचैनी थी, लेकिन इस बार सबकी निगाहें अगम रानी पर टिकी थीं।

उन्होंने शांत स्वर में कहा—

"हरिनाथ बाबा की असली वसीयत किसी तिजोरी में नहीं छिपी थी। वह उनके विचारों में छिपी थी।"

इतना सुनते ही पूरा सभागार शांत हो गया।

तभी सभा में एक अतिथि पहुँचा।

वह उस शिक्षा-ट्रस्ट का प्रतिनिधि था, जिसके साथ हरिनाथ बाबा ने वर्षों पहले यह समझौता किया था। उसके पास मूल दस्तावेज़, रजिस्ट्री की प्रतियाँ और हरिनाथ बाबा द्वारा लिखा गया एक सीलबंद पत्र था।

अगम रानी ने सबके सामने वह पत्र खोला।

कमरे में ऐसा सन्नाटा था कि कागज़ की सरसराहट भी सुनाई दे रही थी।

उन्होंने पढ़ना शुरू किया—

"यदि यह पत्र पढ़ा जा रहा है, तो समझना कि मैं अब इस संसार में नहीं हूँ। मैंने जीवन भर देखा कि लोग ज़मीन बाँटने के लिए लड़ते हैं, लेकिन ज्ञान बाँटने के लिए नहीं। इसलिए मैंने निश्चय किया कि मेरी संपत्ति किसी एक परिवार की नहीं, पूरे गाँव के भविष्य की होगी। यदि मेरे कारण एक भी बच्चा पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ा हो गया, तो समझना कि मेरी सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो गई।"

पत्र समाप्त होते-होते कई लोगों की आँखें नम हो चुकी थीं।

रामलाल ने सिर झुका लिया।

मोहन की आँखों में पश्चाताप था।

कमला बुआ चुपचाप आँसू पोंछ रही थीं।

पहली बार सभी को समझ में आया कि जिस संपत्ति के लिए वे लड़ रहे थे, उसका असली उत्तराधिकारी कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियाँ थीं।

कुछ महीनों बाद उसी भूमि पर एक आधुनिक विद्यालय, पुस्तकालय और कौशल प्रशिक्षण केंद्र का निर्माण शुरू हुआ।

एक वर्ष के भीतर विद्यालय तैयार हो गया।

मुख्य द्वार पर सफेद संगमरमर की पट्टिका लगाई गई, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—

हरिनाथ ज्ञान निकेतन
उसके नीचे अंकित था—

"मनुष्य की सबसे बड़ी विरासत उसकी संपत्ति नहीं, उसके द्वारा दिया गया अवसर है।"

उद्घाटन के दिन गाँव के बच्चे नई पुस्तकों को हाथों में लेकर विद्यालय के प्रांगण में प्रवेश कर रहे थे।

अगम रानी दूर खड़ी मुस्करा रही थीं।

उन्हें लगा जैसे हवेली के बरामदे में बैठा वह वृद्ध आज भी उन बच्चों को देख रहा हो।

हवा का एक हल्का झोंका आया।

विद्यालय के आँगन में लगा पीपल का पौधा धीरे-धीरे हिलने लगा।

मानो हरिनाथ बाबा की अंतिम इच्छा अब शब्द नहीं, एक जीवित सत्य बन चुकी थी।

उस दिन देवपुर ने पहली बार समझा कि कुछ लोग मरने के बाद भी जीवित रहते हैं।

अपने नाम से नहीं...

अपने कर्मों से।

— समाप्त —

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

                                                                                                                  लेखक -डेनियल चंदेल