रात के दस बजने वाले थे। अहमदाबाद के प्लेटफॉर्म से गुजरात मेईल बस छूटने ही वाली थी नीलोफर.. कि तभी आपने फर्स्टकलास के उस कंपार्टमेंट मे प्रवेश किया। दोनों बच्चों और ढेर सारे सामान को कंपार्टमेंट में चढ़ानेसे पहले कहीं ट्रेन चल ना पड़े इस डर से आपका खूबसूरत चेहरा हांफने लगा था। किन्तु इस जल्दबाजी के दरमियान भी आप के सामने वाली स्लीपिंग बर्थ पर बैठ कर इत्मीनान से अंग्रेजी मेगज़ीन पढ़ रहे एक नौजवान को देख आपका दिल एक धड़कन चूक गया। फिर तो ट्रेन शुरू हुई तब तक और भाईजान और अम्मी जान को खुदा हाफ़िज़ कहते वक्त भी आपका ध्यान तो उस सामने वाली बार्थपर बैठे नौजवान के खयालों में ही खोया हुआ था।
लगता तो वहीं है.." आपने मन ही मन सोचा निलोफर..। वही चौड़े कंधे और तीखे चेहरे वाला आरिफ।
निंदभरी आंखो वाले दोनों बच्चों को बर्थ पर आपने लिटाते वक्त और खिड़की के पास बैठ कर बिखरी हुई जुल्फों की लटों को नाज़ुक हाथों से संवारते हुए आपने तिरछी नजरों से देखा तो वह नौजावन मुस्कुराते हुए आप ही के सामने देख रहा था। अगर यह आरिफ ही है तो?..…
कॉलेज के शरारत भरे उन दिनों में आपकी खूबसरती की आगमें जल जाने के लिए जो पतंगे आपकी आसपास मंडराया करते थे उनमें से यह आरिफ उसके तीखे तेवर, कड़क चेहरा और डरावनी आंखो से सबसे अलग तैर आता था। उस वक्त भी वह आप के सामने ऐसे धारदार नज़रोंसे देखता था कि आपका गोरा चेहरा पसीने से सुर्ख है जाता था। कोलेजका वह जनरल सेक्रेट्री और ड्रामा क्लब का प्रेसिडेंट था
आवारा लड़कों के बीच घिरकर सिगारेट फूंकता और लड़कियों को करते रहते आरिफ को आप एक पढ़ा लिखा बदमाश ही गिनते थे नीलोफर, और इसी लिए उस दिन ड्रामा प्रेक्टिस के अंत मे उसने एकांत में ' नीलोफर आईं रिएली लव यू ' कहते हुए आपका हाथ पकड़ते ही आपने उसके चेहरे पे एक जोरदार चांटा जड़ दिया था। बात प्रिंसिपल तक पहोंच गई थी और कड़क नियमों के आग्रही प्रिंसिपल गुप्ता साहबने उसे कॉलेज से रस्टीकेट कर दिया था। और फिर तबसे लेकर आज तक...अभी...इतने सालों बाद…
" मुझे लगता है अब आपको शायद सब याद आ गया है।" मेगज़ीन बन्ध कर के किनारे पर रख कर मुस्कुराते हुए वही तेज़ नज़रों से उसने पूछा।
" मै वही सोच रही थी कि लगता तो वही है आरिफ ही.' आपने थोड़ा सहम कर थिरकते हुए धीमी आवाज़ में कहा नीलोफर।
" लगता नहीं, मै ही हूं। अभी भी आपकी उंगलियों के निशान यहां ऐसे कि ऐसे ही है..?
क्लीन शेव्ड रुआबदार चेहरे पे अपने पंजे को फेरते हुए उसने हंसते हुए कहा और आप शर्मा गई नीलोफर और...।
आपके चांटे ने तो मुझे अहमदाबाद से सीधा दिल्ही फेंक दीआ । ग्रेज्यूएशन फिर वही किया और अभी सी. बी.आईंमे इन्वेस्टीगेशन ऑफिसर हूं। और एक केस के सिलसिले में सूरत जा रहा हूं। ..और आप…?
"अरे वंडरफुल। मेरी ससुराल भी सूरत में ही है। गुजराती लड़की और क्या करेगी? शादी के बाद ये दो बच्चे है और मेरे शौहर रेवेन्यू डिपार्टमेंट में क्लास वन ऑफिसर है"।
" क्या नाम है आप के शौहर का?"
" A.S. शेख। एहसान सलीम शेख। यह मेरा पता है। आप जरूर से बंगले पे आना" आपने पता देने के लिए गोरा हाथ बढ़ाया और आरीफके रुआबदार चेहरे ओर मर्दाना कलाई को देखते हुए अनायास ही आपको छोटे-से कद और सामान्य व्यक्तित्व वाले आपके शौहर याद आ गए।
" फेमली आपकी देल्ही मे..? अपने हिचकिचाते हुए पूछा।
" फेमली? मेरा? हां देल्ही में । आरिफ ने थिजी हुई हिचकिचाती हुई आवाज़ मे उत्तर दीआ और सीगारेट जलाई।
सुरत आ गया। ट्रैन रुक गई। शर्द रातमें प्लेटफॉर्म पर लोगों की परछाइयां घूम रही थी।
"लगता है वह स्टेशन आए नहीं" आपने चिंतीत नज़रों से प्लेटफॉर्म पर आंखे घुमाते हुए कहा नीलोफर।
" आप फिक्र मत करो"कहते हुए आरीफने जल्दी से आपका ढेर सारा सामान प्लेटफॉर्म पर रख दीआ। सोए हुए आपके बड़े बेटे अरहान कि आंखो पे पानी से भीगा हाथ फेरकर उसकी नींद उड़ाई और उसे प्लेटफार्म पर रखा और सोई हुई छोटी सी फलक को आप की गोद मे रख दीआ। तभी अन्जाने से उसी वक्त आपके गोरे हाथ और नाज़ुक कंधे आरिफ को छू गए। देखना कहीं फिर से चांटा मत मार देना..! आपकी आंखों मे आंखे पिरोते हुए नर्म आवाज़ से आरिफ ने कहा और तभी दूर से दौड़ता हांफते हुए आ रहा एहसान दिखाई दीआ।
"लगता है मेरे शोहर आ रहै है। दूर से एहसान को आते देख चेन कि सांस लेते हुए आरिफ को उसकी पहचान कराने के इरादे से आपने कहा नीलोफर। तभी ट्रेन की सीटी बज उठी और आरिफ कंपार्टमेंट मे चढ़ गया।
" अरे लेकिन आपको भी तो यही उतारना है ना..?" आपने अचरज भरी निगाहों से पूछा नीलोफर।
"हां, लेकिन अब नहीं उतारना। फिर कभी।"
" क्यों मेरा घर है इस लिए ? अभी तक गुस्सा कम नहीं हुआ ? ? आपने मीठा गुस्सा करते हुए कहा।
"हां शायद आपका सुखी और फूला फाला घर है इसी लिए ही.. और मै चाहता हूं कि वह ऐसे ही बरकरार रहे।" आरिफ के होठों से हल्के से यह बात निकली, लेकिन रफ्तार पकड़ रही ट्रेन ने उसकी थर्राती आवाज़ को रात कि थिजी हुई ठंडी हवा में बिखेर दिया….।
काश ये बात आपके कानों तक पहोंचती नीलोफर तो…?
ट्रेन अब पूरी रफ्तार से स्टेशन छोड़ चुकी थी
ओर रेलवे प्लेटफार्म पर चाई के स्टॉल पर रखे हुए रेडियो से मेहदी हसन की दर्द भरी गजल के
सूर शर्द हवा में गूंज रहे थे…."
"अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिले
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले"
- राज़ अंजान