अंधेरे में कोई है Vijay Erry द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

अंधेरे में कोई है

अंधेरे में कोई है     लेखक: विजय शर्मा एरी (Vijay Sharma Erry)रात के बारह बज चुके थे। शहर की हलचल थम चुकी थी। सिर्फ कभी-कभी दूर किसी कुत्ते की आवाज़ या हवा में पत्तों की सरसराहट सुनाई देती। अनिरुद्ध अपनी नई किराये की फ्लैट में बैठा था। यह फ्लैट शहर के पुराने हिस्से में थी—तीसरी मंजिल, पिछली तरफ, जहाँ दिन में भी कम रोशनी आती थी।वह पिछले हफ्ते ही यहाँ शिफ्ट हुआ था। कंपनी ट्रांसफर हो गया था। परिवार गाँव में था। अकेलापन उसे पसंद नहीं था, लेकिन मजबूरी थी। फ्लैट पुरानी थी। दीवारों पर पीला पेंट उखड़ रहा था। बाथरूम में पानी की टोंटी कभी-कभी अपने आप टपकने लगती। और सबसे बड़ी बात—बिजली। बार-बार चली जाती।अनिरुद्ध ने लैपटॉप बंद किया। काम खत्म हो चुका था। उसने पानी का गिलास उठाया और रसोई की तरफ बढ़ा। ठीक उसी समय बिजली चली गई। पूरा घर अंधेरे में डूब गया।“फिर से!” उसने बुदबुदाया। मोबाइल की टॉर्च जलाई। हल्की रोशनी में रसोई का दरवाजा दिखाई दिया। पानी पीकर वह वापस बैठक में आया। सोफे पर बैठते ही उसे लगा जैसे कोई साँस ले रहा हो।उसने टॉर्च घुमाई। कोई नहीं। खिड़की बंद थी। पर्दे हिल नहीं रहे थे। फिर भी वह आवाज़… धीमी, गहरी साँस। जैसे कोई सो रहा हो, लेकिन बहुत करीब।अनिरुद्ध ने दिल की धड़कन नियंत्रित करने की कोशिश की। “पुरानी बिल्डिंग है। दीवारों से आवाज़ आती होगी,” उसने खुद को समझाया। बिस्तर पर लेट गया। आँखें बंद कीं। लेकिन नींद नहीं आई।अचानक… किच-किच। जैसे कोई लकड़ी के फर्श पर चल रहा हो। आवाज़ उसके कमरे के बाहर से आ रही थी। गलियारे से।उसने धीरे से उठा। टॉर्च जलाई। दरवाजा खोला। गलियारा खाली था। सीढ़ियों की तरफ कोई नहीं। लेकिन फर्श पर… धूल में पैरों के निशान। ताज़े। नंगे पैरों के।अनिरुद्ध की साँस अटक गई। उसने फोन उठाया। पड़ोसी को कॉल किया। कोई जवाब नहीं। फिर बिल्डिंग के गार्ड को। फोन बंद था।वह वापस कमरे में आया। दरवाजा बंद किया। कुंडी लगाई। बिस्तर पर बैठकर दीवार की तरफ पीठ करके बैठा। टॉर्च बुझा दी ताकि बैटरी बचे। अंधेरा गहरा हो गया।फिर वह आवाज़ आई। अब और करीब।“अनिरुद्ध…”नाम। उसका नाम। धीमी, कर्कश आवाज़ में। जैसे कोई बहुत पुराना रिकॉर्ड बोल रहा हो।वह उछलकर खड़ा हो गया। “कौन है?” उसकी आवाज़ काँप रही थी।कोई जवाब नहीं। सिर्फ साँस। अब उसके कान के पास। ठंडी हवा उसके गाल पर लगी, जैसे कोई साँस छोड़ रहा हो।अनिरुद्ध ने टॉर्च जलाई। कमरा खाली था। लेकिन दीवार पर… उसकी अपनी परछाई के अलावा एक और परछाई। लंबी, पतली, सिर झुकाए हुए। टॉर्च हिलाने पर वह भी हिली, फिर गायब हो गई।वह काँपते हाथों से दरवाजा खोला और भाग निकला। सीढ़ियाँ उतरते हुए वह लगभग गिर पड़ा। नीचे आकर गार्ड रूम की तरफ दौड़ा। गार्ड सो रहा था। अनिरुद्ध ने उसे जगाया।“ऊपर कोई है!” उसने हांफते हुए कहा।गार्ड ने नींद भरी आँखों से देखा। “कौन सर? बिल्डिंग खाली है। सिर्फ आप और दूसरी मंजिल पर एक बूढ़ी औरत रहती है। वह तो सुबह ही गाँव चली गई थी।”“मैंने आवाज़ सुनी। पैरों के निशान देखे।”गार्ड ने टॉर्च ली और साथ चला। तीसरी मंजिल पर पहुँचकर उन्होंने गलियारा चेक किया। धूल में निशान थे, लेकिन गार्ड ने कहा, “शायद चूहों के। या आपकी कल्पना।”अनिरुद्ध अकेला वापस आया। रात बाकी थी। उसने सभी लाइटें जलाईं—जब बिजली आई। लेकिन मन नहीं माना। सुबह तक वह जागता रहा।अगले दिन ऑफिस में वह थका हुआ था। दोस्त राहुल ने पूछा, “क्या हुआ? रात भर सोए नहीं?”अनिरुद्ध ने सब बताया। राहुल हँसा। “पुरानी बिल्डिंगों में ऐसे ही होता है। दीवारें बोलती हैं। तुम ज्यादा फिल्में देखते हो।”लेकिन शाम को जब अनिरुद्ध घर लौटा, तो कुछ अलग था। उसके कमरे के टेबल पर एक पुरानी डायरी रखी थी। काली कवर वाली, जर्जर। वह तो उसकी नहीं थी।उसने खोली। पीले पन्ने। हस्तलिपि पुरानी। पहली पंक्ति:“मैं अंधेरे में हूँ। कोई मुझे देख नहीं सकता। लेकिन मैं सब देखता हूँ।”आगे लिखा था:“यह फ्लैट पहले मेरी थी। 1987 में। मेरा नाम कमल था। मेरी पत्नी और बच्ची यहाँ रहती थीं। एक रात बिजली गई। मैं बाथरूम गया। वापस आकर देखा… वे सो रहे थे। लेकिन उनकी आँखें खुली थीं। और मुँह से खून…”अनिरुद्ध के हाथ काँप गए। डायरी में आगे:“मैं भाग नहीं पाया। पुलिस ने कहा आत्महत्या। लेकिन मैं जानता हूँ। अंधेरे में कोई था। वही जो अब भी यहाँ है। जो नाम लेकर बुलाता है।”आखिरी पन्ना:“अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो भाग जाओ। वरना तुम भी अंधेरे का हिस्सा बन जाओगे।”अनिरुद्ध ने डायरी फेंक दी। कमरा छोड़ने का फैसला किया। सामान पैक करने लगा। तभी बिजली फिर चली गई।अंधेरा। पूरा।अब आवाज़ें और तेज़ थीं।“अनिरुद्ध… तुम भी रहोगे यहाँ… हमेशा…”उसने टॉर्च जलाई। रोशनी में देखा—सोफे पर कोई बैठा था। एक आदमी। चेहरा अंधेरे में छिपा। लेकिन शरीर… पारदर्शी सा।“कौन हो तुम?” अनिरुद्ध की आवाज़ फटी।“मैं कमल हूँ। और तुम… अगले हो।”अनिरुद्ध पीछे हटा। दीवार से टकराया। आदमी उठा। करीब आया। उसकी आँखें खाली थीं। काली।“अंधेरा हमें चुनता है। जो अकेले होते हैं। जो डरते हैं। तुम्हारा डर… हमारा खाना है।”अनिरुद्ध ने दरवाजा खोला और भागा। सीढ़ियाँ। नीचे। सड़क पर। रात के दो बज रहे थे। वह भागता रहा। पार्क तक। वहाँ बेंच पर बैठकर साँस ली। फोन निकाला। राहुल को कॉल किया।“मैं घर नहीं जा रहा। कुछ है वहाँ।”राहुल ने कहा, “मैं आ रहा हूँ। इंतजार कर।”एक घंटे बाद राहुल आया। दोनों वापस फ्लैट गए। लाइटें जल रही थीं। डायरी गायब थी। कमरा सामान्य लग रहा था।राहुल ने कहा, “तुम थके हो। नींद की जरूरत है। मैं यहाँ रुकता हूँ।”रात बीती। अनिरुद्ध आँखें बंद करके लेटा। राहुल सोफे पर। सुबह जब अनिरुद्ध उठा, राहुल नहीं था। सोफे खाली। लेकिन फर्श पर… खून के धब्बे। छोटे-छोटे। और दीवार पर लिखा था, खून से:“अभी और एक।”अनिरुद्ध पागल हो गया। पुलिस बुलाई। उन्होंने कुछ नहीं पाया। खून के धब्बे साफ हो चुके थे। राहुल का फोन स्विच ऑफ था। उसके घर वाले ने कहा वह रात को कहीं नहीं गया।अनिरुद्ध ने फ्लैट छोड़ दी। होटल में रहने लगा। लेकिन रातें शांत नहीं थीं। हर रात वही आवाज़।“अनिरुद्ध… अंधेरे में कोई है… तुम हो…”एक हफ्ते बाद वह डॉक्टर के पास गया। नींद की गोलियाँ लीं। लेकिन एक रात होटल के कमरे में, बिजली गई। अंधेरा। और इस बार… बिस्तर के किनारे कोई बैठा था।कमल। और उसके पीछे… राहुल। दोनों की आँखें काली। मुँह से मुस्कुराहट।“अब तुम हमारे हो।”अनिरुद्ध चिल्लाया। कमरे की लाइट जल गई। कोई नहीं था। लेकिन शीशे में… उसकी अपनी परछाई नहीं थी। खाली शीशा। और उसके पीछे अंधेरा घना हो रहा था।सुबह स्टाफ ने कमरा खोला। अनिरुद्ध बिस्तर पर बैठा था। आँखें खुली। लेकिन वह देख नहीं रहा था। मुँह से सिर्फ एक वाक्य निकल रहा था, बार-बार:“अंधेरे में कोई है… अंधेरे में कोई है…”पुलिस ने उसे अस्पताल भेज दिया। डॉक्टरों ने कहा मानसिक तनाव। लेकिन नर्सें रात में कहतीं—उसके कमरे से कभी-कभी दो आवाज़ें आती हैं। एक उसकी। और एक… कोई और।और शहर के उस पुराने फ्लैट में, जहाँ अब कोई नहीं रहता, रात को कभी-कभी खिड़की से हल्की रोशनी झलकती है। और जो गुजरता है, वह सुनता है—धीरे से कोई नाम लेकर बुला रहा है।अंधेरा कभी खाली नहीं होता।उसमें हमेशा कोई होता है।इंतजार करता हुआ।अगले के लिए।— समाप्त —(शब्द संख्या लगभग 2000)