आख़िरी वादा Deepak Singh द्वारा क्राइम कहानी में हिंदी पीडीएफ

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आख़िरी वादा

अध्याय १: बिसात के मोहरे

दृश्य १: खाकी का रौब और छिपा हुआ गुलाब

रात के करीब दो बजे थे। नगर के बाहरी छोर पर स्थित एक पुराने, सुनसान गोदाम को चारों तरफ से पुलिस की गाड़ियों ने खामोशी से घेर रखा था। गोदाम के भीतर दो शातिर नशीले पदार्थों के तस्कर अपनी बंदूकें ताने छिपे हुए थे, किंतु उनके माथे से पसीना बह रहा था। कारण? उनके ठीक सामने अंधेरे से निकलकर खड़ी थी शहर की सबसे कड़क और बेखौफ पुलिस अधिकारी—कामिनी।

कामिनी की आँखों में कानून की एक ठंडी और कठोर कड़वाहट थी। उसने अपनी सर्विस रिवॉल्वर को बिना किसी हिचकिचाहट के सीधे उन तस्करों के माथे पर तान दिया। उसकी सख्त खाकी वर्दी, उस पर चमकते सितारे और चेहरे का वह कठोर मिजाज अपराधियों के हौसले पस्त करने के लिए पर्याप्त था।

"हथियार नीचे डाल दो, अन्यथा तीसरी गोली चलाने का अवसर न्यायालय भी नहीं देगा," कामिनी की आवाज में एक ऐसी कड़क खनक थी, जो गोदाम की लोहे की दीवारों से टकराकर गूंज उठी।

तस्करों ने कांपते हाथों से अपनी बंदूकें फर्श पर गिरा दीं। कामिनी ने एक ठंडी मुस्कान के साथ अपने कनिष्ठ अधिकारी (जूनियर) को संकेत किया, "इन्हें हवालात में डालो।"

गोदाम से बाहर निकलते ही कामिनी ने अपनी पुलिस टोपी उतारी। गाड़ी के सामने के शीशे पर खुद का सख्त चेहरा देखते हुए उसने अपनी जेब से फोन निकाला। स्क्रीन पर उसकी सबसे प्रिय सहेली विनीता का संदेश चमक रहा था: "कामिनी, मैं और भाई रेस्तरां में तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं। शीघ्र आओ, आज भाई कुछ विशेष बात करने वाले हैं।"

संदेश पढ़ते ही कामिनी के चेहरे की वह सख्त पुलिसिया कड़वाहट एक क्षण में ओझल हो गई और उसके होठों पर एक निश्छल, शर्मीली मुस्कान बिखर गई। उसने गाड़ी की बगल वाली सीट पर रखा एक लाल गुलाब देखा, जो उसने विनीत के लिए खरीदा था। वह विनीत से बेपनाह, अंधा प्यार करती थी। वह विनीत ही था जो इस सख्त पुलिस अधिकारी के कठोर हृदय को मोम बना देता था।

उसी समय, शहर के एक साधारण से रेस्तरां के केबिन में विनीत और उसकी बहन विनीता बैठे थे। उनका एक छोटा-मोटा, सामान्य सा व्यवसाय था, जिसे चलाने के लिए उन्हें हर महीने काफी संघर्ष करना पड़ता था। विनीत अपनी सस्ती कलाई घड़ी देख रहा था और विनीता अपनी कॉफी का मग पकड़े थोड़ी चिंता में मुस्कुरा रही थी। दोनों भाई-बहन के चेहरों पर एक अजीब सी शराफत और मासूमियत थी, जो उनके भीतर छिपे शातिर दिमाग को पूरी तरह छिपाए रखती थी।

"कामिनी आती ही होगी, भाई," विनीता ने धीमी आवाज में कहा। "वह तुम्हारी मोहब्बत में इस कदर अंधी है कि उसे हमारी इस मामूली हैसियत और तुम्हारी परछाई पर भी संदेह नहीं होगा।"

विनीत ने मुस्कुराते हुए अपनी कमीज के कफ्स ठीक किए, "कामिनी का यही अंधा विश्वास ही हमारी इस छोटी सी जिंदगी को बदलने की सबसे बड़ी ढाल है, विनीता।"

दृश्य २: सिंहानिया साम्राज्य की धमक और अटूट बंधन

उसी रात, शहर के सबसे आलीशान क्षेत्र में स्थित 'सिंहानिया ग्रुप' के गगनचुंबी मुख्यालय के बोर्डरूम में देश के बड़े-बड़े निवेशकों (इन्वेस्टर्स) के साथ एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक समाप्त हुई थी। उस विशाल ओक की लकड़ी से बनी मेज के सबसे मुख्य स्थान पर बैठा था—अमर सिंहानिया।

अमर शहर का सबसे धनी युवक और एक कद्दावर व्यापारिक सम्राट (बिजनेस टाइकून) था। उसकी उम्र भले ही कम थी, लेकिन उसकी शख्सियत में एक ऐसा भारी रौब और तीक्ष्ण बुद्धि (स्मार्टनेस) थी कि बड़े-बड़े व्यापारी भी उसके सामने बात करने से पहले दो बार सोचते थे। उसका ब्रांडेड थ्री-पीस सूट, उसकी गहरी, शांत आँखें और उसकी सफलता उसकी ताकत को बयां कर रही थीं। विनीत और विनीता का छोटा-मोटा व्यवसाय तो अमर के इस साम्राज्य के सामने एक तिनके के बराबर भी नहीं था।

बचपन में ही माता-पिता के एक हादसे में गुजर जाने के बाद, अमर ने शून्य से इस पूरे व्यापारिक साम्राज्य को अकेले खड़ा किया था।

"शर्तें अंतिम हैं, सज्जनों। सिंहानिया ग्रुप अपनी ईमानदारी से कभी समझौता नहीं करता," अमर ने अपनी वजनदार आवाज़ में कहा। समझौता पक्का हो चुका था।

जैसे ही बैठक समाप्त हुई, बोर्डरूम का भारी दरवाजा खुला और एक बेहद खूबसूरत, तीखे नैन-नक्श वाली लड़की हाथ में कुछ दस्तावेज लिए अंदर आई। वह थी पूजा, अमर की जुड़वां (ट्विन) बहन और उसकी व्यापारिक साझेदार।

पूजा और अमर सिर्फ भाई-बहन नहीं थे, वे एक-दूसरे के सबसे पक्के मित्र थे। माता-पिता के जाने के बाद उन दोनों ने जिस तरह एक-दूसरे के आंसुओं को पोंछकर जिंदगी की ऊंचाइयों को हासिल किया था, उसने उनके बीच एक ऐसा अटूट बंधन बना दिया था जिसे दुनिया की कोई ताकत नहीं तोड़ सकती थी।

"भाई, आपने आज फिर सिद्ध कर दिया कि सिंहानिया नाम को कोई पीछे नहीं धकेल सकता," पूजा ने मुस्कुराते हुए अमर को पानी का ग्लास दिया।

अमर के चेहरे पर अपनी बहन को देखकर एक सौम्य मुस्कान उभरी, "यह सिर्फ मेरी नहीं, पूजा, तुम्हारी भी मेहनत है। अगर तुम मेरी ताकत बनकर खड़ी न होतीं, तो मैं आज इस मुकाम पर नहीं होता।"

पूजा ने अमर का हाथ धीरे से दबाया और भावुक होकर बोली, "आप मेरे भाई ही नहीं, मेरी पूरी दुनिया हैं। आपकी जिंदगी में जो भी खुशियां आएंगी, उन्हें बचाना और आपकी परछाई पर भी आंच न आने देना, यह मेरा उत्तरदायित्व (जिम्मेदारी) है।"

अमर ने हंसकर उसके सिर पर हाथ फेरा। दोनों भाई-बहन को इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि बहुत जल्द नियति उनके जीवन में एक ऐसा तूफान लाने वाली थी, जहाँ पूजा का यह भाई के प्रति अंधा समर्पण इस पूरे शहर के इतिहास का सबसे खौफनाक प्रतिशोध (badla) बनने वाला था।

 

 

अध्याय २: दो किनारे, दो तक़दीरें

दृश्य १: रोशनी और मुस्कान का नगर

सांझ ढल चुकी थी और नगर की सतरंगी, कृत्रिम रोशनियाँ कांच की विशाल खिड़कियों से छनकर रेस्तरां के भीतर अपनी आभा बिखेर रही थीं। रेस्तरां का वातावरण अत्यंत शांत, शालीन और सुरीला था। पृष्ठभूमि में गूंज रहा धीमा, वाद्य संगीत वहाँ बैठे संभ्रांत लोगों के वार्तालाप में एक मीठी मिठास घोल रहा था।

उसी रेस्तरां के एक एकांत कोने की मेज पर शहर की सबसे कड़क और निर्भीक पुलिस अधिकारी कामिनी बैठी थी। किंतु इस क्षण, उसके मुखमंडल पर वर्दी का वह चिरपरिचित रौब और कठोरता लेशमात्र भी नहीं थी, बल्कि उसके स्थान पर एक असीम सुकून, लज्जा और संकोच के भाव तैर रहे थे। उसके ठीक सामने विनीत बैठा था और उसकी बगल में विनीता।

विनीता ने अपनी कॉफी का मग कांच की मेज पर रखा और उसकी आँखों में एक नटखट, शरारती चमक उभर आई। वह थोड़ा आगे की ओर झुकी और अत्यंत धीमी परंतु उत्साहित आवाज़ में बोली, "मैं सच में बहुत प्रसन्न हूँ, कामिनी! तुम और भाई आखिरकार परिणय सूत्र (विवाह) में बंधने का विचार कर रहे हो। तनिक सोचो, तुम मेरी परम मित्र होने के साथ-साथ मेरी भाभी भी बन जाओगी! फिर तो हमारी इस मैत्री का अधिकार और भी अधिक बढ़ जाएगा।"

यह सुनते ही विनीत ने लज्जा से अपनी नजरें झुका लीं, किंतु उसके अधरों पर एक गहरी, आत्मिक मुस्कान फैल गई। उसने अत्यंत दबे-छिपे और अनजाने अंदाज़ में मेज के नीचे से कामिनी का हाथ थामने का प्रयास किया। कामिनी, जो बड़े से बड़े खूंखार अपराधियों के सम्मुख पलक तक नहीं झपकाती थी, विनीता के इस परिहास पर पूरी तरह शर्मा गई। उसके गोरे गालों पर आई स्वाभाविक लालिमा को छिपाने के लिए उसने अपनी पलकें मूंद लीं और चम्मच से अपनी प्लेट को निष्प्रयोजन खुरचने लगी।

"विनीता... तुम भी ना, कुछ भी प्रलाप करती रहती हो," कामिनी ने अत्यंत मंद स्वर में कहा, परंतु उसकी वाणी की वह खनक स्पष्ट बता रही थी कि वह अंतर्मन से कितनी व्याकुलता और हर्ष का अनुभव कर रही थी।

विनीत ने स्नेहपूर्वक कामिनी की ओर देखा, दोनों की आंखें मिलीं और बिना एक भी शब्द कहे ही दोनों ने मौन रहकर एक-दूसरे से जीवन भर का साथ मांग लिया। उस रेस्तरां की हल्की पीली रोशनी में उन तीनों का वह कोना सुनहरे सपनों, आकांक्षाओं और भविष्य की उम्मीदों से महक रहा था।

जब रेस्तरां से उठने का समय आया, तो विनीता ने कामिनी के कंधे पर धीरे से हाथ रखा और अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ पूछा, "सब कुछ तो निश्चित हो गया कामिनी, किंतु तुम अपने माता-पिता से हमारे इस संबंध के विषय में कब बात कर रही हो?"

कामिनी ने अपनी पर्स संभालते हुए, आँखों में एक दृढ़ विश्वास के साथ उत्तर दिया, "आज रात ही। मैं घर लौटते ही सबसे पहले पिताजी और माताजी को विनीत के बारे में बताऊँगी। मुझे विश्वास है कि वे मेरी प्रसन्नता को देखकर सहर्ष स्वीकार कर लेंगे।"

विनीत और विनीता ने एक-दूसरे को देखा, उनके चेहरों पर एक सूक्ष्म, रहस्यमयी संतुष्टि उभर आई। कामिनी मुस्कुराते हुए अपने घर की ओर बढ़ गई, इस बात से पूरी तरह अनजान कि नियति ने उसके घर की चौखट पर क्या बिसात बिछा रखी थी।

दृश्य २: आकांक्षाओं की ढलती संध्या

इसी नगर के दूसरे छोर पर, एक अत्यंत प्रतिष्ठित, पारंपरिक और सलीके से सजे हुए भवन के बैठक (लिविंग रूम) में मद्धम रोशनी फैली हुई थी। दीवार पर टंगी प्राचीन घड़ी की निरंतर होती टिक-टिक की ध्वनि कमरे के गंभीर सन्नाटे को रह-रहकर भंग कर रही थी। कामिनी के माता-पिता सोफे पर आसीन होकर चाय की चुस्कियां ले रहे थे, किंतु उनके चेहरों पर अपनी इकलौती पुत्री के भविष्य और सुरक्षा को लेकर एक गंभीर चिंता और उत्कृष्ट आशा के भाव स्पष्ट परिलक्षित हो रहे थे।

कामिनी के पिता ने हाथ में थामे समाचार पत्र को मोड़कर एक ओर रखा, अपना चश्मा उतारा और एक गहरी, विचारमग्न सांस लेकर बोले, "देखो भाग्यवान, अमर और पूजा ने अपने माता-पिता के असामयिक निधन के पश्चात जिस गरिमा और दृढ़ता से स्वयं को और अपनी परिस्थितियों को संभाला है, वह कोई सामान्य बात नहीं है। उस अल्पायु में, जब अच्छे-भले कुल के बालक बिखर जाते हैं, इन दोनों सहोदरों (भाई-बहन) ने अपने बिखरते हुए व्यापारिक साम्राज्य को शून्य से उठाकर इस शिखर तक पहुँचाया। आज वे समाज में जिस सम्मानीय मुकाम पर हैं, वह वास्तव में वंदनीय है। उन दोनों भाई-बहन में जो अद्भुत तालमेल और गहरी समझ है, वैसा पवित्र रिश्ता आज के भौतिक दौर में अत्यंत दुर्लभ है।"

कामिनी की माता ने चाय का प्याला मेज पर प्रतिस्थापित किया और सहमति में अपना सिर हिलाते हुए अत्यंत आत्मीय स्वर में बोलीं, "आपने बिल्कुल अक्षरशः सत्य कहा। उन्होंने जीवन में जो भी ऊँचाइयाँ और वैभव अर्जित किया है, वह उनकी अटूट कर्मठता, ईमानदारी और संस्कारों का ही प्रतिफल है। अमर जितना संपन्न और वैभवशाली है, उतना ही विवेकशील, शिष्ट और सुलझा हुआ पुरुष भी है। मेरा अंतर्मन तो यही कहता है कि हमारी कामिनी के लिए अमर से श्रेष्ठ, कद्दावर और सुयोग्य जीवनसाथी संपूर्ण जगत में कोई और हो ही नहीं सकता। हमारी पुत्री की उस कठोर खाकी वर्दी के पीछे जो एक कोमल, मासूम लड़की छिपी है, उसे अमर जैसा गंभीर और समर्थ पुरुष ही पूर्ण सम्मान के साथ संभाल सकता है। हमें अब तनिक भी विलंब नहीं करना चाहिए और इस पावन रिश्ते की बात तुरंत आगे बढ़ानी चाहिए।"

पिता ने कुछ क्षणों तक गंभीर मुद्रा में विचार किया और फिर मंद मुस्कान के साथ अपनी पूर्ण सहमति दे दी।

वे दोनों वृद्ध माता-पिता इस भयंकर सत्य से सर्वथा अनभिज्ञ थे कि जिस क्षण वे अपनी इकलौती संतान के सुखद भविष्य के लिए अमर के नाम का पवित्र स्वप्न बुन रहे थे, ठीक उसी क्षण उनकी पुत्री किसी अत्यंत साधारण और अप्रतिष्ठित व्यक्ति के नाम की मेहंदी अपने हाथों में सजाने का हठ मन में लिए, घर के मुख्य द्वार की ओर बढ़ रही थी।

 

 

अध्याय ३: आदर की चौखट पर

दृश्य १: भ्रम की परछाइयाँ

रेस्तरां से विनीत के प्रेम और सुनहरे स्वप्नों की सुगंध मन में लिए जब कामिनी ने अपने घर की चौखट पर कदम रखा, तो उसके चेहरे पर एक अलौकिक संतोष था। वह मन ही मन उन शब्दों को सुव्यवस्थित कर रही थी, जिनके माध्यम से वह आज रात अपने माता-पिता के सम्मुख विनीत के प्रति अपने अनुराग को प्रकट करने वाली थी।

किंतु भवन के भीतर प्रवेश करते ही उसे एक अजीब सा सन्नाटा पसरा मिला। बैठक (लिविंग रूम) पूरी तरह खाली था। कामिनी ने कौतूहलवश घर के वयोवृद्ध सेवक को पुकारा, "रामू काका! माताजी और पिताजी कहाँ हैं? क्या वे विश्राम कर रहे हैं?"

काका ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्र स्वर में उत्तर दिया, "नहीं बिटिया, बाबूजी और माजी तो लगभग आधे घंटे पूर्व ही घर से निकल चुके हैं। वे दोनों सिंहानिया मैंशन की ओर गए हैं। चलते समय बाबूजी कह रहे थे कि अमर सिंहानिया जी से किसी अत्यंत विशेष और आवश्यक विषय पर वार्तालाप करना है।"

"अमर सिंहानिया?" कामिनी ने चौंककर दोहराया। कुछ क्षणों के लिए उसके मन में आशंका की एक बारीक लकीर उभरी, किंतु अगले ही पल उसने स्वयं को समझा लिया। चूँकि उसके पिता स्वयं बिज़नेस जगत के एक प्रतिष्ठित नाम थे और अमर सिंहानिया शहर का सबसे बड़ा उद्योगपति था, इसलिए कामिनी को लगा कि अवश्य ही व्यापार के सिलसिले में कोई गंभीर और गुप्त रणनीतिक चर्चा (Business Meeting) रही होगी। सेवक इस बात से सर्वथा अनभिज्ञ थे कि उस यात्रा का वास्तविक उद्देश्य क्या था।

कामिनी ने अपनी पुलिस टोपी उतारकर मेज पर रखी और सोफे पर बैठ गई। उसके अधरों पर एक बार फिर विनीत का चेहरा उभर आया। वह अपनी हथेलियों को देखकर मंद-मंद मुस्कुराने लगी और अत्यंत बेसब्री से अपने माता-पिता के लौटने की प्रतीक्षा करने लगी, ताकि उनके आते ही वह अपनी शादी की बात उनके सामने रख सके। वह इस भयंकर सत्य से पूर्णतः अचेत थी कि नियति इस समय सिंहानिया मैंशन में उसके भाग्य का कौन सा नया पृष्ठ लिख रही थी।

दृश्य २: भव्यता और संस्कार का संगम

उसी समय, शहर के सबसे संभ्रांत और वैभवशाली क्षेत्र में स्थित अमर और पूजा का आलीशान सिंहानिया मैंशन किसी श्वेत संगमरमरी प्रासाद (महल) की भांति चमक रहा था। उसकी ऊँची धवल दीवारें, छत से लटकते कांच के विशालकाय झूमर और कलात्मक ढंग से सुसज्जित बैठक कक्ष उनकी अगाध संपन्नता को स्वतः प्रमाणित कर रहे थे। परंतु इस अकूत वैभव के मध्य जो तत्व सबसे विशिष्ट था, वह था इस भवन का कड़ा अनुशासन, मर्यादा और एक गरिमामयी ठहराव।

शाम की मद्धम, स्वर्णिम रोशनी पूरे हॉल में फैली हुई थी, जब कामिनी के माता-पिता ने अत्यंत आदर के साथ उस प्रांगण में कदम रखा।

अमर और पूजा, जो बिज़नेस की निर्मम दुनिया में अपने अत्यंत कठोर और अकाट्य निर्णयों के लिए विख्यात थे, इस क्षण सौम्य, विनीत और विनम्रता की प्रतिमूर्ति दिखाई दे रहे थे। जैसे ही उन्होंने कामिनी के माता-पिता को प्रवेश करते देखा, दोनों भाई-बहन सहसा अपनी कुर्सियों से उठ खड़े हुए। अमर ने आगे बढ़कर पूर्ण श्रद्धा से उन दोनों बुजुर्गों के चरण स्पर्श किए और पूजा ने अत्यंत आत्मीयता के साथ कामिनी की माता का हाथ थाम लिया।

"आइए, अंदर पधारिए। आप दोनों का इस गृह में आगमन हमारे लिए किसी देव-आशीष से कम नहीं है," पूजा ने सोफे की ओर संकेत करते हुए कहा। उसकी वाणी में कोई बनावट या चाटुकारिता नहीं थी, बल्कि एक सहज और निश्चल सम्मान था। सेवक ने तुरंत चांदी की थाली में शीतल पेय और सूखे मेवे लाकर सम्मुख रख दिए।

पूजा ने मंद मुस्कान के साथ वार्तालाप को आगे बढ़ाया, "सच कहूँ तो भाई और मैंने हमेशा आपकी व्यावसायिक सूझबूझ और आपके जीवन जीने के आदर्शों से बहुत कुछ सीखा है। माता-पिता के असामयिक अवसान के पश्चात जब हम दोनों सर्वथा अकेले रह गए थे, तब आपका अनुशासित और मर्यादित जीवन ही हमारे लिए प्रकाश-स्तंभ रहा है।"

अमर ने भी सोफे पर अत्यंत शालीन मुद्रा में बैठते हुए अपनी सहोदर (जुड़वां बहन) की बात का समर्थन किया, "पूजा ने बिल्कुल अक्षरशः सत्य कहा है। व्यापार के संसार में लोग केवल हमारी सफलता और धन देखते हैं, परंतु हम दोनों जानते हैं कि इस मुकाम तक सुरक्षित पहुँचने में आपके वर्षों के अनुभव और स्नेहिल मार्गदर्शन का कितना बड़ा योगदान रहा है। आपका आशीर्वाद हमारे ऊपर सदैव एक सुरक्षा कवच की भांति रहा है।"

कामिनी के माता-पिता इन दोनों भाई-बहन के इस बड़प्पन, शालीनता और उच्च संस्कारों को देखकर अंतर्मन से गद्गद हो रहे थे। उनका अंतःकरण गवाही दे रहा था कि उनका निर्णय शत-प्रतिशत सत्य और न्यायसंगत है।

दृश्य ३: अटूट गठबंधन

कुछ समय तक आत्मीय चर्चा और चाय का क्रम चलता रहा। तत्पश्चात, कमरे में एक अत्यंत गंभीर और गरिमामय सन्नाटा छा गया, जिसे भंग करते हुए आखिरकार कामिनी के पिता ने अपनी बात को सीधा, स्पष्ट और निर्णायक रूप दिया। उन्होंने अपनी चाय का प्याला नीचे रखा, अपने चश्मे को ठीक किया और अमर की आँखों में देखते हुए अत्यंत धीर-गंभीर स्वर में बोले।

"अमर, पूजा... हम यहाँ आज केवल किसी औपचारिक भेंट के लिए उपस्थित नहीं हुए हैं। हमारे वृद्ध हृदयों में एक अभिलाषा है, जिसे हम आज अत्यंत स्पष्टता से तुम्हारे सम्मुख रखना चाहते हैं। हम तुम्हारे और हमारे परिवार के मध्य एक शाश्वत और अटूट रिश्ता जोड़ना चाहते हैं। हमारी अंतरात्मा की इच्छा है कि कामिनी और अमर का पावन विवाह संपन्न हो। तुम दोनों भाई-बहन का व्यक्तित्व, तुम्हारी अगाध मेहनत और ये उत्तम संस्कार हमें अत्यंत प्रिय हैं, और हम अपनी इकलौती पुत्री का हाथ तुम्हारे सामर्थ्यवान हाथों में सौंपना चाहते हैं।"

यह अभूतपूर्व प्रस्ताव सुनते ही पूजा की आँखों में एक अप्रतिम, विजयमयी चमक उभर आई। उसके मुखमंडल पर एक विस्तृत और आल्हादित मुस्कान फैल गई। वह तो मानो इसी स्वर्णिम क्षण की प्रतीक्षा कर रही थी। उसने तुरंत अत्यंत उत्साह के साथ अपनी सहमति देते हुए कहा, "यह तो सिंहानिया परिवार के लिए अत्यंत हर्ष और परम सौभाग्य का विषय होगा! कामिनी जैसी जांबाज, कर्तव्यनिष्ठ और सुलझी हुई स्त्री हमारे कुल की वधू बनेगी, इससे श्रेष्ठ भला और क्या हो सकता है? मैं इस संबंध से अत्यंत प्रसन्न हूँ!"

अमर ने कुछ क्षणों के लिए अपनी आँखें मूंद लीं। उसके मानस पटल पर कामिनी के माता-पिता का वह पुराना उपकार और आदर घूम गया, जिसने उसके संघर्ष के दिनों में उसे सदैव संबल दिया था। उसके उच्च संस्कारों के लिए इस वृद्ध, सम्माननीय जोड़े के प्रस्ताव को ठुकराना या अस्वीकार करना सर्वथा असंभव था।

उसने अत्यंत शालीनता और विनम्रता से अपना मस्तक झुकाया और बेहद धीमे परंतु दृढ़ स्वर में कहा, "आपने स्वयं चलकर हमारे सम्मुख यह याचना रखी है... हम इससे विमुख कैसे हो सकते हैं? आप दोनों हमारे लिए सदैव माता-पिता के समान पूजनीय रहे हैं। यदि आपको प्रतीत होता है कि मैं कामिनी के सर्वथा योग्य हूँ, तो मैं इस पावन गठबंधन के लिए पूरी तरह तत्पर हूँ।"

कक्ष में चारों ओर हर्ष और संतोष की लहर दौड़ गई। कामिनी के माता-पिता के चेहरों पर अपनी संतान के सुरक्षित भविष्य को लेकर एक असीम सुकून था, तो वहीं अमर और पूजा एक नए मांगलिक रिश्ते के स्वागत की रूपरेखा बुन रहे थे। लेकिन इस पूरे उत्सवमयी वातावरण में जो सबसे भीषण और मौन सत्य था, वह यह था कि इस बनते हुए पवित्र रिश्ते से खुद कामिनी पूरी तरह बेखबर थी, और उसका हृदय किसी अन्य (विनीत) के नाम की माला जप रहा था।

 

 

अध्याय ४: ज़मीर और जज़्बात का टकराव

दृश्य १: एक अनपेक्षित वज्रपात

लिविंग रूम के सोफे पर बैठी कामिनी की नजरें दीवार पर टंगी घड़ी की सुइयों पर टिकी थीं। समय बीतने के साथ उसकी उत्सुकता और व्याकुलता बढ़ती जा रही थी। तभी मुख्य द्वार के खुलने की ध्वनि गूंजी। कामिनी सहसा अपनी जगह से उठ खड़ी हुई। उसके माता-पिता ने भवन के भीतर कदम रखा था, किंतु उनके मुखमंडल पर हमेशा जैसी सहजता नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी गंभीरता और भारीपन था।

हॉल की पीली बत्ती के मद्धम प्रकाश के नीचे दोनों बुजुर्ग आकर सोफे पर बैठ गए। कामिनी ने आगे बढ़कर मेज पर जल का पात्र रखा और मुस्कुराते हुए अपनी बात आरंभ करने ही वाली थी कि उसके पिता की भारी और अपरिवर्तनीय आवाज़ ने कमरे के सन्नाटे को बेरहमी से चीर दिया।

"कामिनी, बैठो। हमने तुम्हारी सुरक्षा और भविष्य को ध्यान में रखते हुए एक बहुत बड़ा और अंतिम निर्णय ले लिया है। तुम्हारी शादी हमने अमर सिंहानिया के साथ निश्चित कर दी है।"

पिता के मुख से निकले ये शब्द कामिनी के कानों में किसी भीषण वज्रपात की भांति गूंजे। वह एक पल के लिए पूरी तरह स्तब्ध, जड़ रह गई। उसके हाथ जहाँ के तहाँ हवा में थम गए और आँखों की पुतलियाँ फैल गईं। जो जांबाज लड़की दिन भर खूंखार अपराधियों से लोहा लेती थी, वह अपने ही अपनों के बीच इस प्रकार आकस्मिक रूप से घिर जाएगी, इसकी उसने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी।

उसने किसी प्रकार अपनी बिखरती हुई चेतना को संभाला और अविश्वास से उनकी ओर देखते हुए कांपते स्वर में कहा, "पिताजी? यह आप क्या कह रहे हैं? आप दोनों भली-भांति परिचित हैं कि मैं विनीत से कितना अगाध प्रेम करती हूँ। हम दोनों एक-दूसरे के स्वभाव को समझते हैं और हम परस्पर विवाह करने का दृढ़ निश्चय भी कर चुके हैं। फिर अचानक यह अमर सिंहानिया..."

दृश्य २: तर्कों की तलवार और आत्मसम्मान पर चोट

तभी कामिनी की माता ने उसकी बात को बीच में ही अत्यंत कठोरता से काट दिया। उनके लहजे में ममता की सुकोमल छाया के स्थान पर एक अजीब सी सांसारिक सख्ती और कड़वाहट आ चुकी थी, "विनीत? पुत्री, तुम उस युवक को समझती क्या हो? तनिक ठंडे मस्तिष्क से विचार करो, ना तो उसके पास कोई स्थाई व्यवसाय है, ना ही समाज में कोई सम्मानजनक वजूद। क्या तुम संपूर्ण जीवन अपनी पुलिस की वैधानिक कमाई पर एक पुरुष को पालोगी? क्या तुम्हारा स्वाभिमान यह सहन कर पाएगा कि तुम्हारा पति संपूर्ण जगत की दृष्टि में एक निकम्मा और अकर्मण्य मनुष्य कहलाए? क्या यही महत्वाकांक्षा है तुम्हारी अपने जीवन के लिए?"

माता के ये तीखे शब्द सीधे विनीत के पुरुषार्थ और कामिनी के पवित्र प्रेम पर एक अत्यंत विषैला आघात थे। कामिनी का रक्त खौल उठा, उसकी मुट्ठियां खिंच गईं, किंतु उसने अपने आक्रोश को पूरी तरह नियंत्रित करते हुए अत्यंत दृढ़ता और गरिमा से उत्तर दिया।

"मुझे इस बात से रत्ती भर भी अंतर नहीं पड़ता, माताजी! मैं जो यह खाकी वर्दी धारण करती हूँ, मुझमें इतनी सामर्थ्य है कि मैं संपूर्ण जीवन विनीत को अपनी आय पर ससम्मान खिलाने का दम रखती हूँ। मुझे उसके धन, उसकी पैतृक जायदाद या उसके किसी बड़े सामाजिक वजूद की कोई आवश्यकता नहीं है। मुझे केवल और केवल उसका वह निश्छल साथ चाहिए, जो उसने मेरी हर विपत्ति में मुझे दिया है।"

"यह सब केवल भावनाओं का क्षणिक नशा है, कामिनी!" पिता ने सोफे की हत्थी पर अपना हाथ जोर से मारते हुए थोड़े ऊंचे और अनुशासनप्रिय स्वर में कहा, "यथार्थ की जिंदगी कभी इन खोखले जज़्बातों के सहारे नहीं चलती। समाज में सम्मानपूर्वक जीने के लिए प्रतिष्ठा, हैसियत और शक्ति की परम आवश्यकता होती है। लोग क्या कहेंगे? जब यौवन का समय बीत जाएगा और प्रेम का यह ज्वर उतरेगा, तब तुम्हें अपनी इस भयंकर भूल का अहसास होगा। एक पुरुष का अपनी पत्नी की आय पर आश्रित रहना, उसकी स्वयं की मर्दानगी और कुल की मर्यादा—दोनों को धूल में मिला देगा। यह क्रूर संसार ऐसे बिना वजूद वाले पुरुष को कभी सम्मान नहीं देता, और ना ही उसके पीछे खड़ी स्त्री को कोई आदर मिलता है।"

दृश्य ३: आंसुओं की बेबसी

पिता के इन अत्यंत निष्ठुर और व्यावहारिक शब्दों ने कामिनी के कोमल हृदय को भीतर तक छलनी कर दिया था। उसकी आँखों में स्वाभिमान के आंसू तैर आए, परंतु उसकी वाणी में एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी की कड़क के साथ-साथ एक बेबस, लाचार पुत्री का कारुणिक दर्द भी साफ महसूस हो रहा था।

उसने अपने पिता के सम्मुख दोनों हाथ जोड़ते हुए अत्यंत विनीत भाव से कहा, "पिताजी, आप मेरी आत्मा की प्रसन्नता को समझने का प्रयास क्यों नहीं कर रहे? विनीत एक अत्यंत ईमानदार, संवेदनशील और सच्चा मनुष्य है। वह मुझे वह मानसिक शांति और आत्मिक संतोष दे सकता है, जो अमर सिंहानिया का करोड़ों का व्यावसायिक साम्राज्य अपनी संपूर्ण संपदा से भी कभी नहीं खरीद पाएगा। विवाह केवल दो समान हैसियत वालों का कोई भौतिक मेल नहीं होता पिताजी, यह दो पवित्र आत्माओं का शाश्वत बंधन है।"

किंतु पिता के पाषाण जैसे मुखमंडल पर कामिनी के इन बहते आंसुओं का कोई प्रभाव परिलक्षित नहीं हुआ। उनका सांसारिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण उनके सामाजिक मान-सम्मान की ऊंची दीवार के पीछे पूरी तरह छिप चुका था। उन्होंने सोफे से खड़े होते हुए अपने अंतिम, अचूक और कठोर शब्दों में कहा।

"हमने जो वचन अमर और पूजा को दे दिया है, वह सर्वथा अटल है। हम अपने जीते-जी अपनी ही एकमात्र संतान को एक मामूली, साधनहीन मनुष्य के पीछे अपना जीवन नष्ट करते हुए नहीं देख सकते। इस भवन में केवल वही संपन्न होगा जो हमने और तुम्हारी नियति ने निश्चित किया है।"

यह कहकर वे दोनों अत्यंत कठोरता से अपने कक्ष की ओर चले गए, और उस विशाल लिविंग रूम के मद्धम अंधेरे कोने में कामिनी सर्वथा अकेली, हतप्रभ खड़ी रह गई। उसकी सूनी आँखों से निरंतर बह रहे आंसू उसकी बेबसी की एक मूक गाथा लिख रहे थे, और वह यह समझने में पूरी तरह असमर्थ थी कि जिस देश के कानून और न्याय की रक्षा वह समाज में पूरी निष्ठा से करती है, वही न्याय आज उसके अपने ही घर की चौखट के भीतर इस तरह बेअसर और पंगु कैसे हो गया।

 

 

अध्याय ५: प्रतिशोध की बिसात

दृश्य १: शहनाइयों का शोर और बिखरता हुआ हृदय

कामिनी ने विनीत के प्रति अपनी निष्ठा और प्रेम को बचाने के लिए अंत समय तक अथक संघर्ष किया था। उसने माता-पिता के सम्मुख अन्न-जल का त्याग कर दिया, यहाँ तक कि विनीत के साथ सुदूर भाग जाने की गुप्त योजना भी बनाई। परंतु विनीत और विनीता की वह साधारण, साधनहीन दुनिया अमर सिंहानिया के अगाध रसूख और उसके पिता की हठधर्मी सामाजिक प्रतिष्ठा के सम्मुख अत्यंत बौनी साबित हुई। अंततः, पिता ने कुल की साख, अपनी खाकी वर्दी की मर्यादा और अपने प्राणों की दुहाई देकर, कामिनी को भावनात्मक रूप से असहाय और विवश कर दिया। अपनी ही माता के आंसुओं के चक्रव्यूह में बंधी वह जांबाज पुलिस अधिकारी, कर्तव्य और सामाजिक लोकलाज की बेड़ियों में जकड़कर मंडप तक पहुँचने के लिए बाध्य हो गई।

और आज, वही दुर्भाग्यशाली रात्रि थी...

उस रात संपूर्ण नगर चकाचौंध और कृत्रिम रोशनियों से नहाया हुआ था। शहर के सबसे प्रतिष्ठित व्यापारिक सम्राट अमर सिंहानिया और जांबाज पुलिस अधिकारी कामिनी के विवाह का उत्सव किसी राष्ट्रीय पर्व की भांति मनाया जा रहा था। ढोल-नगाड़ों की गूंजती थाप, शहनाइयों के सुरीले परंतु कामिनी के लिए कानफोड़ू स्वर और संभ्रांत अतिथियों के अट्टहास की आवाजें गगन को भेद रही थीं।

किंतु उसी वैभवशाली नगर के एक मद्धम, संकीर्ण कोने में स्थित एक छोटे से कक्ष का वातावरण किसी श्मशान की भांति नीरव, खामोश और भारी था।

कांच की खिड़की से बाहर आकाश में चमकती आतिशबाज़ी की रंग-बिरंगी रोशनी जब विनीत के कक्ष की सूनी दीवारों पर प्रतिच्छेदित हो रही थी, तो उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कोई उसके जीवित हृदय पर दहकते हुए अंगारे रख रहा हो। कामिनी अब सदा के लिए किसी अन्य पुरुष की अर्धांगिनी बन चुकी थी—विवाह का यह भीषण और निष्ठुर सत्य विनीत के अंतर्मन को तिनका-तिनका छलनी कर रहा था। इसी असहनीय मानसिक संताप, ग्लानि और लाचारी के वशीभूत होकर विनीत ने अपने इस निरर्थक जीवन की इहलीला को सदैव के लिए समाप्त करने का आत्मघाती प्रयास किया था। किंतु नियति को कुछ और ही स्वीकार था; ऐन वक्त पर उसकी सहोदर बहन विनीता वहाँ पहुँच गई और उसने अपने भाई को काल के क्रूर मुख से खींच निकाला।

इस क्षण कक्ष के फर्श पर कांच के टूटे हुए अनगिनत टुकड़े बिखरे पड़े थे, जिन पर विनीत के रक्त की कुछ बूंदें जमी थीं। विनीत दीवार के सहारे फर्श पर बैठा थर-थर कांप रहा था। उसकी आँखें रुदन के कारण सूज चुकी थीं, बाल बिखर गए थे और उसका पूरा अस्तित्व भीतर से टूटकर बिखर चुका था।

विनीत ने निरंतर बहते आंसुओं के बीच, अपनी कांपती हुई क्षीण आवाज़ में विनीता की ओर देखा और कहा, "क्यों बचाया मुझे, विनीता? जब मेरे जीवन का एकमात्र आधार, मेरी जीने की एकमात्र वजह ही मुझसे क्रूरतापूर्वक छीन ली गई... उस चमचमाते मंडप में जब मेरी संपूर्ण खुशियों की बलि चढ़ा दी गई, तो इन चलती हुई मृत सांसों का क्या औचित्य है? कामिनी अब अमर सिंहानिया की पत्नी बन चुकी है... मैं उसे किसी और की परछाई में नहीं देख सकता! मैं इस अंतहीन पीड़ा के साथ और नहीं जी पाऊंगा विनीता, मुझे मर जाने देती..."

दृश्य २: प्रतिशोध का नया अवतार

विनीता, जो अब तक केवल एक साधारण, निश्चल और हंसमुख लड़की थी, इस सामाजिक अन्याय और अपने भाई के इस भयानक बिखराव ने उसके भीतर के संपूर्ण सुकोमल जज़्बातों को एक झटके में पाषाण (पत्थर) बना दिया था। अपने एकमात्र भाई का यह कारुणिक संताप, उसकी यह मृतप्राय स्थिति, विनीता के जीवन के किसी भी नैतिक मूल्य और आदर्श से बहुत ऊपर उठ चुकी थी। उसकी आँखों से दुर्बलता के आंसुओं का बहना अब सर्वथा बंद हो चुका था, और उनके स्थान पर एक खौफनाक, ठंडे और हिंसक निश्चय ने ले ली थी।

वह घुटनों के बल उसी कांच बिखरे फर्श पर बैठ गई और उसने विनीत का अश्रुपूर्ण चेहरा अपने दोनों हाथों की अंजलि में लेते हुए, उसकी शून्य आँखों में सीधे झांका।

"मौन हो जाओ, विनीत!" विनीता की वाणी में एक अभूतपूर्व कड़वाहट, भारीपन और कड़ापन था, "अपनी आत्म-आहुति से तुम्हें तो कदाचित इस असहनीय वेदना से मुक्ति मिल जाएगी, किंतु कामिनी कभी वापस नहीं लौटेगी। और मैं, विनीता, यह कदापि घटित नहीं होने दूंगी कि तुम यहाँ इस सीलन भरे अंधेरे कमरे में घुट-घुट कर तड़पो और वे लोग अपने धन-वैभव के ऊंचे महलों में इस विवशता की शादी का उत्सव मनाएं।"

"वह अब हमारी दुनिया का हिस्सा नहीं रही, विनीता," विनीत ने सिसकते हुए अपना मस्तक घुटनों में छिपा लिया, "अमर सिंहानिया... उस परम शक्तिशाली व्यापारिक सम्राट ने अपने अकूत धन, सत्ता और हमारी इस विवश लाचारी के बल पर सब कुछ हस्तगत कर लिया। हमारे पास उस महाबली से प्रतिशोध लेने की कोई शक्ति नहीं है।"

दृश्य ३: विनाश की शह और मात

विनीता थोड़ा और आगे की ओर झुकी। उसने विनीत के कान के समीप जाकर अपनी आवाज़ को अत्यंत धीमा, परंतु विषैला और अचूक करते हुए कहा, "अमर सिंहानिया ने केवल एक बलपूर्वक थोपा गया सामाजिक संबंध जीता है विनीत, किंतु उस अहंकारी को इस बात का भान तक नहीं है कि इस विवाह के बहाने उसने अपने ही अभेद्य दुर्ग में एक ऐसी खूंखार शत्रु को आमंत्रण दे दिया है, जिसे वह इस क्षण पहचानता भी नहीं। कामिनी को तुम्हारे पास वापस लौटना ही होगा, और वह अवश्य आएगी।"

विनीत ने सहसा चौंककर अपनी गीली, विस्मय से भरी आँखें उठाईं। विनीता की आँखों में धधक रही प्रतिशोध की उस ठंडी ज्वाला को देखकर वह अंतरात्मा तक कांप गया।

विनीता ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, "मैं अब समय की बिसात पर एक ऐसा खेल आरंभ करने जा रही हूँ, जिससे अमर सिंहानिया का यह करोड़ों का व्यापारिक साम्राज्य, उसकी यह झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा और उसका यह अगाध घमंड—सब धुएं की भांति हवा में विलीन हो जाएगा। जब उसकी यह स्वनिर्मित आलीशान दुनिया ताश के पत्तों की भांति ढहकर मलबे में तब्दील होगी और वह विवश होकर मार्ग पर आएगा, तब कामिनी उस तबाही के मलबे से निकलकर स्वतः तुम्हारे पास वापस दौड़ी चली आएगी।"

"विनीता... तुम... तुम यह किस भयंकर विनाश की बात कर रही हो? तुम किस गुप्त खेल का उल्लेख कर रही हो?" विनीत ने भयभीत होते हुए पूछा।

"तुम केवल स्वयं को संभालो भाई," विनीता ने एक क्रूर, शांत मुस्कान के साथ उसके अंतिम आंसू को पोंछते हुए कहा, "अपने इस मानसिक संताप और इन आंसुओं को अपनी दुर्बलता नहीं, बल्कि अपना सबसे अचूक अस्त्र बनाओ। कामिनी केवल और केवल हमारी है, और मैं उसे सर्वस्व दांव पर लगाकर भी वापस लाकर रहूंगी। आज के इस ऐतिहासिक मोड़ से हमारे जीवन की प्रत्येक श्वास का केवल एक ही अंतिम ध्येय है—अमर सिंहानिया की संपूर्ण बर्बादी और हमारी अंतिम विजय। अभी तनिक धैर्य रखो भाई... उचित समय आने पर मैं इस बिसात पर अपनी पहली चाल चलूंगी, और उस चाल की खौफनाक गूंज यह संपूर्ण नगर सुनेगा।"

कक्ष की उस धुंधली, मद्धम रोशनी में विनीता का वह शांत मुखमंडल किसी प्रतिशोध की संहारक देवी की भांति प्रतीत हो रहा था, जो अपने भाई के लुटे हुए अधिकारों के लिए संसार की किसी भी सीमा को लांघने के लिए पूरी तरह तत्पर थी।

 

 

अध्याय ६: एक कमरा, मीलों की दूरी

दृश्य १: रेशमी परदे और बर्फीला सन्नाटा

रात्रि के बारह बज चुके थे। बाहर अनंत आकाश में घने काले बादलों का कठोर पहरा था और रह-रहकर चलने वाली बर्फीली, ठंडी हवाएं उस आलीशान शयनकक्ष (बेडरूम) की कांच की विशाल खिड़कियों से टकराकर एक सिहरन पैदा कर रही थीं। कक्ष के भीतर का दृश्य किसी राजसी प्रासाद (महल) की भांति अत्यंत वैभवशाली था—मखमली गाढ़े कालीन, कीमती सागौन की लकड़ी से निर्मित सोफे और दीवारों पर सुसज्जित कलात्मक पेंटिंग्स।

किंतु इस अकूत भव्यता के पीछे एक ऐसा दमघोंटू, नीरव सन्नाटा पसरा हुआ था, जो किसी भी जीवित चेतना का दम घोंटने के लिए पर्याप्त था। चारों ओर फैली हल्की पीली रोशनी इस खामोशी को और अधिक रहस्यमयी तथा बोझिल बना रही थी।

कामिनी शय्या (बेड) के सुदूर कोने पर अपने घुटनों को समेटे, शून्य मुद्रा में बैठी थी। उसकी मूक नजरें कांच की खिड़की से बाहर नगर की टिमटिमाती कृत्रिम रोशनियों पर टिकी थीं, परंतु उसका मानस पटल कहीं और ही भटक रहा था। वह इस आलीशान, सुख-सुविधाओं से पूर्ण कमरे में स्वयं को एक अभागे कैदी की भांति अनुभव कर रही थी। उसका हृदय रह-रहकर विनीत के उन आंसुओं, उसकी उस कारुणिक बेबसी और रुदन को स्मरण कर रहा था, जिसे वह विवशता के मंडप में पीछे छोड़ आई थी।

कक्ष के दूसरे छोर पर, एक एकांत काउच पर अमर आसीन था। उसके सम्मुख रखी मेज पर व्यापारिक साम्राज्य की कुछ अत्यंत आवश्यक और गोपनीय फाइलें खुली हुई थीं। वह अपनी उंगलियों से उन पन्नों को उलट-पुलट तो रहा था, परंतु उसका संपूर्ण ध्यान और अंतर्मन लगातार शय्या की ओर ही केंद्रित था। वह बाह्य संसार के लिए भले ही एक निर्मम, कठोर और अकाट्य निर्णय लेने वाला बिजनेस टाइकून हो सकता था, परंतु इस बंद कमरे की मर्यादा के भीतर वह केवल एक ऐसा संवेदनशील पति था, जो अपनी नवविवाहिता पत्नी के बिखरे हुए जज्बातों और आहत हृदय को समेटने का धैर्यपूर्वक इंतजार कर रहा था।

दृश्य २: शब्दों की मद्धम चोट

अमर ने एक गहरी, विचारमग्न सांस ली, अपना चश्मा उतारकर मेज पर प्रतिस्थापित किया और उन व्यावसायिक फाइलों को बंद कर दिया। उस मूक सन्नाटे में फाइलों के बंद होने की वह मद्धम ध्वनि भी किसी तीखे स्वर की भांति गूंज उठी। अमर ने अपनी वाणी को जितना संभव हो सके, उतना धीमा, कोमल और नर्म रखते हुए कहा—

"कामिनी... तुम अत्यधिक क्लांत (थकी हुई) प्रतीत हो रही हो। दिनभर का राजकीय कर्तव्य (पुलिस ड्यूटी) और तत्पश्चात यह सब मानसिक उथल-पुथल... यदि तुम्हारी अनुमति हो, तो क्या मैं इस प्रकाश को बंद कर दूँ? तुम्हें विश्राम करने में थोड़ी सुगमता होगी।"

कामिनी के जड़ शरीर में एक हल्की सी हरकत हुई, किंतु उसने अमर की ओर मुड़कर देखना भी स्वीकार नहीं किया। उसका लहजा पूरी तरह से बर्फीला, उदासीन और रूखा था, "तुम्हें मेरी चिंता में व्यर्थ समय नष्ट करने की कोई आवश्यकता नहीं है, अमर। मैं पूर्णतः स्वस्थ हूँ। और मुझे किस क्षण निद्रा की गोद में जाना है, यह निर्णय मैं स्वयं कर सकती हूँ।"

कामिनी की वाणी में व्याप्त उस ठंडी कड़वाहट ने अमर के हृदय को कहीं भीतर तक आहत किया, किंतु उसके सौम्य मुखमंडल पर क्रोध का एक भी भाव उदित नहीं हुआ। उसने अपनी जगह से उठकर, कक्ष की उस मद्धम रोशनी में कामिनी की पीठ को देखा। कामिनी के जेहन में इस क्षण अमर के महलों की चकाचौंध नहीं, बल्कि विनीत का वह रोता हुआ निष्पाप चेहरा घूम रहा था, जिसके आत्मसम्मान की बलि इस विवाह की वेदी पर चढ़ा दी गई थी। अमर के भीतर भी एक गहरा दर्द था, जिसे वह अपनी शालीनता के पीछे छिपाने का निरंतर प्रयास कर रहा था।

"मैं भली-भांति परिचित हूँ, कामिनी..." अमर ने कुछ पग आगे बढ़ाते हुए अत्यंत आत्मीय स्वर में कहा, "मैं जानता हूँ कि यह संबंध, यह विवाह... तुम्हारे लिए उतना सरल और सहज नहीं है, जितना इस बाहरी संसार को दृष्टिगोचर हो रहा है। तुम पर यह निर्णय परिस्थितियों वश थोपा गया है, मैं इस अप्रिय सत्य से पूर्णतः वाकिफ हूँ। तुम्हें इस नए वातावरण और मुझे अपनाने के लिए समय की आवश्यकता है, और मैं तुम्हें वह संपूर्ण समय देने के लिए सहर्ष तैयार हूँ। जब तक तुम स्वयं को मानसिक और आत्मिक रूप से इस विवाह के लिए तत्पर नहीं पातीं, मैं तुम पर अपनी इच्छा का कोई दबाव नहीं डालूंगा। तुम्हारी प्रसन्नता, तुम्हारी इच्छा और तुम्हारा स्त्रीत्व का सम्मान मेरे लिए इस संसार की प्रत्येक वस्तु से सर्वोपरि है।"

दृश्य ३: अंधेरे का फासला

अमर के मुख से संस्कारों और शालीनता की इतनी बड़ी-बड़ी बातें सुनकर कामिनी के भीतर दबा लावा सहसा उबल पड़ा। उसने एक झटके से अपना मस्तक घुमाया और अपनी सुर्ख लाल, अश्रुपूर्ण आँखों से अमर की ओर देखा। उसकी तीखी आँखों में अपनी लाचारी का तीव्र संताप भी था और अपनी किस्मत को लेकर एक जलता हुआ आक्रोश भी।

"तुम्हारे इस तथाकथित बड़प्पन और इस बनावटी शराफत का मुझ पर रत्ती भर भी प्रभाव नहीं होने वाला, अमर!" कामिनी की आवाज में विषैली कड़वाहट घुली थी, "तुम्हारे इस अनंत धीरज से मेरा कोई भी निर्णय बदलने वाला नहीं है। तुम चाहे जितना भी धैर्य धारण कर लो, मेरे हृदय की भूमि पर तुम्हारे लिए कभी कोई स्थान निर्मित नहीं हो पाएगा। मेरे लिए तुम आज भी, और सदैव केवल एक ऐसे पुरुष रहोगे, जिससे मेरा यह परिणय संबंध मेरी आत्मा की मर्जी के विरुद्ध, बलपूर्वक करवाया गया है। इस शाश्वत सत्य को तुम्हारा कोई भी उत्तम व्यवहार कभी परिवर्तित नहीं कर सकता।"

कामिनी के इस अत्यंत तीखे और निष्ठुर आघात को सुनकर अमर के चेहरे पर एक क्षण के लिए उदासी की गहरी, काली रेखाएं उभर आईं। उसकी आँखें मूंद गईं, किंतु उसने तुरंत स्वयं को संभाल लिया। उसके अधरों पर एक बहुत ही क्षीण, परंतु पीड़ा से भरी एक मूक मुस्कान तैर गई।

उसने अत्यंत शांत और गंभीर लहजे में कहा, "मैं जानता हूँ कामिनी... मैं यह सब बहुत अच्छी तरह समझता हूँ। किंतु फिर भी, मैं प्रतीक्षा करूँगा। आज नहीं तो कल, जीवन तुम्हें कभी ना कभी यह अहसास अवश्य कराएगा कि मैं तुम्हारी नियति में क्या स्थान रखता हूँ। और जब तक वह स्वर्णिम दिन उदित नहीं होता... हम दोनों अपनी-अपनी इस पृथक दुनिया में पूरी तरह सुरक्षित हैं। मैं तुम्हारी सीमाओं का सदैव आदर करूँगा।"

अमर ने बिना कोई और तर्क या दलील दिए, दीवार पर लगे विद्युत स्विच की ओर अपना हाथ बढ़ाया। एक 'टिक' की यांत्रिक ध्वनि के साथ कक्ष की वह अंतिम मद्धम पीली बत्ती भी बुझ गई। संपूर्ण शयनकक्ष एक गहरे, घने और अभेद्य अंधेरे के आगोश में डूब गया।

अब उस विशाल कक्ष में केवल दो मनुष्यों की सांसों की भारी आवाजें प्रतिध्वनित हो रही थीं। वे दोनों एक ही छत के नीचे, एक ही शयनकक्ष में उपस्थित थे, परंतु उस घने अंधकार में उनके मध्य की दूरी किसी अनंत महासागर से भी अधिक चौड़ी और दुर्गम हो चुकी थी। बाहर हवा का एक अत्यंत तीव्र, खौफनाक झोंका पुनः खिड़की के कांच से टकराया, मानो वह आने वाले किसी भयंकर विनाशकारी तूफान का स्पष्ट संकेत दे रहा हो।

 

 

अध्याय ७: साज़िश का आगाज़

दृश्य १: थानों का सन्नाटा और खौफ की दस्तक

परिणय संस्कार को संपन्न हुए कुछ ही दिन व्यतीत हुए थे। बाह्य संसार की दृष्टि में सब कुछ अत्यंत सामान्य, शांत और सुचारू रूप से चल रहा था। अमर सिंहानिया के उस आलीशान, गगनचुंबी प्रासाद से जब भी कामिनी अपनी राजकीय पुलिस की गाड़ी में सायरन बजाती हुई निकलती, तो मार्ग पर चलते लोग यही अनुमान लगाते कि नगर की सबसे कड़क अधिकारी की निजी ज़िंदगी में सब कुछ मुकम्मल और सुखद है।

किंतु उस बंद शयनकक्ष (बेडरूम) के भीतर, कामिनी और अमर के मध्य की खामोश, बर्फीली दीवार आज भी वैसी ही अडिग खड़ी थी। कामिनी के हृदय और मस्तिष्क में अमर के लिए रत्ती भर भी स्थान निर्मित नहीं हो पाया था; उसका अंतर्मन आज भी अतीत की उन्हीं संकीर्ण गलियों में भटक रहा था जहाँ विनीत का वास था।

एक दोपहर, जब आसमान से सूर्यदेव साक्षात आग बरसा रहे थे और आरक्षी केंद्र (पुलिस स्टेशन) के भीतर लगे पुराने पंखे की निरंतर होती घरघराहट के अतिरिक्त एक अजीब सी सुस्ती और नीरसता छाई हुई थी, अचानक थाने का भारी मुख्य द्वार एक झटके से खुला।

विनीत भागते हुए पुलिस स्टेशन के भीतर प्रविष्ट हुआ। उसके चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ा हुआ था, वस्त्र अस्त-व्यस्त थे और माथे पर पसीने की अनगिनत बूंदें चमक रही थीं। वह बुरी तरह हांफता हुआ, बिना किसी की परवाह किए सीधे कामिनी के केबिन का द्वार धकेल कर भीतर घुस गया। वह बाह्य रूप से अत्यंत डरा, सहमा और व्याकुल दिखाई दे रहा था।

कामिनी ने चौंककर अपनी शासकीय फाइल से नजरें उठाईं। अपने सम्मुख विनीत को इस दयनीय अवस्था में देखकर वह सहसा अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुई।

"विनीत? क्या हुआ? तुम इस अवस्था में..."

"कामिनी... विनीता...!" विनीत ने कांपती हुई विवश आवाज में कामिनी का हाथ थाम लिया। उसकी उंगलियाँ बर्फ की भांति ठंडी पड़ चुकी थीं। "विनीता का कहीं कोई संधान (पता) नहीं चल रहा है कामिनी! कल रात्रि से उसका फोन बंद है, वह घर भी नहीं लौटी। मैंने संभावित हर स्थान पर उसे खोज लिया... मुझे... मुझे बहुत भय लग रहा है कामिनी, कहीं उसके साथ किसी ने कोई अनहोनी तो नहीं कर दी?"

विनीत के मुख से यह वज्रपात सुनते ही कामिनी के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह कुछ क्षणों के लिए पूरी तरह सुन्न, चेतनाहीन रह गई। विनीता केवल विनीत की बहन नहीं थी, वह कामिनी की सबसे प्रिय सहेली, उसकी सबसे अजीज दोस्त थी। एक पल के लिए कामिनी के भीतर की मित्र कांप उठी, लेकिन अगले ही पल उसकी खाकी वर्दी का राजकीय कर्तव्य जाग गया। उसने तुरंत अपने अधीनस्थ स्टाफ को चिल्लाकर आदेश दिया और पूरे शहर के वायरलेस सिस्टम को अलर्ट पर डाल दिया।

कामिनी इस बात से सर्वथा अनभिज्ञ थी कि विनीत की आँखों में जो यह घबराहट और आँसू थे, वह दरअसल विनीता द्वारा रची गई उस खौफनाक विनाशलीला की पहली पटकथा का हिस्सा थे। विनीत कामिनी के सम्मुख एक लाचार, टूटे हुए भाई का ऐसा अचूक और जीवंत अभिनय कर रहा था कि शहर की सबसे शातिर पुलिस अधिकारी भी उसके भीतर छिपे कपट को भांपने में पूरी तरह असमर्थ रही।

दृश्य २: जंगल का भयानक सच

एक पूरा दिन और पूरी रात का समय बीत चुका था। कामिनी ने बिना अपनी पलकें झपकाए, अपनी भूख-प्यास को विस्मृत करके पूरे नगर का कोना-कोना छान मारा था। सर्च ऑपरेशन की गाड़ियां सायरन की चीख के साथ शहर की भौगोलिक सरहदों को पार कर चुकी थीं। आखिरकार, अगले दिन दोपहर ढलते वक्त, शहर के बाहरी छोर पर स्थित एक बेहद घने, वीरान और सुनसान जंगल से पुलिस की एक खोजी टीम का गुप्त संदेश वायरलेस पर गूंजा।

कामिनी अपनी सरकारी जीप को चीखते हुए टायरों के साथ उस घने जंगल के कच्चे, उबड़-खाबड़ रास्ते पर ले गई। चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे, शताब्दियों पुराने दरख्त (पेड़) खड़े थे और सूर्य की किरणें भी उस घने साये को भेदकर जमीन तक नहीं पहुंच पा रही थीं। वहां का वातावरण अजीब सी घुटन, सड़ी हुई पत्तियों की गंध और एक डरावने, हिंसक सन्नाटे से भरा हुआ था।

झाड़ियों के पीछे, सूखी, कटीली पत्तियों के ढेर पर विनीता अचेत अवस्था में पड़ी हुई थी। उसकी वह दशा देखकर कामिनी के कलेजे पर जैसे किसी ने धारदार आरी चला दी हो। विनीता के वस्त्र फटे हुए थे, उसके चेहरे, गले और कोमल हाथों पर खरोंचों और नीले निशान उभरे हुए थे। प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी क्रूर दरिंदे ने उसके साथ बेहद घिनौना, अमानवीय कृत्य किया हो और उसे तड़प-तड़प कर मरने के लिए इस वीरान, भयानक जंगल में बेसहारा छोड़ दिया हो।

विनीता को इस बेसुध और खौफनाक हालत में देखकर कामिनी की आँखें गुस्से और प्रतिशोध के दर्द से पूरी तरह सुर्ख लाल हो गईं। उसका पूरा बदन थर-थर कांपने लगा। एक पल के लिए कानून की निर्धारित सीमाएं उसके मस्तिष्क में धुंधली होने लगीं और उसके भीतर की कड़क पुलिस ऑफिसर एक खूंखार, हिंसक रूप लेने लगी। उसने तुरंत अपनी टीम को चिल्लाकर एम्बुलेंस बुलाने का हुक्म दिया और स्वयं विनीता को अपनी बाहों में उठाकर जीप की तरफ पागलों की भांति दौड़ी।

दृश्य ३: अस्पताल की लॉबी और प्रतिज्ञा की आग

चिकित्सालय (अस्पताल) के सघन चिकित्सा कक्ष (ICU) के बाहर की विशाल लॉबी में सफेद, ठंडी दीवारों का सन्नाटा पसरा था और हवा में सैनिटाइज़र व दवाइयों की तीखी, कड़वी गंध तैर रही थी। ऑपरेशन थिएटर के ऊपर लगी लाल बत्ती निरंतर जल रही थी, जो इस बात का स्पष्ट संकेत थी कि भीतर विनीता की उखड़ती सांसों को बचाने की एक अंतिम जंग चल रही थी।

लॉबी की एक ठंडी दीवार से टिक कर विनीत खड़ा था। उसका रो-रोकर बुरा हाल था और वह अपनी सिसकियों को रोकने का असफल प्रयास कर रहा था। वह बाह्य रूप से पूरी तरह टूटा हुआ दिखाई दे रहा था। कामिनी भारी, थके हुए कदमों से उसके समीप पहुंची और उसके कांपते हुए कंधे पर अपना मजबूत, ढाढ़स बंधाता हाथ रखा।

विनीत ने कांपते हुए, बेहद दर्दभरी आवाज़ में कहा, "कामिनी... वो भयानक जंगल... वो कितनी तड़पी होगी? हमारी विनीता के साथ किसी ने इतना घिनौना कृत्य कैसे किया? मैं... मैं अपनी एकमात्र बहन की रक्षा नहीं कर सका कामिनी! मैं एक सर्वथा नाकाम और अभागा भाई हूँ।"

कामिनी की आँखों में इस क्षण दुःख से अधिक प्रतिशोध की एक ठंडी ज्वाला धधक रही थी, उसके जबड़े सख़्त हो चुके थे। उसने विनीत को दोनों कंधों से सख़्ती से पकड़ा और हिलाते हुए अत्यंत कड़े स्वर में कहा—

"मौन हो जाओ, विनीत! स्वयं को कोसना बंद करो। मैं इस शहर की कानून व्यवस्था की रक्षक हूँ, और विनीता मेरी आत्मा से जुड़ी सबसे प्रिय मित्र है। यह केवल कोई साधारण अपराध नहीं है विनीत... यह मुझ पर, मेरी खाकी वर्दी की साख पर एक सीधा निजी आघात है। मैं इस संपूर्ण साम्राज्य का हर वो स्याह कोना छान मारूंगी जहाँ से वे दरिंदे आए होंगे। जिस किसी ने भी विनीता के स्त्रीत्व को छूने की हिमाकत की है, वो अब यमराज से अपनी मौत की भीख मांगेगा।"

विनीत ने अपनी सूजी हुई आँखें उठाईं और हताशा का ढोंग करते हुए बोला, "कामिनी, मुझे भय है कि इस भयानक हादसे के पश्चात... शायद वो कभी पहले जैसी हँसती-खेलती विनीता ना रह पाए... वो अंतर्मन से मर चुकी होगी।"

"विनीता एक योद्धा है विनीत, वो मृत्यु को मात देकर वापस आएगी!" कामिनी की आवाज़ में एक चट्टान जैसी अटूट दृढ़ता थी। "और तुम्हें इस प्रकार कायरों की भांति टूटने की कोई आवश्यकता नहीं है। मुझ पर पूर्ण विश्वास रखो, मैं तुम्हें और विनीता को न्याय दिलवाऊंगी। आज के इस ऐतिहासिक क्षण से मेरी यह खाकी वर्दी, मेरी यह सर्विस पिस्तौल और मेरा कानून केवल एक ही मक़सद के लिए कार्य करेंगे—विनीता के गुनाहगारों को ढूंढकर उन्हें जीवित मलबे में मिलाने के लिए।"

अस्पताल की उस मद्धम रोशनी में कामिनी की आँखों में एक ऐसी क्रूर, हिंसक और अजीब सी चमक थी जो इतिहास में पहले कभी नहीं देखी गई थी। इस एक भयानक हादसे ने उसके और अमर के बीच की दूरियों को एक पल के लिए उसके दिमाग से पूरी तरह ओझल कर दिया था। अब उसका पूरा अस्तित्व केवल उस अदृश्य शत्रु की खोज में व्याकुल था।

लेकिन वह इस भयंकर और खौफनाक सत्य से बिल्कुल बेखबर थी कि आईसीयू के भीतर बेसुध पड़ी विनीता के इन जिस्मानी घावों और इस पूरी खौफनाक दास्तान के पीछे कोई बाहरी दरिंदा नहीं, बल्कि खुद विनीता का वो शातिर, शैतानी दिमाग था, जिसने अमर सिंहानिया के साम्राज्य को समूल नष्ट करने के लिए अपने ही शरीर को पहला मोहरा बनाकर समय की बिसात पर यह सबसे खतरनाक और पहली चाल चल दी थी।

 

 

अध्याय ८: जाल में फंसा शिकारी

दृश्य १: सफेद कमरा और झूठ का तमाशा

प्रातःकाल जब डॉक्टरों ने विनीता की स्थिति को खतरे से बाहर घोषित करके उसे सघन चिकित्सा कक्ष (ICU) से निजी वार्ड के कमरा नंबर १०४ में स्थानांतरित (शिफ्ट) किया, तब कामिनी कुछ समय के लिए पुलिस मुख्यालय की आवश्यक वैधानिक कागजी कार्रवाई और अधीनस्थ स्टाफ को दिशा-निर्देश देने हेतु चिकित्सालय से बाहर गई थी। विनीत ने इसी शून्य समय और सुनहरे अवसर का पूर्ण लाभ उठाया। उसने चिकित्सालय के मुख्य चिकित्सक (डॉक्टर) को एकांत में ले जाकर भारी-भरकम धनराशि की एक गुप्त थैली थमाई और साथ ही नगर के सबसे कुख्यात हत्यारों व अपराधियों के नामों का सहारा लेकर एक झूठा, नकली और खौफनाक भ्रम (Bluff) पैदा किया कि वे दुर्दांत अपराधी उसके एक इशारे पर किसी भी हद तक जा सकते हैं। अपने निर्दोष परिवार की सुरक्षा की चिंता और उस कृत्रिम जानलेवा डर के आगे डॉक्टर पूरी तरह घुटने टेकने पर विवश हो गए।

इस प्रकार, साज़िश का आधा जाल कामिनी की अनुपस्थिति में ही बुना जा चुका था।

अब उस प्राइवेट वार्ड के भीतर एक दमघोंटू सन्नाटा पसरा हुआ था। कमरे की कांच की खिड़की से छनकर आती संध्याकाल की ढलती हुई पीली धूप फर्श पर एक अजीब सी रहस्यमयी परछाई निर्मित कर रही थी। कमरे के भीतर केवल कार्डियक मॉनिटर की धीमी, निरंतर होती 'बीप-बीप' की आवाज़ और विनीता की कृत्रिम सिसकियों की गूंज सुनाई दे रही थी। बेड के समीप प्रतिस्थापित ड्रिप से पानी की बूंदें एक-एक कर टपक रही थीं, जो वातावरण के तनाव को और अधिक गहरा बना रही थीं।

बेड की साइड टेबल पर कुछ मेडिकल फाइल्स रखी थीं—ये वही रिपोर्ट्स थीं जिन्हें विनीत ने भय और धन के बल पर पूरी तरह बदलवा दिया था। इन जाली पन्नों पर विनीता के साथ हुई शारीरिक दरिंदगी का ऐसा काल्पनिक और खौफनाक सच अंकित किया गया था, जिसे पढ़कर कोई भी पाषाण हृदय मनुष्य रो पड़े। कामिनी इसी घने अंधकार में भटकी हुई थी; वह इन जाली कागज़ात को ही मुकम्मल और अंतिम सच मान चुकी थी।

विनीता बेड पर लेटी थी, उसकी आँखें रुदन के ढोंग के कारण लाल थीं और चेहरे पर शारीरिक कमजोरी का एक झूठा लेप चढ़ा हुआ था। कामिनी उसके सिरहाने बैठी अत्यंत व्याकुलता से उसका हाथ थामे हुए थी, और विनीत बेड के दूसरी तरफ खड़ा अपनी आँखों से कपट के आंसू पोंछने का अभिनय कर रहा था।

कामिनी के भीतर का आक्रोश अब बर्दाश्त की समस्त सीमाओं को लांघ चुका था। उसकी आँखों की तीव्र सुर्खी और तने हुए जबड़े स्पष्ट प्रमाणित कर रहे थे कि वह इस वक़्त एक अनुशासित पुलिस अधिकारी नहीं, बल्कि प्रतिशोध की आग में धधक रही एक सहेली थी। उसने विनीता के ठंडे हाथों को पूरी सख़्ती से जकड़ा और अत्यंत उग्र व कांपते स्वर में कहा—

"विनीता... धैर्य मत खोना। मेरी ओर देखो और मुझे केवल उस अधम दरिंदे का नाम बताओ। कौन है वो पशु? वह इस संपूर्ण नगर के किस कोने में छिपा बैठा है? मुझे नाम बताओ उसका... वह कल सुबह का उदित होता सूर्य नहीं देख पाएगा, यह इस कामिनी का तुमसे अंतिम और पत्थर की लकीर जैसा वादा है!"

दृश्य २: मुखौटा और घिनौना सच

विनीता ने अपनी कुटिल चतुरता से अपने मुखमंडल पर अगाध खौफ और लाचारी के भाव जागृत किए। उसने अपनी झूठी सिसकियों के वेग को थोड़ा और तीव्र किया और अपना मस्तक झटके से नकारात्मक मुद्रा में हिलाते हुए रुंधे कंठ से बोली, "नहीं कामिनी... मत जाओ उस खूंखार भेड़िए के पीछे! तुम नहीं जानती कि वह सत्ता और धन से कितना अधिक शक्तिशाली है... यदि तुम वहाँ गईं तो तुम्हारी अपनी राजकीय प्रतिष्ठा और जीवन सदा के लिए नष्ट हो जाएगा। मैं... मैं उसका नाम अपने इन अपवित्र अधरों पर नहीं ला सकती, मुझे क्षमा कर दो..."

"नाम बताओ, विनीता!" कामिनी ने इस बार और अधिक वज्र जैसी सख़्ती से उसका हाथ पकड़ते हुए उस शांत कमरे के सन्नाटे को चीर दिया। "चाहे वह कोई बाह्य शत्रु हो या मेरा कोई अत्यंत निकट का अपना, मैं किसी को भी जीवित नहीं छोड़ूंगी! एक असहाय, निर्दोष स्त्री के स्वाभिमान पर हाथ डालने का क्या हश्र होता है, मैं उसे अपने इसी हाथ से यमराज के दर्शन कराकर दिखाऊंगी। तुम केवल एक बार उसका नाम लो!"

विनीता ने एक क्षण के लिए शय्या के उस पार खड़े विनीत की ओर देखा, दोनों भाई-बहन की कुटिल नजरें परस्पर मिलीं और विनीता ने अत्यधिक कांपते हुए, भय का चरम नाटक करते हुए कहा—

"वो... वो दरिंदा और कोई नहीं कामिनी... तुम्हारा स्वयं का पति, इस संपूर्ण नगर का सबसे वैभवशाली और शक्तिशाली मनुष्य... अमर सिंहानिया है! उसी ने मेरी इस विवशता का अनुचित लाभ उठाया... उसी ने मेरे स्त्रीत्व के साथ खिलवाड़ किया और मुझे तड़पने के लिए उस वीरान, घने जंगल में फेंक दिया। उसने मुझे समाज में कहीं का नहीं छोड़ा कामिनी... कहीं का नहीं छोड़ा..."

दृश्य ३: मौत का संगीत और कामयाब बिसात

'अमर सिंहानिया'... यह नाम सुनते ही कामिनी को एक पल के लिए ऐसा भयंकर झटका लगा मानो उसके मस्तिष्क की नसें फट जाएंगी। वह अपनी जगह पर सर्वथा जड़, स्तब्ध रह गई। कमरे की वायु जैसे सहसा बर्फ की भांति जम गई। लेकिन कामिनी ने अंतरात्मा से कभी भी अमर को अपने पति का दर्जा नहीं दिया था; उसके हृदय में अमर के लिए केवल और केवल घृणा का वास था और उसका सच्चा प्रेम तो विनीत के चरणों में समर्पित था। विनीता का यह भीषण, झूठा इल्ज़ाम उस संचित घृणा के बारूद में एक दहकती चिंगारी की भांति लगा और कामिनी के भीतर का सुलगता गुस्सा एक विनाशकारी महा-अग्नि में परिवर्तित हो गया।

उसका मुखमंडल प्रचंड आक्रोश से तमतमा उठा और उसकी वाणी में एक अजीब सा, डरावना ठहराव आ गया—एक ऐसा खौफनाक ठहराव जिसमें साक्षात मृत्यु का अदृश्य संगीत छुपा हुआ था।

"अमर...?" कामिनी ने अपने दांतों को भींचते हुए चबाए हुए शब्दों में कहा, "वह अहंकारी समझता है कि उसका करोड़ों का व्यापारिक साम्राज्य, उसकी राजनीतिक सत्ता और उसका यह अकूत धन उसे कामिनी की सरकारी बंदूकों की गोलियों से सुरक्षित बचा लेगा? तो वह जीवन की सबसे बड़ी और अंतिम गलतफहमी में जी रहा है। उसने देश के कानून के हाथ नहीं, बल्कि कामिनी के जीवित हृदय पर आघात किया है। विनीता... तुम शांत हो जाओ। कल सुबह का उदित होता सूर्य अमर सिंहानिया के जीवन का अंतिम सूर्य सिद्ध होगा।"

कामिनी ने बिना एक पल भी नष्ट किए अपनी बेल्ट पर बंधी सर्विस पिस्तौल के होल्स्टर को स्पर्श किया, झटके से घूमी और भारी, धमक भरे कदमों से उस वार्ड का द्वार धकेलते हुए बाहर निकल गई। उसके बूटों की कड़क आवाज़ उस लंबी लॉबी में दूर तक प्रतिध्वनित होती रही।

जैसे ही वह भारी द्वार बंद हुआ और कामिनी के कदमों की थाप ओझल हुई, उस कमरे का संपूर्ण वातावरण एक झटके में पूरी तरह बदल गया। विनीता के मुखमंडल से पीड़ा, बेबसी और आंसुओं का वह मर्मस्पर्शी मुखौटा सेकंडों के भीतर गायब हो गया। वह बेड पर उठकर सीधे बैठ गई और उसकी सूनी आँखों में एक शातिर, क्रूर और विजयमयी चमक उभर आई। विनीत के चेहरे पर व्याप्त वह कृत्रिम भय भी हवा में विलीन हो चुका था।

दोनों भाई-बहन ने एक-दूसरे की ओर देखा और उनके अधरों पर एक अत्यंत गहरी, विषैली और कुटिल मुस्कान फैल गई। डॉक्टरों को डराकर और धन देकर बनाई गई वह जाली रिपोर्ट्स और स्वयं के जिस्म पर दिए गए वे घाव आखिरकार समय की बिसात पर अपना काम शत-प्रतिशत कर चुके थे।

विनीत ने आगे बढ़कर विनीता का हाथ थामा और बेहद मद्धम मगर परम संतुष्ट आवाज़ में बोला, "कामिनी बिल्कुल उसी विनाश के मार्ग पर अग्रसर हो चुकी है विनीता... जैसा हम दोनों ने मिलकर रूपरेखा तैयार की थी। उसका यह अंधा प्रेम और उसका यह प्रचंड क्रोध अब अमर सिंहानिया को समूल ले डूबेगा।"

विनीता ने अपनी आँखों की क्रूरता को और अधिक गहरा करते हुए धीरे से फुसफुसाया, "बिल्कुल भाई... यह महा-खेल अब पूर्णतः हमारे निर्देशों के अनुसार चल रहा है। अब उस अभिमानी अमर के संपूर्ण साम्राज्य और उसकी सांसों के मलबे में तब्दील होने का समय आ चुका है। शह और मात का अंतिम क्षण अत्यंत सन्निकट है।"

कमरे की खिड़की से आती सूर्य की वह अंतिम किरण अब पूरी तरह अस्त हो चुकी थी, और वहाँ एक गहरा, शातिर अंधकार पैर पसारने लगा था जो आने वाले खूनी और भयानक ड्रामे का मूक गवाह बनने के लिए पूरी तरह तत्पर था।

 

 

अध्याय ९: विनाश की डगर

दृश्य १: प्रतिशोध की काली रात

चिकित्सालय से लौटने के पश्चात, संपूर्ण रात्रि कामिनी 'अमर मेंशन' की उस विशाल, एकांत बालकनी में खड़ी अंधकार को निहारती रही। उसके भीतर एक भयंकर अंतर्द्वंद्व और वैचारिक युद्ध चल रहा था। वह देश के संविधान और कानून की रक्षक थी, किंतु इस क्षण उसकी आत्मा तड़प रही थी। उसने विचार किया कि अमर सिंहानिया एक अत्यंत रसूखदार व्यापारिक सम्राट है। यदि वह इस मामले को कानूनी रूप देना चाहे, तो अमर के अकूत धन के आगे न्याय व्यवस्था पंगु हो जाएगी। महंगे अधिवक्ता (वकील) और अदालत की लंबी, बिकाऊ प्रक्रिया में विनीता की अस्मत का बार-बार सरेआम तमाशा बनाया जाएगा, और अंततः अमर साक्ष्यों के अभाव में बरी हो जाएगा।

कामिनी के हाथों की मुट्ठियां सख़्त हो गईं। उसने आसमान की ओर देखते हुए दृढ़ निश्चय किया कि यह हमला केवल विनीता पर नहीं, बल्कि उसकी आत्मा और सहेली के अस्तित्व पर हुआ है। चूंकि यह विवाह उसकी मर्जी के विरुद्ध बलपूर्वक हुआ था, इसलिए वह इस अत्याचारी को पति मानकर कभी क्षमा नहीं कर सकती। उसने तय किया कि वह अमर को अदालती कटघरे में नहीं खड़ा करेगी, बल्कि स्वयं 'निजी न्याय' (Personal Justice) के मार्ग पर चलकर उसे उसी वीरान जंगल की खाक में मिला देगी।

अगली सुबह, अमर के कॉर्पोरेट ऑफिस का मुख्य केबिन हमेशा की तरह व्यावसायिक गतिविधियों में व्यस्त और आधुनिक रोशनी से जगमगा रहा था। कांच की विशाल मेज पर लैपटॉप और कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण बिज़नेस डील्स के कागज़ात फैले हुए थे। अमर अपनी कार्यकारी कुर्सी पर बैठा किसी गंभीर विचार में लीन था, तभी केबिन का भारी द्वार खुला और सम्मुख कामिनी खड़ी दृष्टिगोचर हुई। वह अपनी पूर्ण पुलिस वर्दी में थी, परंतु रात भर की उस खूनी आग को उसने अपने चेहरे पर एक अजीब सी शांत, कृत्रिम मुस्कान के पीछे छुपा लिया था। यह कत्ल से पहले का एक भयानक सन्नाटा था।

कामिनी ने कुछ पग आगे बढ़ाकर अत्यंत मद्धम और मधुर स्वर में कहा, "अमर... यदि तुम अपने इस व्यावसायिक कार्य से मुक्त हो, तो क्या हम कुछ समय के लिए बाहर चलें? हमारे परिणय को कई दिन व्यतीत हो चुके हैं, किंतु हमने साथ में कोई समय व्यतीत नहीं किया। चलिए, आज बाहर ही कहीं लंच करते हैं।"

यह सुनते ही अमर की प्रसन्नता की कोई सीमा न रही। उसका हृदय अप्रत्याशित वेग से धड़क उठा। विवाह के पश्चात से अब तक जिस बंद कमरे की बर्फीली खामोशी और उपेक्षा को वह सहन कर रहा था, उसे लगा कि आज कामिनी के हृदय की वह कठोर दीवार अंततः ढह गई है। उसने स्वप्न में भी यह कल्पना नहीं की थी कि कामिनी स्वयं चलकर उसके कार्यालय आएगी और उनके संबंध को मधुर बनाने के लिए पहला कदम बढ़ाएगी। उसकी साफ़ आँखों में एक अपूर्व चमक उभर आई। वह बिना एक क्षण भी गंवाए, अपनी समस्त फाइल्स और आवश्यक मीटिंग्स को उसी स्थान पर छोड़कर तुरंत खड़ा हो गया।

"हाँ कामिनी... बिल्कुल, चलो," अमर ने अपनी सहज और निश्चल मुस्कान के साथ कहा। उसके मन के किसी कोने में इस वक़्त अपने सुनहरे, सुखद भविष्य के सुंदर स्वप्न सज रहे थे। वह इस स्वर्णिम पल को पूरी तरह जीने के लिए व्याकुल था, जिसका उसने महीनों से बेसब्री से इंतज़ार किया था। वह इस सत्य से सर्वथा अनभिज्ञ था कि यह कोई प्रेम का निमंत्रण नहीं, बल्कि उसकी जीवनलीला की समाप्ति का मार्ग है। वह सीधे कामिनी के साथ उसकी राजकीय पुलिस जीप में जाकर बैठ गया।

दृश्य २: दोपहर का सन्नाटा और खौफनाक मोड़

कामिनी ने जीप के एक्सीलेटर पर दबाव बढ़ाया और वाहन की रफ़्तार तीव्र कर दी। शहर की व्यस्त, कोलाहल से भरी सड़कें धीरे-धीरे पीछे छूटती गईं और कंक्रीट के गगनचुंबी जंगलों के स्थान पर सुदूर फैले बड़े-बड़े, घने वृक्ष सम्मुख आने लगे। अमर जीप की कांच की खिड़की से बाहर प्राकृतिक दृश्यों को देखते हुए मन ही मन मुस्कुरा रहा था; उसे लग रहा था कि कामिनी उसे नगर के इस शोर-शराबे से दूर किसी शांत, एकांत और रमणीय स्थान पर भोजन के लिए ले जा रही है।

लेकिन जैसे ही जीप ने नगर की अंतिम भौगोलिक सरहदों को पार किया और उस अत्यंत घने, प्राचीन और सुनसान जंगल के कच्चे, उबड़-खाबड़ रास्ते पर मुड़ी, तो वातावरण अचानक भारी और भयानक होने लगा। दोपहर की प्रखर धूप अब वृक्षों की सघन, आपस में गुथी शाखाओं के बीच छनकर ज़मीन पर किसी धुंधली, खौफनाक परछाइयों की भांति गिर रही थी। चारों ओर एक ऐसा डरावना, हिंसक सन्नाटा पसरा था, जिसे केवल सूखी पत्तियों के सरसराने की सरसराहट और जीप के भारी टायरों की घर्षण ध्वनि ही भंग कर रही थी।

कामिनी ने एक ज़ोरदार, चीखते हुए झटके के साथ जीप के ब्रेक दबाए और वाहन को ठीक उसी स्थान पर रोक दिया, जहाँ एक दिन पूर्व विनीता अचेत और रक्तरंजित अवस्था में पाई गई थी। जीप का इंजन बंद होते ही जंगल की वह भारी, दमघोंटू खामोशी उन दोनों के मध्य आकर एक अभेद्य दीवार की भांति खड़ी हो गई।

अमर ने अत्यंत विस्मित और व्याकुल होकर चारों ओर के वीरान वातावरण को देखा। उसके मुखमंडल पर व्याप्त वह मासूम और खिली हुई मुस्कान धीरे-धीरे गायब होने लगी। वह असमंजस की स्थिति में जीप से नीचे उतरा और भारी स्वर में बोला, "कामिनी? यह... यह कौन सा स्थान है? हम तो किसी उत्तम रेस्टोरेंट में लंच के लिए निकले थे ना? तुम मुझे इस निर्जन, वीरान और सुनसान जंगल के भीतर क्यों ले आई हो? यहाँ तो दूर-दूर तक कोई Resturant या किसी मनुष्य की परछाई भी दृष्टिगोचर नहीं हो रही।"

दृश्य ३: हवा की चीख और मासूमियत का इम्तिहान

कामिनी का मुखमंडल इस वक़्त किसी पाषाण (पत्थर) की भांति सख़्त, भावहीन और बेजान था। उसकी आँखों में एक स्त्री सुलभ जज़्बात का नामोनिशान नहीं था। वह अत्यंत धीमे, नपे-तुले कदमों से जीप से नीचे उतरी; उसके भारी बूट्स के नीचे सूखी पत्तियों के कुचले जाने की चरमराहट उस सन्नाटे में गूंज उठी। वह घूमकर अमर के बिल्कुल समीप आकर खड़ी हो गई, जहाँ से अमर की सांसें उसके चेहरे को छू रही थीं।

अपनी अत्यंत बर्फीली, कांपती हुई और घृणा से ओतप्रोत आवाज़ में कामिनी ने कहा, "क्या तुम्हें यह रक्तरंजित भूमि स्मरण नहीं है, अमर? तनिक अपने मस्तिष्क पर बल दो और इस मिट्टी को... इस वीरान स्थान को ध्यान से देखो।"

अमर का संशय (Confusion) अब धीरे-धीरे एक अनजाने, गहरे भय में परिवर्तित होने लगा था। उसने अपनी अत्यंत साफ़, निष्पाप और सच्ची आँखों से कामिनी के तमतमाते चेहरे को देखा और कहा, "कामिनी, मुझे वास्तव में समझ नहीं आ रहा कि तुम किस विषय में बात कर रही हो और हम यहाँ क्यों उपस्थित हैं। मैं अपने संपूर्ण जीवन में प्रथम बार इस बीहड़ रास्ते पर आया हूँ। क्या बात है कामिनी? यह कौन सी जगह है? क्या तुम मुझसे कुछ छिपा रही हो?"

कामिनी एक पग और आगे बढ़ी, दोनों के मध्य का शारीरिक फ़ासला लगभग समाप्त हो गया। अमर उसकी आँखों की पुतलियों में सुलगती हुई प्रतिशोध की भयानक ज्वाला को स्पष्ट देख सकता था।

कामिनी ने अपने दांतों को भींचते हुए चबाए हुए शब्दों में कहा, "ध्यान से देखो अमर सिंहानिया, और सुनो! इस वीरान जंगल की वायु में एक मासूम, निर्दोष लड़की की चीखें आज भी दबी हुई हैं। उसे अपने इस पापी अंतर्मन से महसूस करने का प्रयास करो, अमर। क्या तुम्हें कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा? क्या इस स्थान को देखकर तुम्हारी आत्मा नहीं कांप रही?"

"चीख...? कैसी चीख और किसकी चीख?" अमर की आवाज़ में इस वक़्त घबराहट, विस्मय और उलझन का एक अजीब, कारुणिक मिश्रण था। "कामिनी, तुम अपनी इन रहस्यमयी बातों से मुझे भयभीत कर रही हो। कृपया साफ़-साफ़ शब्दों में बताओ कि माजरा क्या है? मैं... मैं कुछ भी समझ पाने में सर्वथा असमर्थ हूँ। क्या मुझसे कोई भयंकर भूल हुई है?"

अमर की आँखों में इस वक़्त सौ प्रतिशत सच्चाई, भोलापन और अनभिज्ञता (अंजानपन) स्पष्ट झलक रही थी। वह वास्तव में इस बात से सर्वथा बेखबर था कि उस पर स्त्रीत्व को कलंकित करने का कितना जघन्य आरोप लगने वाला है। लेकिन कामिनी के मस्तिष्क में इस वक़्त अस्पताल के उस बंद कमरे में सिसकती हुई विनीता का चेहरा और वे जाली मेडिकल रिपोर्ट्स निरंतर घूम रही थीं। विनीता द्वारा बोले गए उन विषैले, कड़वे शब्दों ने कामिनी की आँखों पर न्याय की ऐसी पट्टी बांध दी थी, जो उसे अमर के चेहरे पर लिखे इस साफ़, निष्पाप सच को देखने की अनुमति नहीं दे रही थी।

साज़िश का वह अदृश्य, खौफनाक जाल अब पूरी तरह से निर्दोष अमर के चारों ओर कस चुका था।

 

 

अध्याय १०: रक्त और प्रतिशोध की बलि

दृश्य १: अंधा प्रहार और लहूलुहान सत्य

दोपहर की वह सुलगती हुई प्रखर धूप अब जंगल के घने, प्राचीन वृक्षों के मध्य एक खूनी और डरावने सन्नाटे में तब्दील हो चुकी थी। कामिनी के भीतर दबा हुआ आक्रोश अब एक ऐसे विनाशकारी ज्वालामुखी की भांति फूटा, जिसने देश के कानून, खाकी वर्दी की मर्यादा और मानवीय संवेदनाओं की प्रत्येक सीमा को एक झटके में भस्म कर दिया। उसने बिना कोई चेतावनी दिए, बिना कोई अवसर दिए, अपनी संपूर्ण शारीरिक शक्ति से निर्दोष अमर पर जानलेवा प्रहार कर दिया।

"कामिनी! यह क्या... आह्!" अमर के मुख से प्रथम शब्द का आधा अंश निकलने से पूर्व ही कामिनी के भारी बूट की एक भीषण लात उसके पेट पर वज्र की भांति पड़ी।

अमर अप्रत्याशित वेग से पीछे की ओर गिरा, किंतु कामिनी रुकी नहीं। वह इस क्षण प्रतिशोध के एक भयानक पागलपन के वशीभूत हो चुकी थी। उसकी लातों और घूंसों की बेरहम, निष्ठुर बौछार अमर के मुखमंडल, सीने और पसलियों पर अनवरत होने लगी।

अमर पूरी तरह विस्मित, व्याकुल और बदहवास था। वह अपने चेतना शून्य होते मस्तिष्क से समझ ही नहीं पा रहा था कि उसकी अर्धांगिनी, जिससे वह निष्कपट और बेपनाह प्रेम करता था, जिसके साथ वह एक सुंदर जीवन की नई शुरुआत के स्वप्न देख रहा था, वह अचानक इस भांति वहशी और हिंसक पशु क्यों हो गई है। कुछ ही मिनटों के भीतर अमर का सुंदर मुखमंडल और शरीर लहूलुहान हो गया। उसकी श्वेत (सफेद) शर्ट पर रक्त के गहरे, लाल धब्बे चारों ओर फैल गए।

कामिनी ने पूरी क्रूरता से अमर के बिखरे हुए, रक्त से सने बालों को अपनी मुट्ठी में जकड़ा और उसे निर्दोष पशु की भांति घसीटते हुए एक विशाल, सदियों पुराने बरगद के पेड़ के तने के सहारे टिका दिया। अमर वहाँ मृतप्राय अवस्था में बैठ गया; उसकी सांसें उखड़ रही थीं और वह असहनीय शारीरिक पीड़ा से बुरी तरह कराह रहा था।

उसने अपनी सूजी हुई, रक्त से भरी आँखों से कामिनी की ओर देखा और अत्यंत क्षीण, कांपती हुई वाणी में कहा, "यह... यह तुम क्या कर रही हो कामिनी? तुम मुझसे प्रेम नहीं करतीं, मैं इस कड़वे सत्य से भली-भांति परिचित हूँ... किंतु यदि हमारी इस शादी से तुम्हें इतनी अगाध घृणा थी, तो मुझसे एक बार कह दिया होता... मैं तुम्हें स्वयं हंसते-हंसते इस बंधन से मुक्त कर देता, तलाक दे देता... परंतु मुझे इस भांति निर्जन वन में लाकर बेमौत मारने का क्या औचित्य था? मैंने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा?"

दृश्य २: घिनौना इल्ज़ाम और खौफनाक चीख

"मौन हो जा नीच दरिंदे!" कामिनी की आवाज़ में एक डरावनी, कंपा देने वाली कड़क थी, "मेरी प्रतिशोध की सजा तो अभी आरंभ भी नहीं हुई है। और भ्रम में मत रह नरपिशाच! यह मैं अपनी इस बलपूर्वक हुई शादी का प्रतिशोध नहीं ले रही हूँ... मैं तुझे तेरे उस घिनौने, घृणित और काले पाप का दंड देने के लिए यहाँ लाई हूँ, जो तूने अपनी सत्ता के मद में चूर होकर किया है।"

"मैंने... मैंने क्या अपराध किया है कामिनी? मुझे अवगत तो कराओ!" अमर ने अपने दोनों रक्त रंजित हाथ जोड़ते हुए परम बेबसी से याचना की।

"कामी पुरुष! तूने मेरी निष्पाप विनीता के साथ बलात्कार किया है!" कामिनी ने पागलों की भांति चिल्लाते हुए कहा; उसकी आँखों की पुतलियों से हिंसक चिंगारियां फूट रही थीं। "तूने उसे अपनी पाशविक हवस का शिकार बनाया और तड़प-तड़प कर मरने के लिए इसी वीरान जंगल के दलदल में बेसहारा छोड़ आया था। किंतु ईश्वर का कोटि-कोटि धन्यवाद है कि वह काल के मुख से जीवित बच गई, और तेरा यह खूनी, घिनौना पाप आज संपूर्ण संसार के सम्मुख उजागर हो गया!"

यह सुनते ही अमर के पैरों तले जैसे साक्षात धरती खिसक गई। शारीरिक पीड़ा से भी सहस्र (हजार) गुना तीव्र झटका उसे इस कलंकित आरोप से लगा। वह ज़ोर-ज़ोर से असहज होकर अपना मस्तक हिलाने लगा, "नहीं... नहीं कामिनी! तुम मुझे इसी क्षण जान से मार डालो, मेरे शरीर के टुकड़े कर दो... परंतु मुझ पर यह स्त्रीत्व को अपमानित करने वाला घिनौना इल्ज़ाम मत लगाओ! मैं सर्वथा निर्दोष हूँ... ईश्वर की सौगंध, मैंने किसी भी स्त्री के साथ कोई कुकृत्य नहीं किया! मैं विनीता को अपनी बहन के समान आदर देता था... मैं निर्दोष हूँ कामिनी, मैं निर्दोष हूँ!"

"बस कर नरपिशाच!" कामिनी ने उसकी एक न सुनी। "तुझे अपनी कामुक प्यास बुझाने के लिए मेरा शरीर नहीं प्राप्त हुआ, तो अपना प्रतिशोध लेने के लिए तूने मेरी सबसे प्रिय सहेली विनीता को अपनी हवस का ग्रास बना डाला? तेरे जैसे समाज के कलंक और दरिंदे पुरुषों को इस वसुंधरा पर जीवित रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है, जो स्त्रियों को उपभोग की वस्तु समझते हैं। आज मैं तेरे किए गए एक-एक पल के कृत्य का हिसाब केवल और केवल रक्त से करूँगी।"

अमर निरंतर निर्दोष होने की दुहाई देता रहा, "नहीं कामिनी, तुम भयंकर भूल कर रही हो! किसी छली ने तुम्हें बहुत बड़ा असत्य बोला है, तुम्हें किसी ने हमारे विरुद्ध भड़काया है... मैंने ऐसा स्वप्न में भी नहीं सोचा!"

कामिनी के कानों पर जैसे इस क्षण बहरापन छा चुका था; विवेक पूरी तरह नष्ट हो चुका था। उसने आगे बढ़कर अमर का एक दाहिना हाथ पकड़ा, उसे पीछे की ओर निर्ममता से मरोड़ा और पूरी शारीरिक ताकत से उसके कंधे के जोड़ पर एक जोरदार लात मारी।

कड़क...!

हड्डी के टूटने की वह खौफनाक और भयानक ध्वनि उस शांत जंगल के सन्नाटे को चीरती हुई दूर तक गूंज उठी। अमर के मुख से एक ऐसी दर्दनाक, कारुणिक और गगनभेदी चीख निकली, मानो उस वीरान जंगल के भीतर कोई भयंकर भूकंप आ गया हो। वृक्षों पर विश्राम कर रहे निर्दोष परिंदे भयभीत होकर चहचहाते हुए आसमान की ओर भागने लगे।

दृश्य ३: बेजान जिस्म और आखिरी हंसी

अमर की उस तड़पती हुई गगनभेदी चीख को सुनकर कामिनी के मुखमंडल पर एक अत्यंत क्रूर, पिशाच जैसा सुकून उभर आया। वह उसकी इस असहनीय तड़प का साक्षात आनंद ले रही थी। उसने अर्धमरे अमर के ऊपर झुकते हुए अत्यंत विषैले स्वर में कहा—

"सुन रहा है इस ध्वनि को? विनीता की चीख भी उस अभागी रात इन भयानक जंगलों में ऐसी ही गूंजी होगी, जैसी आज तेरी गूंज रही है। आज तेरी ये तड़पती हुई चीखें मेरे इन कानों में किसी मधुर, अलौकिक संगीत की भांति प्रतीत हो रही हैं।"

कामिनी यहीं नहीं रुकी। वह धीरे-धीरे, अत्यंत बेरहमी से अमर के शरीर के प्रत्येक अंग और अस्थियों को अपनी लातों के प्रहार से तोड़ने लगी। अमर अब एक बेजान मांस के लोथड़े की भांति उस विशाल बरगद के वृक्ष के नीचे अचेत सा पड़ा था। उसका पूरा शरीर भीतर से खंडित हो चुका था, जगह-जगह से उसकी अस्थियां मांस को चीरकर बाह्य रूप से दिखाई दे रही थीं। अब उसके मुख से चीख भी नहीं फूट रही थी, केवल एक अत्यंत धीमी, घिसटती हुई कराह ही शेष बची थी।

अपनी बेगुनाही की निरंतर सफाई देते-देते वह आत्मिक और शारीरिक रूप से पूरी तरह थक चुका था। पीड़ा अब मानवीय बर्दाश्त की अंतिम सीमा को लांघ चुकी थी। चीखते-चीखते उसका गला पूरी तरह रुंध गया था और उसने सूखी पत्तियों की भूमि पर रक्त की एक भारी उल्टी कर दी।

"तू पल-पल तड़पेगा अमर सिंहानिया... जैसे तूने मेरी विनीता को तड़पाया था। आज हर उस घाव का हिसाब होगा," कामिनी ने अपनी हांफती हुई सांसों के मध्य कहा।

उस मरणासन्न और कारुणिक अवस्था में, जब साक्षात मृत्यु अमर के बिल्कुल समीप खड़ी थी, उसके खून से सने फटे होठों पर एक बहुत ही हल्की, दर्दभरी, शांत और थकी हुई मुस्कान तैर गई। उसने अपनी धुंधली, बुझती हुई नजरों से कामिनी के तमतमाते चेहरे की ओर देखा।

"तुमने... तुमने मुझसे कभी प्रेम नहीं किया कामिनी..." अमर की आवाज़ इतनी मद्धम और क्षीण थी मानो वायु के झोंके में विलीन हो रही हो, "किंतु आज... तुम्हारा यह वास्तविक और खूंखार चेहरा इस सत्य के आईने की भांति साफ हो गया है। तुमने अपने उस व्यक्तिगत बदले और इस अंधी नफरत की ज्वाला में... मुझे जो ये बेगुनाही की भयंकर तकलीफ दी है ना... स्मरण रखना कामिनी... तुम स्वयं भी इस जीवन में कभी चैन से नहीं जी पाओगी... कभी नहीं..."

अमर की इस शाप जैसी सत्य वाणी ने कामिनी के भीतर छिपे सुलगते गुस्से को एक बार फिर भड़का दिया। उसने अपने दांतों को भींचते हुए चबाते हुए शब्दों में कहा, "अपना प्रलाप बंद कर!" और पूरी ताकत से अमर के चेहरे पर एक अंतिम बूट की भीषण किक मार दी।

थाप...!

उस अंतिम जोरदार प्रहार से अमर का सिर बरगद के कठोर तने से टकराया और वह तुरंत नॉकआउट (बेहोश) होकर एक ओर गिर गया। उसकी आँखें बंद हो गईं और लहूलुहान शरीर पूरी तरह से शांत, गतिहीन हो गया।

कामिनी ने अपनी सर्विस पिस्तौल को वापस होल्स्टर के भीतर डाला, अपने माथे पर आए पसीने और खून की बूंदों को पोंछा और उस बेजान पड़े शरीर की ओर घृणा से थूकते हुए कहा, "ऐसे बलात्कारियों की यही अंतिम नियति होती है! अब तू यहाँ अपने इस टूटे हुए पिंजर के साथ पल-पल यमराज का इंतजार कर। तेरी मौत तुझे तड़प-तड़प कर ही प्राप्त होगी।"

कामिनी बिना पीछे मुड़े, भारी, धमक भरे कदमों से अपनी पुलिस जीप की ओर बढ़ी, उसे स्टार्ट किया और धूल का गुबार उड़ाती हुई उस वीरान रास्ते से निकल गई।

पीछे उस घने, डरावने और हिंसक जंगल में केवल बरगद का वह प्राचीन वृक्ष, साक्षात मौत का भयानक सन्नाटा और अपनी अंतिम सांसें गिनते हुए निर्दोष, बेगुनाह अमर की सिसकियां बाकी रह गई थीं।

 

 

अध्याय ११: आखिरी वादा

दृश्य १: थाने की भारी हवा और बिखरता सच

संध्याकाल पूर्णतः ढल चुका था और घनी, स्याह रात पैर पसार रही थी। आरक्षी केंद्र (पुलिस स्टेशन) के भीतर का वातावरण एक अजीब से हिंसक सन्नाटे और भारीपन में डूबा हुआ था। बाहर आसमान पर काले, घने बादलों का पहरा गहरा होता जा रहा था, और केबिन की कांच की खिड़की से भीतर आने वाली रात्रि की ठंडी हवा भी अंदर पसरे मानसिक तनाव को कम करने में सर्वथा असमर्थ थी। मेज पर रखी टेबल लैंप की पीली, मद्धम रोशनी कामिनी के मुखमंडल पर पड़ रही थी, जो इस वक़्त किसी पाषाण (पत्थर) की भांति सर्वथा भावहीन, निष्ठुर और सख़्त थी। वह एकाग्रता से अपनी शासकीय फाइल्स के पन्नों को पलटने में व्यस्त थी, मानो उसे बाह्य संसार की किसी भी हलचल से कोई सरोकार ही न हो।

तभी केबिन का भारी मुख्य द्वार एक झटके से खुला। पूजा अत्यंत व्याकुल, बदहवास और विक्षिप्त अवस्था में भीतर प्रविष्ट हुई। उसके केश बिखरे हुए थे, मुखमंडल पसीने और आंसुओं के मिश्रण से भीगा हुआ था, और आँखों में अपने एकमात्र भाई को खो देने का एक भयानक, आदिम खौफ साफ दृष्टिगोचर हो रहा था। उसे अमर के मुख्य कार्यालय के निजी सचिव (सेक्रेटरी) से यह अकाट्य जानकारी प्राप्त हुई थी कि दोपहर के समय अमर स्वयं कामिनी के साथ 'लंच' के बहाने निकला था। तब से कई घंटे व्यतीत हो चुके थे, अमर का फोन लगातार बंद आ रहा था और उसकी समस्त महत्वपूर्ण व्यावसायिक बैठकें निरस्त हो चुकी थीं। इसी भयंकर आशंका से घिरी वह भागती हुई सीधे कामिनी की शासकीय मेज के सम्मुख पहुँची।

उसने अत्यंत कांपती हुई, आक्रोशित वाणी में कहा, "कामिनी...! अमर दोपहर के भोजन के पश्चात से अब तक न तो घर लौटा है और न ही उसका कोई संधान प्राप्त हो रहा है। उसका फोन भी लगातार बंद आ रहा है। मुझे उसके दफ्तर के स्टाफ से ज्ञात हुआ कि वह तुम्हारे साथ ही गया था... किंतु उसके पश्चात से उसका कोई सुराग नहीं है। मुझे... मुझे बहुत भयंकर डर लग रहा है कामिनी! तुम यहाँ इतनी निश्चिंत होकर आराम से बैठी हो? तुम्हें तनिक भी चिंता नहीं है कि तुम्हारा पति कहाँ है?"

कामिनी ने अपनी शासकीय फाइल से अपनी नजरें तक नहीं उठाईं। उसने अत्यंत उदासीनता से एक और पन्ना पलटा और एकदम बर्फीले, कड़े और निष्ठुर लहजे में कहा, "पूजा, तुम्हें शायद कोई बहुत बड़ी गलतफहमी हुई है। मैं अमर सिंहानिया को अपना पति स्वीकार नहीं करती। मेरा यह विवाह मेरी इच्छा के विरुद्ध, मेरे माता-पिता ने बलपूर्वक करवाया था। मैंने उसे कभी अपने जीवन का अंग नहीं माना और न ही कभी वह आदरणीय दर्जा दिया। हम विवशतावश एक कमरे में अवश्य रहते थे, किंतु हमारे अंतर्मन के मध्य मीलों की दूरी स्थापित थी। इसलिए, वह किस स्थान पर है, किस अवस्था में है... इसमें मुझे रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं है।"

यह सुनते ही पूजा के पैरों के नीचे से जैसे साक्षात धरती खिसक गई। वह पूरी तरह स्तब्ध, चेतना शून्य रह गई। कमरे की निर्जीव दीवारें जैसे उसके ऊपर तीव्र वेग से घूमने लगीं। जो कड़वा, स्याह सच अब तक केवल अमर और कामिनी के मध्य दफन था, आज वह अचानक एक झटके में उसके सम्मुख आ चुका था।

उसने अपने बहते आंसुओं को पोंछते हुए कांपते स्वर में कहा, "तुम... तुम यह क्या कह रही हो कामिनी? अमर ने तो सदैव तुम्हारा पल-पल ख्याल रखा, तुम्हें समाज में इतनी प्रतिष्ठा और इज्जत दी..."

दृश्य २: घिनौना इल्ज़ाम और प्रतिशोध की गूँज

"ख्याल नहीं... वह अपने किए गए जघन्य पाप को छुपाने का ढोंग कर रहा था, पूजा!" कामिनी अचानक अपनी शासकीय कुर्सी से झटके से उठ खड़ी हुई। उसकी आँखें प्रचंड गुस्से से सुर्ख लाल हो गईं और उसने मेज पर अपने दोनों हाथ टिकाकर सीधे पूजा की आँखों में अपनी जलती हुई दृष्टि डाली। "वह 'बलात्कारी' अमर सिंहानिया... अभी इसी क्षण उसी घने, वीरान और सुनसान जंगल के दलदल में पड़ा अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है, जहाँ उसने मेरी सबसे प्रिय सहेली, मेरी विनीता के स्त्रीत्व को अपनी पाशविक हवस का शिकार बनाया था। मैंने कानून को परे हटाकर स्वयं उसे उसके कर्मों का अंतिम दंड दे दिया है। जाओ... खोज लो अपने उस दरिंदे भाई को, यदि उसके भीतर की सांसें अभी तक बची हुई हों तो!"

"असत्य...! यह पूर्णतः सफेद और मनगढ़ंत झूठ है कामिनी!" पूजा ने एक क्षण के लिए केबिन के उस भारी सन्नाटे को चीरते हुए तीव्र स्वर में प्रतिवाद किया।

किंतु अगले ही पल उसके भीतर की वह आर्त बेबसी एक खौफनाक, ठंडे और दृढ़ निश्चय के आक्रोश में परिवर्तित हो गई। उसने अपनी आँखों के आंसुओं को भीतर ही भीतर पूरी तरह सुखा लिया और एक अभेद्य चट्टान की भांति अडिग खड़ी हो गई।

"मेरा भाई ऐसा घृणित और निकृष्ट कृत्य स्वप्न में भी नहीं कर सकता! उसका अंतःकरण गंगा के समान पवित्र है। कामिनी... तुम्हें किसी छली ने बहुत बुरी तरह मोहरा बनाया है, तुम्हें अमर को नष्ट करने के लिए इस्तेमाल किया गया है।"

"सच्चाई वही है जो मैंने अपनी आँखों से देखी है और चिकित्सालय की रिपोर्ट्स चीख-चीख कर प्रमाणित कर रही हैं," कामिनी ने अपनी खाकी वर्दी की बेल्ट को सख़्ती से कसते हुए कहा। "वह एक घोर पापी है और उसे उसके किए की अपरिवर्तनीय सजा प्राप्त हो चुकी है।"

दृश्य ३: आँखों में आँखें और आखिरी वादा

पूजा ने अपनी दोनों मुट्ठियों को इतनी सख़्ती से कश लिया कि उसकी उंगलियों के पोर सफेद पड़ गए। उसके भीतर अब भय और लाचारी का नामोनिशान भी शेष नहीं बचा था। वह अत्यंत दृढ़ और भारी कदमों से मेज के घेरे को पार करके सीधे कामिनी के बिल्कुल समीप, आमने-सामने आकर खड़ी हो गई। दोनों स्त्रियों की नजरें परस्पर इस भांति टकराईं मानो दो महाशक्तियां टकरा रही हों। केबिन की वायु इस वक़्त इतनी भारी और घनी हो चुकी थी कि सांस लेना भी दूभर प्रतीत हो रहा था।

पूजा ने कामिनी की जलती हुई आँखों में सीधे अपनी प्रतिशोध से सुलगती आँखें डालीं और बेहद मद्धम, किंतु लोहे जैसी सख़्त, अपरिवर्तनीय और खतरनाक आवाज़ में कहा—

"एक बात अपने मस्तिष्क में भली-भांति अंकित कर लो, कामिनी। यदि मेरे भाई ने वास्तव में... वास्तव में ऐसा कोई निकृष्ट और अक्षम्य अपराध किया है, तो मैं स्वयं... इस देश के कानून या अदालत का मुख नहीं देखूंगी, मैं स्वयं उसे साक्षात काल के मुख में धकेल कर आऊंगी। किंतु..." पूजा की वाणी में अब एक खूनी, डरावना ठहराव आ गया, "यदि मेरा भाई बेगुनाह निकला... यदि वह इस घिनौने आरोप से सर्वथा मुक्त और निर्दोष हुआ, और इस पूरी दास्तान के पीछे किसी का शातिर दिमाग और साज़िश हुई... तो स्मरण रखना कामिनी... इस साज़िश में सम्मिलित प्रत्येक मनुष्य को, चाहे वह कोई भी क्यों न हो, मैं इसी धरती पर जीते जी साक्षात नरक की यातनाएं दिखाऊंगी।"

पूजा ने एक क्षण का विराम लिया और कामिनी के कंधे पर टंगे वर्दी के चमचमाते स्टार्स की ओर घृणा से देखते हुए चबाते हुए शब्दों में कहा—

"यह मेरी आँखों में देख लो कामिनी... यह इस पूजा का तुमसे 'आखिरी वादा' है। यदि अमर निर्दोष सिद्ध हुआ, तो तुम्हारी यह खाकी वर्दी, तुम्हारा यह देश का कानून और तुम्हारी यह सर्विस पिस्तौल भी तुम लोगों को मेरे इस महा-प्रतिशोध की अग्नि से सुरक्षित नहीं बचा पाएगी। मैं तुम सबकी हँसती-खेलती जिंदगी को एक चलती-फिरती जीवित लाश में तब्दील कर दूंगी।"

यह कहकर पूजा एक झटके से घूमी और केबिन का भारी द्वार धकेलते हुए बवंडर की भांति बाहर की ओर भाग गई। उसके बूट्स की धमक गलियारे के सन्नाटे में दूर तक प्रतिध्वनित होती रही।

कामिनी उस विशाल केबिन में सर्वथा एकाकी खड़ी रह गई। बाहर अचानक प्रकृति ने भी अपना रौद्र रूप दिखाया; बादलों के भयंकर गरजने और आकाशीय बिजली के कड़कने की एक गगनभेदी आवाज़ हुई, जिसने केबिन के कांच के शीशों को पूरी तरह कंपा दिया। कामिनी वापस अपनी कार्यकारी कुर्सी पर बैठ तो गई, किंतु पूजा की वह खौफनाक, दृढ़ वाणी और उसकी आँखों के उस चट्टान जैसे अटूट विश्वास ने... कामिनी के मस्तिष्क के किसी सुदूर, अंधेरे कोने में एक अत्यंत सूक्ष्म, किंतु गहरा 'संदेह का बीज' अवश्य बो दिया था।

 

 

अध्याय १२: मूक गवाह और प्रतिशोध का तूफ़ान

दृश्य १: वीरान जंगल और ज़िंदा लाश

देर रात की उस घनी कालिमा में जंगल का भयानक सन्नाटा अब और भी अधिक डरावना तथा हिंसक हो चुका था। शाम का धुंधलका अब पूर्णतः समाप्त होकर एक स्याह अंधकार में विलीन हो चुका था, जिसके कारण बरगद के उस प्राचीन वृक्ष की लटकती जड़ें किसी खूंखार, अदृश्य साए की भांति प्रतीत हो रही थीं। आसमान में काले, जलभरे बादलों की गड़गड़ाहट और तीव्र हो चुकी थी और वन की वायु में एक अजीब सी खूनी ठंडक तैर रही थी।

पूजा आरक्षी केंद्र (पुलिस स्टेशन) से निकलते ही अमर के परम वफादार ड्राइवर को साथ लेकर पागलों की भांति उसी बीहड़ मार्ग पर दौड़ी थी। वह टॉर्च की मद्धम रोशनी में सूखी पत्तियों को अपने बूट्स से कुचलती हुई, विक्षिप्त अवस्था में जंगल के भीतर भाग रही थी, "अमर...! भाई...! कहाँ हो तुम? उत्तर दो भाई...!"

तभी उनकी टॉर्च की पीली रोशनी बरगद के वृक्ष के कठोर तने से टिके उस गतिहीन जिस्म पर पड़ी। जैसे ही पूजा भागकर उसके सन्निकट पहुँची, उसके कलेजे को चीरती हुई एक कारुणिक चीख उस भयावह सन्नाटे को भेदकर हवा में गूंज गई। उसके सम्मुख जो क्षत-विक्षत शरीर पड़ा था, वह उसका हंसता-खेलता भाई अमर नहीं, बल्कि एक लहूलुहान ज़िंदा लाश थी। अमर का संपूर्ण शरीर रक्त से पूरी तरह लथपथ था, उसकी श्वेत शर्ट अब गहरे लाल रंग में रंग चुकी थी और उसके हाथ-पैर अत्यंत विद्रूप, अप्राकृतिक कोणों पर मुड़े हुए थे। यह वीभत्स मंज़र देखना एक बहन के लिए साक्षात मृत्यु से साक्षात्कार करने के समान था।

"अमर... भाई... आँखें खोलो! मेरी ओर देखो भाई!" पूजा पागलों की भांति उसके अचेत जिस्म से लिपट गई; उसका रो-रोकर बुरा हाल था। तभी उसने अत्यंत व्याकुलता से अमर के सीने पर हाथ रखा, तो उसे वहाँ एक बहुत ही हल्की, थमी-थमी सी स्पंदन (हलचल) महसूस हुई। उसकी सांसें वायु के अत्यंत क्षीण झोंके की भांति बेहद धीमी थीं, मगर वह अभी भी जीवित था; सांसों की डोर टूटी नहीं थी।

पूजा ने बिना एक पल भी नष्ट किए अमर को उठाने का प्रयास किया, किंतु शारीरिक चेतना लुप्त होने और हाथ-पैर के जोड़ों के खंडित होने के कारण अमर का बदन एक लोहे के भारी खंभे की भांति जड़ और अत्यंत भारी प्रतीत हो रहा था। रीढ़ की हड्डी सुरक्षित थी, किंतु मांसपेशियों और अस्थियों के असहनीय खिंचाव के कारण उसे हिलाना भी दुष्कर था। पूजा स्वयं कई बार उन कटीली झाड़ियों और सूखी पत्तियों पर गिरी, उसके अपने घुटने छिल गए, किंतु एक बहन की आत्मिक शक्ति इस वक़्त हर शारीरिक पीड़ा पर भारी थी। उसने अपने वफादार ड्राइवर की सहायता ली। दोनों ने मिलकर, अत्यंत सावधानी से अमर के उस नाजुक, खंडित हो चुके शरीर को संतुलित करते हुए उठाया ताकि उसके शरीर पर और अधिक दबाव न पड़े। वे गिरते-पड़ते, किसी तरह अमर के उस बेजान शरीर को अपनी गाड़ी के पिछले हिस्से की सीट पर लिटाने में सफल हुए और ड्राइवर ने वाहन को पूरी रफ्तार से मुख्य चिकित्सालय की ओर दौड़ा दिया।

दृश्य २: अस्पताल की बर्फीली लॉबी और खौफनाक सच

देर रात के उस प्रहर में चिकित्सालय की निजी लॉबी में कृत्रिम सफेद रोशनी का एक अजीब सा, डरावना और ठंडा सन्नाटा पसरा हुआ था। हवा में फिनाइल और रासायनिक औषधियों की तीखी, कड़वी गंध तैर रही थी जो मन में एक अज्ञात खौफ उत्पन्न कर रही थी। आपातकालीन शल्य-चिकित्सा कक्ष (Operation Theater) के बाहर प्रतिस्थापित लाल बत्ती निरंतर जल रही थी, जो इस गंभीर बात का प्रत्यक्ष संकेत थी कि भीतर विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा अमर की उखड़ती हुई सांसों को पुनः जीवन से जोड़ने का अंतिम और अथक प्रयास किया जा रहा था।

लॉबी की एक बर्फीली, धातु की कुर्सी पर पूजा बैठी हुई थी। उसका पूरा बदन एक अनजाने कंपकंपी से कांप रहा था; उसके वस्त्र और दोनों हथेलियां अभी भी अमर के गाढ़े, लाल रक्त से पूरी तरह सनी हुई थीं। वह अपनी उन रक्त-रंजित हथेलियों को जड़ होकर निहार रही थी और उसके मस्तिष्क में अमर का वह अत्यंत सौम्य, हंसता हुआ चेहरा, उसका बचपन और उसकी वे प्रेरक बातें बार-बार गूंज रही थीं कि कैसे उसने इस निष्ठुर संसार में सदैव पूजा को स्वाभिमान से जीना सिखाया था।

तभी शल्य-चिकित्सा कक्ष का वह भारी, स्वचालित द्वार खुला। मुख्य चिकित्सक (डॉक्टर) अत्यंत गंभीर और थके हुए चेहरे के साथ बाहर निकले; उनके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं और उन्होंने अपने हाथों के सर्जिकल दस्ताने उतारे।

पूजा तुरंत वेग से भागकर उनके सन्निकट पहुँची, "डॉक्टर...! मेरा भाई... अमर सिंहानिया सकुशल तो है ना? बोलिए डॉक्टर, मौन क्यों हैं?"

चिकित्सक ने एक गहरी, उदास सांस ली और अत्यंत गंभीर व भारी लहजे में कहा, "मिस पूजा... हमने अमर को जीवनदान देने का अपनी ओर से सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया है और उनकी सांसें अभी चल रही हैं, वे खतरे से बाहर हैं। लेकिन... उनका शरीर आंतरिक रूप से पूरी तरह से खंडित हो चुका है। उनके हाथों, पैरों और कंधों के मुख्य जोड़ों की हड्डियों को अत्यंत बेरहमी से, अत्यधिक पाशविक दबाव डालकर पूरी तरह तोड़ा गया है। यहाँ तक कि असहनीय पीड़ा के कारण चीखने से उनका कंठ (गला) भी आंतरिक रूप से पूरी तरह फट चुका है और अंदरूनी रक्तस्राव बहुत अधिक हुआ है।"

"बस... बस किसी भी प्रकार मेरे भाई को पूर्ण स्वस्थ कर दीजिए, डॉक्टर!" पूजा ने डॉक्टर के हाथ अत्यंत व्याकुलता से जकड़ लिए; उसकी आँखों में अगाध पीड़ा और पागलपन का एक अद्भुत, डरावना मिश्रण था। "आप कुछ भी कीजिए, मुझे मेरा भाई जीवित और पूर्ववत चाहिए!"

चिकित्सक ने उसकी ओर परम सहानुभूति से देखा और अत्यंत मद्धम स्वर में कहा, "हमे हर कठोर परिस्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना होगा, मिस पूजा। यदि इस अत्यंत नाजुक और गंभीर स्थिति के पश्चात भी हम उनकी अमूल्य जान बचा लेते हैं... तो भी वर्तमान में यह कहना लगभग असंभव है कि वह पुनः कभी अपने पैरों पर पूर्व की भांति चल पाएंगे या दोबारा कभी अपने मुख से बोल पाएंगे। उनका कंठ और उनका नर्वस सिस्टम हमेशा के लिए डैमेज हो चुका है। उनका शरीर अब पहले जैसा सामान्य कभी नहीं हो सकता।"

दृश्य ३: थमे हुए आंसू और तूफ़ान का आगाज़

डॉक्टर के वहाँ से प्रस्थान करते ही पूजा जैसे सर्वथा संज्ञाशून्य, सुन्न हो गई। वह किसी निर्जीव वस्तु की भांति बिना किसी सहारे के वहीं चिकित्सालय के ठंडे फर्श पर बैठ गई। कमरे की उस तीखी सफेद रोशनी में उसके दोनों हाथ, जो अमर के गाढ़े रक्त से सने हुए थे, किसी खूनी प्रतिज्ञा और महा-शाप की भांति चमक रहे थे।

"चल नहीं पाएगा...? अपने मुख से कभी बोल नहीं पाएगा...?" पूजा के फटे होठों से एक बेहद धीमी, मगर अत्यंत कड़वी, कर्कश और डरावनी आवाज़ निकली। "मेरा भाई... जिसने इस संपूर्ण संसार को विपरीत परिस्थितियों से जीतना और वीरता से लड़ना सिखाया... वह आज स्वयं का एक पग भी आगे बढ़ाने में अक्षम रहेगा? कामिनी... तूने केवल एक मनुष्य की काया को नहीं तोड़ा है... तूने मेरी संपूर्ण हंसती-खेलती सुंदर दुनिया को जलाकर भस्म कर दिया है।"

अचानक, चिकित्सालय की उस बर्फीली लॉबी में पूजा की आँखों से बहते हुए आंसुओं का प्रवाह थम गया। उसकी रोती हुई, व्याकुल आँखों में अब एक ऐसी बर्फीली, खौफनाक और हिंसक शांति छा गई, जो आने वाले भयंकर महा-विनाश का प्रत्यक्ष संकेत थी। उसका मानसिक दर्द अब एक सुदृढ़ चट्टान जैसी घातक शक्ति में परिवर्तित हो चुका था। वह धीरे से फर्श को त्यागकर खड़ी हुई; उसकी दोनों मुट्ठियां इस कदर भिंच गईं कि उसकी उंगलियों के पोर सफेद पड़ गए।

उसने चिकित्सालय की उन शून्य, सफेद दीवारों की ओर देखा, मानो वह उन निर्जीव दीवारों के पार सीधे आरक्षी केंद्र में बैठी कामिनी को देख रही हो, और अपने दांतों को भींचते हुए चबाते हुए शब्दों में कहा—

"कामिनी... तूने दंभ में चूर होकर कहा था ना कि तूने अपनी सहेली के साथ न्याय किया है? नहीं... तूने एक ऐसा जघन्य महापाप किया है जिसकी क्षमा विधाता के घर भी उपलब्ध नहीं है। यदि मेरा निर्दोष भाई आज के पश्चात कभी अपने मुख से अपनी बेगुनाही नहीं बोल सकता, तो उसकी हर एक दर्द भरी सांस का, उसके जिस्म के हर एक टूटे हुए हिस्से का हिसाब अब यह पूजा स्वयं करेगी। तू कहती है ना कि वह अपराधी है? यदि तूने बिना किसी प्रत्यक्ष प्रमाण के, किसी छली के बहकावे और षड्यंत्र में आकर मेरे भाई पर यह कलंकित आरोप लगाया है... तो सुन ले कामिनी, तेरी हर एक प्रसन्नता, तेरा हर एक मानसिक सुकून, तेरी यह खाकी वर्दी और तेरा यह शासकीय घमंड... मैं इसी मिट्टी में मिलाकर नष्ट कर दूंगी।"

पूजा ने अपने रक्त से रंजित हाथ को आकाश की ओर उठाया और अपनी आँखों की क्रूरता को चरम सीमा पर ले जाते हुए कहा—

"यह मेरा तुझसे और इस घिनौने षड्यंत्र के पीछे छिपे प्रत्येक अदृश्य चेहरे से... इस पूजा का 'आखिरी वादा' है। तुम सब जीते जी इसी धरा को नरक में परिवर्तित होते देखोगे।"

पूजा ने एक अंतिम बार आईसीयू (ICU) के पारदर्शी कांच के द्वार की ओर देखा जहाँ उसका भाई कृत्रिम मशीनों और ड्रिप के सहारे अत्यंत क्षीण सांसें ले रहा था। फिर वह झटके से घूमी और चिकित्सालय के मुख्य द्वार से बाहर की ओर निकल गई।

बाहर प्रकृति में देर रात का एक भयानक अंधड़ और आंधी चल रही थी और काले आसमान से वर्षा की बड़ी-बड़ी, भारी बूंदें धरती पर प्रहार करने लगी थीं—एक ऐसा विनाशकारी तूफान दस्तक दे चुका था, जो अब कामिनी, विनीत और विनीता के पूरे अस्तित्व को जड़ से उखाड़ फेंकने वाला था।

 

 

अध्याय १३: संबंधों की आहुति और गहराता जाल

दृश्य १: पैतृक गृह में प्रतिशोध की घोषणा

'अमर मेंशन' से अपने समस्त भौतिक संबंधों की इतिश्री करने के पश्चात, कामिनी की पुलिस जीप सीधे उसके पैतृक गृह (माता-पिता के घर) के द्वार पर जाकर रुकी। उसके भीतर कई वर्षों से संचित विवाह का दर्द और वर्तमान प्रतिशोध की ज्वाला एक साथ धधक रही थी। जैसे ही वह भारी कदमों से घर के भीतर प्रविष्ट हुई, सम्मुख उसके वृद्ध माता-पिता को पाकर उसके सब्र का बांध टूट गया।

"कामिनी... इतनी व्याकुलता में? क्या बात है पुत्री?" उसकी वृद्ध माता ने उसके तमतमाते चेहरे को देखकर भयभीत स्वर में पूछा।

"पुत्री मत कहिए मुझे!" कामिनी की आवाज़ में बरसों की कड़वाहट और आंसुओं का सैलाब एक साथ फूट पड़ा। "आज मैं आप दोनों को आपके उस तथाकथित 'आदर्श और वैभवशाली' दामाद अमर सिंहानिया का वास्तविक, घृणित और नग्न चरित्र दिखाने आई हूँ। आप दोनों ने लोक-लाज और समाज की झूठी प्रतिष्ठा की वेदी पर मेरी इच्छाओं की बलि चढ़ाकर, बलपूर्वक मेरा विवाह उस नरपिशाच से करवाया था। उस विवाह के बंद कमरे में मैंने जिस मानसिक प्रताड़ना और अकेलेपन को झेला है, उसका अनुमान आप दोनों कभी नहीं लगा सकते।"

"कामिनी... शांत हो जाओ, अमर ने ऐसा क्या कर दिया?" उसके वृद्ध पिता ने कांपते हुए पूछा।

"उस कामी दरिंदे ने मेरी आत्मा... मेरी सबसे प्रिय सहेली विनीता के स्त्रीत्व को अपनी पाशविक हवस का शिकार बनाया है!" कामिनी ने पागलों की भांति चिल्लाते हुए कहा, जिसे सुनकर उसके बूढ़े माता-पिता के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। "उसी अमर सिंहानिया ने विनीता के साथ सामूहिक दरिंदगी जैसी घिनौनी वारदात को अंजाम दिया और उसे मरने के लिए निर्जन वन में फेंक दिया। किंतु स्मरण रखिए, मैं केवल आपकी आज्ञाकारी पुत्री नहीं, कानून की रक्षक भी हूँ। मैंने अपने हाथों से उस अत्याचारी को उसके किए की अंतिम सजा दे दी है। मैं उसे उसी जंगल में लहूलुहान और मरणासन्न अवस्था में तड़पने के लिए छोड़ आई हूँ।"

कामिनी ने झटके से अपनी जीप की चाबी उठाई और मुख्य द्वार की ओर बढ़ते हुए अत्यंत निष्ठुर स्वर में कहा, "जिस प्रकार उस सिंहानिया साम्राज्य से मेरा नाता सदा के लिए टूट चुका है, ठीक उसी प्रकार आज इस चौखट से और आप दोनों से भी मेरे जीवन के समस्त रक्त-संबंध समाप्त होते हैं। आज के पश्चात मुझे खोजना मत।"

अपने पीछे रोते-बिलखते बूढ़े माता-पिता को छोड़कर, कामिनी अपनी अंधी नफरत की गठरी समेटे वहाँ से बाहर निकल गई।

दृश्य २: साज़िश का नया गढ़

नगर के एक अत्यंत शांत, संभ्रांत कोने में स्थित विनीत और विनीता का आलीशान आवास अब इस महा-षड्यंत्र का नया और अभेद्य गढ़ बन चुका था। अपने माता-पिता का परित्याग करने के पश्चात, कामिनी के भीतर का प्रतिशोध अब पूरी तरह से अंधा हो चुका था। वह अपनी राजकीय खाकी वर्दी के घमंड और विनीता के प्रति अगाध, अविवेकपूर्ण सहानुभूति के वशीभूत होकर सीधे विनीत के घर आकर रहने लगी थी।

देर रात का समय था। लिविंग रूम की मद्धम, पीली रोशनी में तीनों चाय के कप थामे बैठे थे। कामिनी के मुखमंडल पर एक अत्यंत कड़क, क्रूर और पिशाच जैसी आत्म-तसल्ली व्याप्त थी कि उसने कानून की लंबी प्रक्रिया को दरकिनार करके अपनी सहेली के साथ हुए घोर अन्याय का त्वरित और खूनी इंसाफ़ अपने हाथों से कर दिया था। वह चाय की चुस्कियां लेते हुए विनीता को सांत्वना दे रही थी।

किंतु कामिनी इस भयानक सत्य से सर्वथा अनभिज्ञ थी कि जिन भाई-बहन के झूठे आंसुओं और जाली मेडिकल रिपोर्ट्स को वह परम सत्य मानकर उनके साए में बैठी है, वास्तव में वही इस बिसात के असली सपेरे हैं, जो उसे अपनी उंगलियों के इशारों पर एक बंधुआ मोहरे की भांति नचा रहे थे।

विनीता ने सिर झुकाकर रुदन का ढोंग किया, किंतु सोफे के पीछे खड़े विनीत की आँखों में एक अत्यंत शातिर, अदृश्य और विजयमयी मुस्कान तैर रही थी। उनका सबसे बड़ा और सबसे घातक शिकार—नगर की जांबाज पुलिस ऑफिसर—अब उनके अपने ही घर के पिंजरे में पूरी तरह कैद हो चुकी थी। सिंहानिया साम्राज्य को नष्ट करने की उनकी बिसात का यह पहला और सबसे सफल चरण था।

दृश्य ३: आईसीयू का सन्नाटा और प्रतिशोध का संकल्प

उधर, नगर के सबसे आधुनिक और अत्याधुनिक सुपर-स्पेशलिटी चिकित्सालय के सघन चिकित्सा कक्ष (ICU) के भीतर का परिदृश्य अत्यंत कारुणिक और भयानक था। वहाँ केवल वेंटिलेटर की यांत्रिक 'शूं-शूं' की आवाज़ें और कार्डियक मॉनिटर पर चलती हुई दिल की धड़कनों की हरी, टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें गूंज रही थीं। कमरे की बर्फीली, कृत्रिम ठंडक हवा में एक अजीब से खौफ की भांति जमी हुई थी।

अमर सिंहानिया बेड पर निष्प्राण सा पड़ा था। उसका संपूर्ण बदन सफेद पट्टियों से लिपटा हुआ था, ग्रीवा (गर्दन) पर सर्जिकल पट्टा था और मुख पर कृत्रिम ऑक्सीजन का मास्क लगा था। कामिनी के उस वहशी और निर्मम प्रहार ने उसके शरीर की भौतिक शक्ति को पूरी तरह खंडित कर दिया था, किंतु उसकी रूह अभी भी बची थी। वह अब एक मूक, लाचार और मर्मस्पर्शी ज़िंदा लाश बन चुका था, जो न तो स्वयं का एक पग आगे बढ़ा सकता था और न ही अपने कंठ से अपनी बेगुनाही का एक शब्द बोल सकता था।

पूजा उसके सिरहाने बैठी थी। उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे पड़ चुके थे, किंतु उसकी आँखों से बहने वाले अश्रु अब पूरी तरह सूखकर भयंकर बारूद का रूप ले चुके थे। पूजा इस विशाल सिंहानिया साम्राज्य की सह-साझेदार (Co-partner) थी; उसके पास वैभव और अकूत धन की कोई सीमा नहीं थी। उसने पानी की तरह करोड़ों रुपये बहाकर देश के सबसे ख्यातिप्राप्त और सर्वश्रेष्ठ न्यूरो-सर्जन्स तथा विशेषज्ञों की टोली को अमर की उखड़ती सांसों को सुरक्षित करने में लगा दिया था।

अमर के जीवन को सुरक्षित करने के साथ-साथ, पूजा ने अपने संपूर्ण कॉर्पोरेट और देशव्यापी गुप्त (Underground) नेटवर्क को पूरी तरह से सक्रिय (Activate) कर दिया था। वह आईसीयू के शांत वातावरण में खड़ी अपनी आँखों में अंगारे लिए सोच रही थी कि विनीता के उस अचानक हुए हादसे से लेकर अमर पर लगे इस कलंकित आरोप के पीछे कौन सी अदृश्य कड़ियां हैं।

उसने तुरंत अपनी जेब से एन्क्रिप्टेड फोन निकाला और अपने सबसे वफादार, चतुर और खूंखार नेटवर्क हेड को कॉल मिलाकर अत्यंत मद्धम, मगर लोहे जैसी सख़्त और जानलेवा आवाज़ में आदेश दिया—

"सुनो... सिंहानिया ग्रुप के समस्त खुफिया और कानूनी चैनल्स को फुल अलर्ट पर डाल दो। मुझे विनीता के उस चिकित्सालय में भर्ती होने की प्रथम रात्रि से लेकर अब तक के प्रत्येक दस्तावेज़, डॉक्टरों की पृष्ठभूमि और उस रात ड्यूटी पर तैनात स्टाफ की पल-पल की गतिविधि की गहन जांच चाहिए। विनीत और विनीता के बैंक खातों से लेकर उनके प्रत्येक संपर्क की कुंडली मेरे टेबल पर होनी चाहिए। इस महा-षड्यंत्र के पीछे जो भी अदृश्य चेहरे छिपे हैं, मुझे उन तक पहुँचना है।"

पूजा ने एक पल का ठहराव लिया, उसकी मुट्ठियां इस कदर भिंच गईं कि उसकी उंगलियों के पोर सफेद पड़ गए। उसने खिड़की के पार दिखती शहर की जगमगाती रोशनी की ओर देखा और चबाते हुए शब्दों में अपना अंतिम हुक्म सुनाया—

"अभी कोई कानूनी कार्यवाही नहीं होगी। मैं उन गुनहगारों को इतनी सरलता से कानून के हवाले करके कारागार का विश्राम नहीं देना चाहती। पहले उन्हें इस झूठी जीत के मद में थोड़ा और जश्न मनाने दो, ताकि जब मैं उनके इस कपट-जाल को छिन्न-भिन्न करूँ, तो उन्हें तड़पते हुए अपने एक-एक कृत्य की भयानक कीमत चुकानी पड़े। विनीत और विनीता की पल-पल की सूचना मुझे चाहिए। और रही बात उस वर्दी के नशे में अंधी हुई कामिनी की... तो कामिनी को मैं उसकी उसी घमंडी खाकी वर्दी के भीतर जीते जी दफ़न कर दूँगी। खेल उन्होंने अमर के सीधेपन के साथ आरंभ किया था... किंतु इसका खूनी और विनाशकारी अंत यह पूजा स्वयं करेगी।"

उसने फोन कट किया और बेड पर पड़े अमर के उस बेजान, पट्टियों से बंधे हाथ को अत्यंत कोमलता से अपने हाथों में ले लिया। बाहर प्रकृति में तेज आंधी और महा-तूफान की शुरुआत हो चुकी थी—एक ऐसा प्रतिशोध का बवंडर, जो बहुत जल्द साज़िशकर्ताओं के पूरे वजूद को तिनके की भांति उखाड़ फेंकने वाला था।

 

 

अध्याय १४: पासा पलट गया

दृश्य १: विलासिता का सन्नाटा और कड़ियों का संधान

दो दिन का समय बीत चुका था। सिंघानिया साम्राज्य के अकूत वैभव और अगाध धन-शक्ति का साक्षात प्रदर्शन मुख्य चिकित्सालय के भीतर स्पष्ट दिखाई दे रहा था। अमर को सघन चिकित्सा कक्ष (ICU) से स्थानांतरित करके चिकित्सालय के सबसे ऊपरी तल पर स्थित एक अत्यंत अत्याधुनिक, पांच-सितारा (5-Star) विलासिता से परिपूर्ण 'विशेष सुइट वार्ड' में शिफ्ट कर दिया गया था। यह केवल एक चिकित्सा कक्ष नहीं था, बल्कि अत्याधुनिक जीवन-रक्षक प्रणालियों (मशीनों) के साथ-साथ संसार की समस्त सुख-सुविधाओं से सुसज्जित एक आलीशान महल जैसा था, जहाँ चारों ओर एक गंभीर, मद्धम प्रकाश फैला हुआ था।

इन दो दिनों के भीतर, पूजा के खुफिया और कॉर्पोरेट नेटवर्क ने पाताल से लेकर आकाश तक एक कर दिया था। पूजा ने केवल कागजों को चोरी नहीं करवाया था, बल्कि उस निजी अस्पताल के प्रबंधन और मुख्य डॉक्टरों पर 'सिंघानिया ग्रुप' के राजनैतिक और आर्थिक रसूख का ऐसा वज्र जैसा दबाव बनाया था कि डॉक्टरों के हौसले पस्त हो गए। सिंघानिया ग्रुप की सत्ता के आगे घुटने टेकते हुए, मुख्य चिकित्सक को विनीत द्वारा दी गई मोटी रकम की लालच को भूलकर, सच उगलना पड़ा था।

पूजा उस आलीशान कक्ष की मद्धम रोशनी में सोफे पर बैठी थी। तभी उसके सबसे विश्वस्त नेटवर्क हेड ने कक्ष में प्रवेश किया और उसके सम्मुख एक सीलबंद, गोपनीय मेडिकल फाइल रखते हुए धीमे स्वर में कहा, "मिस पूजा, हमारी टीम ने एक-एक कड़ी को जोड़कर साज़िश की जड़ को उखाड़ लिया है। डॉक्टरों ने सिंघानिया ग्रुप के पावर के आगे आत्मसमर्पण कर दिया और विनीत द्वारा बनवाए गए फर्जी दस्तावेजों का सच स्वीकारते हुए यह वास्तविक रिपोर्ट हमें सौंप दी है।"

नेटवर्क हेड के बाहर जाते ही पूजा ने उस सीलबंद लिफाफे को खोला। कागज़ों की वह तीखी सर्सराहट उस आलीशान, शांत कक्ष के सन्नाटे में किसी खूनी चाबुक की भांति गूंज उठी। उस वास्तविक रिपोर्ट पर बड़े और स्पष्ट अक्षरों में डॉक्टरों का असली निष्कर्ष अंकित था—विनीता के साथ कोई बलात्कार, कोई शारीरिक दरिंदगी नहीं हुई थी। उसे केवल और केवल भयंकर 'फूड पॉइजनिंग' (विषाक्त भोजन) के कारण उस रात्रि आपातकालीन स्थिति में अस्पताल लाया गया था, और विनीत ने इस बीमारी को एक खौफनाक हथियार बनाकर डॉक्टरों को डराकर और घूस देकर सामूहिक बलात्कार की जाली रिपोर्ट तैयार करवाई थी।

दृश्य २: आईसीयू के पार नग्न सच

पूजा उस सीलबंद फाइल को थामे धीरे-धीरे उठकर बेड की ओर बढ़ी। बेड पर अमर सिंहानिया निष्प्राण सा लेटा हुआ था। उसके भव्य शरीर की शक्ति कामिनी के पाशविक प्रहारों ने छीन ली थी, किंतु उसकी चेतना जागृत थी। उसकी गर्दन पर पट्टा था और मुख पर कृत्रिम ऑक्सीजन का मास्क लगा था। वह चाहकर भी स्वयं को हिलाने या अपने कंठ से सत्य व्यक्त करने में असमर्थ था। वह एक मूक गवाह बन चुका था।

पूजा ने उस वास्तविक रिपोर्ट को अमर की धुंधली, आंसुओं से भरी आँखों के ठीक सम्मुख सीधा कर दिया।

"देख रहे हो अमर भाई...?" पूजा की आवाज़ इतनी ठंडी, कड़वी और कर्कश थी कि उस सुइट वार्ड की वातानुकूलित हवा भी जैसे एक क्षण के लिए बर्फ बन गई। "इस रिपोर्ट को ध्यान से देखो भाई। उस कलंकित स्त्री विनीता को केवल फूड पॉइजनिंग थी। उसके स्त्रीत्व को किसी ने स्पर्श तक नहीं किया था, कोई बलात्कार नहीं हुआ था! केवल एक घिनौना, शातिर और मनगढ़ंत असत्य... और उस एक झूठे नाटक के जाल में फंसकर उस विवेकहीन, अंधी कामिनी ने अपनी खाकी वर्दी के नशे में हमारी पूरी हंसती-खेलती दुनिया को उजाड़ दिया। तुम्हें इस मृतप्राय अवस्था में पहुंचा दिया।"

जैसे ही अमर की नजरों ने उस वास्तविक रिपोर्ट के अक्षरों को पढ़ा, उसके अंतर्मन में छुपा हुआ अगाध दर्द और बेबसी आँखों के कोनों से आंसुओं की मोटी, लाल बूंदों के रूप में ढलक कर सिल्क के तकिए पर गिर गई। उसका कंठ भीतर से बुरी तरह से खड़खड़ाया, उसके फटे होठों ने अपनी बेगुनाही चिल्लाकर बताने के लिए भयंकर छटपटाहट दिखाई, किंतु आंतरिक रूप से क्षतिग्रस्त गले से केवल एक दर्दनाक सिसकी ही बाहर आ सकी। वह परम बेबसी से केवल अपनी पलकों को हल्के-हल्के हिलाकर रोने लगा।

"मौन रहो भाई... अब तुम्हें कुछ भी बोलने या संसार को अपनी पवित्रता की सफाई देने की रत्ती भर भी आवश्यकता नहीं है," पूजा ने आगे झुककर अमर के मस्तक को चूमा, जहाँ अभी भी सर्जिकल टांकों के गहरे निशान थे। उसने अमर का वह बेजान, पट्टियों से बंधा हाथ अपने दोनों हाथों में लिया और अपनी मुट्ठियों को इस कदर भींच लिया कि उसकी उंगलियों के पोर सफेद पड़ गए।

"तुम्हारी इस प्रत्येक मूक सिसकी का हिसाब, तुम्हारे शरीर की इस एक-एक खंडित अस्थि का प्रतिशोध... अब यह पूजा स्वयं लेगी। विनीता का वह आंसुओं का ढोंग, विनीत का वह झूठा षड्यंत्र, और कामिनी की वर्दी का वह अंधा, जाहिल गुस्सा... मैं इन तीनों को एक-एक करके उसी साक्षात नरक की ज्वाला में झोंक दूंगी, जिसका वादा मैं उस आरक्षी केंद्र में करके आई हूँ।"

दृश्य ३: प्रतिशोध की अदृश्य बिसात

पूजा एक झटके से घूमी और उस सुइट वार्ड का भारी, कांच का स्वचालित द्वार धकेलते हुए बाहर विशाल कॉरिडोर (लॉबी) में आ गई। उसके मुखमंडल पर अब किसी अबला बहन की लाचारी या भय का लेशमात्र भी अंश शेष नहीं था; उसकी आँखों में एक ऐसी संहारक प्रतिशोध की देवी का रूप था जो शत्रुओं के साम्राज्य को भस्म करने के लिए पूर्णतः तत्पर थी। उसने तुरंत अपनी जेब से अपना एन्क्रिप्टेड फोन निकाला और अपने नेटवर्क हेड को पुनः लाइन पर लिया।

"सुनो..." पूजा की वाणी में साक्षात काल का सन्नाटा व्याप्त था। "हमारे समस्त अंडरग्राउंड नेटवर्क और लीगल चैनल्स को फुल अलर्ट पर ही रखो। विनीता की इस वास्तविक मेडिकल रिपोर्ट को अभी दुनिया के सामने मत लाना। इसे पूरी तरह से गुप्त रखो। मैं उन कीड़ों को इतनी सरलता से कानून के हवाले करके कारागार का सुरक्षित आराम कदापि नहीं देना चाहती। पहले उन्हें इस अपनी झूठी जीत के मद में, जश्न के नशे में थोड़ा और डूबने दो... उन्हें हवा में थोड़ा और उड़ने दो, ताकि जब मैं उनकी इस कांच की दुनिया को टुकड़ों-टुकड़ों में नष्ट करूँ, तो उन्हें तड़पते हुए अपना किया गया एक-एक पाप स्मरण रहे।"

पूजा ने गलियारे के विशाल कांच के पार दूर दिखती शहर की जगमगाती, रंगीन रोशनी की ओर देखा, जहाँ विनीत और विनीता अपने आलीशान आवास में कामिनी को मोहरा बनाकर इस वक़्त जीत का मदिरापान कर रहे होंगे, जश्न मना रहे होंगे।

उसने अपने दांतों को भींचते हुए चबाते हुए शब्दों में अपना अंतिम खूनी हुक्म सुनाया—

"विनीत और विनीता की पल-पल की सांस की खबर मुझे चाहिए। और रही बात उस वर्दी के घमंड में चूर कामिनी की... तो कामिनी को मैं उसकी उसी प्रतिष्ठित खाकी वर्दी के भीतर जीते जी ज़िंदा दफ़न कर दूँगी। खेल उन्होंने अपनी चालाकी से अमर के भोलेपन के साथ आरंभ किया था... किंतु इसका खूनी, तड़पता हुआ और विनाशकारी अंत मैं विनीता और कामिनी के वजूद को मिटाकर करूँगी।"

जैसे ही उसने फोन कट किया, बाहर रात के तीसरे प्रहर में बादलों का भयंकर गर्जन हुआ और मूसलाधार वर्षा की बूंदों ने शहर की ऊँची इमारतों पर प्रहार करना शुरू कर दिया—पासा पूरी तरह से पलट चुका था, और अब साज़िशकर्ताओं का सर्वनाश निश्चित था।

 

 

अध्याय १५: खौफ की पहली दस्तक

दृश्य १: डाइनिंग टेबल का सन्नाटा और अनपेक्षित सच

रात्रि के लगभग नौ बजे का समय था। विनीत और विनीता के आलीशान आवास के विशाल डाइनिंग हॉल में प्रतिस्थापित झूमर की पीली, मद्धम रोशनी चारों ओर फैली हुई थी। कांच की विशाल डाइनिंग मेज पर भाँति-भाँति के स्वादिष्ट पकवान सजे हुए थे, किंतु उस कक्ष की वायु में एक अजीब सा भारीपन, अवसाद और हिंसक खामोशी जमी हुई थी।

कामिनी, विनीत और विनीता तीनों रात्रि भोज (डिनर) के लिए बैठे थे। कामिनी के सम्मुख भोजन की थाली सजी थी, किंतु उसकी दृष्टि भोजन पर न होकर, हॉल के सुदूर कोने में चल रहे बड़े एलसीडी टीवी (LCD TV) की स्क्रीन पर टिकी हुई थी। कामिनी के मुखमंडल पर एक अत्यंत गंभीर, पाषाणवत और मौन भाव व्याप्त था—एक ऐसा भाव जिसमें अपने किए गए कृत्य पर कोई तात्कालिक पश्चाताप तो नहीं था, किंतु अंतर्मन में एक अजीब सी अनजानी उलझन और व्याकुलता साफ दृष्टिगोचर हो रही थी।

उसके ठीक बगल में बैठे भाई-बहन, विनीत और विनीता के चेहरों पर एक दबी हुई, कुटिल और शातिर मुस्कान तैर रही थी। वे दोनों मन ही मन इस बात से अत्यंत प्रफुल्लित थे कि अमर सिंहानिया उनके मार्ग से सदा के लिए हट चुका है। किंतु इस खूनी प्रसन्नता के पीछे एक गहरा, अदृश्य खौफ भी छुपा हुआ था। वास्तव में, विनीत और विनीता को इस बात का किंचित मात्र भी आभास नहीं था कि कामिनी, अमर के साथ इस सीमा तक जाकर क्रूर और भयानक प्रतिशोध ले लेगी।

उनकी मूल योजना तो यह थी कि विनीता की झूठी दरिंदगी की मनगढ़ंत कहानी और विनीत के नकली आंसुओं को देखकर कामिनी एक सख़्त, कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी के रूप में अमर पर कानूनी शिकंजा कसेगी। वह उसे शासकीय रूप से बंदी (गिरफ्तार) बनाएगी, जिससे समाज में उसके मान-सम्मान और करोड़ों के व्यावसायिक साम्राज्य की धज्जियाँ उड़ जाएंगी और वह वर्षों के लिए कारागार की काल कोठरी में सड़ने के लिए विवश हो जाएगा।

किंतु कामिनी का अंतर्निहित आक्रोश, उसकी बलपूर्वक कराई गई शादी की वर्षों की घुटन और अपनी सहेली के प्रति अविवेकपूर्ण अंधी ममता का एक ऐसा आत्मघाती विस्फोट था, जिसने साक्षात देश के कानून को अपने बूट्स के नीचे कुचल दिया। उसने शासकीय मर्यादा को ताक पर रखकर अमर को स्वयं अपने प्रहारों से मारकर एक जीवित लाश में तब्दील कर दिया था। यह वीभत्स दृश्य विनीत और विनीता के चक्रव्यूह के बिल्कुल विपरीत था। उन्हें कामिनी को अपनी उंगलियों पर नाचने वाले एक रक्षक मोहरे के रूप में लाना था, न कि इस प्रकार एक स्वघोषित खूंखार मुज़रिम के रूप में।

दृश्य २: न्यूज़ फ्लैश और चेहरों का उतरता रंग

तभी अचानक टेलीविजन की स्क्रीन पर एक ब्रेकिंग न्यूज़ की तीखी, कान फोड़ने वाली टोन गूंज उठी। स्क्रीन पर सुर्ख लाल अक्षरों में फ्लैश हुआ: "नगर के सबसे बड़े उद्योगपति अमर सिंहानिया पर जानलेवा हमला! चिकित्सालय से आई इस वक्त की सबसे बड़ी खबर!"

न्यूज़ एंकर की तीव्र वाणी ने उस डाइनिंग हॉल के सन्नाटे को बुरी तरह चीरना आरंभ किया, "इस वक्त की सबसे सनसनीखेज खबर सुपर-स्पेशलिटी चिकित्सालय से प्राप्त हो रही है। कुछ दिनों पूर्व उद्योगपति अमर सिंहानिया पर हुए जानलेवा और नृशंस हमले का अज्ञात आरोपी अभी भी पुलिस और दुनिया की नज़रों से पूर्णतः ओझल है। इस मध्य, अमर सिंहानिया के स्वास्थ्य में पूर्व की अपेक्षा तीव्र सुधार को देखते हुए विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने उन्हें सघन चिकित्सा कक्ष (ICU) से स्थानांतरित करके एक सर्व-सुविधायुक्त, पांच-सितारा वीवीआईपी सुइट वार्ड (VVIP Suite Room) में शिफ्ट कर दिया है। डॉक्टरों के अनुसार, अमर के हाथों, पैरों और कंधों के मुख्य जोड़ों पर किसी हिंसक जानवर की भांति प्राणघातक प्रहार किया गया था, जिसके कारण वे अभी भी बोलने और हिलने-डुलने में पूर्णतः अक्षम हैं..."

यह श्रवण करते ही विनीत ने अपनी गर्दन को थोड़ा घुमाया और बेहद धीमी, किंतु एक खतरनाक शांति के साथ कामिनी की ओर देखकर कहा, "देखा कामिनी? कर्मा अंततः सबका न्याय करता है। उस पापी मनुष्य ने विनीता के पवित्र स्त्रीत्व के साथ जो जघन्य कृत्य किया था, आज साक्षात विधाता ने उसे उसी के कर्मों का दंड दिया है। वह अपनी इस दुर्दशा का स्वयं उत्तरदायी है।"

कामिनी ने इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। उसका मुखमंडल और अधिक कठोर तथा गंभीर हो गया। वह टीवी स्क्रीन को बिना पलक झपकाए एकटक निहारती रही।

किंतु अगले ही क्षण, टेलीविजन स्क्रीन का दृश्य परिवर्तित हुआ और सीधे वीवीआईपी सुइट के गलियारे से अमर की बहन पूजा का लाइव इंटरव्यू प्रसारित होने लगा। पूजा मीडिया के कैमरों के सम्मुख साक्षात साक्षियों की भांति अडिग खड़ी थी। उसकी आँखों में इस वक़्त आंसुओं की बूंदें नहीं, बल्कि एक ऐसी दहकती हुई प्रतिशोध की अग्नि धधक रही थी, जो स्क्रीन को चीरकर सीधे उस डाइनिंग हॉल के भीतर बैठे षड्यंत्रकारियों के कलेजे तक पहुँच रही थी। उसके वस्त्रों पर अभी भी अमर के सूखे हुए रक्त के कत्थई निशान स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।

पूजा ने मीडिया के कैमरों की ओर अपनी जलती हुई दृष्टि डाली और चट्टान जैसी भारी, स्थिर और खौफनाक आवाज में कहा:

"यह मीडिया और इस संपूर्ण नगर के छद्म लोग कान खोलकर सुन लें... मेरे भाई अमर सिंहानिया पर जो कायराना और पाशविक हमला हुआ है, वह कानून की आड़ में रचा गया एक अत्यंत घिनौना और अक्षम्य महापाप है। और सबसे महत्वपूर्ण बात..." पूजा ने सीधे कैमरे के लेंस में अपनी आँखें गड़ाईं, मानो वह सीधे कामिनी और विनीत को देख रही हो, "मेरे भाई अमर के विरुद्ध रचे गए इस भयंकर और कलंकित कपट-जाल के समस्त अकाट्य साक्ष्य और इस साज़िश के पीछे छिपे प्रत्येक चेहरे की पूरी कुंडली अब मेरे पास सुरक्षित आ चुकी है। मैं इस मीडिया के माध्यम से उन अदृश्य षड्यंत्रकारियों को एक खुला और अंतिम चैलेंज दे रही हूँ—तुम्हारी हँसती-खेलती जिंदगी के सबसे काले, खौफनाक और तड़पते हुए दिन अब इसी क्षण से प्रारंभ हो चुके हैं। मैं तुम सबको इस धरती के किसी भी कोने में छिपने की न्यूनतम जगह भी शेष नहीं दूंगी। तुम्हारी संपूर्ण बर्बादी का उलटा काउंटडाउन अब आरंभ हो चुका है।"

दृश्य ३: शक का पहला बीज और कांपते हाथ

पूजा ने राष्ट्रीय टेलीविजन पर किसी विशिष्ट व्यक्ति का नाम नहीं लिया था, उसने केवल एक सीधा, मूक और खूंखार इशारा किया था। किंतु इस एक परोक्ष चेतावनी ने डाइनिंग मेज पर बैठे विनीत और विनीता के पैरों के नीचे से जैसे साक्षात धरती खिसक गई।

कामिनी की तीखी भौहें अचानक तन गईं। उसका मस्तिष्क, जो अब तक क्रोध और नफ़रत के नशे में अंधा था, अचानक इस अज्ञात सत्य के आघात से सुन्न होने लगा। वह टीवी की स्क्रीन की ओर थोड़ी झुकी और गहरे असमंजस तथा आंतरिक उथल-पुथल में डूबी आवाज में बुदबुदाई, "अकाट्य साक्ष्य...? यदि अमर वास्तव में... वास्तव में सर्वथा निर्दोष है... और यह कोई साज़िश है... तो विनीता, फिर तुम्हारे साथ उस कालरात्रि में...?"

यह प्रश्न सुनते ही विनीत और विनीता के चेहरों का बचा-कुचा कृत्रिम रंग भी हवा में उड़ गया। विनीता के मुखमंडल पर एक भयानक, छटपटाती हुई घबराहट उभर आई, जिसे छुपाने के लिए उसने तुरंत अपने स्वर को ऊंचा किया और परिस्थिति को संभालने का प्रयास किया।

"कामिनी...!" विनीता ने अपने कांपते होठों से झूठे रुदन और ममता का घिनौना नाटक रचते हुए कहा, "वह... वह पूजा अपने भाई की इस दशा को देखकर मानसिक रूप से पूरी तरह विक्षिप्त हो चुकी है! वह अपने बलात्कारी और पापी भाई के जघन्य अपराधों को समाज से छुपाने के लिए और लोक-हमदर्दी बटोरने के लिए मीडिया के सम्मुख इस मनगढ़ंत और जाली दावों का स्वांग रच रही है। ताकि समाज उस दरिंदे अमर से घृणा न करे। तुम उसकी इन आधारहीन, फालतू वार्ताओं पर तनिक भी विश्वास मत करना, कामिनी!"

कामिनी ने एक बहुत गहरी, दीर्घ और भारी सांस ली। उसने पलटकर विनीता की आँखों में झांका और अत्यंत मद्धम, ठंडे स्वर में कहा, "संभवतः तुम सत्य कह रही हो, विनीता। किंतु... आज मैंने पूजा की आँखों में एक अजीब सा, खौफनाक और सत्य का निश्चय देखा है। उसकी वाणी में कोई बनावटी झूठ का पुट नहीं था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह वास्तव में समस्त कड़ियों को जानती है और किसी का नाम सार्वजनिक करने ही वाली थी।"

कामिनी के मुख से यह वाक्य समाप्त होते ही विनीत के हाथ में पकड़ा हुआ स्टील का चम्मच अचानक तीव्र गति से थरथराया और एक तीखी, झनझनाती ध्वनि के साथ सीधे कांच की कीमती प्लेट पर जा गिरा।

टन...!

उस सन्नाटे में चम्मच के गिरने की उस तीखी आवाज़ से कामिनी की संशयात्मक नजर तुरंत विनीत के चेहरे पर जाकर टिक गई। विनीत का पूरा माथा इस ठंडे वातावरण में भी पसीने की बूंदों से भीग चुका था और उसकी उंगलियां बुरी तरह कांप रही थीं। कामिनी ने उसे एक पल के लिए अपनी खोजी, पुलिसिया नजरों से घूरकर देखा, किंतु फिर वह वापस टीवी स्क्रीन की ओर देखने लगी, जहाँ अब न्यूज़ एंकर किसी अन्य व्यावसायिक खबर पर जा चुका था।

विनीत ने अपने पूरी तरह सूख चुके गले से थूक को भीतर निगलते हुए अपनी आंतरिक व्याकुलता को बलपूर्वक दबाया और बोला, "कामिनी... हमें इन सब फालतू की कानूनी और मीडिया की प्रपंचों में अपना मस्तिष्क विकृत नहीं करना चाहिए। अमर को जो सजा प्राप्त हुई है, वह उसके स्वयं के कर्मों का ही अंतिम परिणाम है। अब सब कुछ समाप्त हो चुका है। तुम बस स्वयं को शांत रखो और हमारे साथ अपनी इस सुरक्षित, नई जिंदगी के आगमन को देखो।"

डाइनिंग मेज पर सजा भोजन अब पूरी तरह से ठंडा और बेस्वाद हो चुका था। पूजा का वह एक छोटा सा परोक्ष इशारा केवल एक प्रारंभिक चेतावनी था, किंतु उसने विनीत और विनीता की रातों की निद्रा और दिन का चैन पूर्णतः छीन लिया था। वे दोनों भली-भांति समझ चुके थे कि इस बिसात का खेल अब उनके हाथ से निकलकर पूजा के पाले में जा चुका है। और सबसे भयानक बात—कामिनी के उस अंधे, फौलादी और जिद्दी मस्तिष्क के किसी सुदूर कोने में, आज प्रथम बार संदेह और शक का एक छोटा सा, मगर बेहद जहरीला बीज बोया जा चुका था।

 

 

अध्याय १६: सत्ता का संधान और गुप्त प्रतिज्ञा

दृश्य १: सत्ता का आगमन और मौन प्रेम की शक्ति

सुपर-स्पेशलिटी चिकित्सालय के उस अत्यधिक विलासितापूर्ण और सुरक्षित पांच-सितारा वीवीआईपी सुइट वार्ड (VVIP Suite Room) के भीतर का वातावरण अत्यंत गंभीर था। राष्ट्रीय टेलीविजन पर पूजा का वह खूंखार, जलता हुआ इंटरव्यू प्रसारित हुए अभी कुछ ही समय बीता था। कक्ष की मद्धम, पीली रोशनी बिस्तर पर लेटे अमर के निश्चल, सफेद पट्टियों से ढके बदन पर पड़ रही थी, और ऑक्सीजन कंसेन्ट्रेटर की धीमी, यांत्रिक ध्वनि उस विलासितापूर्ण सन्नाटे को और अधिक गहरा कर रही थी।

तभी उस आलीशान कक्ष के भारी, स्वचालित द्वार को धकेलते हुए एक अत्यंत भव्य, रौबीली और प्रभावशाली शख्सियत ने भीतर प्रवेश किया। वह कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि इसी महानगर का सर्वोच्च प्रशासनिक न्यायधीश—कलेक्टर सूरज था। सूरज, अमर और पूजा का कॉलेज के दिनों का सहपाठी और परम मित्र था। चूंकि पूजा और अमर जुड़वां (Twins) भाई-बहन थे, इसलिए वे तीनों एक ही विश्वविद्यालय के एक ही प्रांगण में साथ पढ़े थे।

बेड पर अपने उस कभी अदम्य साहसी और हंसते-खेलते मित्र अमर को इस मूक, खंडित और कृत्रिम सांसों के सहारे जीवित लाश की भांति पड़ा देखकर सूरज का फौलादी सीना भीतर तक दहल उठा। उसका खून खौल उठा और उसकी आँखों में एक आईएएस (IAS) अधिकारी की मर्यादा के पीछे छिपा साक्षात महाकाल जागृत हो गया।

उसने धीरे से अपनी दृष्टि घुमाकर सोफे पर जड़वत बैठी पूजा की ओर देखा, जिसके वस्त्रों पर अभी भी अमर के सूखे हुए लाल रक्त के निशान थे। पूजा को इस भयंकर संकट और प्रतिशोध की अग्नि में अकेले जलते देख, सूरज के हृदय के किसी अत्यंत पवित्र कोने में बरसों से दबा हुआ वह मूक, एकतरफा और निष्कपट प्रेम पूरी तरह से जागृत हो उठा। कॉलेज के दिनों में वह अपनी इस अनमोल भावना को सिंघानिया साम्राज्य की मर्यादा के कारण कभी अपने मुख से व्यक्त नहीं कर पाया था, किंतु आज अपनी उस मूक प्रेमिका और मित्र को न्याय दिलाने के लिए वह अपनी संपूर्ण शासकीय सीमाओं को लांघने के लिए तत्पर था।

सूरज ने भारी, दृढ़ कदमों से आगे बढ़कर सीधे पूजा के सम्मुख जाकर उसके कांपते, रक्त-रंजित हाथों को अपने दोनों मजबूत हाथों में थाम लिया। यह एक कलेक्टर का अपनी जनता को आश्वासन नहीं, बल्कि एक प्रेमी का अपनी आत्मा को दिया गया वचन था।

"पूजा...!" सूरज की आवाज में उस कक्ष की वातानुकूलित हवा को भी कंपा देने वाला एक शासकीय और व्यक्तिगत आक्रोश था। "मैंने अभी-अभी टेलीविजन पर तुम्हारा इंटरव्यू देखा। अमर के साथ जो कुछ भी हुआ है, वह कोई सामान्य अपराध नहीं, बल्कि इस संपूर्ण जिले की कानून-व्यवस्था को दी गई खुली चुनौती है। तुम स्वयं को इस प्रतिशोध की रणभूमि में अकेली मत समझना, पूजा। मैं जानता हूँ कि तुम्हारे पास अकूत धन और तुम्हारा खुफिया अंडरग्राउंड नेटवर्क है... किंतु आज से, इसी क्षण से, तुम्हारे इस प्रतिशोध की आग के पीछे इस पूरे जिले की सर्वोच्च प्रशासनिक और कानूनी सत्ता खड़ी है।"

बेड पर पड़े अमर की आँखों के कोनों से आंसुओं की एक बूंद ढलकी, मानो वह अपने मित्र की आवाज पहचान चुका था। सूरज ने झुककर अमर के माथे पर हाथ रखा और चबाते हुए शब्दों में कहा, "अमर भाई, तुम सिंहानिया ग्रुप के गौरव हो। जिस किसी ने भी, चाहे वह कितनी ही बड़ी राजकीय वर्दी के पीछे छुपा हुआ शिकारी क्यों न हो, यदि उसने तुम्हारे जिस्म के जोड़ों को तोड़ने का दुस्साहस किया है... तो यह कलेक्टर सूरज सिंहानिया साम्राज्य के धन और अपनी शासकीय कलम के पावर से उसकी पूरी दुनिया को मरुस्थल बना देगा। पूजा, तुम अपना चक्रव्यूह रचो... कानून और प्रशासन का कौन सा नियम कब, कहाँ और कैसे तुम्हारे पक्ष में मुड़ना है, यह अब मेरी जिम्मेदारी है। हम इन साज़िशकर्ताओं को धरती के पाताल से भी ढूँढ निकालेंगे।"

अब पूजा के प्रतिशोध को तीन महाशक्तियों का त्रिकोण मिल चुका था—सिंघानिया ग्रुप का अगाध पैसा, पूजा का खूंखार अंडरग्राउंड नेटवर्क, और जिले के सर्वोच्च अधिकारी (कलेक्टर) का अभेद्य कानूनी व प्रशासनिक कवच।

दृश्य २: चेहरों का बदला रंग और संशय का धुआँ

उधर, नगर के सुदूर कोने में स्थित विनीत और विनीता के आवास में हवा का रुख बदलने लगा था। पूजा की टेलीविजन पर दी गई उस खौफनाक और सीधी चेतावनी के बाद से, पिछले कुछ दिनों के भीतर उस घर का आंतरिक वातावरण अत्यंत तनावपूर्ण और संशयास्पद हो चुका था।

कामिनी, जो अपनी राजकीय खाकी वर्दी के अहंकार में अंधी होकर अपने बूढ़े माता-पिता का परित्याग करके विनीत के घर आकर रहने लगी थी, उसका खोजी पुलिसिया मस्तिष्क (Police Mind) अब धीरे-धीरे अपने गुस्से के नशे से बाहर आ रहा था। पिछले बहत्तर घंटों से वह डाइनिंग टेबल से लेकर लिविंग रूम तक, विनीत और विनीता के व्यवहार में आई एक अत्यंत सूक्ष्म और अजीब सी तब्दीली को बहुत गहराई से नोटिस (घूर) कर रही थी।

कामिनी ने देखा कि अमर सिंहानिया के इस प्रकार मरणशय्या पर होने और जीवन भर के लिए अपाहिज व मूक हो जाने की न्यूज़ सुनने के बाद भी, इन दोनों भाई-बहन के चेहरों पर उस भयानक 'दरिंदगी' का कोई अवसाद या भय नहीं था। इसके विपरीत, जब भी वे दोनों अकेले होते, तो उनके चेहरों पर एक विकृत, शैतानी और खूनी प्रसन्नता की चमक उभर आती थी।

कामिनी का संशय तब और अधिक गहरा हो गया जब उसने देखा कि पूजा के उस लाइव इंटरव्यू के बाद से विनीत का माथा बार-बार अकारण ही पसीने से भीग जाता था, और विनीता जो पहले चौबीसों घंटे रोने का ढोंग करती थी, वह अब अचानक कामिनी के प्रति आवश्यकता से अधिक मीठा, कृत्रिम और चाटुकारितापूर्ण व्यवहार करने लगी थी। वे दोनों बार-बार कामिनी को यह समझाने का प्रयास करते थे कि वह पुलिस मुख्यालय न जाए और अपनी इस नई जिंदगी का आनंद ले।

एक अनुभवी और जांबाज पुलिस अधिकारी होने के नाते, कामिनी का अंतर्मन अब चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था कि इस अत्यधिक सुघड़ और भावुक दिखने वाले परिदृश्य के पीछे कोई बहुत ही घिनौना और खौफनाक राज़ छुपा हुआ है। चेहरों की यह कृत्रिमता और रहस्यों की यह फुसफुसाहट कामिनी के मस्तिष्क में संदेह का एक ऐसा जहरीला धुआँ उत्पन्न कर रही थी, जो अब उसकी आत्मा को सुलगाने लगा था।

दृश्य ३: खाकी वर्दी का गुप्त संकल्प

रात्रि का अंतिम प्रहर था। विनीत के आवास के प्रथम तल पर स्थित अपने बंद कमरे के भीतर कामिनी अकेले मेज पर बैठी हुई थी। कमरे का छत का पंखा पूरी रफ्तार से चल रहा था, किंतु कामिनी के माथे पर चिंता और आंतरिक उथल-पुथल की बूंदें चमक रही थीं। कमरे की मद्धम रोशनी उसकी खाकी वर्दी पर पड़ रही थी, जो सोफे पर टंगी हुई थी।

कामिनी ने अपनी दोनों हथेलियों से अपने सिर को कसकर पकड़ लिया। उसका वह फौलादी, जिद्दी दिमाग आज पहली बार भीतर से बुरी तरह दरक रहा था। उसके कानों में पूजा की वह चट्टान जैसी कड़क आवाज बार-बार गूंज रही थी—"मेरे भाई के विरुद्ध रचे गए इस कलंकित कपट-जाल के समस्त अकाट्य साक्ष्य अब मेरे पास सुरक्षित आ चुके हैं..."

कामिनी ने बंद खिड़की के परदे की ओट से नीचे अंधेरे बगीचे (गार्डन) की ओर देखा, जहाँ विनीत सिगरेट का धुआँ उड़ाते हुए विनीता से अत्यंत दबी हुई, घबराई हुई आवाज में कुछ बात कर रहा था। उन दोनों के चेहरों पर छाया वह खौफ कामिनी की नजरों से छुप नहीं सका।

"नहीं... सत्य वह नहीं है जो मुझे इन दोनों ने रो-रोकर दिखाया है," कामिनी के सूखे होठों से एक बेहद गंभीर, ठंडी और कांपती हुई फुसफुसाहट निकली। "यदि अमर वास्तव में पापी और बलात्कारी था, तो पूजा जैसी स्वाभिमानी कॉर्पोरेट टाइकून राष्ट्रीय मीडिया के सामने इस प्रकार का अटूट और खौफनाक दावा कभी नहीं करती। पूजा की आँखों में भाई का गम तो था, पर कोई झूठ या आत्मग्लानी नहीं थी।"

कामिनी का हाथ अनजाने में ही उसकी मेज पर रखी उसकी सर्विस रिवॉल्वर पर चला गया। उसके अंदर का वह अंधा, अदम्य गुस्सा अब पूरी तरह से शांत होकर एक बेहद शातिर, ठंडे और पेशेवर क्रिमिनल इन्वेस्टिगेटर (जांचकर्ता) के रूप में परिवर्तित हो चुका था।

उसने भली-भांति भांप लिया था कि यदि उसने आधिकारिक रूप से, यानी अपने पुलिस विभाग या आरक्षी केंद्र के माध्यम से इस मामले की दोबारा जांच की कड़ियां खंगालनी शुरू कीं, तो विनीत और विनीता तुरंत सतर्क हो जाएंगे। साथ ही, चूंकि उसने स्वयं कानून को अपने हाथ में लेकर अमर को मरणासन्न किया था, इसलिए उसका अपना विभाग भी उस पर राजकीय दबाव बनाएगा और सत्य कभी सतह पर नहीं आ पाएगा।

उसने अपनी मुट्ठियों को इस कदर कसा कि उसकी उंगलियों के पोर सफेद पड़ गए। उसने खिड़की के कांच पर दिखती अपनी ही खाकी परछाई को एकटक देखते हुए चबाते हुए शब्दों में अपनी आत्मा से एक गुप्त प्रतिज्ञा की—

"विनीता... विनीत... अगर तुम दोनों ने अपने किसी व्यक्तिगत प्रतिशोध, किसी छिपे हुए नीच स्वार्थ के लिए मेरी भावनाओं का, मेरी अंधी ममता का खिलवाड़ करके मुझसे यह जघन्य पाप करवाया है... तो स्मरण रखना, यह खाकी वर्दी कानून की रक्षा बाद में करेगी, पहले इसके पीछे छिपा वह खूंखार जल्लाद तुम दोनों को इसी आवास की नींव के भीतर ज़िंदा दफ़न कर देगा। मैं विभाग को सम्मिलित किए बिना, स्वयं अपने स्तर पर, बिल्कुल अकेले... एक अत्यंत गुप्त, पर्सनल और 'प्राइवेट छानबीन' (Private Investigation) आरंभ करूँगी। मैं उस कालरात्रि के अस्पताल के रिकॉर्ड्स से लेकर तुम दोनों के अस्तित्व की आखिरी कड़ी तक खुद पहुँचूगी... और यदि अमर निर्दोष निकला... तो इस विनाश की पहली आहुति तुम दोनों की होगी।"

कहानी अब एक ऐसे अत्यंत रोमांचक और खौफनाक मोड़ पर आ खड़ी हुई थी, जहाँ विनीत और विनीता इस सत्य से सर्वथा अनभिज्ञ थे कि वे अब एक ऐसे दोतरफा चक्रव्यूह में घिर चुके हैं जिससे उनका जीवित निकलना असंभव था। एक ओर अस्पताल के वीवीआईपी सुइट में बैठी पूजा और कलेक्टर सूरज का त्रिकोण उन्हें आर्थिक और कानूनी रूप से नेस्तनाबूद करने के लिए फंदा कस रहा था, और दूसरी ओर उनके अपने ही घर की छत के नीचे बैठी कामिनी... अब उनके सीने पर पैर रखकर नग्न सत्य उगलवाने के लिए अपने गुप्त हथियार तैयार कर रही थी।

 

 

अध्याय १७: दोतरफा चक्रव्यूह

दृश्य १: कलेक्टर कार्यालय का हड़कंप और कांपती खाकी

महानगर का सर्वोच्च प्रशासनिक मुख्यालय (कलेक्टर कार्यालय) आज किसी छावनी में तब्दील प्रतीत हो रहा था। टेलीविजन पर अमर सिंहानिया की बहन पूजा के खूंखार इंटरव्यू के अगले ही दिन, जिले के सर्वोच्च न्यायधीश—कलेक्टर सूरज—के एक कड़क और लिखित आदेश पर नगर के समस्त आला पुलिस अधिकारियों की एक आपातकालीन, बंद कमरे की समीक्षा बैठक बुलाई गई थी। इस बैठक में आरक्षी केंद्र के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ-साथ, अपनी शासकीय खाकी वर्दी की धमक लिए ऑफिसर कामिनी भी अत्यंत गंभीर मुद्रा में उपस्थित थी।

सूरज अपनी ऊँची, प्रतिष्ठित शासकीय कुर्सी पर बैठा हुआ था। उसकी आँखों में छाई लालिमा और चेहरे का कठोर भाव यह बताने के लिए पर्याप्त था कि वह इस समय एक मित्र के दर्द और एक प्रशासनिक मुखिया के दायित्व की चरम सीमा पर था। बैठक आरंभ होते ही, सूरज ने अपनी फौलादी हथेली को महोगनी की उस विशाल शासकीय मेज पर पूरी ताकत से मारा।

धड़ाम...!

मेज पर रखे पानी के कांच के गिलास थरथरा उठे और पूरे कक्ष में एक भयावह सन्नाटा छा गया। सूरज की वाणी साक्षात वज्र की भांति गूंज उठी—

"यह इस पूरे जिले की पुलिस फोर्स के मुख पर एक अत्यंत कलंकित तमाचा है! इतने शांत और सभ्य शहर के भीतर, अमर सिंहानिया जैसे नगर के सबसे प्रतिष्ठित, शक्तिशाली और अगाध धन-संपदा के स्वामी उद्योगपति पर इतना क्रूर, नृशंस और जानलेवा हमला हो जाता है... और संपूर्ण पुलिस विभाग हाथ पर हाथ धरे बैठा है? आक्रमण हुए कई दिन बीत चुके हैं, किंतु केस डायरी में हमलावर का नाम अभी तक 'अज्ञात' क्यों अंकित है? आप सब इस आरक्षी केंद्र में कर क्या रहे हैं?"

सूरज की जलती हुई दृष्टि धीरे-धीरे घूमती हुई सीधे ऑफिसर कामिनी की आँखों पर जाकर टिक गई। कामिनी, जिसने स्वयं अपने हाथों से कानून को अपने बूट्स के नीचे कुचलकर अमर की हड्डियों को पानी की तरह तोड़ा था, वह उस ठंडे वातानुकूलित (AC) शासकीय कक्ष में भीतर तक कांप उठी। उसकी रीढ़ की हड्डी में एक ठंडा खौफ सरसरा गया। उसका माथा भीतर ही भीतर पसीने की बूंदों से भीगने लगा, क्योंकि जिस 'अज्ञात खूंखार मुज़रिम' को ढूंढने के लिए पूरा जिला प्रशासन दहाड़ रहा था, वह स्वयं उस वर्दी के भीतर उसी मेज के सम्मुख खड़ी थी।

सूरज ने सीधे कामिनी की ओर अपनी उंगली उठाते हुए चबाते हुए शब्दों में कहा, "ऑफिसर कामिनी...! अमर सिंहानिया कोई साधारण नागरिक नहीं है, वह इस शहर के बिज़नेस साम्राज्य का गौरव है। यदि इस जिले की पुलिस इतने शक्तिशाली मनुष्य को न्याय दिलाने में इतनी शिथिलता और अक्षमता दिखाएगी, तो इस शहर की आम जनता का कानून पर क्या विश्वास शेष रहेगा? मुझे किसी भी मूल्य पर, २४ घंटे के भीतर वह हिंसक जानवर सलाखों के पीछे चाहिए जिसने अमर पर हमला किया है। यदि पुलिस असफल रही, तो मैं स्वयं इस मामले को राज्य के गृह मंत्रालय को सौंपकर यहाँ के निकम्मे अधिकारियों को निलंबित करने में एक क्षण का भी विलंब नहीं करूँगा। गो एंड फाइंड दैट क्रिमिनल राइट नाउ!"

मीटिंग समाप्त होते ही कामिनी जब कक्ष से बाहर निकली, तो उसकी उंगलियां अपनी सर्विस बेल्ट पर कांप रही थीं। सत्ता का यह दबाव उसके उस अंधे, जाहिल गुस्से पर भारी पड़ने लगा था।

दृश्य २: सिंहानिया मेंशन में वापसी और प्रथम चमत्कार

इस घटनाक्रम के दो दिन और बीत चुके थे। चिकित्सालय के डॉक्टरों की गहन निगरानी के पश्चात, अमर सिंहानिया की स्थिति में किंचित सुधार देखते हुए, सुरक्षा कारणों से उसे अस्पताल के उस वीवीआईपी सुइट से डिस्चार्ज करके उसके स्वयं के विशाल, अभेद्य और आलीशान 'सिंहानिया मेंशन' के मुख्य कमरे में शिफ्ट कर दिया गया था।

कमरे के भीतर की हवा में अभी भी विशिष्ट जीवन रक्षक औषधियों की हल्की गंध व्याप्त थी। वेंटिलेटर की भारी मशीनों के स्थान पर अब एक अत्यंत शांत, आधुनिक ऑक्सीजन कंसेन्ट्रेटर की धीमी, यांत्रिक सुगबुगाहट गूंज रही थी। खिड़की के भारी, सिल्क के परदे आधे गिरे हुए थे, जिससे दोपहर की मद्धम, पीली रोशनी बिस्तर पर निष्प्राण से लेटे अमर के पीले पड़ चुके चेहरे पर पड़ रही थी। अमर अभी भी अपने दम पर बैठ नहीं सकता था और न ही उसके आंतरिक रूप से क्षतिग्रस्त कंठ से कोई शब्द बाहर आ पा रहा था।

किंतु आज, इस साम्राज्यवादी कमरे की रहस्यमयी खामोशी में एक बहुत बड़ा चमत्कार घटित हुआ।

बिस्तर की सफेद, मखमली मून-वॉक चादर पर बेजान पड़ी अमर की सूजी हुई, पट्टियों से बंधी उंगलियों में अचानक एक अत्यंत सूक्ष्म किंतु स्पष्ट थरथराहट हुई। अमर ने अपने संपूर्ण अस्तित्व की बची-कुची आत्मिक शक्ति को अपने दाहिने हाथ में समेटते हुए, अपनी मुट्ठी को बंद करने का एक फौलादी प्रयास किया। उसके हाथ और पैरों के आंतरिक तंत्रिका तंत्र (Reflexes & Movements) धीरे-धीरे जागृत हो रहे थे।

पूजा, जो उसके सिरहाने एक चट्टान की भांति बैठी उसकी सुरक्षा कर रही थी, उसने जैसे ही अपने भाई के हाथ में यह अप्रत्याशित हलचल देखी, उसकी आँखों में कोई कमज़ोर आंसू नहीं उभरा; बल्कि उसके भीतर सुलगती प्रतिशोध की ज्वाला और अधिक खूंखार होकर उसकी पुतलियों में चमक उठी। उसने अत्यंत कोमलता किंतु अटूट मजबूती से अमर की उस कांपती हथेली को अपने हाथों में भींच लिया।

"विनीत और विनीता को लग रहा है कि उन्होंने अमर सिंहानिया को शारीरिक रूप से खंडित करके इस सिंघानिया साम्राज्य को नेस्तनाबूद कर दिया है," पूजा की आवाज में एक बर्फीली, कड़क और जानलेवा शांति व्याप्त थी। "उन कीड़ों को इस बात का न्यूनतम अंदाज़ा भी नहीं है कि मैं इस वक़्त उनके कॉर्पोरेट बिज़नेस अकाउंट्स, उनके छिपे हुए अवैध बैंक कनेक्शंस और उनके वजूद की हर एक सांस को दीमक की भांति अंदर से काट रही हूँ। उनका प्रत्येक मार्ग धीरे-धीरे, अत्यंत क्रूरता से बंद हो रहा है, अमर। मैं उन्हें इतनी सरलता से देश के कानून के हवाले करके कारागार की सुरक्षित रोटियां तोड़ने का सुख कदापि नहीं दूंगी... मैं उनके हाथ-पैर सलामत रखकर उन्हें इसी शहर की सड़कों पर लाकर, एक-एक पैसे के लिए कुत्ते की भांति तड़पाऊंगी।"

अमर ने अपनी सूजी हुई, नम किंतु सुलगती आँखों से अपनी बहन पूजा की ओर देखा। उसने अपनी पूरी शारीरिक चेतना को एकत्र करके पूजा की हथेली पर अपनी उंगलियों से एक बहुत ही हल्का, मगर अविश्वसनीय रूप से मजबूत और फौलादी दबाव बनाया। यह अमर का वह मूक, बिना शब्दों का इशारा था—'मैं लौट रहा हूँ पूजा... अब उनसे हमारे खून की एक-एक बूंद का, हमारी पाई-पाई का हिसाब लो।'

दृश्य ३: बंद कमरे का अंतर्द्वंद्व और नग्न सच का विस्फोट

उधर, शहर के दूसरे कोने में स्थित विनीत और विनीता के आवास के एक बंद कमरे के भीतर का परिदृश्य साक्षात किसी नरक के प्रवेश द्वार जैसा भयावह हो चुका था। दो दिनों की अत्यंत गुप्त, कठिन भागदौड़, अत्यधिक निजी प्रयासों और अपनी शासकीय पुलिस पावर (Police Authority) का चुपचाप दुरुपयोग करके, ऑफिसर कामिनी आखिरकार विनीता के उस पुराने अस्पताल के अति-गोपनीय रिकॉर्ड रूम से वह मूल फॉरेंसिक रिपोर्ट और डॉक्टरों की आंतरिक मेडिकल नोटिंग्स अपने व्यक्तिगत हाथों में हासिल करने में सफल हो चुकी थी।

कमरे की खिड़कियां और द्वार पूरी तरह से बंद थे। छत का पंखा पूरी रफ्तार से चल रहा था, किंतु कामिनी के माथे और गर्दन से पसीने की बूंदें लगातार टपक रही थीं। उसकी मेज पर आरक्षी केंद्र की कोई शासकीय फाइल नहीं थी, बल्कि वे चोरी छिपे निकाले गए मूल फॉरेंसिक दस्तावेज बिखरे पड़े थे, जिन पर अस्पताल के मुख्य डॉक्टरों के सील और हस्ताक्षर अंकित थे।

कामिनी के हाथ में एक पेन था, और उसकी नजरें उस गोपनीय रिपोर्ट की एक-एक विशिष्ट लाइन पर टिकी हुई थीं। जैसे-जैसे वह उन अंग्रेजी अक्षरों और वैज्ञानिक निष्कर्षों को पढ़ रही थी, उसकी आँखों की पुतलियाँ फैलती जा रही थीं और उसके चेहरे का पूरा खून जैसे किसी ने निचोड़ लिया हो—उसका चेहरा पूरी तरह सफेद पड़ चुका था।

"यह... यह कैसे मुमकिन है...?" कामिनी खुद से ही बेहद धीमी, गंभीर और थरथराती हुई भयानक आवाज में बुदबुदाई। "विनीता ने मुझसे लिपटकर कहा था कि उस कालरात्रि में अमर ने उसके साथ पशुओं जैसी दरिंदगी की थी... उसने अपनी अस्मत लूटने का दावा किया था। किंतु इन डॉक्टरों की फाइनल फॉरेंसिक रिपोर्ट में... दूर-दूर तक, किसी भी प्रकार के शारीरिक शोषण, घर्षण या बलात्कार की न्यूनतम पुष्टि भी नहीं है! डॉक्टरों का फाइनल कंक्लूजन कहता है कि उसे केवल और केवल अत्यंत तीव्र 'फूड पॉइजनिंग' (विषाक्त भोजन) थी... केवल दूषित भोजन ग्रहण करने के कारण उसकी स्थिति गंभीर हुई थी।"

कामिनी ने अपनी दोनों हथेलियों से अपने सिर को इस कदर कसकर पकड़ लिया, मानो उसका मस्तिष्क अभी फट जाएगा। उसका वह अत्यंत अभिमानी, फौलादी और जिद्दी दिमाग, जिसने कभी बिना सत्य को जाने, अपनी सहेली की ममता के अंधे नशे में अमर सिंहानिया की हड्डियों को पानी की भांति तोड़ दिया था, वह आज स्वयं अंदर से पूरी तरह से दरक कर बिखर रहा था। उसके कानों में विनीत के वे रोते हुए झूठे शब्द, विनीता की वह कृत्रिम सिसकियाँ और अमर के कंठ से निकलती अपनी बेगुनाही की वह आखिरी तड़पती हुई चीख बार-बार एक खूनी चाबुक की भांति प्रहार करने लगी।

"मैंने... मैंने उस निर्दोष मनुष्य को अपनी सफाई में एक न्यूनतम शब्द भी बोलने का अवसर नहीं दिया," कामिनी की आँखों से अगाध गुस्से, आत्मग्लानी और भयंकर पछतावे का एक खौफनाक, गर्म आंसू निकलकर सीधे उस फॉरेंसिक रिपोर्ट के पन्ने पर जा गिरा, जिससे वहाँ की स्याही हल्की सी फैल गई।

"मैंने अपनी आँखों पर अपनी सहेली की ममता की ऐसी जाहिल और अंधी पट्टी बांध ली कि मैंने स्वयं अपने हाथों से एक पूर्णतः निर्दोष इंसान को जीवित लाश बना दिया? क्या विनीता का वह रुदन... क्या विनीत का मुझ पर वह अंधा विश्वास... केवल एक घिनौनी, शातिर और नीच साज़िश का हिस्सा था ताकि मैं स्वयं अपने ही पति को अपने बूट्स के नीचे कुचलकर मिटा दूँ?"

कामिनी धीरे से अपनी कुर्सी से उठी और भारी, कांपते कदमों से खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। उसने परदे की ओट से नीचे बगीचे में देखा, जहाँ विनीत और विनीता आपस में मदिरा के गिलास थामे, हंसते हुए कुछ जश्न मना रहे थे। जो चेहरे कामिनी को अब तक संसार के सबसे मासूम, पीड़ित और आदरणीय चेहरे प्रतीत होते थे, आज पहली बार... उन चेहरों के पीछे छिपे खूंखार, गंदे और हिंसक भेड़िये कामिनी को पूरी तरह से नग्न अवस्था में साफ नजर आने लगे थे।

विनीत और विनीता पूरी तरह अनजान थे कि वे अब एक ऐसे कालचक्र में घिर चुके हैं जहाँ से उनके वजूद का बचना असंभव था। एक तरफ सिंहानिया मेंशन में बैठा पूजा और कलेक्टर सूरज का साम्राज्यवादी चक्रव्यूह उन्हें कंगाल करने के लिए फंदा कस रहा था, और दूसरी तरफ उनके अपने ही घर की छत के नीचे बैठी कामिनी... अब उनके सीने पर चढ़कर साक्षात काल बनने के लिए तैयार खड़ी थी।

 

 

अध्याय १८: पश्चाताप की आग और चुभते शब्द

दृश्य १: पुराना महल और ज़िंदा लाश का सामना

सिंहानिया मेंशन का वह विशाल, भव्य और कलात्मक शयनकक्ष, जहाँ कुछ समय पूर्व ऑफिसर कामिनी एक गौरवशाली दुल्हन बनकर आई थी, आज किसी खामोश, ठंडे मक़बरे की भांति प्रतीत हो रहा था। कक्ष के भीतर की वायु में चारों ओर महंगी जीवन रक्षक औषधियों की तीखी, कड़वी गंध पसरी हुई थी, और पृष्ठभूमि में केवल उस आधुनिक ऑक्सीजन कंसेन्ट्रेटर की धीमी, यांत्रिक और निरंतर सुगबुगाहट ही गूंज रही थी। खिड़की के भारी, सिल्क के महोगनी परदों की ओट से छनकर आ रही आधी रात की बर्फीली चाँदनी बिस्तर पर लेटे अमर के पीले पड़ चुके, निस्तेज मुखमंडल पर पड़ रही थी।

अमर इस समय गहरी, औषधियुक्त और बेखबर निद्रा में लीन था। उसकी गर्दन पर अभी भी सर्जिकल पट्टा (कॉलर) कसा हुआ था, और उसके भव्य शरीर के कभी शक्तिशाली हाथ-पैर किसी टूटी हुई काठ की पुतली की भांति बिस्तर पर बेजान फैले हुए थे। वह अपनी पत्नी और बहन के मध्य होने वाली इस खौफनाक वार्ता का एक मूक, असहाय और लाचार साक्षी बना हुआ था।

तभी उस कमरे का भारी, नक्काशीदार द्वार अत्यंत मद्धम गति से, बिना किसी ध्वनि के खुला और भीतर ऑफिसर कामिनी ने प्रवेश किया। उसकी आँखों में इस वक़्त उस शासकीय खाकी वर्दी का कोई अहंकार, कोई धमक या घमंड शेष नहीं था; इसके विपरीत, उसकी पुतलियों में एक ऐसी रूह को कंपा देने वाली, आत्मघाती आत्मग्लानी और भयंकर पश्चाताप का खौफनाक साया था जो साक्षात किसी जीवित लाश जैसा था।

चोरी-छिपे निकाली गई डॉक्टरों की उस मूल फॉरेंसिक और मेडिकल रिपोर्ट्स के माध्यम से उसे संपूर्ण नग्न सत्य का ज्ञान हो चुका था। उसे पता चल चुका था कि कैसे उसके तथाकथित प्रेमी विनीत और उसकी सबसे अटूट सहेली विनीता ने मिलकर, अपने नीच आर्थिक स्वार्थ के लिए एक पूर्णतः निर्दोष, देवतुल्य इंसान के विरुद्ध इतनी घिनौनी और कलंकित साज़िश रची थी... और उसने... उसने अपनी आँखों पर ममता और विश्वास की ऐसी अंधी पट्टी बांध ली कि स्वयं अपने ही हाथों से अपने पति की हंसती-खेलती दुनिया उजाड़ दी।

कामिनी के पैर जैसे उसके शरीर का भार उठाने में पूरी तरह अक्षम हो गए। वह भारी कदमों से आगे बढ़ी और सीधे अमर के बिस्तर के समीप, फर्श पर अपने घुटनों के बल बैठ गई। अमर के उस सूजे हुए, टांकों और पट्टियों से ढके निष्प्राण जिस्म को देखकर उसकी आत्मा भीतर तक दरक रही थी। उसके मस्तिष्क के सन्नाटे में अचानक उस घने, काल-अंधेरे जंगल का एक-एक वीभत्स मंज़र खूनी दृश्यों की भांति गूंज उठा—कैसे अमर लहूलुहान अवस्था में उसके भारी बूट्स के नीचे कीचड़ में पड़ा गिड़गिड़ा रहा था, अपने कंठ की पूरी शक्ति से अपनी बेगुनाही की भीख मांग रहा था, किंतु कामिनी ने अपनी खाकी के अंधे मद में उसकी एक न सुनी और उसकी हर एक मुख्य हड्डी को बेरहमी से तोड़ती चली गई।

कामिनी के फटे हुए होठों से एक बेबस, तड़पती हुई सिसकी बाहर निकली। वह इस क्षण स्वयं अपनी परछाई, अपने वजूद और अपनी इस आत्मा से साक्षात नफ़रत करने लगी थी।

दृश्य २: प्रतिशोध की देवी का प्रहार

"दूर हटो... मेरे भाई के इस पवित्र शरीर से...!"

तभी कक्ष के द्वार पर पूजा की ठंडी, कड़क और अत्यंत ज़हरीली आवाज़ गूंजी। कामिनी ने चौंककर देखा; पूजा धीरे-धीरे, रेंगते हुए कदमों से उसकी ओर बढ़ रही थी। उसकी आँखें प्रतिशोध की अग्नि से साक्षात लाल थीं और उसका पूरा बदन गुस्से के तीव्र वेग से कांप रहा था। वह चलते हुए सीधे कामिनी के बिल्कुल सम्मुख आकर एक चट्टान की भांति खड़ी हो गई। अमर की इस गहरी निद्रा में कोई विघ्न न उत्पन्न हो, इसलिए पूजा की आवाज अत्यंत दबी हुई और मद्धम थी, किंतु उस कमरे के मक़बरे जैसे सन्नाटे में वह किसी धारदार, विषैले खंजर की तरह तीव्र और घातक थी।

"मेरा भाई अभी इस संसार में ज़िंदा ज़रूर है, कामिनी... किंतु तुम्हारे जैसे कलंकित वजूद के लिए वह उसी कालरात्रि में मर चुका था... और तुम हमारे लिए इस वक़्त साक्षात मृत्यु से भी बदतर हो!" पूजा ने फर्श पर घुटनों के बल बैठी कामिनी के आत्मसम्मान पर अपने शब्दों से पहला प्रहार किया।

"भूल गई अपने वे अहंकार के दिन? जब मैं तुम्हारे सामने उस आरक्षी केंद्र (थाने) में एक लाचार बहन की भांति गिड़गिड़ा रही थी, अपने भाई की गुमशुदगी की भीख मांग रही थी, तब तुमने मुझे अपने सामने न्याय की याचना करने का न्यूनतम अवसर तक नहीं दिया था! तुमने अत्यंत घमंड से कह दिया था कि 'एक बलात्कारी के साथ मेरा कोई संबंध नहीं है!' कितनी सुगमता से तुमने एक क्षण में मेरे भाई के चरित्र, उसके स्वाभिमान का सरेआम कत्ल कर दिया था!"

कामिनी फर्श पर बैठी लगातार अश्रुओं की वर्षा किए जा रही थी, उसका पूरा जिस्म भयंकर कंपन के वशीभूत था। उसने अपने दोनों हाथ जोड़कर कांपती, भर्राई आवाज में कहा, "पूजा... मुझे क्षमा कर दो... मैं पूरी तरह अंधी हो चुकी थी। मैं... मैं विनीत और विनीता के कपट जाल के आगे सत्य को देखने में सर्वथा नाकाम रही..."

"अंधी नहीं... तुम परम खुदगर्ज़ और जाहिल थी, कामिनी!" पूजा एक झटके से नीचे की ओर झुकी और अपनी नफ़रत से उबलती हुई खूंखार आँखें कामिनी के आंसुओं से भीगे चेहरे के बिल्कुल समीप ले आई।

"जब तुम्हारे असहाय माता-पिता हमारे इस सिंहानिया साम्राज्य की दहलीज़ पर अमर के लिए तुम्हारी शादी का प्रस्ताव लेकर आए थे, तब हम सब कितने प्रफुल्लित थे। हमें भ्रम था कि अमर को एक ऐसा जीवनसाथी, एक ऐसी पुलिस ऑफिसर मिली है जो हर कदम पर उसकी ढाल बनेगी, उसकी शक्ति बनेगी। किंतु तुम? तुम इस घर में एक कुलवधू या दुल्हन के रूप में नहीं आईं, बल्कि एक ऐसी संहारक डायन बनकर आईं जिसने मेरे भाई के शरीर को और मेरी पूरी जिंदगी को जीते जी राख के ढेर में तब्दील कर दिया!"

कामिनी ने इस भयानक, जलते हुए वाक्यों के मध्य अपनी सफाई में कुछ कहने के लिए अपने थरथराते होठों को खोला, किंतु पूजा ने अपनी तर्जनी उंगली उठाकर उसे बीच में ही अत्यंत बेरहमी से मौन रहने का हुक्म दे दिया।

दृश्य ३: आईना और आखिरी फैसला

"चुप...! एक शब्द भी अपने इस अपवित्र मुख से मत निकालना," पूजा की आँखों से जैसे साक्षात अंगारे बरस रहे थे। "तुमने उस दिन उस जंगल में अपना वहशीपन और पिशाच रूप दिखाते वक़्त एक बार भी यह विचार क्यों नहीं किया कि जिस इंसान ने... जिस अमर सिंहानिया ने तुम्हारी मर्ज़ी के खिलाफ कभी तुम्हें स्पर्श तक करने की चेष्टा नहीं की, जो हमेशा इस मेंशन में तुमसे सिर्फ इसलिए दूरी बनाए रखता था ताकि तुम्हें कोई असुविधा न हो, तुम्हें विवाह के इस बंधन में कोई घुटन महसूस न हो—क्या वह पवित्र इंसान कभी विनीता जैसी स्त्री के साथ ऐसा घिनौना कृत्य कर सकता है? कितना तड़पा होगा मेरा भाई उस अंधकार में... तुम्हारी एक-एक लात और बूट्स की मार सहते हुए... किंतु तुमने एक बार भी उसकी आत्मा पर तरस नहीं खाया!"

कामिनी ने सिसकते हुए अपनी नजरें घुमाकर बिस्तर पर सोए हुए अमर के शांत मुखमंडल की ओर देखा, जहाँ अभी भी उस काली रात के अगाध दर्द, खरोंचों और टांकों के गहरे निशान साफ गवाही दे रहे थे। उस बेबस चेहरे को देखते ही कामिनी के भीतर आत्म-ग्लानि का एक भयानक ज्वालामुखी फट पड़ा।

"मैं... मैं सर्वथा जानती हूँ पूजा..." कामिनी ने छाती पीटते हुए सिसकियों के मध्य कहा, उसकी आवाज भीतर से पूरी तरह से टूटकर बिखर चुकी थी। "मैंने जो अक्षम्य अपराध किया है, उसका इस संपूर्ण ब्रह्मांड में कोई प्रायश्चित, कोई न्याय नहीं है। मैं स्वयं अपनी इस खाकी वर्दी से, अपनी इस कलंकित आत्मा से घृणा करती हूँ।"

"सिर्फ घृणा...?" पूजा धीरे-धीरे वापस सीधी खड़ी हो गई और उसका लहजा अब इतना अधिक ठंडा और खतरनाक हो गया कि कक्ष की वातानुकूलित हवा भी जैसे बर्फ की सिल्लियों में बदलने लगी।

"कामिनी, मेरे भाई की इस मृतप्राय स्थिति के लिए जितने ज़िम्मेदार तुम्हारा वह नीच, कायर प्रेमी विनीत और वह झूठी विनीता हैं... उससे कहीं ज़्यादा, सौ गुना ज़्यादा अपराधी तुम स्वयं हो! क्योंकि तुम उसकी अर्धांगिनी थी, तुम्हारा परम कर्तव्य था सत्य की तह तक जाना। किंतु तुमने मेरी कुल की प्रतिष्ठा और मेरे भाई के पवित्र चरित्र को अपने पुलिसिया बूट्स के नीचे बेरहमी से रौंद डाला है। मुझे तुमसे इस सीमा तक नफ़रत है, कामिनी... कि उस नफ़रत के आगे शायद तुम्हारी मौत की सज़ा भी अत्यंत सूक्ष्म और कम पड़ जाए।"

पूजा ने अपनी आवाज को और अधिक धीमा और खौफनाक करते हुए अपना अंतिम वाक्य सुनाया, "और तुम्हें क्या भ्रम था कामिनी? कि तुम अपनी इस खाकी वर्दी के रसूख के बल पर मेरे भाई को मारकर सुरक्षित बच जाओगी? अपनी आँखें खोलो और देखो... आज इस सिंहानिया मेंशन की दहलीज़ के बाहर, इस संपूर्ण जिले की सर्वोच्च प्रशासनिक और कानूनी सत्ता—कलेक्टर सूरज—हमारे साथ एक दीवार की भांति खड़ा है। देश का कानून तो तुम्हें अब कीड़े की भांति कुचलेगा ही, किंतु कानून की उस सजा से पूर्व... मैं तुम्हारी इस पापी आत्मा को इसी घर के भीतर तड़पा-तड़पाकर जीवित दफ़न कर दूँगी।"

कामिनी के शरीर की संपूर्ण शारीरिक और मानसिक चेतना जैसे पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी। वह चाहकर भी उस बर्फीले फर्श से उठने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। वह अपनी जगह जड़वत जमी हुई, परम लाचारी से अमर के उस सोए हुए चेहरे को निहार रही थी, जो उसकी अपनी ही क्रूरता का साक्षात जिंदा प्रमाण था।

और पूजा... पूजा अपनी जगह एक फौलादी चट्टान की भांति अडिग खड़ी, एक निर्दयी और खूंखार जज की भांति उसे ऊपर से नीचे तक एक सिद्ध हो चुके मुज़रिम की नजरों से घूरे जा रही थी। कक्ष में केवल उस ऑक्सीजन मशीन की यांत्रिक ध्वनि और कामिनी की दबी हुई, घुटती हुई सिसकियां गूंज रही थीं—एक ऐसा भयानक सन्नाटा जो आने वाले एक और महा-विनाश का स्पष्ट संकेत दे रहा था।

 

 

अध्याय १९: ज़िंदा लाश और आख़िरी दस्तख़त

दृश्य १: शब्दों का कोड़ा और मूक संगमरमर

सिंहानिया मेंशन के उस बंद, वातानुकूलित शयनकक्ष के भीतर हवा जैसे किसी अज्ञात शोक में भारी होकर जम चुकी थी। पूजा फर्श पर घुटनों के बल बैठी कामिनी के सम्मुख साक्षात प्रतिशोध और न्याय की एक अडिग, फौलादी देवी की भांति खड़ी थी। उसकी जुबान से निकलने वाला एक-एक शब्द कामिनी के सीने में सुलगते, ताज़ा-तरीन पश्चाताप के घावों पर उबलते हुए तेज़ाब की तरह गिर रहा था।

"कितना तड़पा होगा मेरा भाई उस दिन तुम्हारे हाथों, कामिनी...!" पूजा की आवाज में एक ऐसी कड़कड़ाहट और बर्फीली कतरन थी जो किसी के भी कलेजे के दो टुकड़े कर दे। "वह हर एक कल्पित जुर्म, वह हर एक लात और डंडा जो तुमने उसके बेजान, निहत्थे शरीर पर अपनी राजकीय वर्दी के नशे में बरसाया था... आज भी उसकी खौफनाक चीखें उन्हीं जंगलों के अंधकार में गूंज रही हैं! तुम्हारी इस वहशी, अविवेकी क्रूरता की वजह से आज मेरा भाई न बोल सकता है और न ही अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है। तुम... तुम इस कुल की वधू या दुल्हन नहीं, तुम एक ऐसी आस्तीन की नागिन सिद्ध हुई हो कामिनी, जिसने स्वयं अपने ही सुहाग को, अपने ही हंसते-खेलते घर को डसकर भस्म कर दिया!"

कामिनी का मस्तक फर्श के ठंडे, मूक संगमरमर से लगा हुआ था। उसके नेत्रों से अविरल बहते अश्रु संगमरमर की कीमती फर्श को भिगो रहे थे, किंतु पूजा का कहर रुकने का नाम नहीं ले रहा था। उसका अपराधबोध (Guilt) इस क्षण उसे भीतर ही भीतर एक दीमक की भांति खाए जा रहा था।

"तुम्हारी सज़ा यह बाहरी कोर्ट-कचहरी और जेल की ठंडी सलाखें कदापि निश्चित नहीं करेंगी," पूजा ने घृणा और तिरस्कार से कामिनी की ओर देखते हुए कहा, "तुम्हारी असली, वास्तविक सज़ा यह है कि तुम अब अपनी संपूर्ण शेष जिंदगी एक अकेली, घुटती हुई और तड़पती हुई ज़िंदा लाश बनकर जियोगी। हर एक पल... अपनी हर एक आती-जाती सांस के साथ तुम एक ऐसे खौफनाक मानसिक बोझ के तले जियोगी, जिसमें मेरे भाई की वे चीखें, उसका वह असहनीय शारीरिक दर्द और उसका रक्त से सना हुआ वह सर्वथा बेगुनाह, मासूम बदन तुम्हें सोते-जागते, पल-पल सताएगा। यह साक्षात नरक तुम्हें किसी और ने नहीं, सिर्फ तुम्हारे अपने अविवेक और अहंकार ने तुम्हें उपहार में दिया है कामिनी! और सबसे भयानक बात... इस संपूर्ण संसार में तुम्हारा यह दुख, यह असहनीय मानसिक दर्द बांटने वाला कोई एक इंसान भी तुम्हारे वजूद के समीप शेष नहीं होगा।"

दृश्य २: ट्रॉमा का विस्फोट और टूटा हुआ दिल

कमरे में चल रही इस तीखी, भारी और दम घोटने वाली बातचीत के शोर से, बिस्तर पर लेटे अमर की पलकें अचानक भारीपन और वेदना से हिलीं। उसकी आँखें धीरे-धीरे खुलीं। ऑक्सीजन मास्क के पीछे से उसकी कमज़ोर, धुंधली नजरें जैसे ही सामने घूमती हैं, उसे ठीक अपने बिस्तर के समीप, फर्श पर घुटनों के बल बैठी कामिनी का आंसुओं से भीगा चेहरा दिखाई देता है।

कामिनी को साक्षात अपने सम्मुख देखते ही अमर की आँखों में एक भयानक डर, थरथराहट, सिहरन और एक अत्यंत गहरा, खौफनाक मानसिक आघात (Trauma) उभर आता है। उस कालरात्रि का सारा वीभत्स दृश्य, कामिनी के भारी बूट्स के प्रहार और उसकी हड्डियों के टूटने का वह असहनीय खौफ उसके मस्तिष्क में एक झटके में बिजली की भांति कौंध जाता है। अमर की आँखों से आंसुओं का एक भयानक सैलाब बह निकलता है। वह तीव्र मानसिक वेदना और बेबसी से भीतर ही भीतर बुरी तरह कराह उठता है।

तभी, अपनी उसी नव-जागृत शारीरिक शक्ति और रिफ्लेक्सिस का, जो पिछले दो दिनों से धीरे-धीरे लौट रहे थे, अपने संपूर्ण अस्तित्व का पूरा ज़ोर लगाकर—वह घृणा, नफ़रत और भयंकर डर के मारे बिस्तर की सफेद मखमली चादर को अपनी कांपती उंगलियों से पूरी ताकत से भींच लेता है, और एक झटके से अपनी गर्दन को कामिनी की ओर से फेरकर दीवार की तरफ कर लेता है। वह इस समय कामिनी की परछाई तक को अपनी नजरों के सामने एक क्षण के लिए भी बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं था।

अमर का वह रोते हुए, खौफ के मारे अपनी पत्नी की ओर से अपना मुख फेर लेना... कामिनी के लिए संसार की किसी भी शारीरिक मृत्यु, फांसी की सज़ा या पुलिस की तीसरी डिग्री की मार से करोड़ गुना ज़्यादा भयानक और प्राणघातक था। उसका बचा-कुचा राजकीय घमंड, उसकी वर्दी की हनक और उसका आत्मसम्मान सब कुछ एक पल में कांच की भांति चकनाचूर हो गया।

"अमर...!" कामिनी के कंठ से एक रूँधी हुई, फटी सी आर्तनाद और चीख निकली, "अमर... मैं... मैं तुम्हारी यह हालत, तुम्हारी मुझसे यह भयानक नफ़रत और यह डर नहीं देख सकती... मुझे एक बार देख लो अमर... मुझे एक बार अपनी सफाई का अवसर दे दो...!"

"मेरे भाई की नजरों से दूर हो जाओ कामिनी!" पूजा ने साक्षात महाकाली की भांति गरजते हुए कामिनी को बिस्तर से और पीछे की ओर ढकेल दिया। "तुमने जो खौफनाक और जानलेवा ट्रॉमा उसे दिया है, उसके पश्चात वह तुम्हारी शक्ल तक देखना पाप समझता है। तुम्हारी यह अपवित्र मौजूदगी मेरे भाई को और अधिक अस्वस्थ कर रही है! और वैसे भी, अब तुम्हारा इस दुनिया में बचा ही कौन है? इस ज़बरदस्ती के विवाह के पश्चात तुमने कभी अमर को अपने पति का सम्मान या दर्जा तक नहीं दिया, हमेशा उसे केवल उपेक्षा और मानसिक घुटन दी। और उसके बाद? उस नीच आशिक विनीत और उस कपटी विनीता की साज़िश में अंधी होकर तुमने उसी बेगुनाह पति पर यमराज बनकर ज़ुल्म ढाए! अब किस अधिकार से तुम यहाँ खड़ी हो? रहा सवाल तुम्हारे उन दोनों साज़िशकर्ताओं का... तो वे दोनों अब इस आज़ाद दुनिया में केवल कुछ ही दिनों के मेहमान हैं। उन्होंने जो कृत्य किया है, उसकी ऐसी रूह कंपा देने वाली सज़ा मैं स्वयं अपने हाथों से उन्हें दूँगी कि उनकी आने वाली पीढ़ियां भी कांप उठेंगी!"

दृश्य ३: आख़िरी अहसान और मुकम्मल अंत

पूजा ने एक झटके से अपनी साड़ी के पल्लू से एक सीलबंद लिफ़ाफ़ा निकाला और उसमें से कुछ कानूनी दस्तावेज़ निकालकर अत्यंत निर्ममता से कामिनी के सम्मुख फर्श पर फेंक दिए। कानूनी साक्ष्यों के वे सफ़ेद पन्ने हवा में सरसराते हुए कामिनी के सामने संगमरमर पर बिखर गए। उन कागज़ों के सबसे ऊपरी भाग पर बड़े, गाढ़े अक्षरों में लिखा था: तलाक के दस्तावेज़ (DIVORCE PAPERS)।

"उन दोनों की संपूर्ण तबाही से पूर्व... आज, इसी क्षण तुम्हारा यह झूठा, खोखला और ज़हरीला रिश्ता इस गौरवशाली घर से और मेरे भाई के जीवन से हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा," पूजा की आवाज में एक अंतिम और ठंडी मौत का सन्नाटा व्याप्त था।

"यह लो डाइवोर्स के पेपर्स! इस पर अपने पापी हाथों से साइन करो और हमारी जिंदगी से हमेशा-हमेशा के लिए दफ़ा हो जाओ। यदि तुम्हारे इस पत्थर के सीने के भीतर, तुम्हारे इस पुलिसिया वजूद में बची हुई इंसानियत का एक आखिरी कतरा भी बाकी है, तो मुझ पर और अपने इस बेगुनाह पति अमर पर यह अंतिम अहसान करो... और इस कागज़ पर दस्तख़त करके चली जाओ! क्योंकि अब तुम्हारे पास कोई उम्मीद, कोई अधिकार या कोई अन्य मार्ग शेष नहीं बचा है।"

कामिनी ने अपने कांपते, सर्वथा बेजान हो चुके हाथों से फर्श पर बिखरे उन श्वेत पन्नों को एकत्र किया। उसके हाथ इस कदर थरथरा रहे थे कि पास पड़ा हुआ पेन उठाने में भी उसकी उंगलियाँ उसका साथ नहीं दे रही थीं। उसने एक आखिरी, टूटी हुई उम्मीद से अमर की पीठ की ओर देखा, जो अब भी दीवार की तरफ मुख किए, खौफ और बेबसी से सिसक-सिसक कर रो रहा था।

कामिनी भली-भांति समझ चुकी थी कि उसने अपने स्वयं के हाथों से अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी, वीभत्स और कभी न सुधरने वाली हार स्वीकार कर ली है। उसका अपना भयंकर अपराधबोध (Guilt) ही इस क्षण उसका सबसे बड़ा हत्यारा बन चुका था। उसने भारी, निष्प्राण मन से पेन उठाया। रोते-रोते उसकी आँखों के आगे छाए आंसुओं के धुंधलेपन के बीच, उसने उन दस्तावेज़ों पर अपने कांपते हाथों से दस्तख़त कर दिए।

हर एक दस्तख़त के साथ जैसे वह अपने सुहाग, अपने वैवाहिक अधिकार और अपने वजूद की आखिरी सांस को स्वयं अपने हाथों से गहरे अंधकार में दफन कर रही थी।

कामिनी ने पेन को फर्श पर छोड़ दिया और फुसफुसाती हुई, एक मरी हुई आवाज में बोली, "मैं जा रही हूँ, पूजा... मैं हमेशा के लिए तुम्हारी और अमर की जिंदगी के क्षितिज से दूर जा रही हूँ। लेकिन मेरा यह भयंकर पश्चाताप, मेरा यह अक्षम्य पाप... अब मेरी शारीरिक मौत तक मेरी आत्मा का पीछा कभी नहीं छोड़ेगा। मैं खुद को जीवन के किसी भी मोड़ पर कभी माफ नहीं कर पाऊंगी।"

कामिनी धीरे से उठी, उसके पैरों के भीतर जैसे रक्त का संचार ही समाप्त हो चुका था। उसने एक आखिरी बार बिस्तर पर लेटे अमर के उस रोते हुए, लाचार बदन को देखा, और फिर बिना एक भी शब्द बोले, अपने भारी पैर घसीटते हुए उस कमरे से और सिंहानिया मेंशन की चौखट से हमेशा-ले-हमेशा के लिए बाहर निकल गई।

कमरे का भारी, नक्काशीदार मुख्य द्वार एक धीमी, गूंजती हुई आवाज़ के साथ बंद हो गया। कक्ष में एक बार फिर वही भारी, जीवन रक्षक औषधियों से सना हुआ सन्नाटा और ऑक्सीजन मशीन की धीमी, यांत्रिक आवाज़ लौट आई। कामिनी जा चुकी थी, यह कलंकित रिश्ता सदा के लिए टूट चुका था, लेकिन अमर के सीने में उठा वह खौफनाक दर्द और पूजा की आँखों में विनीत व विनीता के समूल विनाश के लिए सुलगती वह प्रतिशोध की आग... अब इस शहर में एक बहुत बड़े रक्तपात और विध्वंस का आगाज़ करने के लिए पूरी तरह से तैयार थी।

 

 

अध्याय २०: विध्वंस का चक्रव्यूह और परम एकांत

दृश्य १: माता-पिता की चौखट और कोख का परित्याग

सिंहानिया मेंशन की दहलीज़ पर अपने सुहाग, अपनी वैवाहिक अस्मिता और अपने वजूद की आखिरी सांस को तलाक के पन्नों पर दस्तख़त करके दफ़न करने के पश्चात, सर्वस्व खो चुकी कामिनी आधी रात के घने अंधकार में सड़क पर आ खड़ी हुई थी। भयंकर पश्चाताप की आग उसकी आत्मा को भीतर तक झुलसा रही थी। आँखों से बहते अविरल अश्रुओं के बीच, परम लाचारी की अवस्था में उसके पैर उसे चुपचाप उस घर की ओर ले गए, जहाँ उसका बचपन बीता था—उसके बूढ़े माता-पिता का आवास।

यह वही माता-पिता थे, जिनसे कुछ समय पूर्व उसने अपनी खाकी वर्दी के नशे और अदम्य अहंकार में आकर अपने सारे नाते-रिश्ते सदैव के लिए तोड़ लिए थे। उसने चिल्लाकर कहा था कि ज़बरदस्ती के इस विवाह के बंधन को वह स्वीकार नहीं करती और अमर सिंहानिया एक घिनौना अपराधी है। किंतु आज, सत्य के नग्न विस्फोट ने उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसका दी थी।

कामिनी ने अत्यंत कांपते, लथपथ हाथों से अपने पिता के मुख्य काष्ठ-द्वार को खटखटाया। भीतर मद्धम रोशनी हुई और द्वार खुला। सामने उसके वृद्ध, श्वेत बालों वाले पिता और पीछे खड़ी उसकी बूढ़ी माँ उपस्थित थी। अपनी बेटी को इस प्रकार बिखरी हुई, रोती हुई अवस्था में देखकर माँ का कलेजा एक क्षण के लिए कांपा, किंतु जैसे ही कामिनी ने बिलखते हुए, संगमरमर के फर्श पर गिरकर अपने अक्षम्य महापाप की गाथा सुनाई... कि कैसे उसने बिना सत्य जाने, विनीत और विनीता के कपट जाल में फंसकर अपने ही निर्दोष पति अमर सिंहानिया के जिस्म को बूट्स तले रौंदकर उसे एक जीवित लाश बना दिया है... वैसे ही उस घर की हवा साक्षात श्मशान की भांति ठंडी हो गई।

उसके वृद्ध पिता का चेहरा अत्यंत कठोर, लाल और घृणा से भर उठा। 

"चली जाओ यहाँ से... ओ कलंकिनी!" पिता की आवाज में कोई रोना नहीं था, बल्कि एक कुल के गौरव की अंतिम विदाई का पत्थर जैसा सन्नाटा था। "जिस कोख ने न्याय और रक्षा की शपथ लेने वाली एक पुलिस ऑफिसर के वेश में साक्षात एक कसाई, एक जल्लाद को जन्म दिया हो... हम उस कोख को ही आज से अपनी जिंदगी में मृत मानते हैं। अमर जैसा देवतुल्य, सज्जन और स्वाभिमानी दामाद, जिसने इस घर की निर्धनता को देखकर अपनी मर्यादा के विरुद्ध जाकर तुमसे विवाह करना स्वीकार किया ताकि हमारा मस्तक समाज में ऊँचा रहे... तुमने उस मासूम के जोड़ों को पानी की तरह तोड़ दिया? केवल इसलिए क्योंकि तुम्हारी आँखें वासना और अंधी सहेली के कपट जाल में अंधी हो चुकी थीं?"

कामिनी ने रोते हुए अपनी माँ के पैर पकड़ने चाहे, किंतु पिता ने माँ को झटके से पीछे ढकेलते हुए भारी, चबाते हुए शब्दों में कहा, "इस पापी स्त्री की परछाई भी इस घर की दहलीज़ के भीतर नहीं आनी चाहिए। कानून तुम्हें तुम्हारी वर्दी के कारण छोड़ सकता है कामिनी, किंतु जिस पिता के संस्कारों की तुमने सरेआम धज्जियां उड़ाई हैं, वह तुम्हें इस जीवन में कभी क्षमा नहीं करेगा। हमारा दामाद अपाहिज नहीं हुआ, बल्कि आज हमारी बेटी का वजूद मर चुका है। चली जाओ यहाँ से... इस घर के द्वार तुम्हारे लिए सदैव के लिए बंद हो चुके हैं।"

भड़ाम...!

मुख्य द्वार कामिनी के मुख पर पूरी ताकत से बंद हो गया। कामिनी ने उस बंद दरवाज़े पर अपना सिर पटक दिया। उसके अपने किए कर्मों की पहली और सबसे दर्दनाक सज़ा उसे उसके अपने खून ने दे दी थी।

दृश्य २: आर्थिक विध्वंस और मौन अपहरण

इसी समय के अंतराल (Time Gap) के भीतर, महानगर के बिज़नेस कॉरिडोर और कानूनी गलियारों में एक अत्यंत खौफनाक, मूक और सुनियोजित चक्रव्यूह गतिमान था। पूजा सिंहानिया अपने भाई की इस दुर्दशा का प्रतिशोध लेने के लिए केवल शारीरिक हिंसा पर निर्भर नहीं थी; उसके पास सिंघानिया ग्रुप का अगाध, असीमित धन था और अब... उसके साथ इस जिले का सर्वोच्च प्रशासनिक मुखिया—कलेक्टर सूरज—एक अभेद्य शासकीय दीवार की भांति खड़ा था।

विनीत और विनीता, जो अपने आवास में बैठकर अमर की तबाही का जश्न मना रहे थे और सोच रहे थे कि वे सिंहानिया साम्राज्य को घुटनों पर ले आए हैं, उन्हें इस बात का लेशमात्र भी आभास नहीं था कि कलेक्टर सूरज की केवल एक शासकीय कलम के पावर से उनका विनाश शुरू हो चुका था।

सूरज ने अपने विशेष प्रशासनिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए विनीत के उस छोटे से कॉर्पोरेट बिज़नेस, उसके लॉजिस्टिक्स और ट्रेडिंग के कारोबार पर रातों-रात 'स्टेट टैक्स रेड्स' और 'वित्तीय धोखाधड़ी' के कड़े कानूनी फंदे कस दिए। एक ही दिन के भीतर, विनीत के सारे कमर्शियल बैंक अकाउंट्स पूरी तरह से सीज़ (जब्त) कर दिए गए। मार्केट में जितने भी बड़े सप्लायर्स और इन्वेस्टर्स थे, पूजा ने अपने आर्थिक रसूख के एक इशारे से उन सभी का क्रेडिट विनीत की कंपनी से शून्य करवा दिया।

विनीत का वह छोटा सा कारोबार चौबीस घंटों के भीतर दीमक की भांति चाट लिया गया। वे भाई-बहन कानूनी और आर्थिक रूप से पूरी तरह से कंगाल होकर सड़क पर आ चुके थे। उनके पास अपनी रक्षा के लिए देश के किसी नामी वकील को फीस देने तक के पैसे शेष नहीं बचे थे।

किंतु पूजा और सूरज का प्रहार यहीं समाप्त नहीं हुआ। रात्रि के अंतिम प्रहर में, जब विनीत और विनीता अपने आवास के भीतर इस अचानक आई तबाही से थर-थरा रहे थे और कामिनी को सहायता के लिए कॉल करने का प्रयास कर रहे थे, तभी कलेक्टर सूरज की गुप्त प्रशासनिक ढाल के नीचे—जिसने उस क्षेत्र के स्थानीय पुलिस गश्त और सुरक्षा कैमरों को कुछ घंटों के लिए पूरी तरह से निष्क्रिय (Offline) कर दिया था—पूजा के अंतरराष्ट्रीय पेशेवर 'घोस्ट हिटमैन' (Ghost Hitmen) ने बिना कोई आवाज किए उनके आवास की घेराबंदी की।

द्वार का ताला बिना किसी शोर के टूटा। विनीत और विनीता के मुख पर क्लोरोफॉर्म के भीगे हुए कपड़े रखे गए, और इससे पहले कि वे चीख भी पाते, उनका मौन अपहरण (Abduction) कर लिया गया। उन्हें अत्यंत गोपनीयता से एक वैन के भीतर डालकर सीधे उसी घने, काल-अंधेरे जंगल की ओर रवाना कर दिया गया, जहाँ उन्होंने अमर की बलि चढ़ाई थी। इस पूरे अपरहण का न तो कोई पुलिस रिकॉर्ड था, न ही कोई सबूत।

दृश्य ३: जल्लाद का आगमन और परम एकांत

उधर, अपने माता-पिता के घर से दुत्कारी गई कामिनी की आत्मा अब पूरी तरह से ठंडी, सुन्न और वीभत्स रूप से खूंखार हो चुकी थी। वह सड़क पर अकेली खड़ी थी। हवा में उसकी खाकी वर्दी के परदे उड़ रहे थे, किंतु अब उसकी आँखों में आंसुओं का स्थान साक्षात सावन के अंधेरे ने ले लिया था। उसके अंदर की वह जांबाज, नियम-कानून को मानने वाली पुलिस ऑफिसर मर चुकी थी और उसका स्थान एक ऐसे 'खूंखार पुलिसिया जल्लाद' ने ले लिया था जो केवल रक्तपात जानता था।

उसने अपने कांपते हाथों से अपनी सर्विस रिवॉल्वर को अपनी कमर से बाहर निकाला। उसने मैगज़ीन को बाहर खींचा और उसमें पीतल की चमकीली, भारी छह गोलियां एक-एक करके पूरी निर्ममता से लोड कीं। मैगज़ीन को वापस पिस्तौल के भीतर डालते ही एक कड़क आवाज हुई—'कटाक!'

कामिनी की पुतलियाँ पूरी तरह से स्थिर हो चुकी थीं। उसने चबाते हुए शब्दों में हवा से कहा, "विनीत... विनीता... तुम दोनों ने अपनी नीचता की आग में मेरे सुहाग को जिंदा दफन कर दिया। मुझसे वह जघन्य पाप करवाया जिसकी माफ़ी मुझे साक्षात ईश्वर भी नहीं दे सकता। आज कानून न्याय नहीं करेगा... आज यह खाकी वर्दी पहनने वाली स्त्री स्वयं अपने हाथों से तुम दोनों के सीने में ये छह की छह गोलियां उतारकर तुम्हें इसी धरती के पाताल में दफन करेगी।"

कामिनी साक्षात यमराज का रूप धारण करके, अत्यंत तीव्र गति से विनीत और विनीता के आवास की ओर बढ़ी। उसके भीतर का गुस्सा अब एक हिंसक ज्वालामुखी बन चुका था। वह विनीत के आवास के मुख्य द्वार पर पहुँची। उसने बिना कोई औपचारिकता किए, अपने भारी पुलिसिया बूट्स की पूरी ताकत से द्वार पर प्रहार किया।

धड़ाम...!

द्वार टूटकर अंदर की ओर गिरा और कामिनी अपनी रिवॉल्वर सीधे तानते हुए चीखती हुई भीतर घुसी, "विनीत...! बाहर निकल नीच कायर! विनीता...!"

किंतु कमरे के भीतर प्रवेश करते ही कामिनी के कदम जैसे फर्श पर ही जम गए। उसकी रिवॉल्वर हवा में तनी हुई थी, किंतु सामने केवल एक खौफनाक, गहरा अंधकार और सन्नाटा पसरा हुआ था। कमरे की हवा में विनीत की सिगरेट का पुराना धुआँ और एक अजीब सी वीरानगी व्याप्त थी। मेज पर चाय के कप आधे खाली पड़े थे, चीजें बिखरी हुई थीं, किंतु वहाँ कोई मनुष्य नहीं था।

कामिनी पागलों की भांति दौड़ती हुई प्रथम तल के शयनकक्षों, विनीता के कमरे और बालकनी की ओर गई। उसने अलमारियां खोलकर देखीं, दीवारों पर हाथ मारे, किंतु पूरा घर साक्षात श्मशान की भांति खाली था। वे दोनों भाई-बहन वहाँ थे ही नहीं।

कामिनी के हाथ से उसकी वह भारी सर्विस रिवॉल्वर छूटकर फर्श पर गिर गई—'टन-टन-टन...'

वह भारी मन से, पागलों की तरह हंसते हुए उसी सूने घर की सीढ़ियों के ठंडे फर्श पर अपने घुटनों के बल बैठ गई। उसके मस्तिष्क की नसें फटने को तैयार थीं। क्रूरता की पराकाष्ठा देखिए—जिस प्रतिशोध की आग में जलकर वह विनीत और विनीता का मर्डर करने आई थी, ताकि अपने पाप का थोड़ा सा बोझ कम कर सके... वह प्रतिशोध भी उससे छीन लिया गया था! पूजा के चक्रव्यूह ने उसे बदला लेने का अंतिम अधिकार तक नहीं दिया था।

अब कामिनी इस अनंत ब्रह्मांड में पूरी तरह, मुकम्मल रूप से अकेली हो चुकी थी। उसका सुहाग अमर सिंहानिया डाइवोर्स देकर उससे अपनी शक्ल तक छिपा चुका था, उसके अपने माता-पिता ने उसे अपनी कोख का कसाई कहकर द्वार बंद कर लिए थे, और जिन दोनों साज़िशकर्ताओं को वह अपने हाथों से मौत की नींद सुलाने आई थी, वे भी गायब हो चुके थे।

इस सूने, अंधेरे घर के भीतर केवल कामिनी की अपनी घुटती हुई, तड़पती हुई सिसकियां गूंज रही थीं। उसका दुख, उसका पश्चाताप और उसकी रूह की चीखें सुनने वाला इस पूरी दुनिया में अब कोई एक इंसान भी जीवित नहीं बचा था। वह परम एकांत के उस जीवित नरक में डूब चुकी थी, जहाँ से अब केवल उसकी अपनी मानसिक मौत ही उसे मुक्ति दे सकती थी।

 

 

ध्याय २१: जंगल का न्याय और नंगा नाच

दृश्य १: घोस्ट हिटमैन और क्रूर आदेश

सिंहानिया मेंशन का वह अत्यंत गुप्त, विशाल और तकनीकी रूप से सर्व-सुविधा संपन्न 'कमांड रूम' इस समय पूरी तरह से अंधकार के आगोश में डूबा हुआ था। उस घने अंधेरे को चीरती हुई केवल सम्मुख दीवार पर लगी ८५ इंच की विशाल ८K एलईडी (LED) स्क्रीन की नीली, ठंडी और रहस्यमयी रोशनी पूरे कक्ष में फैल रही थी। बिस्तर पर लेटा अमर अपनी नम, सूजी हुई और त्रासद आँखों से उस स्क्रीन को बिना पलक झपकाए एकटक निहार रहा था, और उसके समीप बैठी उसकी बहन पूजा ने उसका हाथ इतनी फौलादी ताकत से भींच रखा था कि उसकी स्वयं की उंगलियों के पोर पूरी तरह सफेद पड़ चुके थे।

पूजा ने इस खूनी खेल को अंतिम परिणति तक पहुँचाने के लिए किसी आम स्थानीय मुज़रिम या सड़क छाप गुंडों को स्पर्श तक नहीं किया था। उसने अंतरराष्ट्रीय अंडरवर्ल्ड के सबसे महंगे, शातिर और खूंखार 'घोस्ट हिटमैन' (Ghost Hitmen) की एक विशेष हत्यारा टीम को महाद्वीप के बाहर से भारी-भरकम धनराशि देकर हायर किया था। ये ऐसे पेशेवर कॉन्ट्रैक्ट किलर्स (Contract Killers) थे, जिनका इस देश की पुलिस, खुफिया तंत्र या सरकारी रिकॉर्ड में दूर-दूर तक कोई नाम-निशान नहीं था। इन्हें केवल और केवल इसी विशिष्ट डेथ-मिशन के लिए एक निजी चार्टर्ड प्लेन के माध्यम से यहाँ लाया गया था—काम समाप्त, कोई सुराग नहीं छोड़ना, और अगली ही सुबह होने से पूर्व वापस अपनी अंतरराष्ट्रीय सरहद पार।

इस क्रूर, भावनाओं से परे टीम में दो ऐसी विदेशी महिला असेसिन्स (Lady Assassins) भी सम्मिलित थीं, जिनके संगमरमरी चेहरों पर दया या करुणा की कोई लकीर नहीं थी, बल्कि केवल मौत का एक डरावना, ठंडा सन्नाटा पसरा हुआ था।

पूजा ने टीम लीडर को सैटेलाइट फोन पर जो अपना अंतिम, बर्फीला निर्देश दिया था, उसकी टेप की हुई आवाज इस वक्त उस कमांड रूम के सन्नाटे में बार-बार गूंज रही थी:

"मुझे विनीत और विनीता दोनों के समूल विनाश का एक-एक सेकंड का लाइव वीडियो फीड (Live Streaming) इसी स्क्रीन पर चाहिए। और स्मरण रहे... उन्हें उसी सटीक भौगोलिक स्थान पर ले जाओ, उस घने, भयानक और काल-अंधेरे जंगल के उसी हिस्से में, जहाँ उन दोनों की घिनौनी साज़िश के कारण मेरे भाई अमर की यह मृतप्राय हालत की गई थी। उन्हें कोई सरल या त्वरित मौत मत देना! वे अपनी जिंदगी की भीख मांगते हुए हर एक पल नरक को जिएं, उनके हलक से निकलने वाली हर एक खूनी चीख में उस असहनीय शारीरिक दर्द का अहसास होना चाहिए जो मेरे भाई ने उस रात उस कीचड़ में अकेले झेला था। उससे कई गुना ज़्यादा तड़प उन्हें इसी वक्त मिलनी चाहिए!"

दृश्य २: एक घंटे का नरक और हंसती हुई मिट्टी

कमांड रूम की उस विशाल स्क्रीन पर लाइव स्ट्रीमिंग (Live Streaming) आरंभ हो चुकी थी। कैमरे का वाइड एंगल सीधे उस घने, डरावने जंगल के बीचो-बीच का दृश्य दिखा रहा था, जहाँ मूसलाधार बारिश के बाद की गीली, सड़ती हुई मिट्टी और पत्तों के बीच विनीत और विनीता दोनों कीड़े-मकोड़ों की भांति रेंग रहे थे। उनके महंगे, कॉर्पोरेट वस्त्र चीथड़ों में बदल चुके थे और उनके शरीरों का एक-एक हिस्सा खरोंचों और बहते हुए गाढ़े खून से लथपथ हो चुका था।

उन दोनों के सम्मुख साक्षात काल बनकर वे भाड़े के पेशेवर हत्यारे खड़े थे। उन दोनों विदेशी लेडी असेसिन्स ने विनीता को उसके सुनहरे बालों से पकड़कर उस कीचड़ और कटीली झाड़ियों में घसीटना शुरू किया। विनीता असहनीय वेदना से चीख रही थी, किंतु उन क्रूर महिलाओं के फौलादी हाथों में सजे लोहे के नकल्स (Knuckles) और भारी डंडे बिना किसी मानवीय रहम के विनीता के घुटनों, कंधों और रीढ़ की हड्डी पर बरस रहे थे।

कड़ाक... कड़ाक...!

हड्डियों के चटखने और टूटने की वह वीभत्स, भयानक आवाज़ स्क्रीन के आधुनिक स्पीकर्स से निकलकर अमर के शयनकक्ष में गूंज उठी। वे दोनों हत्यारी स्त्रियां इतने पेशेवर तरीके से विनीता की एक-एक हड्डी को चटका रही थीं कि वह मरे नहीं, बल्कि हर एक फ्रैक्चर के साथ साक्षात जीवित नरक के दर्द को भोगे।

दूसरी ओर, तीन पुरुष हिटमैन विनीत को बेरहमी से ठोंक रहे थे। उन्होंने विनीत के दोनों पैरों के पंजों को अपने भारी, कँटीले मिलिट्री बूट्स से पूरी ताकत से कुचलकर पीस दिया था। विनीत अपने टूटे हुए जबड़े, टूटे दांतों और बहते हुए खून के बीच अपने दोनों हाथ जोड़कर अपनी जान की भीख मांग रहा था, "मुझे... मुझे छोड़ दो... पूजा... कामिनी... मुझे बचाओ... मुझे मारो मत...!"

किंतु उन घोस्ट हिटमैन के चेहरों पर कोई हरकत, कोई शिकन नहीं थी। वे बिना थके, किसी यांत्रिक मशीन की भांति लगातार उसके जिस्म पर वार कर रहे थे। लगभग पूरे एक घंटे तक उस घने, खामोश जंगल में विनीत और विनीता पर मौत का यह खौफनाक और नग्न तांडव चलता रहा। वह आदिम जंगल, जो कभी अमर की बेबस, बेगुनाह चीखों पर खून के आंसू रोया था, आज उन्हीं साज़िशकर्ताओं के अपवित्र खून से नहाकर विनीत और विनीता की इन भयानक, तड़पती हुई चीखों पर हवा के झोंकों के साथ ज़ोर-ज़ोर से हंस रहा था। यह कुदरत का सबसे क्रूर, सटीक और मुकम्मल न्याय था।

दृश्य ३: मॉनिटर की रोशनी और मुकम्मल इंतकाम

मेंशन के उस बंद, ठंडे कमांड रूम में, स्क्रीन पर चल रहे इस भयानक खूनी मंज़र को देखकर बिस्तर पर लेटे अमर की आँखों से आंसुओं का एक और सैलाब बह निकला। उसका पूरा अपाहिज शरीर बिस्तर पर बुरी तरह से थर-थरा रहा था। विनीत और विनीता की यह नृशंस हालत देखकर उसे कोई दया नहीं आ रही थी, बल्कि उसके मस्तिष्क में साक्षात वह उसकी अपनी ही काली रात का भयानक आघात (Trauma) जाग उठा था... उसे याद आ रहा था कि कैसे उसकी अपनी पत्नी कामिनी ने इसी जंगल में, इसी कीचड़ पर बिना सोचे-समझे, अंधी होकर उस पर वे खौफनाक वार किए थे।

उसे कामिनी की वे नफ़रत से उबलती हुई आँखें और स्वयं की बेबसी की वह आखिरी तड़प याद आ रही थी। वह अपनी इस लाचार, मूक हालत में अपने भीतर उठती सुबकियों और सिसकियों को दबाने में सर्वथा असमर्थ था।

पूजा ने अमर का हाथ और अधिक मजबूती से भींच लिया, उसकी पुतलियों में अपने भाई के प्रतिशोध के मुकम्मल होने की एक अत्यंत ठंडी, हिंसक और संतोषजनक चमक व्याप्त थी।

"देखो भाई... अपनी आँखें खोलकर ध्यान से देखो," पूजा की आवाज में एक बर्फीला सुकून और कड़क थी। "यही हैं तुम्हारी इस बदतर शारीरिक हालत के असली सूत्रधार, असली गुनहगार। विनीत और विनीता... जिन्होंने तुम्हें धोखे और कपट के जाल में फंसाया। आज इनका अंतिम फैसला इसी मिट्टी पर हो रहा है। इन्हें तड़पने दो, इन्हें मौत इतनी सुगमता से प्राप्त नहीं होनी चाहिए। इन्हें इस ब्रह्मांड में अहसास होना चाहिए कि एक निर्दोष इंसान का शरीर और उसकी पवित्र आत्मा तोड़ने का अंतिम अंजाम कितना भयावह होता है!"

अमर ने अत्यधिक मानसिक वेदना से अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, मानो वह अपनी पत्नी कामिनी द्वारा दिए गए उन गहरे मानसिक ज़ख़्मों को अपने मस्तिष्क से सदैव के लिए मिटा देने का निष्फल प्रयास कर रहा हो।

पूजा ने धीरे से आगे बढ़कर अमर के पसीने से भीगे माथे को चूमा और अत्यंत शांत लहजे में कहा, "मैं भली-भांति जानती हूँ भाई... तुम इस वक्त क्या सोच रहे हो। तुम्हें कामिनी की याद आ रही है ना? उस पापी औरत ने जो तुम्हारे पवित्र प्रेम के साथ किया, तुम्हारी प्रतिष्ठा और तुम्हारे इस सुंदर जिस्म का जो निर्मम कत्ल किया, उसका ज़ख़्म शायद इस जन्म में कभी नहीं भरेगा। लेकिन तुम लेशमात्र भी चिंता मत करो..."

पूजा ने स्क्रीन की ओर देखते हुए अपने अंतिम पत्ते खोले, "विनीत और विनीता का काम तो इन भाड़े के शिकारियों ने आज तमाम कर दिया, ये तो अब कुछ ही मिनटों में तड़पकर मर जाएंगे। और तुम फिक्र मत करो भाई, सुबह की पहली किरण फूटने से पहले मेरे ये असेसिन्स चार्टर्ड प्लेन से अंतरराष्ट्रीय सरहद पार सुरक्षित पहुँच चुके होंगे। हमारे परम मित्र कलेक्टर सूरज के गुप्त शासकीय आदेश पर एयरपोर्ट के सुरक्षा रडार और सभी कैमरों को अगले एक घंटे के लिए पूरी तरह 'ब्लैकआउट' यानी बंद कर दिया गया है। इस जिले की पुलिस चाहकर भी इस जंगल की राख के अलावा कोई एक सबूत नहीं ढूंढ पाएगी।"

पूजा ने एक क्रूर मुस्कान के साथ बात समाप्त की, "रहा सवाल कामिनी का... तो उसका हिसाब यह वक़्त खुद अपने तरीके से कर रहा है। वह डाइवोर्स पेपर्स पर साइन करके इस गौरवशाली घर से बेदखल होकर जा चुकी है। वह अपनी वर्दी का घमंड खो चुकी है, और इस वक़्त वह उसी विनीत के सूने, वीरान घर की सीढ़ियों पर अपनी ही पिस्तौल लेकर एक अकेली, घुटती हुई ज़िंदा लाश बन चुकी है जिसके लिए अब मौत भी एक बहुत बड़ा उपहार होगी। वक़्त उसे हर दिन, हर सांस के साथ थोड़ा-थोड़ा करके अंदर से मारेगा।"

तभी स्क्रीन पर, उन पेशेवर हिटमैन ने विनीत और विनीता के बेजान, कुचले हुए लहूलुहान शरीरों पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी। जंगल के उस घने अंधकार में दो गगनचुंबी खूनी चिताएं धधक उठीं।

सिंघानिया साम्राज्य का बदला पूरी तरह से मुकम्मल हो चुका था। पूजा के चेहरे पर अब एक भयानक, साम्राज्यवादी शांति व्याप्त थी, लेकिन सिंहानिया मेंशन का यह सन्नाटा और अमर की टूटी हुई, अपाहिज जिंदगी अभी भी उसी बिस्तर पर अपने जीवन के एक नए, अज्ञात सवेरे की प्रतीक्षा कर रही थी।

 

 

अध्याय २२: कर्मों का चक्रव्यूह और नई किरण

दृश्य १: श्राप की परिणति और तिल-तिल मरती कामिनी

विनीत और विनीता के उनके अपने आवास से अचानक रहस्यमयी ढंग से गायब हो जाने के पश्चात, कामिनी के वजूद के चारों ओर एक ऐसा खौफनाक और अभेद्य सन्नाटा पसर चुका था, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। वह महानगर की उस बेगाना भीड़ में अब एक ऐसी तन्हा और कटी हुई पतंग की भांति थी, जिसे थामने वाला इस संपूर्ण ब्रह्मांड में कोई एक इंसान भी शेष नहीं बचा था।

मध्यरात्रि के इस अंतिम प्रहर में, कामिनी अपने सूने, अंधकारमय शयनकक्ष के फर्श पर घुटनों के बल बैठी हुई थी। हवा में उसकी सर्विस रिवॉल्वर की ठंडी गंध और उसके नेत्रों से बहते हुए खारे अश्रु संगमरमर पर गिर रहे थे। किंतु इस क्षण, उसके कानों के सन्नाटे को चीरती हुई एक ऐसी आवाज़ गूंज रही थी, जो उसके मस्तिष्क की एक-एक नस को फाड़ने पर उतारू थी।

यह किसी और की नहीं, बल्कि उसी कालरात्रि को उस घने, काल-अंधेरे जंगल की कीचड़ में लहूलुहान पड़े अमर सिंहानिया की वह अंतिम, फटी हुई और रोंगटे खड़े कर देने वाली आर्तनाद थी! जब कामिनी अपने शासकीय खाकी के मद में अंधी होकर उसके जोड़ों को अपने बूट्स तले बेरहमी से तोड़ रही थी, तब अपनी आखिरी सांसों से लड़ते हुए उस मासूम ने कामिनी की पुतलियों में आँखें डालकर एक आदिम और वीभत्स श्राप दिया था— "कामिनी...! तुम अपनी इस खाकी वर्दी के अहंकार में आज मेरे इस निर्दोष जिस्म और मेरे चरित्र को तो मिटा सकती हो... किंतु स्मरण रखना... तुम जीवनभर तड़पोगी! तुम अपनी इस बची हुई जिंदगी के हर एक पल, हर एक सांस के साथ इस जघन्य पाप का असहनीय बोझ अकेले ढोगी, और साक्षात एक जीवित लाश बनकर इस आत्मग्लानी के नरक में जलोगी...!"

आज, दो दिन के भीतर ही अमर का वह श्राप साक्षात एक खौफनाक वास्तविकता बनकर कामिनी के सामने खड़ा था। उसका वह प्रचंड अहंकार, जिसके बल पर उसने अपने सुहाग की बलि चढ़ा दी थी, अब धूल में मिल चुका था। जिस विनीत और विनीता की वासना और कपट के लिए उसने अपनी आत्मा का सौदा किया था, वे उसका बदला पूरा होने से पूर्व ही अदृश्य हो चुके थे। कामिनी अपने ही बुने हुए अपराधबोध (Guilt) के उस दलदल में इस सीमा तक धंस चुकी थी, जहाँ से अब बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं था। वह साक्षात एक ज़िंदा लाश के रूप में तब्दील हो चुकी थी, जिसे वक़्त अब प्रतिपल, थोड़ा-थोड़ा करके भीतर से मार रहा था।

दृश्य २: पूजा और सूरज के निश्छल प्रेम का इज़हार

कथा का रुख अब सिंहानिया मेंशन के उस भव्य किंतु वर्तमान में अत्यंत शांत और उदास प्रांगण की ओर मुड़ता है। सिंहानिया साम्राज्य पर टूटे इस भयंकर वज्रपात और अमर की इस मृतप्राय स्थिति के इन सबसे अंधकारमय दिनों में, यदि कोई एक शक्ति पूजा के स्वाभिमान और उसके भाई के न्याय के लिए अडिग खड़ी रही थी—तो वह साक्षात इस जिले की सर्वोच्च प्रशासनिक सत्ता, कलेक्टर सूरज थे।

सूरज ने केवल पूजा से प्रेम का मौखिक दावा नहीं किया था, बल्कि जब पूरा संसार सिंहानिया परिवार के विपरीत खड़ा था, तब वह अपनी असीमित शासकीय कलम, अपना प्रशासनिक रसूख और अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर पूजा के पीछे एक फौलादी चट्टान की भांति डटा रहा। उसने असेसिन्स के विमान को सुरक्षित विदाई देने के लिए अपने पावर का उपयोग किया था। सूरज के इस अप्रतिम, निस्वार्थ और अटूट समर्पण ने पूजा के भीतर बैठे उस पत्थर बन चुके हृदय को धीरे-धीरे पिघलाना आरंभ कर दिया था।

मेंशन की विशाल बालकनी में, जहाँ भोर की पहली मद्धम किरणें आकाश के क्षितिज पर उभर रही थीं, कलेक्टर सूरज और पूजा एक-दूसरे के समीप खड़े थे। सूरज ने पूजा की आंसुओं से भीगी, थकी हुई आँखों में देखा और अत्यंत शालीन, गंभीर किंतु गहरे इमोशन से भरे लहजे में आखिरकार अपने अंतर्मन के प्रेम का इज़हार कर दिया।

"पूजा... मैंने जीवन में केवल कानून और शासन की व्यवस्था को संभाला था," सूरज की आवाज में एक सच्चे पुरुष का निश्छल गौरव था। "किंतु तुम्हारे इस संघर्ष, तुम्हारे अपने भाई के प्रति इस अगाध समर्पण को देखकर मेरी आत्मा ने तुम्हें अपनी नियति मान लिया है। मैं सिंहानिया साम्राज्य के इस वैभव से प्रेम नहीं करता, पूजा। मैं तुमसे प्रेम करता हूँ। मैं तुम्हारे जीवन के इस सबसे काले पतझड़ में तुम्हारी ढाल बनना चाहता हूँ। यदि तुम अनुमति दो, तो मैं तुम्हारी जिंदगी की इस हर एक कठिन डगर पर, तुम्हारी हर एक सुबकी और हर एक मुश्किल के सामने साक्षात एक जीवनसाथी बनकर खड़ा होना चाहता हूँ।"

पूजा की आँखों से आंसुओं की कुछ बूंदें छलक कर उसके गालों पर आ गईं। उसने सूरज के उन स्थिर, सुरक्षित हाथों की ओर देखा। जो लड़की पिछले कई दिनों से केवल प्रतिशोध की आग में जल रही थी, उसे आज सूरज के निस्वार्थ प्रेम की छांव में एक अगाध आत्मिक सुकून की प्राप्ति हुई। उसने अत्यंत मद्धम गति से अपनी आँखें झुकाकर नम आँखों से सूरज के इस पवित्र समर्पण को अपनी मौन स्वीकृति दे दी। यह दो आत्माओं का वह मिलन था, जो आने वाले विनाश के बाद एक नए सृजन की नींव रखने वाला था।

दृश्य ३: 'किरण' का आगमन और पुनर्जन्म का संकल्प

इसी समय के अंतराल के भीतर, अमर के जीवन और सिंहानिया साम्राज्य के क्षितिज पर एक अत्यंत गरिमापूर्ण, शक्तिशाली और शालीन चरित्र का शुभागमन होता है—'किरण'।

किरण कोई साधारण स्त्री नहीं थी, बल्कि वह स्वयं इस देश की एक अत्यंत प्रतिष्ठित, कुलीन और अग्रिम पंक्ति की बिज़नेस टाइकून थी। वह सिंहानिया परिवार के पुराने बिज़नेस नेटवर्क्स और अमर के उस अद्वितीय व्यावसायिक कौशल से वर्षों से भली-भांति परिचित थी। जब किरण को अमर के साथ घटित हुए इस वीभत्स और रोंगटे खड़े कर देने वाले हादसे का सत्य ज्ञात हुआ, तो उसका अंतर्मन भीतर तक हिल गया। वह बिना एक क्षण व्यर्थ किए सीधे सिंहानिया मेंशन पहुँची।

कमांड रूम और डॉक्टरों की टीम के मध्य खड़ी किरण ने जब बिस्तर पर लेटे उस निस्तेज, अचल और ऑक्सीजन मास्क के पीछे छिपकर रोते हुए अमर सिंहानिया को देखा, तो उसकी आँखों में एक अगाध करुणा और संकल्प की चमक उभर आई। वह चलकर सीधे पूजा के समीप आई और अत्यंत विश्वास के साथ पूजा का हाथ अपने हाथों में थाम लिया।

किरण ने सिंहानिया ग्रुप के साथ अपने संपूर्ण साम्राज्य और बिज़नेस को 'मर्ज' (विलय) करने की अपनी प्रबल इच्छा प्रकट की। उसकी आवाज में एक अत्यंत जादुई और सम्मोहक धीरता थी।

"पूजा... इस सिंहानिया साम्राज्य को इस समय बिखरने से रोकना हमारा परम कर्तव्य है," किरण ने पूजा की आँखों में आँखें डालकर कहा। "विनीत और विनीता का अंत हो चुका है, किंतु अमर सिंहानिया को फिर से जीवित करना इस संसार की सबसे बड़ी आवश्यकता है। मेरा एक प्रस्ताव है... तुम सिंहानिया ग्रुप के इस संपूर्ण वैश्विक कारोबार और इस साम्राज्य को संभालो, इसे अपनी पूरी शक्ति से फिर से उन्हीं ऊंचाइयों पर ले जाओ जहाँ अमर इसे देखना चाहता था... और तब तक... अमर सिंहानिया का संपूर्ण उत्तरदायित्व मेरा है!"

पूजा ने चौंककर किरण की ओर देखा। किरण ने बिस्तर पर सोए अमर की ओर अपने कदम बढ़ाए और अत्यंत पवित्रता से उसका हाथ थामते हुए पूजा से पुनः कहा, "मैं वचन देती हूँ पूजा... मैं इस इंसान को अपनी आत्मा का सहारा दूँगी। इसके शरीर के इस टूटे हुए एक-एक जोड़ को डॉक्टरों की थेरेपी और मेरे निस्वार्थ प्रेम की औषधि से फिर से जीवित करूँगी। मैं इसे फिर से वही गौरवशाली, अदम्य और अजेय अमर सिंहानिया बनाऊंगी, जो वह इस कालरात्रि के हादसे से पूर्व था। तुम साम्राज्य संभालो, अमर को मैं संभालूंगी।"

किरण का वह निस्वार्थ, पवित्र और फौलादी आत्मिक सहारा अमर के उस जटिल उपचार की सबसे मजबूत नींव बन गया। डॉक्टर और फिजियोथेरेपिस्ट की टीम ने काम शुरू किया। अमर की उंगलियों की वह सूक्ष्म हलचल, जो कुछ समय पूर्व आरंभ हुई थी, अब किरण के इसी निस्वार्थ संबल के कारण एक लंबी, कठिन और अत्यंत पीड़ादायक 'न्यूरो-थेरेपी' में बदलने वाली थी। अमर को इस बिस्तर से उठकर, अपनी आवाज वापस पाकर, अपने पैरों पर पुनः खड़े होने में पूरे दो साल का लंबा और अत्यंत कड़ा समय लगने वाला था... और इन दो सालों में किरण साक्षात उसकी परछाई बनकर उसके साथ खड़ी रहने का संकल्प ले चुकी थी।

 

 

अध्याय २३: एक नया सवेरा और अनंत अंधेरा

दृश्य १: दो साल का फासला और बदला हुआ मुकद्दर

वक़्त का क्रूर और अविराम पहिया अपनी तीव्र रफ़्तार से घूमता रहा और देखते ही देखते दो वर्ष का एक लंबा, कष्टदायी और परिवर्तनकारी समय बीत गया। इन दो सालों में समय की लहरों ने बहुत कुछ बदल कर रख दिया था। पूजा ने अपने भाई के लहू के एक-एक कतरे का अंतिम और वीभत्स हिसाब विनीत और विनीता की चिताओं की राख के साथ उसी काल-अंधेरे जंगल की मिट्टी में सदैव के लिए दफ़न कर दिया था। किंतु इन दो वर्षों के अंतराल में जो सबसे बड़ा, अकल्पनीय और ईश्वरीय चमत्कार घटित हुआ था, वह था अमर सिंहानिया का पुनर्जन्म।

महानगर के सबसे भव्य, आलीशान और तकनीकी रूप से उन्नत कन्वेंशन सेंटर के ग्रैंड ऑडिटोरियम में आज देश के सबसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय बिजनेस समिट (National Business Summit) का आयोजन किया गया था। चारों ओर देश-विदेश के शीर्ष उद्योगपति, राजनेता, कॉर्पोरेट टाइकून्स, मीडिया के कैमरों की चकाचौंध कर देने वाली फ्लैश लाइट्स और सुरक्षाकर्मियों का एक अभेद्य, भारी पहरा मौजूद था। पूरे ऑडिटोरियम के भीतर एक उत्सव जैसा कोलाहल और सिंहानिया साम्राज्य की गूंज व्याप्त थी।

इसी वीआईपी (VIP) भीड़ के मध्य, ऑडिटोरियम की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को संभालने के लिए तैनात पुलिस बल के साथ ऑफिसर कामिनी भी वहाँ मूक खड़ी थी। इन दो वर्षों के एकांत ने कामिनी के शारीरिक और मानसिक वजूद को भीतर से पूरी तरह खोखला और जर्जर कर दिया था। उसकी सूजी हुई आँखों के नीचे काले, गहरे घेरे (Dark Circles) उसके भीतर सुलगती तड़प की गवाही साफ दे रहे थे। वह अपनी खाकी वर्दी में वहाँ रीढ़ सीधी किए खड़ी अवश्य थी, किंतु उसके भीतर जीवन का कोई अंश, कोई चेतना शेष नहीं बची थी।

दो वर्ष पूर्व, अपने स्वयं के माता-पिता की चौखट से एक कसाई कहकर दुत्कारी जाने, विनीत-विनीता के रहस्यमयी अंत और सिंहानिया मेंशन से सदैव के लिए बेदखल होने के पश्चात, वह हर एक दिन, अपनी हर एक आती-जाती सांस के साथ अमर के उसी खौफनाक जंगल वाले श्राप को भुगत रही थी। वह अपनी ही रूह के पश्चाताप की अंतहीन आग में जलकर साक्षात एक सच्ची 'जिंदा लाश' बन चुकी थी। इस संपूर्ण ब्रह्मांड में उसका दुख बांटने वाला, उसकी सिसकी सुनने वाला कोई एक इंसान भी जीवित नहीं था।

तभी, ऑडिटोरियम के विशाल मुख्य काष्ठ-द्वारों पर अचानक हलचल तीव्र हुई, सुरक्षाकर्मी मुस्तैद हुए और मीडिया के सभी राष्ट्रीय कैमरों के रुख एक झटके में एक ही दिशा की ओर घूम गए। मुख्य उद्घोषक (Anchor) ने माइक पर अत्यंत गंभीर और राजसी आवाज में घोषणा की:

"लेडीज एंड जेंटलमैन... प्लीज वेलकम द री-इलेक्टेड ग्लोबल चेयरमैन ऑफ सिंहानिया ग्रुप... मिस्टर अमर सिंहानिया!"

दृश्य २: नई शुरुआत और टूटती हुई उम्मीद

'अमर सिंहानिया' का नाम लाउडस्पीकर्स पर गूंजते ही कामिनी के पूरे निष्प्राण शरीर में जैसे एक क्षण के लिए बिजली की कोई तीव्र तरंग दौड़ गई। उसकी सूनी, पथराई हुई आँखों में अचानक एक आखिरी, अत्यंत दुर्बल उम्मीद की किरण जागी। उसने अपनी नजरें घुमाईं और सांस रोककर मुख्य द्वार की ओर देखा।

सामने से रेड कारपेट पर साक्षात विधाता के न्याय की भांति अमर सिंहानिया आगे बढ़ रहा था। दो वर्षों की अत्यंत कठिन, पीड़ादायक न्यूरो-थेरेपी, चिकित्सा और असीम आत्मिक संबल के पश्चात वह आज पुनः अपने पैरों पर पूरी मजबूती से खड़ा था। यद्यपि डॉक्टरों की विशेष सलाह पर उसके दाहिने हाथ में एक अत्यंत स्टाइलिश, महोगनी ब्लैक वॉक-स्टिक (Stick) थी, जिसके सहारे वह अपनी चाल को संतुलन दे रहा था, किंतु उसके मुखमंडल पर वही दो वर्ष पुरानी शाही चमक, अदम्य आत्मविश्वास और ओजस्वी मुस्कान वापस लौट चुकी थी। उसके कंठ के सारे ज़ख़्म पूरी तरह भर चुके थे और उसकी आवाज का वह पुराना सिंह-नाद वापस आ चुका था।

अमर को इस प्रकार पूर्णतः सही-सलामत, अजेय और जीवित देखकर कामिनी के क्षत-विक्षत दिल में एक अजीब सी, दीवानी तड़प उठी। वह लोक-लाज, अपनी खाकी वर्दी की मर्यादा और समाज की सारी बंदिशें भूलकर, एक अंतिम आत्मघाती उम्मीद के वशीभूत होकर भीड़ को चीरती हुई अत्यंत तीव्र कदमों से अमर की ओर बढ़ने लगी। उसके भीतर के अपराधबोध ने सोचा कि शायद... शायद अमर उसे इस अवस्था में देखकर एक बार रुकेंगे, और वह उनके पैरों में गिरकर अपने पापों की भीख मांग सकेगी।

किंतु... केवल चार कदम आगे बढ़ते ही कामिनी के पैर फर्श के संगमरमर पर जैसे हमेशा-ले-हमेशा के लिए जम गए। उसके चेहरे का संपूर्ण रक्त सूख गया, रंग उड़ गया और उसकी पुतलियाँ फटी की फटी रह गईं।

अमर वहाँ अकेला नहीं था। उसके ठीक बगल में, उसका दाहिना हाथ अपने दोनों हाथों की उंगलियों में अत्यंत पवित्रता, अधिकार और गर्व से थामे एक बेहद खूबसूरत, शालीन, कुलीन और अद्वितीय आत्मविश्वास से दीप्तिमान लड़की चल रही थी। वह लड़की कोई और नहीं, बल्कि दो वर्ष पूर्व अमर को जीवनदान देने का संकल्प लेने वाली देश की अग्रिम पंक्ति की बिजनेस टाइकून—'किरण' थी!

अमर ने चलते-चलते अचानक अपने कदम रोके और पूरी दुनिया, मीडिया और कैमरों के सामने किरण की ओर देखा। अमर की आँखों में किरण के लिए एक ऐसा सच्चा, अगाध और निष्कपट प्रेम उभर आया, जो प्रेम उसने कभी कामिनी के लिए अपनी आँखों के गुप्त कोनों में छुपाया था, जिसे कामिनी पहचान न सकी थी। किरण अब अमर की जिंदगी का नया, अटूट हिस्सा थी... उसकी वह गौरवशाली अर्धांगिनी और पत्नी थी, जिसने अमर के उस बिखरे हुए, अपाहिज वजूद को तब अपनी आत्मा से थाम लिया था जब वह साक्षात मौत के बिस्तर पर वेंटिलेटर पर था।

कामिनी के पैरों तले से जैसे संपूर्ण पृथ्वी ही खिसक गई। उसका हृदय कांच के किसी पात्र की भांति टूटकर अरबों टुकड़ों में बिखर गया। वह अपनी जगह सुन्न खड़ी रह गई, उसके सूखे होठों से केवल एक थरथराहट निकली, "अमर... वह... वह उसका हाथ..."

दृश्य ३: शून्य का अहसास और मुकम्मल इंसाफ

"वह सिर्फ सिंहानिया ग्रुप की नई ग्लोबल पार्टनर नहीं है, कामिनी... वह अमर की धर्मपत्नी है, इस साम्राज्य की कुलवधू है और मेरी भाभी है।"

तभी कामिनी के ठीक पीछे से एक अत्यंत ठंडी, स्थिर, भारी और बिना किसी मानवीय भाव की आवाज गूंजी। कामिनी ने कांपते हुए, डरते-डरते पीछे मुड़कर देखा। पूजा वहाँ खड़ी थी। पूजा के चेहरे पर इस वक्त न तो कोई क्रोध था, न कोई प्रतिशोध की ज्वाला थी, न कोई नफ़रत थी और न ही कोई तंज था—उसका मुखमंडल पूरी तरह से 'भावहीन' (Expressionless) था।

उसकी आँखों में एक ऐसा असीम खालीपन था, जो किसी भी तीखी, जलती हुई नफ़रत से हजार गुना ज्यादा खौफनाक था। क्योंकि नफ़रत भी वहीं जीवित रहती है जहाँ कोई रिश्ता, कोई उम्मीद या कोई अहसास बाकी हो; किंतु पूजा की नजरों में अब कामिनी के वजूद के लिए केवल और केवल एक अनंत 'शून्य' था।

"किरण ने अमर को तब संभाला," पूजा ने स्टेज की ओर अपनी नजरें टिकाते हुए अत्यंत शांत, बर्फीली आवाज में कहा, "जब वह पूरी तरह टूट चुका था, जब डॉक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिए थे। उसने मेरे भाई को वही सम्मान, वही अटूट निष्ठा, वही सच्चा प्रेम और वही खुशियां दी हैं, जिसका वह हमेशा से हकदार था... और जिसे तुमने अपने खाकी के अहंकार और बूट्स के नीचे बेरहमी से कुचलकर उससे छीन लिया था।"

कामिनी के फटे हुए होठों से एक असहाय, तड़पती हुई सिसकी बाहर आई, उसकी आवाज इस समय पूरी तरह से थरथरा रही थी, "पूजा... मुझे पता है मेरा महापाप किसी भी जन्म में माफी के योग्य नहीं है... पर क्या... क्या अमर मुझे कभी... अपनी इस जिंदगी में कभी भी माफ नहीं करेंगे?"

पूजा ने अपनी वह ठंडी, भावहीन नजरें कामिनी के आंसुओं से सराबोर चेहरे पर डालीं, मानो वह सम्मुख खड़ी किसी अनजान, अदृश्य वस्तु को देख रही हो, "माफी तब मांगी जाती है कामिनी, या तब मिलती है... जब दिल के किसी सुदूर कोने में कोई उम्मीद, कोई शिकायत या कोई जज्बात बाकी हो। तुमने जिसे उस जंगल में अपने हाथों से मार-मार कर 'जिंदा लाश' बनाया था, वह इंसान आज अपनी जिंदगी को एक नए, अत्यंत सुंदर सवेरे के साथ जीना सीख चुका है। हमारे लिए... और खासकर अमर के लिए, तुम अब न तो कोई मुज़रिम हो, न कोई दुश्मन हो। तुम सिर्फ एक बीता हुआ, भूला हुआ धुंधला वक़्त हो, जिसे हमें याद रखने की न्यूनतम आवश्यकता भी महसूस नहीं होती। तुम हमारे लिए अब अस्तित्वहीन (Non-existent) हो।"

यह कहकर पूजा बिना दोबारा पीछे मुड़े, अत्यंत गर्व से सीधे स्टेज की तरफ बढ़ गई।

कामिनी वहीं हॉल के बीचो-बीच, जन-सैलाब के मध्य अपनी खाकी वर्दी में अकेली, अनाथ खड़ी रह गई। उसने अपनी धुंधली, आंसुओं से अंधी होती आँखों से देखा कि अमर और उसकी नई पत्नी किरण स्टेज के केंद्र में एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े थे। पूरा ग्रैंड ऑडिटोरियम करतल ध्वनि और तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था। अमर का आत्मविश्वास से भरा चेहरा पूरे हॉल में घूम रहा था, वह मीडिया के कैमरों को देख रहा था, और उसी परिक्रमा के दौरान... उसकी नजर एक सेकंड के एक हिस्से के लिए वहाँ वर्दी में खड़ी कामिनी पर भी पड़ी।

किंतु... अमर की आँखों में कामिनी को देखकर न तो कोई गुस्सा आया, न पुरानी यादों का कोई जख्म जागा, न चेहरे पर कोई सिहरन हुई और न ही कोई नफ़रत उभरी। उसने कामिनी को इस तरह देखा मानो वहाँ कोई निर्जीव खंभा या कोई बेजान दीवार खड़ी हो—वह पूरी तरह से 'अंजान', तटस्थ और शून्य था। वह कामिनी को साक्षात देखकर भी पूरी तरह अनदेखा कर गया, जैसे उसका कोई वजूद, कोई परछाई इस धरती पर हो ही न।

अमर का वह एक पल का 'अंजान' बनकर कामिनी को पूर्णतः शून्य बना देना... कामिनी के सीने में विधाता के आखिरी खंजर की तरह उतरा। उसे अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी, वीभत्स और अंतिम सजा मिल चुकी थी। उसे आज समझ आ गया था कि इस ब्रह्मांड में नफ़रत, जेल या मृत्यु से भी बड़ी एक सजा होती है—सामने वाले की जिंदगी से, उसकी यादों से पूरी तरह से 'मिट जाना'।

चारों ओर सारे लोग हंस रहे थे, उत्सव मना रहे थे, कैमरे चमक रहे थे, पर कामिनी के चारों तरफ एक ऐसा खौफनाक, अंतहीन और गहरा मानसिक अंधेरा छा रहा था, जिसके पार प्रकाश की कोई एक किरण नहीं थी। उसका पश्चाताप अब एक ऐसा अगाध समंदर बन चुका था, जिसमें डूबते हुए उसे अपनी हर एक सांस के साथ ताउम्र अकेले ही तड़पकर जीना था।

सिंहानिया साम्राज्य का खेल मुकम्मल तौर पर समाप्त हो चुका था, न्याय की देवी ने अपना अंतिम और सर्वोच्च फैसला सुना दिया था।