ज़हरीली थाली sukhvinder Singh Rai द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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ज़हरीली थाली

मिट्टी में ज़हर घोलकर, कैसा स्वाद ढूंढते हो, बीमारियों की फसल बोकर, फौलाद ढूंढते हो। 🌾डाइनिंग टेबल पर माहौल खामोश था। आर्यन अपनी थाली के सामने गुमसुम बैठा था, उसके हाथ में रोटी का एक टुकड़ा था, पर उसकी उँगलियाँ जैसे किसी गहरे दर्द में काँप रही थीं। उसने वह टुकड़ा मुँह तक ले जाकर चखा, पर अगले ही पल एक लंबी और भारी साँस छोड़ते हुए उसने वह निवाला वापस थाली में पटक दिया। उसके कंधे झुके हुए थे और आँखों में अजीब सी खालीपन था।पास ही बैठी रिया ने आर्यन के हाथों की इस बेचैनी को भांप लिया। उसने अपनी प्लेट से नजरें हटाईं और धीरे से पूछा, "क्या बात है आर्यन? आज तुम यूँ ही बैठे हो, रोटी को हाथ तक नहीं लगाया। कोई परेशानी है क्या?"आर्यन ने अपनी उदास और नम आँखें उठाईं, हवा में तैरती बेजान सी खुशबू की तरफ़ देखा और रुंधे गले से बोला, "रिया, हाथ में यह अन्न की थाली तो है, पर इसमें वो पुरानी वाली रूह, वो सोंधी महक और वो जान ही नहीं बची। मुझे आज भी वो दिन याद हैं जब हमारे बुजुर्ग चूल्हे की ताजी और शुद्ध रोटी खाया करते थे। तब उनके शरीर फौलाद जैसे लोहे के समान मज़बूत हुआ करते थे। उस वक्त की रोटी में कुदरती मिठास होती थी, जिसे खाते ही शरीर की नस-नस में असली ताकत दौड़ जाती थी। लोग हट्टे-कट्टे, सेहतमंद और लंबी उम्र वाले होते थे।"रिया ने बिना कुछ कहे उसकी बात पूरी तल्लीनता से सुनी।आर्यन का दर्द और गहरा हो गया, वह अपनी थाली की तरफ़ देखते हुए आगे बोला, "पर आज की इस थाली को देखो... इसमें न कोई स्वाद है, न कोई अपनापन और न ही कोई ऊर्जा। आज हम खेतों का अन्न नहीं, बल्कि इन उपजाऊ जमीनों में धड़ल्ले से घोले जा रहे कीटनाशकों और यूरिया-सुपर जैसे उस 'सफ़ेद ज़हर' को गटक रहे हैं। यही सबसे बड़ी वजह है कि आज यह खाना खाकर शरीर को कुछ 'लगता' ही नहीं है। इंसान या तो अंदर से खोखला, कमज़ोर और लाचार हो जाता है, या फिर उस पर बीमारियों से भरा हुआ बेकार का मोटापा चढ़ जाता है। सच कहूँ तो, हम अपनी सेहत को सुधार नहीं रहे, बस अपनी भूख को एक धोखे में रखे हुए हैं; हमने अपनी असली खुराक को खुद अपने हाथों ज़हर में बदल दिया है।"रिया ने एक ठंडी और गहरी आह भरी, उसके माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। उसने धीरे से कहा, "तुम बिल्कुल सच कह रहे हो आर्यन... हमने इस अंधी तरक्की और आधुनिकता की दौड़ में अपनी थाली का असली सुकून, मिट्टी की खुशबू और वो बेजोड़ ताकत, सब कुछ हमेशा के लिए खो दिया है।" 🥀**शायरी:**वो चूल्हे की महक खो गई, वो रोटी की ताकत गई,ज़हर की खेती क्या हुई, इंसान की बरकत गई। ✨**शिक्षा (Moral):**"सिर्फ़ पेट भरना ही ज़िंदा रहना नहीं है। जब तक हमारी मिट्टी ज़हर मुक्त नहीं होगी, तब तक हमारी थाली की रोटी में न तो कभी वो खोया स्वाद लौटेगा और न ही हमारे शरीरों में वो पुरानी फौलादी ताकत वापस आ पाएगी।" 🌿**लेखक की कलम से:**मेरे प्यारे पाठकों, आज हम जो कुछ भी अपनी थाली में परोसकर खा रहे हैं, क्या वह वाकई हमारे शरीर को ताकत दे रहा है? ज़रा सोचिए! पहले के लोग लंबी उम्र और मज़बूत शरीर के मालिक इसलिए होते थे क्योंकि उनकी मिट्टी और उनका अन्न बिल्कुल साफ़ व शुद्ध था। आज हम सिर्फ़ अपनी भूख मिटा रहे हैं, सेहत नहीं बना रहे। इस पर गहराई से सोचियेगा ज़रूर, क्या हम अपनी आने वाली मासूम नस्लों को सिर्फ बीमारियों का ज़हर तो नहीं परोस रहे?आपका अपना—**सुखविंदर** ✍️आप हमारी कहानी पॉकेट एफएम पर भी सुन सकते हैं: 'हिडन डील: तलाश एक वारिस की', जिसके मुख्य किरदार कबीर और अनिका हैं। 🎧