सांझ:एक अधूरी दास्तान Pankaj kumar द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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सांझ:एक अधूरी दास्तान

                                       दिन भर की अंतहीन भागदौड़ और मानसिक थकान ने जब शरीर को पूरी तरह पस्त कर दिया, तो मैं भारी कदमों से छत पर आ गया। ढलती हुई शाम अपनी सुनहरी रोशनी समेट रही थी। थकान इतनी गहरी थी कि हड्डियों में तक में एक मीठा सा दर्द महसूस हो रहा था, मानो शरीर अब जवाब दे रहा हो। ऐसे में मेरी आरामदायक कुर्सी और एक कप कड़क चाय ही मेरे इकलौते हमसफर थे। सूरज क्षितिज की ओट में छिपने ही वाला था—दिन और रात के बीच की वो ऐसी बेला, जो न पूरी तरह उजाले की होती है और न अंधेरे की। बस एक खूबसूरत सा अधूरापन, जो मन को बिना वजह  ही उदास कर देता है।

​मैंने चाय की पहली चुस्की ली और अपनी आँखें बंद कर लीं। बंद पलकों के पीछे एक अजीब सी वीरानी और उदासी का डेरा था। मैं उन धुंधली गलियों में खो ही रहा था कि अचानक मेज पर रखे फोन की थरथराहट ने उस सन्नाटे को कांच की तरह चटका दिया।

​आँखें खोलीं तो देखा, व्हाट्सएप पर एक मैसेज झिलमिला रहा था। किसी पुराने और बेहद अज़ीज़ दोस्त ने एक तस्वीर भेजी थी। जैसे ही तस्वीर डाउनलोड होकर स्क्रीन पर उभरी, मेरी उंगलियों की पकड़ ढीली पड़ गई। चाय का प्याला मेरे हाथ से छूटते-छूटते बचा। सीने में एक तेज़ टीस उठी; मेरा दिल ज़ोर से धड़का और फिर जैसे एक पल के लिए थम सा गया। मैं सुन्न होकर अपनी जगह पर ही जम गया। ऐसा लगा जैसे किसी ने बरसों पुराने घाव की पट्टियां एक ही झटके में उधेड़ दी हों।

​मैंने कांपते हाथों से फोन की स्क्रीन को ज़ूम किया। उसकी गहरी, शांत और रहस्यमयी आँखों में वही पुराना ठहराव था, जिसमें डूब जाना कभी मेरी सबसे बड़ी इबादत हुआ करता था। उस खूबसूरत चेहरे को आज इतने सालों बाद सामने देखकर मन अजीब सी बेचैनी से घिर गया। चेहरे पर वही बेदाग सादगी, होठों पर एक गहरा मौन। कंधे तक आते उसके काले, घने बाल माथे को यूं चूम रहे थे, जैसे किसी शांत झील के किनारे झुकी हुई घटाएं।

​वह मेरी ‘सांझ’ थी।

हाँ, मेरी सांझ... एक ऐसी सांझ जो रात के अंधेरे में खोने से पहले ही, वक़्त की ढलान से कहीं फिसल गई थी।

​आज पूरे 23 साल बाद मैं उस चेहरे को देख रहा था। उसने तो दुनिया से जाने से पहले अपनी हर निशानी को मिटा देने की कोशिश की थी। फिर यह तस्वीर कहाँ से आई? इतने सालों से जो दर्द सीने के किसी अंधेरे कोने में दफ़न हो गया था, वह आज फिर ज़िंदा होकर फड़फड़ाने लगा था।

​मैंने सांझ को जाते हुए नहीं देखा था। बस कोसों दूर से आई एक पत्थर जैसी ठंडी ख़बर सुनी थी कि 'सांझ अब नहीं रही'। लेकिन आज, इतने लंबे अरसे बाद उसे स्क्रीन पर इतना जीवंत और वास्तविक देखकर मेरी रूह कांप उठी। खुली आँखों के सामने यादों का एक ऐसा सैलाब उमड़ पड़ा, जो मेरे आज को तिनके सा बहाकर मुझे सन् 1996 के उस दौर में ले गया... जहाँ इस अधूरी कहानी की पहली ईंट रखी गई थी।