एपिसोड 2: दलदल की पहली सीढ़ीराघव की जिंदगी में सब कुछ किसी सुनहरे सपने जैसा चल रहा था। कॉलेज का टॉपर, शहर की सबसे बड़ी कंपनी का स्टार मैनेजर और मां का इकलौता लाडला—यही राघव की पहचान थी। लेकिन नियति के मन में कुछ और ही चल रहा था। उसे क्या पता था कि कामयाबी के इसी शिखर के पीछे एक ऐसा गहरा और काला दलदल छुपा हुआ है, जो उसे एक ही झटके में निगलने के लिए तैयार बैठा है। और उस दलदल का रास्ता खुला एक बेहद चमचमाती कॉर्पोरेट पार्टी से।कंपनी की सालाना कामयाबी का जश्न मनाने के लिए शहर के एक आलीशान होटल में पार्टी रखी गई थी। चारों तरफ चकाचौंध, ऊंचे लोग और महंगी शराब का दौर चल रहा था। राघव हमेशा इन चीजों से दूर रहता था, लेकिन तभी वहां विक्की की एंट्री हुई। विक्की राघव के कॉलेज का एक पुराना दोस्त था, जो अब शहर का एक बड़ा ब्रोकर बन चुका था। विक्की ने राघव के कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए कहा, "अरे राघव भाई! इतने बड़े मैनेजर बन गए, पर आज भी वही पुराने किताबी कीड़े हो? आज की रात जश्न की रात है, थोड़ा सा रिलैक्स करो।"राघव ने मना किया, "नहीं विक्की, मैं इन सब चीज़ों से दूर ही रहता हूँ। मुझे काम की वजह से पहले ही बहुत सिरदर्द है।" विक्की के चेहरे पर एक शातिर मुस्कान तैर गई। उसने अपनी जेब से एक छोटी सी चमकीली पुड़िया निकाली। उसमें सफेद रंग का एक महीन पाउडर था। विक्की ने उसे एक ड्रिंक में मिलाते हुए बहुत ही धीमे से कहा, "अरे भाई, यह कोई नशा नहीं है। यह तो कॉर्पोरेट लाइफ का सीक्रेट है। इसे लेते ही तुम्हारा सारा तनाव, सिरदर्द और थकान एक सेकंड में गायब हो जाएगी। बस एक घूंट... मेरे नाम।"काम के बढ़ते दबाव, थकान और दोस्त के बार-बार जिद करने पर राघव का आत्मबल उस एक कमजोर पल में डगमगा गया। उसने वह ग्लास उठाया और एक ही सांस में खाली कर दिया। उस एक घूंट ने राघव के शरीर में एक अजीब सी ऊर्जा और झूठे सुकून का अहसास भर दिया। उसे लगा जैसे दुनिया का सारा तनाव खत्म हो गया है। वह हवा में उड़ रहा था। विक्की उसे देखकर मन ही मन हंस रहा था, क्योंकि उसने राघव के रूप में अपना सबसे बड़ा और अमीर शिकार फंसा लिया था।पार्टी खत्म हो गई, लेकिन वह झूठा सुकूँ राघव के दिमाग पर हावी हो गया। अगले कुछ दिनों तक जब भी ऑफिस में काम का तनाव बढ़ता, राघव के कदम खुद-ब-खुद विक्की के ठिकाने की तरफ बढ़ जाते। शुरुआत में जो चीज सिर्फ 'तनाव मिटाने का साधन' थी, वह धीरे-धीरे राघव की जरूरत बनने लगी। उसे खुद अहसास नहीं हुआ कि कब वह उस सफेद पाउडर का गुलाम हो चुका था। एक सुबह जब राघव सोकर उठा, तो उसके हाथ-पैर बुरी तरह कांप रहे थे। उसका सिर फटा जा रहा था। जब तक उसे वह खुराक नहीं मिलती, उसका शरीर काम करना बंद कर देता था। उसने अपनी अलमारी खोली, लेकिन वहां पैसे खत्म हो चुके थे। नशे की उस भयानक तड़प में राघव ने पहली बार अपनी मां के कमरे की अलमारी की तरफ देखा, जहाँ मां ने अपनी जिंदगी भर की जमापूंजी और सोने के कंगन रखे थे। राघव के हाथ कांप रहे थे, जमीर चीख रहा था, लेकिन नशे का शैतान उस पर हावी हो चुका था। उसने अलमारी का ताला तोड़ दिया। राघव ने दलदल में अपना पहला कदम रख दिया था, जहाँ से वापसी का रास्ता बंद होने वाला था।