पहला फ़ोन Kajal Soam द्वारा जीवनी में हिंदी पीडीएफ

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पहला फ़ोन

पहला फोन
क्या याद है आपको? आपने सबसे पहले किसको फोन मिलाया या किसका फोन उठाया?

हम्म!
शायद याद है या नहीं।
मैं अपनी बात कहूँ तो मुझे याद है। चाचा की शादी के दो महीने बाद घर में टेलीफोन आया। उस समय मैं 5 या 6 साल की थी। उस फोन में एक विकल्प था कि एक बटन दबाने पर जिसे अभी बात की, उसे फोन कॉल लग जाती।

घर पर दादी ने और सबने पापा को नंबर मिलाया। मेरी आँखों ने उस नंबर को पकड़ लिया। उन दिनों पापा बाहर नौकरी करते थे और 6 या 7 महीने में एक बार घर आते थे। सबके बात करने के बाद, मैंने देखा कि कोई मुझे देख तो नहीं रहा। उस समय हमारा खतरा रहता था, शरारत की वो पुड़िया जहाँ जाओ, वहाँ काम का सत्यानाश

फिर मैंने फोन नंबर मिलाया। जब फोन उठा तो उसमें से पापा की आवाज आई। पापा ने कहा, "क्या बात हो गई? अभी तो फोन कटा था।"

मैंने कहा, "पापा।"
पापा ने कहा, "हाँ।"
मैंने फिर कहा, "पापा।"
पापा ने फिर कहा, "हाँ।"
मैंने फिर कहा, "पापा।"
पापा ने फिर कहा, "हाँ।"
मैंने फिर कहा, "पापा।"
पापा ने फिर कहा, "हाँ।"
मैंने फिर कहा, "पापा।"
पापा ने फिर कहा, "हाँ।"
मैंने फिर कहा, "पापा।"
पापा ने फिर कहा, "हाँ।"

ये मेरे लिए खेल सा बन गया था।

पापा ने कहा, "मैं सुन रहा हूँ, ठीक है।"
मैंने कहा, "पापा, मैंने वो तार वाला हैंडल उठा लिया था, मुझे भी बात करनी थी।"

पापा की हँसी छूट गई। मम्मी की मुझ पर नजर गई। वो चिल्लाईं, वो खेल नहीं, कोई चीज़ नहीं है।
मैंने कहा, "हाँ पता है, पर मम्मी, इसमें से पापा बोल रहे थे।" मम्मी भाग कर आईं कि इसने क्या रायता फैला दिया!

एक बार चाचा ने पापा को फोन मिलाया, मैंने फिर फोन दबा दिया। उनके जाने के बाद, खेल में मैंने आखिरी बटन दबाया। वो बजने लगा। मैं डर कर वहाँ से भाग गई। मम्मी की आवाज आई कि इस बार तो हैंडल खराब कर दिया। शाम में आईं तो घर पर किसी ने कुछ नहीं कहा।

फिर चाचा ने मुझे समझाया, "ये टेलीफोन है, इससे हम किसी व्यक्ति से बात करते हैं जो हमसे दूर है।" इसे भी उल्टा समझा! मैं और छोटी बहन एक सीढ़ी पर और एक कमरे में 'हेलो' 'हेलो' करने लगीं। घरवाले हँसते हमारी इन हरकतों पर।

कुछ यादें या किस्से संभाल कर रखने चाहिए। बेशक ये आधुनिकता की आड़ में हैं, पर हमें वो नहीं भूलना चाहिए जहाँ से शुरुआत हुई। मतलब से न सही, टेलीफोन के बहाने उन यादों को एक बार जरूर जियों। जब परेशान हो, तो एक बार पीछे झाँक लेना, शायद कुछ मिले—जैसे हौसला, हिम्मत, जवाब। कुछ तो मिलेगा, चाहे आपके होठों की मुस्कान ही हो।
एक बार अपनी तस्वीर जो छोड़ कर आया उसे जरूर देखना शायद कुछ मिल जाए और कुछ ना मिले तो एक मुस्कान तो जरूर मिलेगी जो आपके चेहरे पर हंसी ले आएऔर जब हमारा आदमी खुश होता है। तभी हमें हमारी उलझनों से छुटकारा मिलता है ।तभी वह चीज देख पाते हैं जो हमसे छुपी हुई है ।एक छोटा सा बच्चा भी हमारी उन परेशानियों का हल निकाल लेता है ।

   
— काजल