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वत्सर घर लौट रहा था तब वह मन ही मन अपने आराध्य श्रीकृष्ण का धन्यवाद करता रहा था। साथ साथ स्वयं को दोषी भी मान रहा था कि इतने दिनों तक वह कृष्ण की सेवा से वंचित रहा था।
‘हे कृष्ण! इतने दिनों तक मैं तुमसे दूर रहा। तुम्हारी सेवा नहीं कर सका। किन्तु तुम ही साक्षी हो कि एक क्षण भी मैं तुम्हारे स्मरण से विमुख नहीं रहा। यह सब तुम्हारी ही तो लीला है, तुम्हारा ही प्रपंच है। इसमें मेरा क्या दोष? अब मैं लौट आया हूँ। अब अविरल तुम्हारी सेवा में लगा रहूँगा। बस मुझ पर तुम कृपा बनाये रखना।’
ऐसे विचार करते करते वत्सर जब अपने गाँव पहुँचा तो सीधे ही मंदिर आ पहुँचा। दूर से ही मंदिर को देखकर वह आश्चर्य और आशंका के मिश्रित भावों से घिर गया। वह वहीं रुक गया।
‘यह मंदिर खुला क्यों है? मैं तो इसे बंद करके गया था। किसने इसे खोला? मंदिर के ताले तोड़कर कोई कुछ चोरी कर गया? या स्वयं भगवान की मूर्ति को ...?’
वत्सर दौड़ा, सीधे मंदिर में प्रवेश कर गया।
‘”मूर्ति तो यहीं है। तो चोर क्या चोरी कर गया?” उसने समग्र मंदिर का विहंगावलोकन किया। उसे कोई विशेष वस्तु ध्यान में नहीं आई जिसकी चोरी हो गई हो। प्राय: सभी वस्तुएं अपने स्थान पर यथा स्थिति पड़ी थी।
“मैं भी मूर्ख हूँ। मंदिर में मूर्ति के उपरांत ऐसा कुछ है ही क्या जीसमें चोरों की रुचि हो, उसे चोरी करे। ”वह मन ही मन मुस्कुराया। कृष्ण की मूर्ति को देखने लगा।
कृष्ण! जैसे अपने अधरों से स्मित कर रहे हो। नयनों से अमी वृष्टि कर रहे हो। वत्सर ने इस स्मित और अमी वृष्टि को अपनी आँखों से पिया। अनायास ही वत्सर के होंठों पर भी स्मित आ गया। दोनों स्मित के साथ अपलक परस्पर निहारते रहे। दोनों से प्रवाहित होकर प्रवाह एक रूप हो गया। सब कुछ स्थिर हो गया। समय के कुछ टुकड़े वहीं रुक गए। भक्त और भगवान के इस अनूठे संगम को देखने की लालसा समय की क्षणों को भी हो आई। वत्सर के नयनों से अश्रु धारा स्वत: बहने लगी।
सहसा मंदिर में किसी के पदचाप की ध्वनि सुनाई दी। वत्सर की समाधि भंग हुई। उसने मुड़कर देखा।
“वत्सर, तुम आ गए? कुशल तो हो न?” शैल के गुप्तचर मोहनन और रेखा को वत्सर ने देखा।
“मैं कुशल हूँ। आप दोनों यहाँ कैसे?”
“जब से तुम यहाँ से गए हो, तब से हम दोनों इस मंदिर की रक्षा कर रहे हैं। शैल का आदेश था कि तुम्हारी अनुपस्थिति में इस मंदिर और परिसर में कुछ भी ऐसा न हो कि जो शत्रु द्वारा किया गया हो। उनके द्वारा ऐसा करने पर मंदिर को और तुम्हें क्षति हो।”
“धन्यवाद। किन्तु मेरी वे क्या क्षति कर सकते थे? मंदिर में तो कुछ है ही नहीं जो किसी के काम की हो। हाँ, मैंने देखा कि यहाँ सब कुछ सुरक्षित है। यह आपके कारण है।”
“यहाँ अनेक संभावनाएं थी जो तुम्हें क्षति कर सकती थी।”
“जैसे?”
“मंदिर से चोरी करने जैसा तो कुछ है ही नहीं। किन्तु मूर्ति की चोरी हो सकती थी। मूर्ति को या मंदिर को नष्ट किया जा सकता था। उपरांत उसके ...।” रेखा बोलते बोलते अटक गई।
“उपरांत उसके क्या? जो भी बात हो, स्पष्ट कहो।”
“शैल ने बताया था कि जब तुम्हारे विरुद्ध कोई प्रमाण प्रस्तुत करने में विफल रहे तब राहुल -सोनिया -नदीम की योजना थी कि मंदिर में प्रतिबंधित ड्रग्स और कुछ हथियार रख दिया जाए। स्थानीय पुलिस के द्वारा उसे प्राप्त हुआ ऐसी स्थिति उत्पन्न करना।”
“ऐसा क्यों करना चाहते थे?”
“ऐसा होता तो वे सिद्ध कर देते कि तुम्हारा चरित्र ही अपराधियों जैसा है। अत: मीरा की हत्या भी तुमने ही की है। इस प्रकार तुम्हें न्यायालय से मृत्यु दंड या आजीवन कारावास का दंड दिलाना चाहते थे।”
“किन्तु मैं तो निर्दोष हूँ।”
“वे दोषित सिद्ध कर देते।”
“तो उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया?”
“उनके अधिवक्ता कपिल ने उन्हें रोका था। वे जानते थे कि हम दोनों अविरत रूप से यहाँ मंदिर को ही देख रहे थे। तुम्हें बता दें कि हमने मंदिर के चारों तरफ गुप्त केमेरा लगा रखे हैं। यदि वे ऐसा कोई प्रयास करते तो उसका मुद्रण उसमें अंकित हो जाता जिसे न्यायालय में रखते ही उनके सारे षड्यन्त्र का परिचय सब को मिल जाता।”
“ओह, यह बात थी? मुझे फँसाने की ऐसी योजना थी। आप दोनों एवं शैल का मैं ऋणी हूँ। आपने मुझे इन सबसे बचा लिया।”
“हम तो केवल निमित्त मात्र हैं। शैल भी इस योजना से अपरिचित थे। यह समग्र दूरंदेशी सारा जी की थी। उसने ही शैल को कहा और हमें यहाँ काम पर लगा दिया था। वत्सर, यह सारी योजना वास्तव में श्री कृष्ण की ही प्रतीत होती है।”
अंतिम शब्दों को सुनते ही वत्सर ने कृष्ण की तरफ देखा। कृष्ण की आँखों में बड़े नटखट भाव थे। वत्सर उन भावों के मर्म को समझ गया। स्मित करने लगा।
“एक बात पूछूँ आप दोनों को?”
“जी पूछो, वत्सर।”
“मैं जब यहाँ से गया था तब मंदिर बंद करके गया था। जब आज अभी आया तो मंदिर के द्वार खुले पाए। आप दोनों यहाँ दिन रात मंदिर की रक्षा करते रहे हो तो बताओ कि मंदिर के द्वार किसने खोले? कब खोले? कैसे खोले? या आप दोनों ने ही इसे खोला?”
प्रश्न सुनकर दोनों ने एक दूसरे को देखा। दोनों की दृष्टि में विस्मय था।
“कहो कैसे हुआ यह सब? किसने किया?”
“हमने नहीं किया है यह सब। ऐसा पुछकार तुम अनभिज्ञ क्यों बन रहे हो, वत्सर?”
“क्या तात्पर्य है?”
“वत्सर, प्रतिदिन एक व्यक्ति आता था जिसके हाथों में मंदिर के ताले की चाबी होती थी। तुम्हारी ही भांति वस्त्र परिधान करता था। नित्य नियत समय पर मंदिर खोलता था। नित्य क्रम अनुसार सेवा, पूजा, वंदना, आरती करता था। दोनों समय भोग भी लगाता था। संध्या समय पर तुम्हारी ही भांति बाँसुरी बजाता था। तुम्हारी ही भांति मंदिर बंद कर चला जाता था।”
“क्या बात करते हो?”
“यही सत्य है, वत्सर।”
“अर्थात मेरी अनुपस्थिति में भी मेरे कृष्ण की पूजा, वंदना, अर्चना आदि सब कुछ वैसे ही चलता रहा जैसे मैं करता रहता था?”
“यही तो हम कह रहे हैं। आज भी वैसा ही हुआ है। मंदिर को उसने ही खोला है। देखो, उस कोने में पड़े हैं ताला और चाबी। और देखो, अभी अभी पूजन अर्चन भी किया गया है।”
वत्सर ने कृष्ण की मूर्ति को निहारा। अचंभित होकर वह बस देखता ही रहा।
“यह सब तो मैंने देखा ही नहीं। यह तो आनंद और आश्चर्य की बात है।” वत्सर क्षणभर रुका। समग्र मंदिर परिसर पर दृष्टि डाली।
“यह कैसे हो सकता है?”
“क्यों नहीं हो सकता?”
“मंदिर के ताले की चाभी तो मैं अपने घर पर रखता था। अभी भी वहीं होगी। तो यह चाबी यहाँ कैसे?”
वत्सर ने चाबी को देखा, उठाया, परखा।
“यह तो वही चाबियाँ हैं। ये यहाँ कैसे?”
“तुमने ही उसे कहा होगा कि घर से चाबी ले लेना।”
“किसे? मैंने किसीको ऐसा नहीँ कहा। न ही किसी को यह दायित्व दिया। तो? यह किसने किया? कौन है वह?”
“वह तो तुम जानो। हम क्या जानें? चलो ढूंढते हैं उसे। यहीं कहीं होगा।”
सभी ने सारे मंदिर परिसर में उसकी खोज की।
“यहाँ तो इस समय कोई नहीं है।” वत्सर ने आश्चर्य प्रकट किया।
“कुछ समय पूर्व ही वह आया था। यहीं कहीं गया होगा। लौट आएगा। तब तक प्रतिक्षा करते हैं।”
वत्सर के साथ मोहनन और रेखा प्रतीक्षा करने लगे।
“भोग का समय हो गया है किन्तु कोई नहीं आया, कोई भोग नहीं लगा। मेरा मत है कि यह तुम्हारी कोई भ्रमणा ही होगी।”
“नहीं, वत्सर, कोई भ्रमणा नहीं है। सत्य ही है।”
“तो अभी तक वह कहाँ है? आया क्यों नहीं?”
“एक क्षण रुको। मैं तुम्हें कुछ दिखाती हूँ।” रेखा ने अपने मोबाइल से कुछ ढूँढने का प्रयास करते हुए कहा। “हमारे केमरे में सारी गतिविधियां बंद है। उसमें वह भी है। मैं दिखाती हूँ। तुम स्वयं उसे देख लो, परख लो, मान लो, स्वीकार लो।” रेखा ढूंढती रही, अधिक समय तक। उसने सारे द्रश्य देखे किन्तु इन दृश्यों में वह नहीं मिला।
“ऐसा कैसे हो सकता है? इसमें सारी घटनाएं समाविष्ट हैं, मंदिर के ताले खुलते हैं वह भी है। किन्तु ऐसा करने वाला व्यक्ति ही नहीं दिख रहा। जैसे कोई अदृश्य हाथ यह कर रहे हो! यह चमत्कार है या हमारी भ्रमणा?”
तीनों ने सभी मुद्रित भाग देखे, आश्चर्य से देखते ही रहे।
वत्सर ने श्री कृष्ण की आँखों में देखा। वहाँ एक अलौकिक भाव था, अधरों पर था भुवन मोहिनी स्मित। क्षण भर में वत्सर सारा रहस्य जान गया। मनोमन कृष्ण को वंदन किया, स्मित किया और बोला,
“ओहम नमो भगवाते वासुदेवाय।” मोहनन और रेखा भी साथ साथ इस मंत्र का जाप करने लगे।