कैफ़े में हल्की-हल्की कॉफी की महक फैली हुई थी। चारों ओर धीमा इंस्ट्रूमेंटल संगीत वातावरण को और भी सुकूनभरा बना रहा था। कुछ लोग अपने लैपटॉप पर काम करने में व्यस्त थे, तो कुछ अपने दोस्तों के साथ हँसी-मज़ाक कर रहे थे। बाहर शीशे की बड़ी-बड़ी खिड़कियों से आती सुनहरी धूप पूरे हॉल में एक गर्माहट बिखेर रही थी।
एक कोने की टेबल पर बैठा युवक अनमने ढंग से आसपास नज़र दौड़ा रहा था। तभी उसकी निगाह अचानक सामने बैठी एक लड़की पर जाकर ठहर गई।
लड़की पूरी तरह अपनी किताब में डूबी हुई थी। उसकी आँखों पर हल्के फ्रेम का चश्मा था, जो उसे एक गंभीर और आकर्षक व्यक्तित्व दे रहा था। उसने अनजाने में अपने हाथ में पकड़े पेन का पिछला हिस्सा अपने होंठों के बीच दबा रखा था। कभी वह किताब की किसी पंक्ति को ध्यान से पढ़ती, तो कभी भौंहें हल्की सिकोड़कर कुछ सोचती और फिर अपनी नोटबुक में दो-चार शब्द लिख देती।
उसके चेहरे पर बनावटीपन का ज़रा भी निशान नहीं था। बिना किसी मेकअप के भी उसकी त्वचा पर एक स्वाभाविक चमक थी। कंधों से थोड़ा नीचे तक आते करीने से कटे बाल उसके चेहरे को और भी निखार रहे थे। जब भी वह अपनी लटों को कान के पीछे करती, उसकी हर छोटी-सी हरकत में एक अनकही सादगी झलक उठती।
वह आसपास की दुनिया से पूरी तरह बेखबर थी। कैफ़े में कितनी आवाज़ें थीं, कितने लोग आ-जा रहे थे, इससे उसे जैसे कोई मतलब ही नहीं था। इस समय उसके लिए केवल उसकी किताब, उसकी नोटबुक और उसके विचार ही मायने रखते थे।
युवक की नज़रें उस पर कुछ इस तरह टिक गईं कि मानो समय कुछ पल के लिए ठहर गया हो। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उस लड़की में ऐसा क्या था जिसने उसे पहली ही नज़र में रोक लिया। वह खूबसूरत तो थी, लेकिन उसकी खूबसूरती का कारण केवल उसका चेहरा नहीं था। उसकी सादगी, पढ़ने में डूब जाने का अंदाज़ और चेहरे पर झलकती मासूम गंभीरता उसे सबसे अलग बना रही थी।
वह अनायास ही मुस्कुरा उठा। उसके मन में एक अजीब-सी उत्सुकता जन्म ले चुकी थी। वह जानना चाहता था कि लड़की क्या पढ़ रही है, किस दुनिया में खोई हुई है और आखिर उसके चेहरे पर इतनी गहरी तल्लीनता क्यों है।
इसी बीच सामने बैठा उसका दोस्त मेन्यू कार्ड पलटते हुए बोला,
"यार, क्या ऑर्डर करें? कॉफी लेगा या कुछ और?"
कोई जवाब नहीं मिला।
उसने फिर बिना ऊपर देखे कहा,
"सुन रहा है न? मैं पूछ रहा हूँ, क्या मंगाऊँ?"
फिर भी सामने से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।
अब उसने मेन्यू कार्ड नीचे रखा और हैरानी से अपने दोस्त की ओर देखा। सामने बैठा युवक बिल्कुल स्थिर था। उसकी आँखें किसी एक दिशा में टिकी हुई थीं और चेहरे पर एक अलग ही भाव था—जैसे वह इस कैफ़े में मौजूद ही न हो।
दोस्त ने उसकी नज़रों का पीछा किया।
कुछ दूरी पर वही लड़की बैठी थी, जो अब भी अपनी किताब के पन्ने पलटने में व्यस्त थी।
दोस्त के चेहरे पर शरारती मुस्कान फैल गई।
"अच्छा... बात यहाँ तक पहुँच गई है।"
उसने धीमे से हँसते हुए कहा।
युवक फिर भी चुप रहा।
दोस्त ने कुहनी मारते हुए मुस्कुराकर पूछा,
"पहली बार किसी को इतनी देर तक देख रहा है। क्या बात है?"
इस बार युवक जैसे अचानक अपनी सोच से बाहर आया। उसने हल्की-सी झेंपी हुई मुस्कान के साथ नज़रें हटाईं, लेकिन अगले ही पल उसकी निगाह फिर उसी दिशा में चली गई।
उसे महसूस हो रहा था कि वह लड़की जितनी साधारण दिख रही है, उसके व्यक्तित्व में उतनी ही गहराई छिपी हुई है। शायद यही बात उसे बार-बार उसकी ओर देखने पर मजबूर कर रही थी।
देव की नज़र जैसे ही शिव की आँखों का पीछा करते हुए सामने वाली टेबल तक पहुँची, उसके चेहरे पर हैरानी साफ़ झलकने लगी।
उसने देखा कि शिव पूरी तरह एक अनजान लड़की को देखे जा रहा था। उसकी आँखों में वही ठहराव था, जो देव ने आज तक कभी नहीं देखा था।
देव को अपनी आँखों पर यकीन ही नहीं हुआ।
वह मन ही मन सोचने लगा—
"ये वही शिव है... जो आज तक किसी भी लड़की की तरफ दो पल से ज़्यादा देखता तक नहीं था। कॉलेज के दिनों में न जाने कितनी लड़कियाँ इसके पीछे घूमती थीं, लेकिन इसने कभी किसी को भाव तक नहीं दिया। बिजनेस पार्टियों में बड़े-बड़े घरानों की लड़कियाँ इससे बात करने की कोशिश करती थीं, लेकिन यह हमेशा उनसे दूरी बनाकर रखता था। और आज... आज ये एक अनजान लड़की को इस तरह देख रहा है जैसे दुनिया में इसके अलावा कोई और हो ही नहीं।"
देव के होठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
उसने धीरे से शिव के कंधे पर हाथ रखा।
"भाई..."
लेकिन शिव ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
देव ने दूसरी बार आवाज़ लगाई।
"शिव... कहाँ खो गया?"
फिर भी कोई जवाब नहीं मिला।
अब देव पूरी तरह आश्वस्त हो चुका था कि मामला कुछ अलग ही है।
उसने शरारती अंदाज़ में उसी दिशा में देखा जहाँ शिव की नज़रें टिकी थीं।
लड़की अभी भी अपनी किताब में डूबी हुई थी। उसे इस बात का ज़रा भी एहसास नहीं था कि कोई लगातार उसे देख रहा है। वह कभी पेन से किसी लाइन पर निशान लगाती, कभी कुछ लिखती और फिर दोबारा पढ़ने लगती।
देव ने धीमे स्वर में कहा,
"लगता है भाई पहली नज़र वाला मामला है..."
लेकिन शिव तक उसकी बात पहुँची ही नहीं।
उसी समय टेबल पर रखा युग का मोबाइल तेज़ी से बज उठा।
फोन की अचानक गूँजी रिंगटोन ने दोनों का ध्यान तोड़ दिया।
शिव की नज़रें पहली बार उस लड़की से हटकर टेबल पर रखे फोन की ओर गईं।
युग ने बिना देर किए फोन उठा लिया।
जैसे ही उसकी नज़र स्क्रीन पर चमक रहे नंबर पर पड़ी, उसके चेहरे की सहजता पल भर में गायब हो गई।
उसकी आँखें गंभीर हो गईं और जबड़ा हल्का-सा भींच गया।
शिव ने केवल युग का चेहरा देखा और बिना कुछ पूछे समझ गया कि कॉल किसका होगा।
दोनों कई वर्षों से साथ काम कर रहे थे। एक-दूसरे के चेहरे के बदलते भाव पढ़ना उन्हें आता था।
युग ने कॉल रिसीव किया।
"हाँ..."
उसने केवल एक शब्द कहा और कुछ क्षण तक सामने वाले की बातें सुनता रहा।
उसके चेहरे की कठोरता लगातार बढ़ती जा रही थी।
कुछ सेकंड बाद उसने शांत स्वर में जवाब दिया—
"ठीक है... हम तुरंत पहुँच रहे हैं।"
इतना कहकर उसने कॉल काट दी।
फोन जेब में रखते हुए उसने बिना समय गंवाए शिव की ओर देखा।
"शिव... अब हमें यहाँ से निकलना होगा।"
शिव ने एक बार फिर अनायास उसी लड़की की ओर देखा।
वह अब भी पूरी तरह अपनी किताब में खोई हुई थी।
न जाने क्यों उसके मन में अचानक यह इच्छा हुई कि कम-से-कम उसका नाम तो जान ले।
युग ने उसकी नज़रें पढ़ लीं।
वह हल्का-सा मुस्कुराया और बोला,
"फिक्र मत कर। अगर किस्मत में हुई तो इसके बारे में सब पता चल जाएगा। अभी हमारे लिए मीटिंग ज़्यादा ज़रूरी है।"
यह कहते हुए उसने बिना किसी को एहसास होने दिए अपना मोबाइल निकाला।
उसने कैमरा खोला और ऐसे अभिनय किया जैसे किसी सामान्य तस्वीर पर क्लिक कर रहा हो।
लेकिन अगले ही पल कैमरे का फोकस उस लड़की पर था।
उसने अलग-अलग एंगल से दो-तीन तस्वीरें क्लिक कीं।
काम पूरा होते ही उसने मोबाइल वापस जेब में रख लिया।
"चलें?"
शिव ने एक आखिरी बार लड़की को देखा।
फिर बिना कुछ कहे अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।
दोनों तेजी से कैफ़े से बाहर निकल गए।
कुछ ही देर बाद उनकी काली एसयूवी शहर की व्यस्त सड़कों को पीछे छोड़ती हुई सुनसान इलाके की ओर बढ़ रही थी।
गाड़ी के भीतर असामान्य खामोशी पसरी हुई थी।
शिव की आँखों के सामने बार-बार उसी लड़की का चेहरा घूम रहा था।
दूसरी ओर युग बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था। उसके चेहरे से साफ़ पता चल रहा था कि जिस मीटिंग के लिए उन्हें बुलाया गया था, वह बेहद महत्वपूर्ण थी।
करीब आधे घंटे बाद गाड़ी शहर के बाहरी इलाके में स्थित एक अधूरी बहुमंज़िला इमारत के सामने आकर रुकी।
दोनों गाड़ी से उतरे।
उनके सामने अधूरी इमारत आसमान को छूती हुई खड़ी थी। चारों ओर सन्नाटा था। हवा की तेज़ आवाज़ और अधूरी मंज़िलों से टकराकर लौटती गूँज माहौल को और भी रहस्यमय बना रही थी।
युग ने ऊपर नज़र उठाकर इमारत को देखा और धीमे स्वर में कहा,
"यही जगह तय हुई थी... देखते हैं हमारा इंतज़ार कौन कर रहा है।"
दोनों बिना एक शब्द बोले इमारत के भीतर प्रवेश कर गए।
To be continued......