अध्याय १: बिजली, बादल और भूली हुई प्रार्थना
आसमान उस रात फटने को था। रामटोला के ऊपर बादल इस तरह घुमड़ रहे थे जैसे किसी ने आकाश में कोई पुराना घाव कुरेद दिया हो, और उस घाव से अंधेरा रिसकर पूरे गाँव पर बरस रहा हो। बिजली हर कुछ पलों में कड़कती, और उसकी रोशनी में गाँव की मिट्टी की दीवारें, टूटी हुई मुंडेरें और झुके हुए पेड़ किसी डरावने चित्र की तरह चमक उठते। नदी किनारे का बाँध, जिसे कालीचरण सिंह के ठेके में बनवाया जा रहा था, उस रात पानी के दबाव से चरमरा रहा था, और गाँव के लोग अपने-अपने घरों की छतों पर खड़े होकर उसे देख रहे थे, जैसे कोई तमाशा हो, जैसे यह उनकी अपनी ज़िंदगी का हिस्सा न हो।
तभी वह हुआ, जिसे बाद में गाँव के लोग सालों तक फुसफुसाहटों में दोहराते रहे, कभी विश्वास से, कभी डर से।
पार्वती देवी, जो उस वक्त एक बच्चे को गोद में उठाए बाँध की तरफ भागी जा रही थीं क्योंकि पानी उसकी झोंपड़ी तक पहुँच चुका था, अचानक रुक गईं। उनके पैरों के नीचे की धरती काँप रही थी, पानी उनकी कमर तक आ चुका था, और बच्चा उनकी बाँहों में बेसुध पड़ा था। उन्होंने आँखें बंद कीं - क्यों, यह वो खुद नहीं जानती थीं - और जब खोलीं, तो उनके दोनों हाथों की हथेलियों से एक हल्की, सुनहरी आभा फूट पड़ी। पानी, जो उनकी तरफ बहा चला आ रहा था, एक क्षण के लिए जैसे रुक गया, जैसे किसी अदृश्य दीवार से टकराया हो। गाँव वालों ने बाद में कसम खाकर कहा कि उन्होंने अपनी आँखों से देखा था - पानी पार्वती देवी के इर्द-गिर्द एक गोल घेरे में बँट गया था, ठीक वैसे ही जैसे कोई नदी किसी चट्टान के इर्द-गिर्द बँट जाती है।
उसी रात, बाँध के दूसरे छोर पर, गोविंद अपने कंधों पर दो बोरी बालू लादे मज़दूरों की मदद कर रहा था, यह जानते हुए कि यह काम कालीचरण के ठेके का है, कालीचरण का दुश्मन नहीं, फिर भी उसका शरीर, उसका खून, उसे रुकने नहीं दे रहा था। जब बाँध का एक हिस्सा टूटा और मलबा तीन मज़दूरों की तरफ बहा, गोविंद ने बिना सोचे एक भारी लकड़ी का शहतीर पकड़ लिया - इतना भारी कि सामान्यतः चार आदमी मिलकर भी न उठा पाते - और उसे उस मलबे के आगे अड़ा दिया। उसकी बाँहों की नसें फूल आईं, उसकी आँखों में एक अजीब सी नीली चमक कौंधी, और जब सब कुछ शांत हुआ, तो वह खुद हैरान खड़ा था, यह समझ न पाते हुए कि उसने यह किया कैसे।
गाँव के बाहर, पुराने बरगद के नीचे, जहाँ बाबा भोलानाथ बरसों से अकेले तपस्या में बैठे रहते थे, राख का एक ढेर अचानक हवा में उठा और एक क्षण के लिए त्रिशूल का आकार ले बैठा, फिर बिखर गया। बाबा ने अपनी आँखें खोलीं, माथे पर हाथ फेरा, और धीरे से बुदबुदाए - "यह समय आ रहा है क्या... इतनी जल्दी?"
और गाँव के स्कूल में, जहाँ मास्टर ब्रह्मानंद तिवारी उस रात बच्चों के कुछ काग़ज़ात बचाने के लिए रुके हुए थे, अचानक उनकी ज़ुबान पर एक ऐसा श्लोक चढ़ आया जो उन्होंने कभी नहीं पढ़ा था, न कभी सुना था। वह श्लोक उनके मुँह से इस तरह निकला जैसे सदियों से उनकी आत्मा में दबा पड़ा हो, और जैसे ही वह पूरा हुआ, बाँध के पास मची चीख-पुकार अचानक शांत हो गई, पानी का बहाव थोड़ा धीमा पड़ गया।
यह रात, यह घटना, अभी बहुत आगे की है। इसे ठीक से समझने के लिए हमें कुछ महीने पीछे लौटना होगा - उन्हीं गलियों में, उसी रामटोला में - जहाँ यह सब कुछ बहुत ही साधारण ढंग से शुरू हुआ था, बिना किसी चमत्कार के, बिना किसी संकेत के।
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रामटोला बिहार के उन हज़ारों गाँवों में से एक था जिनका नाम किसी नक़्शे पर मुश्किल से मिलता, मगर जिनकी मिट्टी में सदियों की कहानियाँ दबी पड़ी थीं। सरसों के खेत गाँव की सीमा तक फैले हुए थे, और जब हवा चलती तो पीले फूल किसी समुद्र की लहरों की तरह झूम उठते। गाँव के बीचोंबीच एक पुराना बरगद खड़ा था, जिसकी जड़ें ज़मीन से बाहर आकर सैकड़ों साँपों की तरह बल खाती थीं, और उसी के नीचे एक छोटा सा शिवालय था, जिसका पत्थर घिस-घिसकर चिकना हो चुका था। बरसात के दिनों में गाँव की पगडंडियाँ कीचड़ में तब्दील हो जातीं, और औरतें अपनी साड़ियाँ उठाए, सिर पर पानी के घड़े लिए, उन्हीं गलियों से गुज़रतीं जैसे यह उनकी रोज़ की इबादत हो।
गाँव के इकलौते सरकारी स्कूल में मास्टर ब्रह्मानंद तिवारी पिछले तीस सालों से पढ़ा रहे थे। वे साठ पार कर चुके थे, चश्मा हमेशा नाक की नोक पर टिका रहता, धोती-कुर्ता उनकी वर्दी थी, और उनकी भुलक्कड़ी गाँव भर में मशहूर थी। वे अक्सर अपनी ही छड़ी ढूंढते हुए मिल जाते जबकि वह उनके हाथ में ही होती, या फिर बाज़ार से चावल लेने निकलते और लौटते वक्त भूल जाते कि चावल लेना भी था। बच्चे उनकी नकल उतारते, पर सम्मान भी बेइंतहा करते, क्योंकि जब भी कोई गाँव वाला किसी उलझन में फँसता - चाहे वह ज़मीन का झगड़ा हो या किसी बच्चे की शादी की बात - लोग मास्टर साहब के पास ही आते। उनकी बातों में एक अजीब सी गहराई होती, जैसे वे किसी और समय से बोल रहे हों। कभी-कभी, बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते, वे अचानक किसी संस्कृत श्लोक की पंक्ति बोल उठते, फिर खुद हैरान होकर पूछते - "अरे, यह मैंने कहाँ से सीखा?" और बच्चे हँस पड़ते, यह सोचकर कि मास्टर साहब की भुलक्कड़ी अब उनकी अपनी बातों तक पहुँच गई है।
उसी गाँव में, नदी के किनारे बसे मल्लाह टोले में, गोविंद रहता था - पच्चीस साल का, साँवला, मज़बूत कद-काठी वाला नौजवान, जिसकी आँखों में एक अजीब सी शांति थी, मानो वह हर हालात में खुद को संभाले रखना जानता हो। गोविंद के माँ-बाप बचपन में ही गुज़र गए थे, और गाँव ने ही उसे पाला था - कभी इस घर में, कभी उस घर में, कभी मंदिर के प्रसाद पर, कभी किसी की मज़दूरी में हिस्सा बँटाकर। शायद इसीलिए गोविंद के भीतर पूरे गाँव के लिए एक ऐसी ज़िम्मेदारी घर कर गई थी जो उम्र से कहीं ज़्यादा बड़ी थी। जब भी गाँव में कोई मुसीबत आती - बाढ़ हो, आग लगे, या किसी की बैलगाड़ी कीचड़ में फँस जाए - गोविंद सबसे पहले पहुँचता। लोग कहते, "गोविंद के कंधे भगवान ने खास बनाए हैं," और यह कहकर हँस देते, यह न जानते हुए कि वे कितना सच कह रहे हैं। गोविंद खुद भी नहीं समझ पाता था कि जब वह किसी बोझ तले होता, तो उसके भीतर से एक ताक़त क्यों उमड़ आती थी जो उसकी अपनी नहीं लगती थी।
गाँव के बाहर, जहाँ खेत ख़त्म होते और जंगल शुरू होता, वहाँ एक पुराना पीपल का पेड़ था, और उसी के नीचे बाबा भोलानाथ का डेरा था। कोई नहीं जानता था बाबा कहाँ से आए, कितने साल से वहाँ बैठे थे। शरीर पर राख पुती रहती, बाल जटाओं में उलझे रहते, और आँखों में एक ऐसी आग थी जिसे देखकर बच्चे डर जाते और बूढ़े हाथ जोड़ लेते। बाबा साल में शायद ही दस बार बोलते, मगर जब बोलते, तो उनकी बात पत्थर पर लकीर बन जाती। एक बार गाँव के मुखिया ने पीपल का पेड़ कटवाने की कोशिश की थी, तो बाबा ने बस इतना कहा था - "जिस दिन यह पेड़ कटेगा, उस दिन इस गाँव की जड़ें भी कटेंगी।" उस रात मुखिया के घर में अचानक आग लग गई थी, और तब से किसी ने उस पेड़ की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखा। बाबा को गुस्सा जल्दी आता था, और जब आता, तो आसपास की हवा तक भारी हो जाती, मगर पल भर में वे फिर उसी शांत, उदासीन साधु में बदल जाते, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
और फिर थीं पार्वती देवी - गाँव की दाई, वैद्य, और पंचायत की इकलौती औरत सदस्य। पैंतालीस की उम्र, पर आवाज़ में इतनी धार कि बड़े-बड़े मर्द भी उनके सामने बोलने से पहले दो बार सोचते। पार्वती देवी ने गाँव के हर दूसरे घर के बच्चे को अपने हाथों से जन्म दिलाया था, हर बीमार को अपनी जड़ी-बूटियों से ठीक किया था, और हर अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाई थी, चाहे वह अन्याय पंचायत के मुखिया की तरफ़ से ही क्यों न हो रहा हो। लोग उनसे डरते भी थे और उन पर भरोसा भी बेहिसाब करते थे। उनके हाथों में एक अजीब सी गर्माहट थी - जब वे किसी घाव पर हाथ रखतीं, दर्द जैसे कम होने लगता, ऐसा हर कोई महसूस करता था, भले ही कोई इसे नाम न दे पाता। गोविंद को वे बचपन से जानती थीं, और अक्सर उसे टोकतीं - "इतना बोझ मत उठाया कर अकेले, गोविंद, एक दिन टूट जाएगा शरीर।" गोविंद हँस देता, यह न जानते हुए कि पार्वती देवी की यह चिंता कितनी गहरी सच्चाई छुपाए हुए थी।
यह चारों - मास्टर ब्रह्मानंद, गोविंद, बाबा भोलानाथ, और पार्वती देवी - एक-दूसरे को बरसों से जानते थे, जैसे हर गाँव में सब एक-दूसरे को जानते हैं, मगर उनके बीच कभी कोई खास नज़दीकी नहीं रही थी। वे बस गाँव के अलग-अलग कोनों में अपनी-अपनी ज़िंदगी जी रहे थे, अनजान इस बात से कि उनकी आत्माएँ किसी और युग की, किसी और लोक की धरोहर लिए हुए हैं।
बदलाव की शुरुआत हुई उस दिन, जब कालीचरण सिंह की गाड़ी पहली बार रामटोला की मिट्टी पर धूल उड़ाती हुई आई।
कालीचरण शहर से आया था, चमकदार सफ़ेद कुर्ते और सोने की चेन पहने, हाथ में मोबाइल और पीछे तीन-चार गुर्गे लिए। उसने पंचायत में ऐलान किया कि सरकार ने नदी पर एक बड़ा बाँध बनाने की योजना पास की है, जिससे गाँव में बिजली आएगी, सिंचाई होगी, तरक्की होगी - और यह ठेका उसे मिला है। तालियाँ बजीं, कुछ लोग खुश हुए, कुछ ने शक भरी नज़रों से देखा। मास्टर ब्रह्मानंद ने सिर्फ इतना पूछा - "बाँध कहाँ बनेगा, बेटा? हमारे शिवालय के पास वाली ज़मीन तो नहीं?" कालीचरण मुस्कुराया, एक ऐसी मुस्कान जिसमें मिठास कम, चालाकी ज़्यादा थी - "मास्टर जी, तरक्की के लिए कभी-कभी पुरानी चीज़ों को थोड़ा हटाना पड़ता है। मंदिर तो दूसरी जगह भी बन सकता है।"
उस रात पार्वती देवी ने पंचायत की बैठक में खुलकर विरोध किया - "यह ज़मीन सिर्फ मिट्टी नहीं है, यह हमारी जड़ें हैं। इस आदमी की नीयत ठीक नहीं लगती।" कालीचरण ने सिर्फ हँसकर टाल दिया, मगर उसकी आँखों में एक पल के लिए जो चमक उभरी, वह हँसी की नहीं थी - वह किसी पुरानी दुश्मनी की चमक थी, जिसे शायद वह खुद भी नहीं पहचानता था।
गोविंद, जो उस बैठक में चुपचाप एक कोने में खड़ा सुन रहा था, महसूस कर रहा था कि उसके सीने में कुछ सुलग रहा है - एक ऐसी बेचैनी जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी, कालीचरण को देखकर। उसने खुद से कहा कि यह बस एक अजनबी से बेवजह की नाराज़गी है, मगर भीतर कहीं कुछ और ही फुसफुसा रहा था।
बाबा भोलानाथ उस दिन गाँव में नहीं आए थे, मगर कहते हैं कि जिस वक्त कालीचरण की गाड़ी गाँव की सीमा में दाखिल हुई, ठीक उसी वक्त पीपल के पेड़ के नीचे बैठे बाबा ने अचानक आँखें खोल दी थीं, बरसों की समाधि तोड़कर, और बुदबुदाए थे - "आ गया... आखिर आ ही गया।"
गाँव की ज़िंदगी फिर भी अपनी सामान्य रफ़्तार से चलती रही। बाँध का काम शुरू हुआ, मज़दूर आए, मिट्टी खुदी, पैसा बहा। कालीचरण हफ्ते में दो-तीन बार गाँव आता, हर बार अपनी बात मनवाने के नए तरीके लेकर - कभी लालच से, किसी को ठेके में हिस्सा देकर, कभी डर से, किसी की ज़मीन के काग़ज़ात में गड़बड़ी की धमकी देकर। धीरे-धीरे गाँव के कुछ लोग उसके पाले में आने लगे, कुछ चुप हो गए, और सिर्फ मुट्ठी भर लोग - मास्टर ब्रह्मानंद, पार्वती देवी, और उनकी बात सुनने वाला गोविंद - अब भी सवाल उठाते रहे।
एक शाम, जब सूरज सरसों के खेतों के पीछे डूब रहा था और आसमान नारंगी और बैंगनी रंगों से भर गया था, गोविंद पीपल के पेड़ के पास से गुज़र रहा था, तभी बाबा भोलानाथ की आवाज़ ने उसे रोक लिया - "रुक, बच्चा।" गोविंद चौंक गया, क्योंकि बाबा ने कभी उससे सीधे बात नहीं की थी। बाबा ने उसकी आँखों में गहराई से देखा, मानो कोई पुरानी किताब पढ़ रहे हों, और फिर धीरे से कहा - "तेरे कंधों पर जो बोझ है, वह इस जन्म का नहीं है। जल्द ही तुझे पता चलेगा।" इतना कहकर बाबा फिर आँखें मूँदकर बैठ गए, जैसे कुछ कहा ही न हो। गोविंद वहाँ से चला तो गया, मगर उस रात उसे नींद नहीं आई। वह खिड़की से बाहर काली रात को घूरता रहा, यह न समझ पाते हुए कि बाबा की बात का मतलब क्या था, मगर उसके भीतर कुछ था जो उस बात को झुठला नहीं पा रहा था।
उधर पार्वती देवी की जड़ी-बूटियों की पोटली में, जो उन्हें उनकी दादी से विरासत में मिली थी, एक पुराना, मैला काग़ज़ था जिसे उन्होंने कभी खोलकर नहीं पढ़ा था - दादी ने मरते वक्त कहा था, "जब वक्त आएगा, खुद खुल जाएगा।" उस रात, जब कालीचरण के आदमी बाँध की नई सीमा नापने शिवालय के करीब तक आ पहुँचे, पार्वती देवी ने गुस्से में वह पुरानी पोटली उठाई, और जैसे ही उनकी उँगलियाँ उस मैले काग़ज़ पर पड़ीं, उन्हें एक झटका सा महसूस हुआ - हल्का, बिजली जैसा, जो उनकी बाँह से होकर दिल तक पहुँच गया। उन्होंने काग़ज़ को घबराकर वापस रख दिया, यह सोचकर कि थकान के मारे ऐसा महसूस हुआ होगा, मगर उस रात नींद में उन्हें एक सपना आया - आग की लपटों में एक स्त्री रूप, त्रिशूल लिए, जो उन्हीं के चेहरे से मिलता-जुलता था।
मास्टर ब्रह्मानंद उस हफ्ते स्कूल की छुट्टी के बाद अकेले शिवालय में बैठे थे, वही पुराना शिवालय जिसे कालीचरण हटवाना चाहता था। वे अक्सर वहाँ शाम को बैठकर कुछ बुदबुदाया करते, खुद नहीं जानते क्यों। उस दिन, जब वे आँखें बंद किए बैठे थे, उनके मुँह से अनायास एक श्लोक फूट पड़ा - वही श्लोक, जो आगे चलकर उस तूफ़ानी रात को इतना अहम साबित होने वाला था। जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो पाया कि शिवालय के चारों तरफ की मिट्टी में उगी घास अचानक हरी-भरी हो गई थी, जैसे किसी ने अभी-अभी पानी दिया हो, जबकि आसपास कहीं कोई पानी का स्रोत नहीं था। उन्होंने चश्मा उतारकर आँखें मलीं, यह सोचकर कि बुढ़ापे में आँखें धोखा देने लगी हैं, और घर की तरफ चल दिए, इस राज़ को अपने भीतर ही दबाए हुए।
गाँव में एक अजीब सी बेचैनी फैलने लगी थी - कोई इसे बयान नहीं कर पा रहा था, मगर हर कोई महसूस कर रहा था। हवा में कुछ बदल रहा था। बूढ़े कहते, "कुछ होने वाला है," और जवान लोग इसे बूढ़ों की वहमी बातें समझकर हँस देते। मगर पीपल के पेड़ के पत्ते बिना हवा के हिलने लगे थे, शिवालय की घंटी कभी-कभी अपने आप बज उठती, और गाँव के कुत्ते रात के किसी खास पहर पर एक साथ रोने लगते, मानो कोई अदृश्य चीज़ गाँव की सीमा पर मंडरा रही हो।
कालीचरण सिंह, इस सबसे बेख़बर, अपनी योजनाओं में मशगूल था। उसकी नज़र अब सिर्फ बाँध पर नहीं थी - उसने गाँव के मुखिया पद के लिए भी चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया था, यह वादा करते हुए कि वह रामटोला को "आधुनिक गाँव" बनाएगा। उसकी बातों में एक ऐसी चालाकी थी जो गरीबों को सपने बेचती और ताक़तवरों को डराती। जो उसका विरोध करते, उनकी ज़मीन के काग़ज़ात में अचानक गड़बड़ी निकल आती; जो उसका साथ देते, उनके घर बिजली के नए कनेक्शन पहुँच जाते। धीरे-धीरे उसकी पकड़ गाँव पर मज़बूत होती जा रही थी, जैसे किसी साँप ने चुपचाप अपना शिकार जकड़ लिया हो।
एक दिन पंचायत की बैठक में, जब कालीचरण मुखिया पद के लिए अपना प्रचार कर रहा था, पार्वती देवी ने खड़े होकर सीधा सवाल पूछ लिया - "तुम्हारे ठेके का पैसा कहाँ से आया, कालीचरण? और यह अचानक मुखिया बनने की जल्दी क्यों?" पूरी पंचायत में सन्नाटा छा गया। कालीचरण की मुस्कान एक पल के लिए गायब हुई, और उसकी आँखों में वही पुरानी, ठंडी चमक उभर आई - इस बार ज़्यादा साफ़, ज़्यादा गहरी, जैसे सदियों की कोई भूख उसमें जाग उठी हो। उसने धीरे से कहा - "देवी जी, कुछ सवाल न पूछे जाएँ तो अच्छा है। हर किसी की एक कीमत होती है, हर किसी की एक कमज़ोरी। मुझे पता लगाना अच्छे से आता है।" यह कहकर वह मुस्कुराता हुआ चला गया, मगर उसके जाने के बाद भी हवा में एक अजीब सी भारीपन रह गया, जैसे किसी ने अभी-अभी एक छिपी हुई धमकी दी हो।
उस रात गोविंद, बाबा भोलानाथ, पार्वती देवी और मास्टर ब्रह्मानंद - चारों अलग-अलग, अपने-अपने घरों में, एक जैसा सपना देखते हैं, बिना यह जाने कि बाकी तीन भी वही देख रहे हैं। सपने में एक विशाल, अंधकार से भरा आकाश है, और उसमें चार रोशनियाँ जल रही हैं - एक सुनहरी, एक नीली, एक भगवा, और एक श्वेत। चारों रोशनियाँ धीरे-धीरे एक-दूसरे की तरफ खिंचती हैं, मानो सदियों बाद फिर मिलने वाली हों, और तभी एक पाँचवीं, काली छाया उन चारों के बीच फैलती है, उन्हें अलग करने की कोशिश करती हुई।
चारों एक साथ हड़बड़ाकर जाग उठते हैं, पसीने से तरबतर, दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कता हुआ, और खिड़की से बाहर देखते हैं - रामटोला की वही शांत रात, सरसों के खेतों पर चाँदनी बिखरी हुई, मानो कुछ हुआ ही न हो। मगर चारों के भीतर अब एक जैसी बेचैनी घर कर चुकी है, एक जैसा सवाल - "यह सपना इतना सच क्यों लगा?"
गाँव अब भी सोया हुआ था, अनजान इस बात से कि उसकी मिट्टी में सोए हुए देवता जागने को हैं, और उनके साथ ही जागने को है एक ऐसा अंधकार जो सदियों से अपने वक्त का इंतज़ार कर रहा था।