बारिश की हल्की-हल्की बूंदें शहर को किसी फिल्म जैसा बना रही थीं।
लेकिन उस खूबसूरत मौसम से बिल्कुल उलट थी अनन्या मिश्रा की हालत।
"हे भगवान... आज ही लेट होना था!"
वह एक हाथ में कॉफी, दूसरे में फाइल और कंधे पर बैग लटकाए सड़क पार करने के लिए दौड़ी।
उसी समय...
पीईईईईईईईई...!!
एक चमचमाती काली लग्ज़री कार उसके सामने ब्रेक लगाकर रुकी।
कॉफी सीधा कार के बोनट पर...
और अगला छींटा...
कार से उतरने वाले आदमी की सफेद शर्ट पर।
अनन्या ने धीरे-धीरे ऊपर देखा।
लगभग 6 फीट 2 इंच लंबा, ब्लैक सूट, ठंडी निगाहें, महंगी घड़ी और ऐसा चेहरा जिसे देखकर आधी दुनिया क्रश खा जाए।
वह गुस्से में बस उसे देख रहा था।
"देखकर नहीं चल सकती?"
अनन्या ने भी तुरंत जवाब दिया।
"आप भी तो देखकर गाड़ी चला सकते थे!"
"मेरी गलती?"
"जी हाँ!"
दोनों एक-दूसरे को ऐसे घूर रहे थे जैसे अभी युद्ध शुरू हो जाएगा।
ड्राइवर धीरे से बोला—
"सर... मीटिंग के लिए देर हो रही है।"
उस आदमी ने बिना कुछ कहे अपना कार्ड अनन्या के हाथ में रखा।
"मेरी शर्ट का बिल भेज देना।"
"और आप मेरी कॉफी का बिल भेज दीजिए!"
उसने कार्ड बीच से फाड़ दिया।
वह आदमी पहली बार थोड़ा हैरान हुआ।
फिर हल्की-सी मुस्कान आई...
"Interesting..."
और कार चली गई।
अनन्या ने पीछे से चिल्लाकर कहा—
"घमंडी कहीं के!"
उसी दिन दोपहर...
अनन्या जिस इंटरव्यू के लिए आई थी...
उसे देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
रिसेप्शनिस्ट मुस्कुराई।
"मैम, हमारे CEO आपका इंटरव्यू लेंगे।"
दरवाज़ा खुला।
और अंदर वही आदमी बैठा था।
उसने बिना ऊपर देखे कहा—
"Come in."
अनन्या बुदबुदाई—
"हे भगवान... फिर से यही?"
उसने सिर उठाया।
"ओह... कॉफी गर्ल।"
"मेरा नाम अनन्या है।"
"और मेरा नाम..."
"पता है... घमंडी CEO."
कमरे में तीन सेकंड की चुप्पी।
फिर...
CEO ज़ोर से हँस पड़ा।
"काफी बहादुर हो।"
"सच बोलना बहादुरी नहीं होती।"
वह पहली लड़की थी जो उससे डर नहीं रही थी।
उसका नाम था...
आर्यन मल्होत्रा।
देश की सबसे बड़ी टेक कंपनी का मालिक।
सैकड़ों करोड़ की कंपनी।
लेकिन मुस्कुराना जैसे भूल चुका था।
इंटरव्यू शुरू हुआ।
"तुम्हारे पास अनुभव?"
"कम है।"
"फिर नौकरी क्यों दूँ?"
"क्योंकि बाकी लोग आपकी हाँ में हाँ मिलाएँगे... मैं सच बोलूँगी।"
आर्यन ने पहली बार ध्यान से उसे देखा।
वह अलग थी।
बहुत अलग।
"You're hired."
अनन्या चौंक गई।
"इतनी जल्दी?"
"कॉफी गिराने का कॉन्फिडेंस देखकर लगा... कंपनी भी संभाल लोगी।"
"बहुत फनी हैं आप।"
"मुझे पता है।"
"नहीं... बिल्कुल नहीं।"
एक हफ्ते बाद...
ऑफिस में सब आर्यन से डरते थे।
लेकिन अनन्या...
"सर... आप फिर से लंच स्किप कर रहे हैं?"
"हाँ।"
"नहीं।"
उसने सामने डिब्बा रख दिया।
"खा लीजिए।"
"ऑर्डर दे रही हो?"
"जी।"
"अगर ना खाऊँ?"
"तो आपकी दादी को फोन कर दूँगी।"
आर्यन ने पहली बार बिना बहस किए खाना शुरू कर दिया।
बाहर पूरा स्टाफ शीशे से देख रहा था।
"CEO सर... किसी की बात मान गए?"
"ये लड़की है या जादू?"
उसी शाम...
आर्यन की दादी अचानक ऑफिस पहुँचीं।
उन्होंने अनन्या को देखा।
फिर आर्यन को।
फिर मुस्कुराईं।
"आखिर मिल ही गई!"
दोनों एक साथ बोले—
"क्या?"
दादी बोलीं—
"मेरी होने वाली बहू।"
अनन्या के मुँह का पानी सूख गया।
"न-नहीं..."
आर्यन ने सिर पकड़ लिया।
"दादी... प्लीज़।"
लेकिन दादी मानने वालों में से नहीं थीं।
अगले दिन...
घर पर फैमिली डिनर।
दादी ने घोषणा कर दी।
"एक महीने बाद आर्यन की सगाई होगी।"
आर्यन बोला—
"मैं शादी नहीं करूँगा।"
"तो कंपनी छोड़ दो।"
पूरा हॉल शांत हो गया।
"क्या?"
दादी मुस्कुराईं।
"कंपनी की नई शर्त।"
आर्यन पहली बार फँस चुका था।
अगले दिन ऑफिस...
आर्यन ने अनन्या को केबिन में बुलाया।
"मुझे तुम्हारी मदद चाहिए।"
"किस बात में?"
"मेरी नकली मंगेतर बन जाओ।"
अनन्या की आँखें गोल।
"क्या??"
"सिर्फ तीन महीने।"
"नहीं!"
"सैलरी दस गुना।"
"नहीं!"
"तुम्हारी माँ का इलाज मैं करवा दूँगा।"
अनन्या चुप हो गई।
उसकी माँ की दवाइयों के पैसे जुटाना मुश्किल हो रहा था।
आर्यन बोला—
"कोई गलत बात नहीं होगी। बस एक्टिंग।"
"और तीन महीने बाद?"
"हम अलग हो जाएँगे।"
लंबी चुप्पी...
फिर अनन्या ने गहरी साँस ली।
"...ठीक है।"
आर्यन ने हाथ बढ़ाया।
"डील?"
अनन्या ने हाथ मिलाया।
"डील।"
दोनों को बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था...
कि यही एक झूठ...
उनकी पूरी ज़िंदगी बदलने वाला था।
उसी शाम...
दादी के सामने दोनों हाथ पकड़कर खड़े थे।
आर्यन बोला—
"दादी... हम... एक-दूसरे को पसंद करते हैं।"
दादी खुशी से रोने लगीं।
पूरे घर में मिठाइयाँ बाँटी जाने लगीं।
तभी...
एक तेज़ आवाज़ आई—
"आर्यन... तुम्हारी मंगेतर मैं हूँ, ये कौन है?"
दरवाज़े पर खड़ी थी एक बेहद स्टाइलिश लड़की...
उसकी आँखों में गुस्सा था।
आर्यन के चेहरे का रंग उड़ गया।
अनन्या ने धीरे से पूछा—
"...ये कौन है?"
आर्यन बुदबुदाया—
"...मुसीबत।"
जारी रहेगा... 💖