“मैंने कुछ नहीं किया… मुझे मत मारो… बहुत दर्द हो रहा है।
मैंने कोई गलती नहीं की। सच में मम्मी… वो तो विक्की अंकल ने मेरे साथ गलत व्यवहार किया था। मैं सच कह रही हूँ… मैंने कुछ नहीं किया।”
रुचि आँखों में आँसू लिए अपनी माँ से विनती कर रही थी।
लेकिन उसकी माँ, सावित्री जी, बिना रुके उस पर डंडे बरसाए जा रही थीं।
“चुप कर, कर्मजली! हमें बेवकूफ समझ रखा है क्या?
हम अच्छी तरह जानते हैं तू कैसी है। खुद आदमी पर डोरे डालती है और अब बिचारी बनने का नाटक कर रही है, बेचारे मिस्टर विक्की जैसे शरीफ आदमी पर इल्ज़ाम लगा रही है!
आज तो तुझे सबक सिखाकर ही रहूँगी।”
सावित्री जी गुस्से में रुचि को मारती जा रही थीं।
मार खाते-खाते रुचि की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। उसका शरीर दर्द से कांप रहा था, आँसू लगातार बह रहे थे।
लेकिन सावित्री जी को जरा भी तरस नहीं आ रहा था।
घर में खड़े नौकर-चाकर यह सब देखकर चुप थे, पर उनके चेहरों पर रुचि के लिए दया साफ दिखाई दे रही थी।
तभी पास खड़े रुचि के पिता, विनोद चौधरी, बोले—
“बस भी करो सावित्री… अगर तुम इसे ऐसे ही मारती रहीं तो यह मर जाएगी।”
सावित्री जी गुस्से से उनकी ओर मुड़ीं—
“चुप रहो! सब तुम्हारी ही वजह से है। अगर तुम इसकी भागी हुई माँ के साथ रिश्ते में न पड़ते तो यह लड़की इस घर में आती ही नहीं और न मेरे जीवन का बोझ बनती।”
तभी विनोद जी के पास खड़े विक्की बोले—
“अरे सावित्री जी, रहने दीजिए। बच्ची है… इस उम्र में गलती हो जाती है।”
“विक्की जी, आप कह रहे हैं तो मैं इसे छोड़ देती हूँ… नहीं तो आज इसकी खाल तक उधेड़ देती!”
सावित्री जी ने जलती हुई नज़रों से रुचि को देखा।
फिर उन्होंने जोर से आवाज लगाई—
“रूपा! रूपा! इस लड़की को अभी मेरी आँखों के सामने से ले जाओ। नहीं तो आज इसकी जान ले लूँगी!”
रुचि इतनी मार खा चुकी थी कि उससे ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था।
लेकिन माँ की डरावनी आवाज सुनकर वह किसी तरह काँपते हुए उठी।
नौकरानी रूपा ने रुचि को सहारा दिया और धीरे-धीरे उसे कमरे की तरफ ले गई।
रूपा ने दरवाजा खोला और रुचि को कमरे में छोड़ा।
रूपा के जाते ही नन्ही सी रुचि निढाल हो गई जैसे अब नन्ही सी रुचि अपनी जीवन से हार गई हो। रुचि के मोटी जैसे आशु फर्श को भिगो रहे होते है कभी वो अपने सामने दिवाल को देखती तो कभी छत के ऊपर टांगे फैन को कहना मुश्किल है रुचि क्या सोच रही है वो लगातार रो रही होती है।
रुचि रोती बिलखती हुई - “क्यों क्यों मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा मैने किसी का क्या बिगड़ा क्यों क्यों आखिर क्यों ?”
रुचि ऊपर देखते हुए मम्मा आप क्यों चली गई मुझे अपने साथ क्यों नहीं ले गई ये दुनिया ओर यह के लोग बहुत बुरे है सब मेरे साथ बहुत गंदा बर्ताव करते है पहले शुरू शुरू में मम्मी मेरा बहुत ख्याल रखती थी लेकिन अब अब वो…
इतना कह के रुचि किसी दुनिया में चली है और रोने लगती है।
वहीं दूसरे रूम में__
सावित्री जी गुस्से से पूरे रूम का सामान इधर से उधर फेक रही होती है। वहीं उनके पास में विनोद जी खड़े उन्हें देखने के सिवा कुछ नहीं कर रहे होते है।
सावित्री जी दंत पिस्ते हुए -“उस लड़की की हिम्मत कैसे हुई ? विक्की जैसे भले आदमी के ऊपर आरोप लगाने की उसने खुद को समझ क्या रखा है ? वो कही कि अप्सरा है।”
थोड़ा रुक के -“इस लड़की को तो मै छोड़ूंगी नहीं उसको वो सबक सिखाओगी जिससे वो पूरी जिंदगी याद रखेगी।”
सावित्री जी अपनी बात पूरी करके रूम से निकलने लगती है उतने में विनोद जी सावित्री जी का हाथ पकड़ते हुए - “रुक जाओ भगवान ओर कितने उस बच्ची पे अपना कहर बरसाओगी कुछ देर पहले तुमने उसे कम मारा जो अब फिर से उसके पास जा रही हो।”
सावित्री जी अपने हाथ को गुस्से दे कहते हुए जिसे विनोद जी ने पकड़ रखा था - “क्या कह कहर अरे मेरा बस चले तो मै उसे मार ही डालूं उसकी वजह से…”
इतना कहते कहते सावित्री जी आंखों में हल्की सी नमी आ जाती है। इससे पहले विनोद जी देख पाए वो जल्दी से रूम में लगे बाथरूम में घुस जाती है।
रुचि रोते रोते कब सो जाती है उसे खुद पता नहीं चलता है।
अगली सुबह__
रुचि की आंख खुलती है तो खुद को ठंडे फर्श में लेटे हुए उसे कोई हैरानी नहीं होती है। उसे पिछले दिन हुए हादशा याद आ रहा होता है ।
कैसे वो अपने रूम से निकल के पानी लेने के लेकिन किचेन की तरफ जा रही होती है वहीं रस्ते में उसे किसी की बाहें द्वारा एक रूम में खींच लिया जाता है जब वो कुछ बोलने की कोशिश करती है उसका मुंह हाथों द्वारा बंद कर दिया जाता है। वह बहुत संघर्ष करती है लेकिन उस आदमी की मजबूत बाहों की वज़ह से वो जरा भी हिल नहीं पाती है। रुचि को लगता है अब कुछ नहीं हो सकता उतने में रूम के बाहर से जानी पहुंची आवाज सुनाई देती है।
“विक्की जी आप कह है देखिए मैंने ओर विनोद ने आपके लिए सरप्राइज ऑर्गेनाइज्ड किया है ज़रा देखिए उम्मीद है आपको हमारा सरप्राइज बहुत पसंद आएगा ।”
रूम के बाहर कोई ओर नहीं सावित्री जी ओर विनोद जी होते है ।
अपनी मम्मी पापा की आवाज सुन के रुचि की जान में जान आती है लेकिन अपने ऊपर उस शैतान ( विक्की ) को देख के रुचि का दिल जोरो से धड़क रहा होता है।
वह बोलना चाहती थी लेकिन उसके मुंह से आवाज नहीं निकलती है।
विक्की नन्ही सी रुचि के गालों पे बेशरम जैसे हाथ फेरते हुए तेज आवाज में - “सावित्री जी इसकी क्या जरूरत थी आप तो खामा खाई इतना सब कर रही है।’
रूम के बाहर सावित्री जी -’अरे आप हमे शर्मिंदा कर रहे है आपके लिए जितना करे कम ही है।”
“अच्छा ये सब छोड़े आप जल्दी से जल्दी लिविंग रूम में आए”
सावित्री जी अपनी बात कहती है।
विक्की रुचि को अपनी कातिलाना मुस्कान से देखते हुए -” ok”
सावित्री जी ओर विनोद जी जाने लगते है।
वहीं नन्ही सी रुचि का दिल धक धक हो रहा होता है उसे कुछ समझ नहीं आता लेकिन पता नहीं कह से उसके अंदर अचानक से हिम्मत आती है वो पास से फूलदान उठाने की कोशिश करती है लेकिन वो गलती से जमीन में गिर जाता है जिससे पूरे रूम में एक तेज आवाज गूंज उठती है जिसे सुन के वह जो सावित्री जी ओर विनोद जी वह से जा रहे होते है इस अचानक सी आवाज को सुन के रुक जाते है ओर तुरंत रूम का गेट खोल के अंदर आ जाते है।
सावित्री जी विनोद जी अपने सामने का नज़ारा देख के अपनी आँखें हैरानी से बड़ी बड़ी कर देते है।
दोनों देखते है रुचि विक्की के ऊपर लेटी होती है देखने से ऐसा लगता है रुचि ने विक्की को पकड़ रखा होता है लेकिन असल में रुचि जल्दी से उठने की कोशिश में विक्की के ऊपर गिर जाती है जिसका फायदा उठा के विक्की भी रुचि को अपनी तरफ खींचता है।
लेकिन जैसे ही विक्की देखता सावित्री विनोद रूम का गेट खोल के रूम के अंदर आ रहे हैं वैसे वो उन्हें दिखाने की कोशिश करते हुए रुचि से बोलता है - “रुचि बेटा आप ये क्या कर रहे ? ये गलत है बाहर आपके मम्मी पापा”
सावित्री जी, विनोद जी दोनों लोग रूम के अंदर आते ही विक्की की बात सुन लेते है जिससे उन्हें लगता है रुचि ने कुछ गलत करने की कोशिश की है।
सावित्री जी गुस्से से चिल्लाते हुए - ‘रुचि तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई विक्की जी के रूम में आने की ओर ये क्या हरक है ये क्या करने की कोशिश कर रही थी ?”
सावित्री जी रुचि को बेड से उठती है और एक खींच के तमाचा जड़ देती है।
रुचि अपने आंखों में आशु लिए - “मम्मी मैने कुछ नहीं किया वो.. तो… विक्की अंकल मुझे यह लेकर आए मै तो पानी लेने के लिए किचन में जा रही थी।”
सावित्री जी एक ओर थप्पड़ रुचि को मारते हुए - “चुपकर लड़की हमे न बता तू कैसी है और क्या करने जा रही थी आज मै तुझे बताओगी चल..”
इतना कह के सावित्री जी रुचि को रूम से बाहर ले जाती है।
सावित्री जी रुचि के बाल पकड़ते हुए - “क्या कह विक्की जी तुझे ले गए तेरी ये बोलने की हिम्मत कैसे हुई ? उल्टा चोर कोतवाल को डांटे तुझे तो आज मै बताती हूं।’
रुचि रोते हुए - “सच में मम्मी मैने कुछ नहीं किया विक्की अंकल ने मेरे साथ गंदा करने की कोशिश कर रहे थे”
रुचि अपने पिता को देखते हुए - “पापा आप तो मेरी बात मानो मैने सच में कुछ नहीं किया”
विनोद जी रुचि को अपनी तरस निगाहों से देख रहे होते है उनकी आंखों में भी दर्द होता है लेकिन वो कुछ नहीं कहते है।
बाकी तो आप सब को पता है बिचारी नन्ही सी रुचि के साथ क्या होता है ?
वर्तमान समय__
रुचि को ये सब याद आते ही उसकी आंखे भीग जाती है ।
वह अपनी जगह से उठाने की कोशिश करती है लेकिन उसे अपने शरीर में एक असहानी दर्द होता है जिसके चलते उसके मुंह से एक दर्द भरी चीख निकल जाती है।
आ… आ… आ…😭
रुचि रोने के सिवा कुछ नहीं कर सकती है। जब वो रो रो के थक जाती है धीरे से उठती है और नहाने के लिए बाथरूम में चली जाती है।
जैसे ही रुचि के शरीर में हल्का गुनगुना पानी पड़ता है उसे दर्द वाली जगह पे बहुत आराम मिलता है।
रुचि की आखे सुकून से बंद हो जाती है।
क्या होगा आगे?
क्या सावित्री का गुस्सा यहीं खत्म होगा… या रुचि की मुश्किलें और बढ़ेंगी?
क्या रुचि कभी अपने दर्द से बाहर निकल पाएगी जानने के लिए पढ़िए — “बिना पंखों के पंख” मेरे यानी SKD के साथ