3.1 रास्ते की घबराहट और शीशे के सामने की बेचैनी
अजय की बाइक धूल भरी सड़क पर दौड़ रही थी। हवा के झोंके चेहरे से टकराते, मगर उसका मन कहीं और भाग रहा था — धड़कनें इतनी तेज़ थीं जैसे इंजन की आवाज़ भी कम पड़ गई हो। “क्या होगा अगर सामने पसंद न आए… या उसने मुझे ही पसंद न किया तो?”
उधर, गाँव के उस पुराने मकान के भीतर… लड़की शीशे के सामने खड़ी थी। कभी बालों की लट ठीक करती, तो कभी अपने कान की बाली सीधी करती। चेहरे पर हल्की-सी बेचैनी थी — “क्या होगा सब ठीक-ठाक? क्या वो मुझे पसंद भी करेगा?”
इतना सोचते-सोचते उसके होठों पर हल्की मुस्कान तैर गई, मानो दिल में कहीं एक मीठी-सी गुदगुदी हो रही हो। तभी पीछे से उसकी सहेली हँसते हुए बोली — “अरे वाह! ये तो सातवीं बार बाली ठीक कर रही है तू। कहीं ऐसा न हो होने वाले जीजा जी तुझे आज ही उठा कर ले जाएँ अपने साथ!” लड़की शर्मा गई, गालों पर लालिमा और गहरी हो गई। शीशे में उसने खुद की ही झलक देखी और झट से नज़रें झुका लीं।
3.2 गाँव की दहलीज़ और धूल भरा सफ़र
सड़क के उस मोड़ पर… रोहित ने पीछे से आवाज़ लगाई — “भाई, टेंशन छोड़! मिठाई का डिब्बा भी तैयार है, मोसिया ले जाएँगे। सब सेट है, अब फिक्र करने की कोई बात नहीं।” अजय ने मुस्कराने की कोशिश की, मगर चेहरे पर वही हल्की घबराहट थी।
वो जानता था, असली बात अभी भी उसके दिल के अंदर दबी है… उधर लड़की ने खिड़की से झाँककर आसमान देखा — हल्के बादल थे, पर हवा में अजीब-सी मिषास थी। “क्या पता आज कुछ बदल जाए…” उसने सोचा।
अजय और रोहित अब गाँव से बस पाँच मिनट की दूरी पर थे। सड़क पर धूल इतनी उड़ रही थी कि चेहरा और कपड़े सब परत से ढक चुके थे। आगे चल रही मारुति अचानक रुक गई। उसमें से अजय के पापा उतरे। दोनों ने बाइक रोकी और पास आए। पापा ने मुस्कुराते हुए कहा — “देख रहे हो, अपना क्या हाल बना लिया? पूरा धूल में लिपट गए हो।” असल में मारुति आगे-आगे और बाइक पीछे-पीछे थी, इसलिए दोनों पर धूल ज़्यादा जम गई थी। वहीं थोड़ी देर रुककर अजय और रोहित ने चेहरा धोया, कपड़े झाड़े। फिर पापा बोले — “तू चल, गाड़ी में बैठ जा। मैं बाइक लेकर आऊँगा। वैसे भी घर आ ही गया है।”
3.3 आँगन में स्वागत और मेहमान-नवाज़ी
कुछ ही मिनटों में गाड़ी एक बड़े से घर के सामने आकर रुकी। गाड़ी दरवाज़े पर थमी तो लड़की के पापा आगे बढ़े। अजय के पापा ने मुस्कराकर उन्हें गले लगाया और हालचाल पूछा। सब गाड़ी से उतरे। अजय ने आदर से लड़की के पापा के पैर छुए और बाकी रिश्तेदारों को भी नमस्ते की। कुछ ने हाथ मिलाया, कुछ ने दुलार से पीठ थपथपाई।
फाटक पार करते ही आँगन में मेहमानों की चहल-पहल थी। कोई हँसते हुए गपशप कर रहा था, कोई बच्चों को संभाल रहा था। अजय ने एक-एक बड़े-बुज़ुर्ग के पैर छुए, बाकी सबको नमस्ते कहा। जैसे ही सब तख़्तों और चारपाइयों पर बैठे, मिठाई और पानी सामने आ गया। थोड़ी ही देर में गरमा-गरम चाय और पकौड़ियाँ भी आ गईं। इसी बीच रिश्तेदारों के सवाल-जवाब शुरू हुए। एक अंकल हँसते हुए बोले — “तो बेटा, पढ़ाई कहाँ तक की?” अजय ने शान्त मुस्कान के साथ जवाब दिया। दूसरे चाचा ने रोहित से मज़ाक करते हुए कहा — “भाई, लगता है
पढ़ाई से ज़्यादा खेलकूद में आगे है ये!” सब ज़ोर से हँस पड़े। लड़की की बुआ ने धीरे से अपनी बहन से कहा — “लड़का शान्त है, सलीका भी अच्छा है।” ये सुनकर अजय के पापा के चेहरे पर गर्व की हल्की-सी चमक आ गई।
3.4 शालीनता, उत्सुकता और लड़की की आमद
आँगन में हँसी-ठिठोली का माहौल था। अजय एक कोने में सधा बैठा था। जहाँ ज़रूरत होती, वहीं मुस्कुराकर जवाब देता। इतने में लड़की की बुआ ने धीरे से उसकी तरफ़ देखकर फुसफुसाया — “लड़का तो ठीक लग रहा है, बस थोड़ा चुप-चुप है।” बगल में बैठी चाची हँस पड़ीं — “अरे, अच्छा है! ज़्यादा बोलने वाले लड़के तो आजकल मिलते कहाँ हैं?”
इधर, लड़की खिड़की से झाँक रही थी। सहेली ने फिर चुटकी ली — “देख ले, जीजा जी तो सबको इंप्रेस कर रहे हैं।” लड़की के गाल और लाल हो गए। उसने तुरंत परदा खींच लिया। उधर, किसी मामा ने अजय से पूछा — “बेटा, पढ़ाई कहाँ तक हुई?”
अजय ने सहजता से जवाब दिया। फिर किसी और ने पूछा — “काम-धंधे में क्या सोच रखा है?” अजय ने मुस्कुराते हुए छोटा-सा जवाब दिया। सब उसकी शालीनता देख कर चुप हो गए।
तभी किसी ने आवाज़ दी — “लड़की को बुलाओ।” सबकी नज़र दरवाज़े की ओर मुड़ गई। धीरे-धीरे कदम बढ़ाती लड़की भीतर आई। गुलाबी सलवार-सूट पहने, सिर पर दुपट्टा सँभाले, नज़रें झुकी हुईं। उसकी चाल में हल्की-सी घबराहट थी, मगर आँखों के कोनों में छिपी मुस्कान उसकी बेचैनी को और प्यारा बना रही थी। पीछे उसकी सहेली भी साथ-साथ चली आ रही थी।
3.5 देवर का मज़ाक और आँखों की गुफ़्तगू
लड़की बड़ों के पास पहुँचते ही धीरे-धीरे उनके पैर छूने लगी। आख़िरकार वो अजय के पास पहुँची। एक पल को माहौल जैसे ठहर गया। उसने धीरे से झुककर अजय के पैर छुए। अजय का दिल जोर से धड़क उठा, लेकिन वो बस हल्की-सी मुस्कान दबाकर चुपचाप बैठा रहा। उसकी नज़रें, चाहकर भी, लड़की से हट न पा रही थीं।
लड़की फिर रोहित की ओर बढ़ी। जैसे ही उसने झुकना चाह, रोहित ने हड़बड़ाकर अपने पैर पीछे कर लिए और हँसते हुए बोला — “अरे! मैं तो तुम्हारा देवर हूँ।” पास बैठे एक बुज़ुर्ग चाचा ने हँसते हुए जोड़ दिया — “हाँ-हाँ, यही तुम्हारा देवर है। इसको पैर छूने की ज़रूरत नहीं।” पूरा आँगन हल्की-सी हँसी से गूंज उठा। लड़की झेंप गई, उसके गाल और भी लाल हो उठे। मुस्कराते हुए वो जल्दी से अपनी सहेली के पास जाकर खड़ी हो गई।
जाने से पहले, उसने एक पल के लिए चुपके से सिर उठाया। उसकी नज़रें सीधे अजय से टकराईं। कुछ ही सेकंड… दोनों की आँखें एक-दूसरे में अटक गईं। अजय का दिल जैसे फिर से धड़क उठा। लड़की ने तुरंत नज़रें झुका लीं, मगर उसके होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान तैर गई। इसके बाद लड़की अपनी सहेली के साथ अंदर चली गई।
3.6 राम-सीता की जोड़ी और पहला स्पर्श
थोड़ी ही देर में वही लड़की फिर से आई — इस बार उसके हाथों में चाँदी की थाली थी, जिसमें पान सजाए रखे थे। वो धीरे-धीरे सबके पास जाकर थाली बढ़ाती। जब वो अजय के पास पहुँची, तो उसने हिम्मत करके हल्की-सी नज़र उठाई। अजय की आँखें उससे मिलीं… पर दोनों ने कुछ नहीं कहा। तभी पीछे से अजय के पापा बोले — “ये नहीं खाता।” लड़की हल्की-सी मुस्कुराई, और थाली अपनी सहेली के हाथों में पकड़ा दी। इसी बीच घर के भीतर से दो कुर्सियाँ आकर बीच में रखी गईं। एक बुज़ुर्ग मज़ाक में बोले — “अरे, लड़का-लड़की को बिठाओ न कुर्सी पर।” अजय और लड़की दोनों ही थोड़े झिझकते हुए जाकर कुर्सी पर बैठ गए।
तभी कुछ रिश्तेदार बोले — “देखो-देखो, दोनों की जोड़ी तो बिल्कुल राम–सीता जैसी लग रही है!” मोसिया ने लड़की से कुछ सवाल किए — पढ़ाई, शौक वगैरह के। वो धीमे-धीमे जवाब देती रही।
आख़िर में अजय के पापा बोले — “चलो, दोनों को साथ खड़ा करो, फोटो खींच लेते हैं।” दोनों उठकर खड़े हुए। अजय थोड़ा किनारे हटकर खड़ा हो गया। तभी पीछे से किसी ने चुटकी ली — “अरे भाई! इतना दूर क्यों खड़े हो? थोड़ा पास आओ न।” अजय धीरे से लड़की के करीब हुआ, और उसी पल दोनों हल्के से टकरा गए। वो उनका पहला स्पर्श था। अजय का दिल ज़ोर से धड़क उठा, चेहरा हल्का-सा लाल पड़ गया।
लड़की ने भी झिझकते हुए नज़रें झुका लीं, मगर उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई। फोटो खिंच गई। दोनों फिर से कुर्सी पर बैठ गए। तभी अजय के पापा ने आस-पास बैठे लोगों से कहा — “मेरा मानना है कि लड़का-लड़की को आपस में थोड़ी देर अकेले बात करनी चाहिए। उन्हें भी तो एक-दूसरे को समझने का मौका मिले।”