मेरे हिस्से की ज़िंदगी - अध्याय 1 sapna द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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मेरे हिस्से की ज़िंदगी - अध्याय 1

मेरे हिस्से की ज़िंदगी

Part 1 – ज़िंदगी अभी बाकी है


भूमिका (Introduction)

यह कहानी मेरी ज़िंदगी का सच है।

इसमें न कोई बनावट है, न ही कोई फिल्मी परफेक्ट एंडिंग।

यह कहानी है एक लड़की की, एक पत्नी की, और एक माँ की—

जो बार-बार टूटी, बार-बार गिरी, पर हर बार खुद की खातिर उठ खड़ी हुई।

अध्याय 1: मैं और मेरी ज़िद

लोग कहते हैं कि बेटियां पराया धन होती हैं, लेकिन मैं अपने दादा-दादी के आंगन की वो रौनक थी जिसके बिना उनका दिन शुरू नहीं होता था। उनकी आँखों का नूर, उनके बुढ़ापे का सहारा—मैं उनकी लाडली थी।

बचपन से ही मुझमें एक बात अलग थी... मैं ज़िद्दी बहुत थी। जो चीज़ एक बार ठान ली, वो मुझे हर हाल में चाहिए होती थी। तब लोग इसे मेरा बचपना कहते थे, लेकिन सच तो यह था कि उस ज़िद के पीछे मेरा खुद से अटूट प्यार और मेरा आत्मसम्मान (Self-respect) छुपा था। मैं किसी का दिल नहीं दुखाती थी, पर हाँ, खुद को कभी किसी से कम भी नहीं समझती थी।

🌸 वो स्कूल के दिन और पांच सहेलियां

स्कूल के वो दिन मेरी ज़िंदगी के सबसे हसीन और बेफिक्र दिन थे। हम पाँच सहेलियाँ थीं। सिर्फ सहेलियाँ नहीं, एक-दूसरे की जान! हमारी दुनिया बस हम पाँचों के इर्द-गिर्द घूमती थी।

पढ़ाई के नाम पर हम सिर्फ हाजिरी लगाते थे, असली मज़ा तो मस्ती में था। हमारी क्लास टीचर अक्सर हमें देखकर हंसते हुए डांटती थीं—

"तुम पाँचों की पढ़ाई कम और नौटंकी ज़्यादा चलती है!"

वह भी क्या दौर था... जेब में सिर्फ एक रुपया लेकर घर से निकलना, स्कूल के बाहर से इमली या चूर्ण खरीदना और फिर लंच ब्रेक में एक ही टिफिन पर पाँचों का टूट पड़ना। उस वक्त वो एक रुपया भी किसी खजाने से कम नहीं लगता था।

हमारी दोस्ती में एक अजीब सी वफादारी थी। अगर हम पाँचों में से कोई एक भी किसी दिन स्कूल नहीं आती, तो बाकी की चार भी स्कूल बंक कर देती थीं। तब सब इसे बचपना कहते थे, पर आज समझ आता है कि वो बचपन का नादान प्यार नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए बेइंतहा वफादारी थी।

हमारी मैम का मुझ पर एक अलग ही भरोसा था। वो अक्सर कहती थीं—"ये लड़की चाहे कितनी भी मस्ती कर ले, पर ये कभी कुछ गलत नहीं कर सकती।" उनका वो भरोसा आज भी मेरे दिल के किसी कोने में महफ़ूज़ है, जिसने मुझे हर मुश्किल वक्त में टूटने से बचाया।

जब ज़िंदगी ने करवट बदली...

तब दुनिया बहुत सीधी थी। रिश्तों में कोई नफ़रत, कोई हिसाब-किताब नहीं था। मुझे कहाँ पता था कि स्कूल की इस चारदीवारी से बाहर निकलते ही ज़िंदगी इतनी उलझ जाएगी?

आज भी जब यह दुनिया मुझे बोझ लगने लगती है, जब जिम्मेदारियाँ मेरा दम घोटने लगती हैं, तो मैं आँखें बंद करके चुपके से उसी स्कूल वाली ज़िद्दी लड़की के पास लौट जाती हूँ... जो हंसना जानती थी, जो उड़ना जानती थी।

लेकिन...

मासूमियत के वो दिन बहुत छोटे थे। मुझे नहीं पता था कि जिस स्कूल की दहलीज को पार करके मैं बड़े होने के सपने देख रही हूँ, वहीं बाहर मेरा सामना एक ऐसे सच से होने वाला था, जिसने मेरी पूरी ज़िंदगी को हिलाकर रख दिया।

एक ऐसा मोड़ आने वाला था, जिसने मुझसे मेरी वो मासूम हँसी हमेशा के लिए छीन ली।

अगले भाग में देखिए (Promo):

"आखिर क्या हुआ जब उस ज़िद्दी लड़की की ज़िंदगी में 'प्यार' ने दस्तक दी? क्या वो प्यार उसकी ताकत बना या उसके आंसुओं की वजह? जानने के लिए पढ़िए भाग 2: पहली मोहब्बत का पहला धोखा..."