शृङ्गार रस
शृङ्गार रस को रसों में सबसे शक्तिशाली होने के कारण रसराज (रसों का राजा) कहा जाता है, क्योंकि यह जीवन के प्रेममय भावों को केंद्र में रखता है, जो साहित्य और कला में प्रेम, सौन्दर्य और कामुक आकर्षण के भावों को प्रधानता देता है, जिसका स्थायी भाव 'रति' (प्रेम) है। जब विभाव, अनुभाव और सञ्चारी भावों के संयोग से नायक-नायिका या अन्य जीव के मन में स्थित रति प्रेम के रूप में परिणत होती है, तो उसे शृङ्गार रस कहते हैं। स्थायी भाव : रति (प्रेम), आलम्बन : नायक और नायिका, उद्दीपन : रमणीक उद्यान, वसन्त ऋतु, चाँदनी, एकान्त स्थान, अनुभाव : कटाक्ष, आलिङ्गन, मुस्कान आदि इसके अङ्ग हैं । जहाँ नायक-नायिका के मिलन, प्रेम वार्ता और सुखद सौन्दर्य का वर्णन होता है, वहाँ संयोग रस होता है और जहाँ प्रेमी-प्रेमिका या किसी के मिलन के अभाव में प्रेम की व्याकुलता या विछोह का वर्णन होता है, वहाँ वियोग रस होता है।
यह मनुष्य की भावनाओं, सम्बन्धों की गहराई (संयोग और वियोग) और प्रकृति के सुन्दर चित्रण द्वारा पाठकों को मानसिक आनन्द प्रदान करता है, जो मानवीय संवेदनाओं का केंद्र है। इसमें मात्र कामुकता नहीं, अपितु भक्ति (ईश्वर के प्रति प्रेम), मिलन की लालसा और गहरे भावनात्मक जुड़ाव समाहित हैं। यह नायक-नायिका के मिलन (संयोग) का आनन्द (सुख) और वियोग (अलगाव/विछुड़ने) की पीड़ा दोनों की गहराई से अभिव्यक्ति करता है। कविता, सङ्गीत, और नृत्य में यह सौंदर्य (फूल, सुगन्ध, वसन्त आदि) और आकर्षण का प्रतीक है, जो कृति को जीवन्त बनाता है। यह प्रेम को अहङ्कार से मुक्त कर ईश्वर से जोड़ने (भक्ति) के माध्यम के रूप में भी कार्य करता है।
यद्यपि शृङ्गार रस शरीर है तो रति (प्रेम) उसकी आत्मा है। यही दोनों कभी संयोग करते हैं तो कभी वियोग। मनुष्य रूपी तुच्छ जीवन में परस्पर मिलकर कभी संयोग से सुख देते हैं तो कभी वियोग से दुःख (पीड़ा) देते हैं। यही इनका सम्पूर्ण जीवन चक्र होता है। इस सम्पूर्ण जीवन चक्र में शृङ्गार रस के माध्यम से सभी स्त्री-पुरुषों को अपने वश में किया जा सकता है, यहाँ तक कि परमपिता परम ब्रह्म परमात्मा को भी। यद्यपि बिना मोह माया के शृङ्गार रस जीवन को सुदृढ़ता सहित रति अथवा संयोग को एक गाँठ में जोड़ देता है तो वह जीवन अमृत के समान हो जाता है, किन्तु वही शृङ्गार रस जीवन को असुदृढ़ता समेत वियोग से मेल कर दे तो अमृत-सा जीवन भी विष का विकराल रूप ले लेता है। यदि संयोग सुन्दर पुष्प है तो वियोग काँटा है। महापुरुषों के मत अनुसार काँटे में कोई भी या किसी भी प्रकार से तनिक मात्र भी सुख या आनन्द नहीं है, अतः जितना शीघ्र हो, उतने ही शीघ्र काँटे को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ना चाहिए, न कि उसी में उलझा रहे। फूल में अपार आनन्द है, जिसका वर्णन कवि चाहे जितना ही क्यों न करले, किन्तु अपने मुख रूपी लेखनी से उसकी अपार महिमा का वर्णन नहीं कर पाते हैं। यदि आनन्द को समुन्द्र मान कर उसमें संयोग या प्रेम रूपी पुष्प से भरा जाय तो भी वह आनन्द रूपी समुन्द्र नहीं भरेगा, क्योंकि जहाँ पर आनन्द, प्रेम, संयोग, एक भाव, निर्मल मन, शुद्ध बुद्धि, आत्मविश्वास और सुदृढ़ता का होता है, वहाँ पर बड़ा-सा-बड़ा समुन्द्र भी पुष्प रूपी प्रेम को भरने हेतु लघु पड़ जाता है, अतः काँटा रूपी वियोग को पीछे छोड़ कर पुष्प रूपी संयोग या प्रेम पर आँख मूँद कर आगे बढ़ना चाहिए। यही जीवन का मुख्य लक्ष्य है जीने के लिए।
प्रेम में निराकार ईश्वर भी आकार रूप में दिखाई देता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। जब प्रेम करोगे तभी तो जानोगे की प्रेम होता क्या है? प्रेम में आनन्द क्या है? प्रेम का महत्व क्या है? और प्रेम की महिमा क्या है?
उद्धव जी को भी ज्ञान पर बहुत घमण्ड था, किन्तु श्रीकृष्ण नें उन्हें प्रेम का ऐसा मार्ग दिखाया कि वे अपनी सुध-बुध भूलकर प्रेम में पागल हो गए हैं। जब उद्धव जी नें प्रेम की महिमा को जाना तो भगवान् को बड़ी खरी-खोटी सुनाया कि जो व्यक्ति आपसे अत्यधिक प्रेम करता है, आपका साक्षात दर्शन करता है तो फिर उसे वियोग क्यों देते हैं?
मैं (ऋषभ विश्वकर्मा) शृङ्गार रस की महिमा का वर्णन कहाँ तक करूँ? इसकी महिमा ही बहुत अपार, जिसका पार नहीं पाया जा सकता है। तथापि मैंनें अपनी बुद्धि के अनुसार शृङ्गार रस का तनिक मात्र (कुछ) वर्णन किया।
ऋषभ विश्वकर्मा