समुद्री लुटेरालेखक: विजय शर्मा ऐरीसमुद्र की लहरों में एक अजीब-सी बेचैनी थी। रात का समय था। आसमान में बादल छाए हुए थे और चाँद कभी दिखाई देता तो कभी बादलों में छिप जाता। दूर-दूर तक सिर्फ पानी ही पानी था। उस अथाह समुद्र में एक पुराना जहाज़ लहरों से लड़ता हुआ आगे बढ़ रहा था।उस जहाज़ का मालिक था—समुद्री लुटेरा रूद्र।रूद्र का नाम सुनते ही व्यापारियों के चेहरे पीले पड़ जाते थे। वह कभी किसी देश का नहीं रहा था। उसका घर समुद्र था और उसकी पहचान डर।लेकिन आज रूद्र के चेहरे पर वैसी कठोरता नहीं थी। उसकी आँखों में एक अजीब खालीपन था।"सरदार, आगे तूफान है!" उसके साथी करण ने कहा।रूद्र मुस्कुराया।"करण, जिंदगी भर तूफानों से ही तो खेलता आया हूँ।"लेकिन सच्चाई यह थी कि अब उसे तूफानों से डर नहीं लगता था, बल्कि अपने अतीत से डर लगने लगा था।बीस साल पहले रूद्र एक साधारण मछुआरे का बेटा था। वह भारत के एक छोटे समुद्री गाँव में रहता था। उसके पिता ईमानदार और मेहनती इंसान थे।एक दिन कुछ विदेशी लुटेरों ने उनके गाँव पर हमला कर दिया। उन्होंने गाँव लूट लिया और रूद्र के माता-पिता की हत्या कर दी।तब रूद्र सिर्फ बारह साल का था।उस रात उसने समुद्र किनारे बैठकर रोते हुए कसम खाई थी।"मैं इतना ताकतवर बनूँगा कि कोई मुझे कमजोर समझने की हिम्मत नहीं करेगा।"उसकी यह कसम धीरे-धीरे उसे अंधेरे रास्ते पर ले गई।वह लुटेरों के एक गिरोह में शामिल हो गया।समय बीतता गया।रूद्र तलवार चलाने, जहाज़ चलाने और लड़ाई लड़ने में माहिर हो गया।कुछ वर्षों बाद उसने अपने गुरु को भी पीछे छोड़ दिया और खुद समुद्री लुटेरों का सरदार बन गया।रूद्र ने बहुत धन कमाया।सोने के संदूक, हीरे-जवाहरात और कीमती सामान उसके जहाज़ में भरे रहते थे।लेकिन जितना धन बढ़ता गया, उतनी ही उसकी बेचैनी भी बढ़ती गई।एक रात उसने सपना देखा।उसकी माँ सामने खड़ी थी।"बेटा, क्या यही बनने का सपना देखा था?"रूद्र चौंककर उठ बैठा।उसके माथे पर पसीना था।वह पूरी रात सो नहीं पाया।कुछ दिनों बाद उसका जहाज़ एक छोटे द्वीप के पास पहुँचा।वहाँ उसे एक बूढ़ा साधु दिखाई दिया।लुटेरे हँसने लगे।"सरदार, इस बूढ़े के पास क्या होगा?"लेकिन साधु ने रूद्र को देखकर कहा,"तुम्हारे पास सब कुछ है, फिर भी तुम सबसे गरीब इंसान हो।"रूद्र हैरान रह गया।"तुम मुझे जानते हो?""तुम खुद को नहीं जानते, मैं तुम्हें क्या जानूँ?"साधु की बात उसके दिल में उतर गई।रूद्र कई दिनों तक उस साधु के शब्दों के बारे में सोचता रहा।उसने अपने जीवन पर नजर डाली।वह अमीर था, शक्तिशाली था, लेकिन खुश नहीं था।उसे कोई अपना नहीं कहता था।उसके साथी भी उसके डर से साथ थे, प्यार से नहीं।एक दिन समुद्र में भयंकर तूफान आया।लहरें पहाड़ों जैसी ऊँची हो गईं।जहाज़ डगमगाने लगा।सभी लुटेरे घबरा गए।"सरदार! हम बच नहीं पाएँगे!"करण चिल्लाया।रूद्र ने पहली बार महसूस किया कि मौत कितनी करीब है।उसने आँखें बंद कर लीं।उसे अपनी माँ का चेहरा दिखाई दिया।उसे अपने पिता की बातें याद आने लगीं।"बेटा, इंसान की असली कमाई धन नहीं, अच्छे कर्म होते हैं।"किसी तरह जहाज़ बच गया।लेकिन तूफान ने रूद्र के भीतर कुछ बदल दिया था।उसने फैसला किया कि अब वह अपने जीवन का उद्देश्य बदलेगा।कुछ दिनों बाद उन्हें एक व्यापारी जहाज़ दिखाई दिया।साथी खुश हो गए।"सरदार, आज खूब माल मिलेगा!"लेकिन जब वे पास पहुँचे तो पता चला कि जहाज़ में यात्री थे।उनमें औरतें और बच्चे भी थे।लुटेरे हमला करने को तैयार हो गए।तभी रूद्र गरजा—"कोई हमला नहीं करेगा!"सभी चौंक गए।"लेकिन सरदार...""मैंने कहा कोई हमला नहीं करेगा।"लुटेरे हैरान थे।पहली बार उनके सरदार ने किसी जहाज़ को छोड़ दिया था।धीरे-धीरे रूद्र बदलने लगा।वह जरूरतमंद नाविकों की मदद करने लगा।तूफान में फँसे जहाज़ों को रास्ता दिखाने लगा।उसका नाम अब सिर्फ डर का नहीं, मदद का भी प्रतीक बनने लगा।लेकिन उसके पुराने दुश्मन उसे भूलने वाले नहीं थे।एक रात उसे खबर मिली कि कुख्यात समुद्री लुटेरा ब्लैक फाल्कन उसके पीछे पड़ा है।ब्लैक फाल्कन उससे भी ज्यादा निर्दयी था।वह समुद्र का नया राजा बनना चाहता था।"रूद्र कमजोर हो गया है," उसने अपने लोगों से कहा।"अब उसका अंत करने का समय आ गया है।"कुछ दिनों बाद दोनों जहाज़ आमने-सामने आ गए।समुद्र शांत था।लेकिन हवा में युद्ध की गंध थी।ब्लैक फाल्कन हँसा।"रूद्र! सुना है तुम संत बन गए हो।"रूद्र बोला,"नहीं, मैं सिर्फ इंसान बनने की कोशिश कर रहा हूँ।"दोनों के बीच भयंकर लड़ाई शुरू हो गई।तलवारें टकराईं।चिंगारियाँ उड़ने लगीं।घंटों तक युद्ध चलता रहा।अचानक ब्लैक फाल्कन ने धोखे से हमला किया।रूद्र घायल होकर गिर पड़ा।सभी साथी घबरा गए।लेकिन तभी रूद्र को अपने पिता की बात याद आई।"सच्ची ताकत तलवार में नहीं, इरादे में होती है।"वह फिर उठ खड़ा हुआ।उसने पूरी शक्ति से वार किया।ब्लैक फाल्कन की तलवार समुद्र में जा गिरी।अब ब्लैक फाल्कन निहत्था था।सभी बोले,"सरदार, इसे मार डालो!"लेकिन रूद्र ने तलवार नीचे कर दी।"नहीं।"ब्लैक फाल्कन हैरान था।"तुम मुझे छोड़ रहे हो?""मैं वही गलती नहीं दोहराऊँगा जिसने मेरी जिंदगी बर्बाद की थी।"उसने अपने दुश्मन को जीवनदान दे दिया।उस दिन के बाद रूद्र की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई।लोग उसे समुद्री लुटेरा नहीं, समुद्र का रक्षक कहने लगे।लेकिन उसके दिल में अभी भी एक अधूरापन था।एक दिन वह उसी गाँव पहुँचा जहाँ उसका बचपन बीता था।गाँव अब पहले से सुंदर था।वहाँ एक छोटा विद्यालय था।एक अनाथालय भी था।रूद्र ने अपना सारा खजाना गाँव वालों को दान कर दिया।"यह धन उन लोगों का है जिनसे मैंने छीन लिया था।"गाँव वाले उसकी ओर आश्चर्य से देखने लगे।उसने समुद्र किनारे अपने माता-पिता की स्मृति में एक स्मारक बनवाया।शाम को वह वहीं बैठा लहरों को देख रहा था।सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था।उसे ऐसा लगा जैसे हवा में उसकी माँ की आवाज गूँज रही हो।"अब मुझे तुम पर गर्व है, बेटा।"रूद्र की आँखों से आँसू बह निकले।वर्षों बाद उसके दिल को शांति मिली थी।समय बीतता गया।रूद्र अब किसी जहाज़ को नहीं लूटता था।वह समुद्र में भटकता जरूर था, लेकिन अब उसकी भटकन का उद्देश्य बदल चुका था।जहाँ भी कोई जहाज़ मुसीबत में होता, वह मदद के लिए पहुँच जाता।जहाँ कोई गरीब मछुआरा संकट में होता, वह उसका सहारा बन जाता।लोग कहते थे कि समुद्र में एक रहस्यमयी जहाज़ घूमता है, जिसका कप्तान कभी लुटेरा था।एक रात एक युवा नाविक ने उससे पूछा,"सरदार, क्या आपको अपने पुराने जीवन पर पछतावा होता है?"रूद्र मुस्कुराया।"हाँ, बहुत होता है। लेकिन अगर इंसान अपनी गलतियों से सीख ले, तो वही गलतियाँ उसकी सबसे बड़ी शिक्षक बन जाती हैं।""तो क्या आपको अब मंजिल मिल गई है?"रूद्र ने समुद्र की ओर देखा।लहरें चाँदनी में चमक रही थीं।"मंजिल नहीं मिली, बेटा। लेकिन अब रास्ता सही मिल गया है।"उस रात उसका जहाज़ फिर समुद्र की अनंत गहराइयों की ओर बढ़ गया।लेकिन अब वह डर और लूट का प्रतीक नहीं था।वह उम्मीद का प्रतीक था।एक ऐसा भटकता समुद्री लुटेरा, जिसने पूरी दुनिया घूमकर आखिर यह समझ लिया था कि सबसे बड़ा खजाना सोना नहीं, बल्कि इंसानियत है।समाप्त— विजय शर्मा ऐरी