मेंरे सुनहरे गर्मी के दिन - 1 H.k Bhardwaj द्वारा कुछ भी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

मेंरे सुनहरे गर्मी के दिन - 1

■■ मेंरे जीवन के सुनहरे गर्मी के दिन ■■

✍️ Written by H. K. Bharadwaj________________________________________________________________________________


               मनुष्य के जीवन में कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं, जो समय के अथाह प्रवाह में भी कभी धूमिल नहीं पड़तीं।            वे स्मृतियाँ वर्षों बाद भी मन के किसी कोमल कोने में दीपक की लौ की भाँति टिमटिमाती रहती हैं।                   जीवन की आपाधापी, संघर्ष और व्यस्तताओं के बीच जब कभी मन थक जाता है, तब वही स्मृतियाँ शीतल छाया बनकर आत्मा को विश्राम प्रदान करती हैं।

मेरे जीवन में भी ऐसी ही कुछ स्मृतियाँ हैं—मेरे गाँव की, मेरे दादा-दादी की, उन निष्कपट मित्रों की और उन सुनहरे गर्मी के दिनों की, जिनकी मधुर गूँज आज भी मेरे हृदय में जीवित है।

यह उन दिनों की बात है, जब मैं बारह वर्ष का था और नगर के एक विद्यालय में पढ़ता था। जैसे ही वार्षिक परीक्षाएँ समाप्त होतीं, मेरा मन गाँव जाने के लिए व्याकुल हो उठता। मुझे गर्मी की छुट्टियों का इंतज़ार उतना नहीं रहता था, जितना अपने गाँव पहुँचने का।

वह गाँव जहाँ मेरी जड़ें थीं।

जहाँ मेरे दादा-दादी रहते थे।

जहाँ हर घर में अपनापन था और हर चेहरे पर आत्मीय मुस्कान।

उस वर्ष भी जैसे ही विद्यालय बंद हुआ, मैं माता-पिता के साथ गाँव के लिए रवाना हो गया।

बस जब गाँव की सीमा में पहुँची, तो दूर-दूर तक फैले गेहूँ के कटे खेत, आमों से लदे बाग, नीम और पीपल के वृक्ष तथा कच्ची पगडंडियाँ देखकर मेरा हृदय प्रसन्नता से भर उठा।

बस अड्डे पर दादाजी मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे।

सफेद धोती-कुर्ता पहने, सिर पर साफा बाँधे, हाथ में पुरानी लकड़ी की छड़ी लिए वे बार-बार सड़क की ओर देख रहे थे।

जैसे ही मेरी दृष्टि उन पर पड़ी, मैं बस से उतरकर उनकी ओर दौड़ पड़ा।

"दादाजी!"

मैंने पुकारा।

उन्होंने अपने दोनों हाथ फैलाकर मुझे बाँहों में भर लिया।

उनकी आँखें छलछला उठीं।

"आ गया मेरा राजा बेटा..."

उनकी भर्राई हुई आवाज़ में वर्षों का स्नेह समाया हुआ था।

घर पहुँचा तो दादी आँगन में खड़ी प्रतीक्षा कर रही थीं।

जैसे ही उन्होंने मुझे देखा, उनका झुर्रियों भरा चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा।

उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और बार-बार मेरे माथे को चूमने लगीं।

"कितना दुबला हो गया है मेरा लाल!"

उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा।

फिर तुरंत रसोई में चली गईं।

कुछ ही देर में मेरे सामने मिट्टी के कुल्हड़ में ठंडी लस्सी, घर का बना मक्खन और गरमागरम बाजरे की रोटी रख दी गई।

दादी का प्रेम भोजन के प्रत्येक कौर में घुला हुआ था।

उस रात मैं दादाजी की चारपाई के पास ही सोया।

आँगन में खुले आकाश के नीचे तारों की असंख्य पंक्तियाँ चमक रही थीं।

दादी मेरे सिर में तेल लगा रही थीं।

दादाजी मुझे अपने बचपन के किस्से सुना रहे थे।

धीरे-धीरे उनकी आवाज़ लोरी बन गई और मैं नींद की गोद में समा गया।

सुबह मुर्गे की बाँग और गौरैयों के कलरव से मेरी आँख खुली।

नगर के शोरगुल से दूर यह संसार कितना शांत और मधुर था!

दादी पहले ही जाग चुकी थीं।

उन्होंने स्नान कर तुलसी को जल अर्पित किया था और अब रसोई में मेरे लिए गुड़ और घी से चुपड़ी रोटियाँ बना रही थीं।

जब मैं रसोई में पहुँचा, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

"पहले कुछ खा ले बेटा, फिर पूरे गाँव में घूमना।"

उनकी आँखों में जो ममता थी, वह किसी तीर्थ से कम पवित्र नहीं थी।

दिन बीतने लगे।

मेरे बाल-सखा भी मुझसे मिलने आने लगे।

मोहन, रघु, गोपाल और छोटू।

हम सब दिन भर गाँव की गलियों, खेतों और बागों में घूमते रहते।

कभी आम के बगीचे में बैठकर कच्चे आम खाते।

कभी तालाब के किनारे बैठकर घंटों बातें करते।

कभी पगडंडियों पर दौड़ लगाते।

उन दिनों मित्रता में कोई स्वार्थ नहीं था।

यदि किसी के पास दो आम होते, तो एक मित्र को अवश्य देता।

यदि किसी के घर मिठाई बनती, तो पूरा समूह उसका स्वाद चखता।

हमें यह ज्ञात ही नहीं था कि संसार में ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा जैसी भी कोई वस्तु होती है।

एक दिन दोपहर के समय हम खेलते-खेलते बहुत दूर निकल गए।

भीषण गर्मी थी।

प्यास से हमारा गला सूखने लगा।

तभी एक वृद्धा ने हमें देखा।

वह पास के घर में रहती थीं।

उन्होंने तुरंत हमें अपने घर बुलाया।

मिट्टी के घड़े का शीतल जल पिलाया।

साथ ही गुड़ और सत्तू भी दिया।

हम उनके लिए अजनबी नहीं थे।

गाँव में बच्चे पूरे गाँव के होते हैं।

उस दिन मैंने पहली बार अनुभव किया कि सच्चा वैभव धन नहीं, बल्कि मानवता है।

संध्या होते ही गाँव की चौपाल सज जाती।

वृद्धजन नीम के विशाल वृक्ष के नीचे बैठते।

कोई भजन गाता।

कोई लोककथा सुनाता।

कोई जीवन के अनुभव बाँटता।

मैं दादाजी के साथ वहीं बैठता।

उनकी बातें सुनता।

उनकी आँखों में जीवन का अनुभव झलकता था।

वे कहते—

"बेटा, मनुष्य की पहचान उसके धन से नहीं, उसके व्यवहार से होती है।"

आज भी वह वाक्य मेरे जीवन का पथप्रदर्शक है।

समय अपने पंख लगाकर उड़ रहा था।

मुझे पता ही नहीं चला कि छुट्टियाँ कब समाप्ति की ओर बढ़ चलीं।

जब लौटने का दिन आया, तो घर का वातावरण अचानक उदास हो गया।

दादी सुबह से ही चुप थीं।

उन्होंने मेरे लिए गुड़, लड्डू और सत्तू बाँधकर रख दिए थे।

दादाजी बार-बार मुझे देखते और फिर अपनी आँखें दूसरी ओर फेर लेते।

बस अड्डे तक मुझे छोड़ने केवल दादा-दादी ही नहीं आए।

मेरे मित्र भी आए।

पड़ोसी भी आए।

गाँव के कई बुज़ुर्ग भी आए।

जब बस चलने लगी, तो दादी ने काँपते हाथों से मेरा सिर सहलाया।

"जल्दी आना बेटा..."

इतना कहते-कहते उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

दादाजी ने स्वयं को संयत रखने का प्रयास किया, पर उनकी आँखें भी नम थीं।

मैं खिड़की से बाहर देखता रहा।

पूरा गाँव धीरे-धीरे दृष्टि से ओझल होता गया।

किन्तु उस दिन मैं केवल गाँव नहीं छोड़ रहा था।

मैं प्रेम छोड़ रहा था।

मैं अपनापन छोड़ रहा था।

मैं उस संसार से दूर जा रहा था जहाँ मनुष्य आज भी मनुष्य के लिए जीता था।

आज अनेक वर्ष बीत चुके हैं।

दादा-दादी इस संसार में नहीं हैं।

उनकी चारपाइयाँ अब खाली हैं।

आँगन का वह चूल्हा अब नहीं जलता।

किन्तु जब भी गर्मी की तपती दोपहर में कहीं से आम के बौर की सुगंध आती है, मेरे हृदय में स्मृतियों का झरना फूट पड़ता है।

मुझे दादी का आँचल याद आता है।

दादाजी का स्नेहिल हाथ याद आता है।

मित्रों की हँसी याद आती है।

गाँव के लोगों का निष्कपट प्रेम याद आता है।

और तब मैं अनुभव करता हूँ कि जीवन के सबसे अमूल्य दिन वे नहीं थे जब मेरे पास धन, पद और प्रतिष्ठा आई—

बल्कि वे थे...

जब मैं दादी की गोद में सिर रखकर सो जाता था,

दादाजी की उँगली पकड़कर खेतों की पगडंडी पर चलता था,

और मित्रों के साथ आम के बगीचों में हँसता-खेलता था।

वास्तव में वही थे—

मेरे जीवन के सुनहरे गर्मी के दिन।

Written by H K Bharadwaj

शेषांश अगले अङ्क में।