श्रापित एक प्रेम कहानी - 90 CHIRANJIT TEWARY द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 90

होटल मालिक के इस तरह से कहने पर एकांश को गुस्सा आ जाता है एकांश गुस्से से होटल मालिक से कहता है:


" वरना क्या ...! क्या कर लोगे ।"


 एकांश मांतक से कहता है :


" अंकल आपका कितना बिल हुआ है ..?" 


मांतक कहता है:


" ये बिल भी मुझे नही पता । "



एकांश टेबल मे रखा बिल वाली डायरी को उठाता है और बिल को दैखकर और मांतक से कहता है:

" आपको पता है ये जो सिक्का आप इन्हे दे रहे हो इस एक सिक्के से मे आप अभी जितना खाये हो उतना ही खाना आप यहां पर दौ महीने भर तक खा सकते हो। "


मांतक एकांश से हैरानी से कहता है:


क्या तुम सत्य कह रहो ...? इस स्वर्ण मुद्रा ये हम पुरे महीनो तक इतना ही भोजन खा सकते है...?"


" हां अंकल मे सत्य बोल रहा हूँ इसिलिए आप इन्हे ये मत दिजिए ।"


 एकांश मांतक से कहता है:



एकांश की बात सुनकर मांतक कहता है:


" परतुं हे मानव मेरे पास तो अभी केवल यही है।"


एकांश कहता है:


 "ठिक है कोई बात नही आप इन्हे अपने पास रख रख लो मैं आपका पैसा इन्हें दे देता हूँ ।"


त्रिजला खुश होकर कहती है:


" तो फिर इन सबको तुम रख लो ।"


 एकांश त्रिजला से मना करते हुए कहता है:

" नही नही आंटी ...! मैं आपसे यो सब लेने के लिए पैसे नही दे रहा हूँ । इसे आप अपने पास ही रखिए ।"


 मांतक कहता है:


" रख लो हे भले मानव । हम जानते है के तुम्हे इसका लोभ नही परतुं अगर तुम इन्हे रख लोगे तो हमे बड़ी प्रसन्नता होगी ।"


 एकांश फिर मना करते हूए कहता है:


" नही अंकल मैं इसे नही ले सकता अगर आपसे ये लेना ही होता तो मैं इसे इस होटल के मालिक को ही लेने दे देता इसिलिए मैं इसे नही ले सकता । "


एकांश होटल मालिक को मांतक का बिल पे कर देता है और मांतक से कहता है:


" आप लोग अब जा सकते हो मैने आपके खाने का पैसा दे दिया है।"


मांतक और त्रिजला एकांश इतना कहने पर खुश हो जाता है और त्रिजला खुश होती हूई एकांश से कहती है:


" तुम्हारा ये उपकार हम पर ऋृण रहा इससे पहले भी तुमने हम पर ........!"


 त्रिजला के इतना कहने पर मांतक त्रिजला की बात को बिच मे काटते हूए कहता है:


" तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद । अब हम चलते है।"


एकांश हां मे अपना सर हिलाते हुए कहता है:


" ठिक है अंकल ।।"


 मांतक और त्रिजला वहां से चला जाता है और एक पेड़ के पिछे जाकर फिर से पक्षी बन जाता है और वही पर बैठकर एकांश और वर्शाली के निकलने का इंतेजार करने लग जाता है।


 वर्शाली एकांश से कहती है :


" एकांश जी इनके बातो से लग रहा था के ये भी इस लोक के नही थे और इन्होने मांस का सेवन किया है इससे यही प्रतित होता है के ये देत्य ही है।"


एकांश कहता है:



" तो अब हमे क्या करना चाहिए वर्शाली ....? "



वर्शाली कहती है :


" हमे ये पता करना होगा के ये देत्य यहां क्यों आए है।"


 इतना बोलकर दोनो ही वहां से निकल जाता है और अपने घर और जाने लगता है जिसके पिछे मातंक और त्रिजला भी जाने लगती है । उधर आलोक और चतुर निलु के पास बैठा था । निलु बहुत ही घबराया बुआ था । आलोक निलु से कहता है:


" काका आप बिल्कुल भी डरिये नही मैं आपके साथ हूँ ना। मेरा भरोसा कीजिए ।"



 आलोक के इतना कहने के बाद निलु कहता है:


"कुंम्भन के डर से बेटा । "


एकांश हैरानी से कहता है:


" क्या काका ...! कुंम्भन के डर से आप यहां इस हवेली के अंदर छिपे हुए हो। जब की आपको पता है के कुंम्भन को दोबारा से उसी जंगल को अंदर कैद कर लिया गया है। "


निलु कहता है:


" वो तो अभी कैद है पर बैटा उसने और भी देत्यों को यहां पर बुला़या है। जो हर समय हम पर नजर रख रहा है।"



 निलु इधऱ उधऱ दैख कर कहता है:



आलोक और चतुर निलु की बात सुनकर हैरान था। चतुर हैरानी से निलु से पूछता है:


" ये आप कैसे कह सकते हो काका के कुंम्भन ने और भी देत्य को बुलाया है जो यही हमारे आस पास रहे है।"


निलु चतुर की बात का कोई जवाब नही देता है। तो आलोक निलु के कंधे पर अपना हाथ रख कर कहता है:


" देखिए काका मैने कहा ना आप मुझ पर भरोसा रखो और बेफिक्र होकर बताईए।"


निलु एक गहरी सांस लेता है और अपनी बात को जारी रखते हूए कहता है:


" बैटा क्योकी ये सब होते हूए मैने अपनी आंखो से दैखा है।"


आलोक और चतुर निलु से इतना सुनकर हैरान हो जाता है ओर आलोक नीलू से पूछता है:


" क्या ..! क्या कहा अपने काका ...! अपने ये सब अपनी आँखों से देखा और ..? पर कैसे और कहाँ ..?"


नीलु कहता है:


" हा बेटा मैं सच कह रहा हूँ । मैंने अपनी आँखों से देखा है के कुम्भन एक यज्ञ करके उन्हे बुलाया और उन्हो मणी को ढुडने के लिए भेज दिया ।"


 चतुर निलु की बात को बिच मे काट कर कहता है:


" पर काका जब कुंम्भन ये सब कर रहा था तो आप वहां पर क्या कर रहे थे ..?"


 चतुर की बात सुनकर आलोक हैरानी से निलु की और दैख रहा था के निलु इसका क्या जवाब देगा । निलु कहता है:


" मैं वहां पर जान बुझकर नही गया था बेटा मुझे वहां पर ले जाया गया था।"


आलोक यो सुनकर चौंक जाता है और निलु से पूछता है:


" आपको ले जाया गया पर क्यों ..? और कौन आपको वहां लेकर गया .?"


 निलु कुछ दैर चुप रहता है। निलु के चुप रहने से आलोक परेसान हो जाता है और निलु से पूछता है :

" आप चुप क्यो हो गए काका ! आपको वहां पर कौन लेकर गया बोलिए ना।"

निलु आलोक की और अपनी डरी हूई लाल लाल आंखे से घुरते हूए कहता है:


" मुझे वहां पर कुंम्भन लेकर गया था ।"


कुंम्भन का नाम सुनकर आलोक और चतुर के मानो होश ही उड़ गए हो उन दोनो ने ये कभी नही सौचा था के निलु काका कुंम्भन का नाम लेगें। आलोक तो एक दम से मानो चुप ही हो गया था तभी चतुर धिरे से हकलाते हुए निलु से पूछता है:

" कु... कु .…..क..क ...कुम्भन ! क...क....कुंम्भन आ......आपको क.....कैसे ?"

चतुर इतना ही बोल पाता है क्योकी उसके मुह से कुछ नही निकल रहा था। निलु चतुर की और देखकर कहता है :


" हां बेटा कुंम्भन ने ही मुझे पकड़कर अपने गुफा की और लेकर गया और फिर मेरा ये हाल किया ।"


 निलु डर से रोते हुए कहता है:


"वो बहुत भयानक है और निर्दयी है बेटा । उसके पास जादुई शक्तियां भी है जिससे वो कही भी गायब होकर चला जाता है और फिर वापस आ जाता है।"


"वह अपने जादु से सारी चिजों को हवा मे उछाल रहा था और फिर ....!"


 इतना बोलकर निलु उस पल मे दोबारा चला जाता है जहां पर निलु बेहोशी का नाटक कर रहा था और कुंम्भन यज्ञ मे आहुती दे रहा था और फिर सारी चीजे जैसे मानव खोपड़ी कंकाल ये सब हवा मे उड़कर चारो और घुम रहा था।


 निलु फिर अपने इस पल मे आ जाता है और चुप चाप खोया रहता है आलोक निलु को हिलाते हुए कहता है :


" काका कहां खो गए आप ..? निलु काका ....निलु काका ....! "


आलोक के पुकारने पर निलु उस पल से बाहर आ जाता है और कहता है:


"हां ....हा...!"


आलोक फिर कहता है :


"काका आप कहां खो गए थे ..?" 


निलु कहता है:


" और कहां बैटा मैं बस उसी पल मे चला गया था जहां पर निलु अपनी जादुई शक्ती से सभी देत्य को बुला रहा था। "



आलोक फिर पूछता है:


" अच्छा फिर क्या हुआ काका?"


निलु आलोक और चतुर को सारी बात बोलकर सुनाता है के कैसे उसे रोने की आवाज सुनाई देती है और कैसे वह उस आवाज का पिछा करते करते कुंम्भन तक पहूँच जाता है।


 और उसकी गाड़ी कैसे अपने आप चलने लगती है और फिर उसी जगह पर होती है । ये सब सुनने के बाद आलोक और चतुर हैरान तो थे ही पर उनके मन मे कई सारे सवाल खड़े कर दिये थे। 


आलोक निलु से पूछता है:


" काका इसका मतलब ये सारी चोटें आपको किसी 
इंसान ने नही बल्की उस देत्य कुंम्भन ने दिया है?"

निलु हां मे अपना सर हिलाता है । चतुर फिर पूछता है :


" तो फिर आप हम सबसे झुट क्यों बोल रहे थे?"


निलु चतुर के बात से चुप हो जाता है । तब आलोक निलु से पूछता है:

" हां निलु काका आपने तो हमे एक कहानी सुना कर रख दिया पर आप पर हम सब को उसी समय शक हो गया था क्योकी इनका गहरा घांव और नाखुन के निशान दैखकर हमे विश्वास हो गया था के आप और बड़े पापा हम सबसे कुछ छुपा रहे हो ।"


" और तबसे हमने आप सब पर नजर रखनी सुरु कर दी थी पर काका आप वहां उस वन मे रात को क्या करने गए थे ?"

आलोक की बात सुनकर निलु एक दम से सहम जाता है। वो चुप हो जाता है निलु आलोक को ये बात बताना नही चाहता था के दक्षराज अघोरी के पास जंगल के अंदर जाता है ।



To be continue.....1439