महाराणा लक्ष्य सिंह (लाखा) : हिंदुओं के रक्षक व चूँडा की अमर गाथा
(1382-1421 ईसवी)
महाराणा हम्मीर के पश्चात, महाराणा खेता के नाम से विख्यात उनके पुत्र क्षेत्र सिंह मेवाड़ के महाराणा बने। उन्होंने 1365-82 ईसवी तक राज किया। खेता भी अपने पिता की तरह ही पराक्रमी और महत्त्वाकांक्षी थे। उन्होंने अजमेर, मांडलगढ़, दसोर और छप्पन नाम का पहाड़ी क्षेत्र जीतकर मेवाड़ में मिला लिया था। गोगँदा के मंदिरों के शिलालेखों के अनुसार, खेता ने मालवा के सेनापति अमी शाह नाम के एक मुस्लिम आक्रांता को पकड़कर कारागार में डाल दिया था।
अपने पिता हम्मीर की ही तरह खेता ने अमी शाह उर्फ दिलावर खाँ से सिंगोली में युद्ध कर, उसे पराजित किया। कीर्ति-स्तंभ के शिलालेख के अनुसार चित्तौड़ के समीप नानौर नामक स्थान पर खेता ने दिलावर को पुनः पराजित कर बंदी बनाया। कुंभलगढ़ के शिलालेख के अनुसार, खेता ने पाटन, गुजरात के शासक जफर खाँ को पराजित कर बंदी बनाया।
बकरौल के युद्ध में दिल्ली के तथाकथित सुल्तान की खेता द्वारा पराजय का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। आर.सी. मजूमदार के अनुसार, यह व्यक्ति दिलावर खाँ था, जबकि ‘वीर विनोद’ ने इस व्यक्ति को फिरोज शाह तुगलक बताया है। जो भी हो, यह विजय तथाकथित दिल्ली सल्तनत पर मेवाड़ के प्रभुत्व का ही एक और प्रमाण है।
खेता को मेवाड की ‘गुरिल्ला युद्ध’ पद्धति का जनक भी कहा जाता है, क्योंकि वे अपने शत्रु को मेवाड़ की घाटियों में आने देते थे और दोनों ओर से घाटी बंद करके बड़ी-से-बड़ी सेना को भी कुछ ही देर में पूर्णतया समाप्त करवा देते थे। खेता, बारू बारठ के काफी निकट थे, जिन्होंने उनके पिता हम्मीर को चित्तौड़ विजय करने में सहायता की थी। ये बारू, बरवड़ी देवी के पुत्र थे, जिनको हम्मीर अपनी कुलदेवी के समान ही पूजते थे।
एक बार बूंदी के हाड़ा राजपूतों ने बारू का अपमान कर दिया और बारू ने आवेश में आत्महत्या कर ली। इसी झगड़े में महाराणा खेता ने कुपित होकर बूँदी के किले पर चढ़ाई कर दी। इसी युद्ध में महाराणा खेता की असामयिक मृत्यु हो गई।
खेता के बाद उनके पुत्र लक्ष्य सिंह, जिन्हें ‘लाखा’ भी कहा जाता था, काफी विपरीत परिस्थितियों में मेवाड़ के महाराणा बने। मेवाड़ के ये महान महाराणा, हम्मीर के पौत्र थे और इनका जीवन और इनके कार्य निम्नलिखित तीन कारणों से मेवाड़ के इतिहास में महत्त्वपूर्ण हैं—
1. लाखा ने ही दिल्ली के बादशाह तुगलक को बदनोर में हराया था और उसका बिहार के गया तक पीछा किया। इन्होंने ही गया को इस्लामी लुटेरों के शिकंजे से छुड़ाया था।
2. जावर में चाँदी और टिन की खानें इन्हीं के काल में खोजी गई थीं और इन्हीं खानों के कारण मेवाड़ को इस्लामी आक्रांताओं से लड़ने हेतु सतत आर्थिक बल मिला।
3. लाखा के पुत्र चूँडा के त्याग की कथा, जिन्हें ‘राजस्थान का भीष्म’ भी कहा जाता है। लाखा की कथा विस्तार से वर्णित है।
तुगलकों से युद्ध व गया तीर्थ की मुक्ति
एक राजा के रूप में लाखा का पहला काम था, बूँदी के हाड़ाओं को अपने पिता की मृत्यु का प्रत्यक्ष दोषी न मानकर उन्हें क्षमा करना व उन्हें 24 गाँव जागीर में देकर उनसे मित्रता करना।
लाखा ने सिसोदियों का प्रतिशोध शांत करने के लिए मिट्टी की बूँदी बनाकर उसे तहस-नहस किया। इस प्रकार अपनी उदार हृदयता व समझ से लाखा ने दो राज्यों के बीच की शत्रुता को समाप्त कर दिया।
इसके पश्चात् लाखा ने मारवाड़ क्षेत्र को पराजित कर मेवाड़ में मिला लिया और बेरतगढ़ को ध्वस्त कर एक नए नगर 'बदनौर' की स्थापना की।
बदनौर में ही हुए एक भीषण युद्ध में लाखा ने दिल्ली के एक ठग, गयासुद्दीन तुगलक को बुरी तरह पराजित कर उसका पीछा बिहार में स्थित एक हिंदू तीर्थ 'गया' तक किया था। तुगलक हिंदू तीर्थयात्रियों से गया में कर वसूल किया करता था। लाखा ने तुगलक को बंदी बनाया और उसे भारी दंडराशि लेने के बाद ही छोड़ा, साथ ही उन्होंने उसे गया-काशी और प्रयागराज आने वाले हिंदू तीर्थयात्रियों से कर न वसूलने का प्रण भी करवाया।
यद्यपि विभिन्न लेखकों के वर्णनानुसार इस बात में भी विवाद है कि यह कौन सा तुगलक था, जिसका पीछा करके लाखा ने उसे बंदी बनाया था। कर्नल टॉड उसे मुहम्मद लोधी बताते हैं, किंतु लोधी वंश तो लाखा के महाप्रयाण के 20 वर्ष बाद सत्ता में आया था।
‘वीर विनोद’ के अनुसार, यह योद्धा गयासुद्दीन तुगलक था, यद्यपि यह तुगलक वंश के संस्थापक गियास-अल-दीन तुगलक का पोता था। वैसे गया के संदर्भ में यह उत्तर प्रदेश या बिहार का कोई स्थानीय मुस्लिम शासक भी हो सकता है, जिसे लाखा ने पराजित करके तीर्थयात्रियों से कर न लेने पर बाध्य किया होगा! दुर्भाग्य से उस समय के लिखित इतिहास में हमें यह स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती।
मेवाड़ से द्वारिका का मार्ग एक और डाकुओं के दल द्वारा आतंकित था। इन्हें ‘काबा’ कहा जाता था। एक समय लाखा की माता सोलंकिनी जब द्वारिकाधीश के दर्शन करने जा रही थीं तो इन्हीं काबा डाकुओं ने उन्हें और उनके रक्षकों को घेर लिया था। शार्दूलगढ़ के राव सिंह डोडिया ने तब मेवाड़ी सेना की सहायता की। दोनों के बीच एक छोटा सा युद्ध भी हुआ। राव सिंह और उनके पुत्र कालू और धवल, इस युद्ध में मेवाड़ की ओर से बड़ी वीरता से लड़े। राजमाता की रक्षा करने के इस युद्ध में राव सिंह की मृत्यु हो गई, पर काबा डाकुओं को अंततः पराजित कर दिया गया।
कालू और धवल ने राजमाता को मेवाड़ तक सुरक्षित पहुंचाया और वापस लौट गए। लाखा ने इन दोनों भाइयों को रतनगढ़, नंदराय और मसौदा की जागीर देकर पुरस्कृत किया तथा डोडिया राजपुत्रों को सदा के लिए मेवाड़ का मित्र बना लिया गया। डोडिया वंश के सरदार भविष्य में भी मेवाड़ के महाराणाओं के जीवन में महत्त्वपूर्ण रहे।
राजमाता की अगली गया तीर्थयात्रा में धवल उनके साथ गए थे और मेवाड़ के कारवों पर छापर के स्थानीय शासक शेर खान ने आक्रमण कर दिया। धवल ने उसे पराजित कर बंदी बना लिया और उसकी समस्त संपत्ति को मेवाड़ के राजकोष में समर्पित कर दिया। लाखा ने इस्लामी उपद्रवियों के साथ ऐसे कई छोटे-बड़े युद्ध लड़े और हिंदुओं को उनके अत्याचारों से बचाए रखा।
लाखा के राज्यकाल में जावर में चाँदी और सीसे की खानें प्राप्त होना उस समय की दूसरी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। लाखा ने इस क्षेत्र में और अनुसंधान किया, जिससे वहाँ से चाँदी, टिन, सीसा, ताँबा और अंजन का दोहन किया। ये खानें मेवाड़ के महाराणाओं और उनके भविष्य के लिए पर्याप्त धन की व्यवस्था करने के लिए अक्षय स्रोत बनी रहीं।
लाखा ने इन खानों से प्राप्त धन की सहायता से मेवाड़ में विभिन्न स्थानों पर दुर्ग का निर्माण करवाया और चित्तौड़ दुर्ग का जीर्णोद्धार भी करवाया। चित्तौड़ दुर्ग में उन्होंने ब्रह्मा मंदिर के अलावा कुछ महलों का निर्माण भी करवाया। साथ ही उन्होंने अपने दादा हम्मीर के अधूरे निर्माण कार्यों को भी पूरा करवाया।
चूँडा का त्याग व व्यक्तित्व
लाखा के जीवन की तीसरी और सबसे महत्त्वपूर्ण घटना, भावनाओं, सम्मान और निष्ठा से ओत-प्रोत है। यह घटना लाखा की वृद्धावस्था में घटी। लाखा के ज्येष्ट पुत्र चूँडा उनके पश्चात् मेवाड़ के लिए एक योग्य उत्तराधिकारी थे। मारवाड़ के राव रिणमल ने चूँडा से अपनी बहन के विवाह प्रस्तावस्वरूप एक नारियल मेवाड़ भेजा। उक्त नारियल को मेवाड़ के दरबार में लाखा ने ग्रहण कर लिया, क्योंकि उस समय चूँडा वहाँ नहीं थे।
लाखा ने मारवाड़ के दूत को कहा कि जब चूँडा आएँगे तो विवाह के प्रस्ताव पर निर्णय लिया जाएगा। लाखा ने मजाक में दूत से कहा, “मुझे नहीं लगता कि तुम यह मुझ जैसे बूढ़े के लिए लाए होगे !” चूँडा के आखेट से लौटने पर जब इस वार्तालाप का पता उन्हें चला तो चूँडा ने राव रिणमल के इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा, “यदि मेरे पिता ने विनोद में भी इस प्रस्ताव में रुचि दिखाई है, तो मेरा इस प्रस्ताव को स्वीकारने का कोई अधिकार नहीं बनता।”
राव रिणमल इस बात से स्तब्ध रह गए और उन्होंने अपनी बहन का विवाह वृद्ध लाखा से करवाने से मना कर दिया। चूँडा ने इस विषय में बात करने हेतु मारवाड़ से किसी चारण को भेजने का आग्रह किया, तब चंदन चारण को समझने के लिए बुलाया गया। चंदन चारण ने चूँडा से कहा कि महाराणा वृद्ध हैं और यदि हम अपनी राजकुमारी का विवाह उनसे करते हैं तो उन दोनों से उत्पन्न पुत्र को जीवन भर तुम्हारी सेवा ही करनी पड़ेगी। अतः इस विवाह का कोई औचित्य नहीं बनता।
इसके जवाब में चूँडा ने कहा, “मैं चित्तौड़ पर राज करने के अपने अधिकार का इसी क्षण त्याग करता हूँ। मैं महाराणा और राजकुमारी से उत्पन्न पुत्र का आजीवन सेवक रहूँगा।”
चंदन ने फिर कहा, “हे चूँडा, किंतु तब आपके पुत्रों का क्या होगा ?”
चूँडा ने उत्तर दिया, “मैं एकलिंगजी की शपथ लेकर कहता हूँ कि मेरा कोई भी वंशज मेवाड़ के सिंहासन पर अधिकार के विषय में नहीं सोचेगा। मेवाड़ के अजन्मे महाराणा को छूने से पूर्व उन्हें मुझसे युद्ध करना होगा।”
चंदन तब राव रिणमल के पास गया और उन्हें समझाते हुए बोला, “चूँडा एक सम्माननीय, वचननिष्ठ व्यक्ति हैं। उन्होंने मेवाड़ के राजसिंहासन का त्याग कर दिया है। यदि हमारी बहन को लाखा से पुत्र होता है तो वही उस राज्य का उत्तराधिकारी होगा। इस अवसर को जाने नहीं देना चाहिए और यह भी स्मरण रखिए राजन, चंदन की पुरानी लकड़ी, नई से अधिक अच्छी होती है।”
इन सब बातों के चलते लाखा का विवाह मारवाड़ की हंसाबाई से हो गया। मारवाड़ की राजकुमारी ने विवाह के तेरह महीने बाद मोकल नाम के एक पुत्र को जन्म दिया। यही मोकल आगे जाकर मेवाड़ के न्यायप्रिय और वीर शासक बने।
क्या हम हिंदू, कभी चूँडा के बलिदान का स्तर समझ पाएँगे, जो उन्होंने अपने पिता की एक जाने-अनजाने में की गई एक छोटी सी इच्छा को पूर्ण करने के लिए किया ?
धरती के टुकड़ों के लिए भाइयों पर कोर्ट केस कर झगड़ने वाले हिंदू, क्या चूँडा के प्रेम व त्याग की भावना कभी समझ पाएँगे ?
ऐसे महान व्यक्ति का चरित्र कितना उज्ज्वल और उच्च होगा, जिसने न केवल स्वयं को, बल्कि अपने वंशजों को भी प्रतिज्ञावश मेवाड़ के राज्याधिकार से वंचित कर दिया ? किस पवित्र विचार के चलते चूँडा ने ऐसा दृढ़ निश्चय किया होगा, यह किसी भी मनुष्य को नैतिक उलझन में डाल सकता है!
चूँडा के समान उत्सर्ग का उदाहरण केवल महाभारत में भीष्म का मिलता है, जब भीष्म ने राज करने के अपने अधिकार को अपने पिता शांतनु की इच्छा के लिए छोड़ दिया था।
चूँडा ने जीवन भर मोकल की सेवा की और एक बड़े भाई की तरह उन्हें बाहरी और आंतरिक शत्रुओं से हमेशा बचाया।
कालांतर में लाखा के देहावसान के बाद दुर्भाग्यवश, माता हंसाबाई ने चूँडा के मंतव्य पर संदेह किया और उन्हें मेवाड़ से चले जाने को कहा।
चूँडा ने अपने भाइयों समेत मेवाड़ की सीमा के बाहर मांडू के दिलावर खाँ के यहाँ अपना ठिकाना स्थापित किया।
चूँडा के निष्कासन के बाद उधर मेवाड़ में महाराणा मोकल की असामयिक हत्या कर दी गई। मोकल के बाद उनके परम यशस्वी पुत्र कुंभा, मेवाड़ की गद्दी पर विराजे।
इस समय चित्तौड़ पूरी तरह से मारवाड़ के रिणमल के नियंत्रण में आ गया था, जो कि कुंभा की दादी के भाई थे। सिसोदिया राजपूतों को इस प्रकार रिणमल का मेवाड़ में बढ़ता हस्तक्षेप नहीं सुहाया तथा एक रात्रि को कुंभा का सेवक इक्का, उनके पैर दबाते-दबाते रोने लगा। जब कुंभा ने कारण पूछा तो इक्का बोला, “चारों तरफ मारवाड़ी आ गए हैं। सिसोदियों के हाथ से मेवाड़ गया तो राठौर मालिक बनेंगे। यह सोचकर रोना आ गया।”
कुंभा ने माँ सौभाग्यवती से मंत्रणा की। स्वयं को यों घिरा पाकर माँ-बेटे ने चूँडा को पुनः मेवाड़ बुलवाया। महात्यागी रावत चूँडा पुरानी बातें भूलकर तुरंत अपने सैनिकों सहित कुंभा के पास आ गए।
राव रिणमल की हत्या की योजना बनाई गई। कुंभा व राजमाता के आदेश पर रिणमल की एक दासी ने उनसे प्रेम का दिखावा कर उन्हें एक रात जमकर मदिरा पिला दी। नशे में दासी ने रिणमल का एक हाथ भी पलंग से बाँध दिया। आठ-दस बलवान सैनिक रिणमल पर टूट पड़े। रिणमल बढ़ी हुई आयु में भी गजब के योद्धा थे। हथियार तो मिला नहीं, रिणमल ने मरने से पूर्व एक लोटे से तीन सैनिकों को मार डाला।
रिणमल को अपनी हत्या का पूर्वानुमान था, सो उन्होंने अपने पुत्र जोधा को पहले ही चित्तौड़ की तलहटी में भेज दिया था। रिणमल की हत्या के बाद चूँडा को जोधा को मारने भेजा गया। जोधा मारवाड़ की तरफ भाग गए, जहाँ मंडोवर पर चूँडा ने चढ़ाई कर विजय प्राप्त की।
कुछ समय बाद कुंभा की दादी माँ व माँ की मंत्रणा से कुंभा ने जोधा को क्षमा कर दिया तथा मारवाड़ में भिन्न राज्य स्थापित करने की आज्ञा दे दी। वृद्ध चूँडा को पुनः मेवाड़ बुला लिया गया। पितामह भीष्म की भाँति चूँडा भी बहुत वृद्ध होकर मोक्ष को प्राप्त हुए। दुर्भाग्य से इन महापुरुष चूँडा की मृत्यु किन परिस्थितियों में, किस स्थान पर हुई, यह स्पष्ट ज्ञात नहीं है।
चूँडा, हिंदू धर्म के उन अज्ञात, अनाम नींव के पत्थर के समान हैं, जो कभी न पूजे जाते हैं, न सराहे ही जाते हैं। वे तो दिखाई भी नहीं देते। बस अपनी नियति के मौन स्वीकार में धर्म को अपने कंधों पर उठा, संकट की घड़ियों से पार लगाकर अदृश्य हो जाते हैं।
चूँडा जैसा देवपुरुष, वीतरागता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। सहज पितृभक्ति, अकूत राष्ट्रप्रेम, सुख-दुःख व जय-पराजय को समदृष्टि से जीने वाले विलक्षण राजपूत, चूँडा के चरित्र की सुगंध यदि हिंदुओं के सार्वजनिक जीवन में प्रवाहित हो जाए तो हमारा समाज आज भी निखर सकता है।
चूँडा के वंशज ‘चूँडावत’ कहलाए और उनकी आने वाली सभी पीढ़ियों ने मेवाड़ की हमेशा सेवा व सहायता की। चूँडावतों ने भविष्य में मेवाड़ के सभी युद्धों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और महाराणा सांगा तथा महाराणा प्रताप के युद्ध अभियानों में उनके साथ मिलकर लड़े। चूँडावतों ने पीढ़ियों तक मेवाड़ की सेवा की और मेवाड़ की सेना में हरावल (अग्रिम पंक्ति) दस्ता सदैव उन्हीं का दायित्व था।
चूँडावत आज भी पूरे विश्व में फैले हुए हैं और ये काफी सफल और गौरवशाली लोग हैं। रावत चूँडा व उनके वंशज चूँडावतों की यह विलक्षण गाथा आज के परिप्रेक्ष्य में दो कारणों से अनुकरणीय हो जाती है।
पहला, राजपूतों के लिए वचन कितना मूल्यवान् होता था ! बिना कोई लिखा-पढ़ी, मुख से निकली हुई बात कितनी महत्त्वपूर्ण होती है, यह हमारे पुरखों द्वारा स्थापित मूल्यों से हम समझ सकते हैं।
वह क्या गुण है, जो मनुष्यों को पशुओं से भिन्न तथा ऊपर करता है—वाणी।
मनुष्य केवल तब ही मनुष्य है, जब तक वह वाणी के वास्तविक मूल्य को समझे, अन्यथा वह पशु ही है। समकालीन हिंदू समाज में जो मिथ्याचार का बोलबाला है, उसे मिटाना है तो राव चूँडा जैसे महापुरुषों के जीवन से सीखना ही पड़ेगा। मुख से बोला हुआ वचन ही वाणिज्य, संबंध, परिवार, शिष्टाचार, बोलचाल व समाज का आधार होता है। वचन निभाने वाले समाज ही संसार के शिखर पर आरूढ़ होते हैं।
झूठ बोलने वाले समाज एक रिक्त व्यवस्था में जीने को अभिशप्त होते हैं। इस दृष्टि से समकालीन पाश्चात्य व जापानी समाज, हिंदुओं से आगे हैं।
वहाँ आज भी वचन का इतना मूल्य है कि बड़े-बड़े व्यापारिक निर्णय भी मौखिक आश्वासन पर हो जाते हैं।
समय आ गया है कि हिंदू समाज भी वचन के मूल्य को आत्मसात् करे।
जो दूसरी महानतम बात चूँडा के इस वचन से निकलती है, वह है पुरखों का सम्मान। चूँडा के इस वचन का उनकी संतानों व पीढ़ियों ने पालन किया।
मानव इतिहास में ऐसे त्याग के उदाहरण मिलना असंभव है, जहाँ अपने एक पूर्वज के दिए हुए वचन को पाँच सौ वर्षों तक उनकी संतानों ने निभाया। चूँडावतों ने न तो कभी मेवाड़ के राजघराने के विरुद्ध विद्रोह किया, न किसी षड्यंत्र का भाग बने, वरन् निस्पृह, निर्लिप्त भाव से कर्मयोग के सिद्धांत को अपने वक्ष पर धारण करके हिंदू इतिहास में एक अभूतपूर्व उदाहरण स्थापित किया।
मेवाड़ की विजयगाथा का बहुत बड़ा श्रेय इन विलक्षण चूँडावत राजपूतों को जाता है, जो अपने किसी एक पुरखे के दिए एक वचन के लिए मेवाड़ राजघराने की निष्ठा में कटते रहे, मरते रहे, पर कभी मेवाड़ के सिंहासन पर कुदृष्टि नहीं डाली, कभी विश्वासघात नहीं किया। जिस दिन हिंदू समाज, चूँडावतों के इस अप्रतिम त्याग के मूल्य को समझ गया, उस दिन हमारे सार्वजनिक जीवन में हम भी कदाचित् मुख से निकले वचन का मूल्य समझ पाएँ! अपने पुरखों के प्रति निष्ठा का वास्तविक अर्थ समझ पाएँ।
निष्ठा ही सर्वस्व है।
निष्ठा ही मनुष्यता है।
निष्ठा ही पूजा है।
निष्ठा ही प्रार्थना है।
निष्ठा ही जीवन है।
यह प्रकरण जहाँ चूँडा की महिमा दर्शाता है, वहीं दुर्भाग्य से लाखा की अतृप्त कामुकता को भी प्रगट करता है। कोई पिता इतना कामांध भी हो सकता है कि अपने ही पुत्र को उसके अधिकारों से वंचित कर दे ?
चूँडा तो राज्य का त्याग करके इतिहास में अमर हो गए, पर लाखा के धवल जीवन पर यह कालिख तो हमेशा रहेगी कि उन्होंने अपने ही पुत्र के साथ अन्याय किया।
चूँडा का त्याग तो भीष्म के त्याग से भी महान था, क्योंकि चूँडा के वचन का मूल्य तो उनकी पीढ़ियों ने भी चुकाया। व्यक्ति अपने अधिकारों की बलि तो दे सकता है, लेकिन अपनी संतानों के अधिकार की बलि इतिहास में कम ही देखने को मिलती है। लाखा की तरह हस्तिनापुर के महाराज शांतनु की काम-वासना का कितना भयंकर मूल्य भारतवर्ष ने चुकाया, जब भीष्म के प्रकरण की परिणति महाभारत के भयानक संग्राम में हुई!
इस जगत के सब दुःख, कुइच्छा से जन्म लेते हैं।
कुइच्छा क्या है ?
जो इच्छा संतुलन में न हो।
आपकी आय के साथ संतुलन में, आपकी आयु के साथ संतुलन में, आपके श्रम के साथ संतुलन में, परिवार में आपके स्थान के साथ संतुलन में, धर्म के साथ संतुलन में न हो, वही इच्छा कुइच्छा है।
कुइच्छा को मिटाने के लिए धर्म की समझ आवश्यक है। अपनी आवश्यकता से अधिक धन, अपनी योग्यता से अधिक सत्ता, अपनी आयु के विपरीत आचरण, ये सब धर्म के विपरीत हैं, इसलिए दुःख लाएँगे।
काल की गति को समझ कर जीने वाले व्यक्ति व समाज ही सफल व सुखी होते हैं।
यदि चूँडा मेवाड़ के महाराणा होते तो क्या होता, यह तो कभी भी ज्ञात नहीं हो सकेगा, पर हिंदू राजाओं की कामांधता कितने भयानक परिणाम ला सकती है, यह सीखने योग्य बात है। चूँडा के प्रकरण को यदि छोड़ दें तो महाराणा लाखा एक विलक्षण शासक सिद्ध होते हैं।
उस समय के मेवाड़ की एक अद्भुत प्रथा और थी। जब राजा वृद्ध हो जाते थे तो वे स्वेच्छा से राज्यभार त्याग देते थे और कुछ चुने हुए योद्धाओं को लेकर भारतवर्ष के तीर्थों को इस्लामी उपद्रवियों से बचाने हेतु निकल पड़ते थे।
राणा लाखा भी अपनी वृद्धावस्था में भारत के पूर्वी हिस्सों में स्थित हिंदू तीर्थों को यवनों से मुक्त कराने निकल गए और ऐसे ही एक युद्ध में वे मोक्ष को प्राप्त हुए।
लाखा वह अद्भुत महाराणा हुए, जिन्होंने अपने पुरखों की ख्याति व मेवाड़ की भौगोलिक सीमा का बहुत विस्तार किया। अपने संघर्षपूर्ण जीवन और सम्मानपूर्ण अंत से मेवाड़ की आने वाली पीढ़ियों को वे समझा गए कि हिंदू धर्म को इस्लामी उपद्रवियों से बचाना ही उनके जीवन का मूल उद्देश्य है। तथाकथित दिल्ली सल्तनत, लाखा के समय में खंडित हो रही थी और गुजरात व मालवा में स्वतंत्र इस्लामिक राज्यों की जड़ें जमने लगी थीं। लाखा अपने पुत्र मोकल व पौत्र कुंभा के लिए पर्याप्त धन व संसाधन छोड़कर स्वर्ग को सिधारे तथा मेवाड़ के इन महान महाराणा के जीवन का पटाक्षेप मध्य भारत के किसी अज्ञात युद्ध में हुआ।