किराए का घर Vandna Sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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किराए का घर

**"किराए का घर" -  *लेखिका: डॉ वंदना शर्मा*वर्तमान समय में अपना घर होना भी एक सपना ही है। बढ़ती जनसंख्या और सीमित ज़मीन। डिब्बेनुमा जैसे घर में रहने को मजबूर लोग।यह कहानी है दिल्ली में कार्यरत दलन प्रसाद की। शादी के बाद अपनी धर्मपत्नी विनीता को अपने साथ दिल्ली लेकर आया। चौथी मंजिल पर यही कोई पचास गज का दो कमरे वाला फ्लैट। किराये के फ्लैट में बस चार दीवारों से घिरा एक फ्लोर मिलता है। ना छत अपनी ना ज़मीन अपनी। एक ही बिल्डिंग में पाँच परिवार रहते। रोज़ किसी ना किसी बात पर पड़ोसी से चिकचिक रहती। ज़ोर से फोन पर बातें नहीं करनी हैं। सबकी प्राइवेसी बाधित होती है। छत पर नहीं जाना है। छत सिर्फ मकानमालिक की है। रात दस बजे मुख्य दरवाजा बंद हो जायेगा फिर किसी के लिए नहीं खुलेगा।विनीता ने उसी घर को अपना समझ सजाया, सँवारा। कोने-कोने को महकाया। भविष्य के सपने संजोए। ईश्वर की कृपा से उनको एक पुत्र की प्राप्ति हुई। दोनों पति-पत्नी बहुत खुश थे। लेकिन मकान मालिक ने पाबन्दी बढ़ा दी। "बच्चे का शोर नीचे नहीं आना चाहिए। फ्लैट की दीवार गंदी नहीं होनी चाहिए। दीवारों पर फोटो फ्रेम नहीं लगाने और पानी सिर्फ रात में ही आयेगा।"विनीता समझती थी अपनी मजबूरी। इसलिए चुप रहती। विनीता अपने बेटे के साथ यादें बनाने में व्यस्त रहती। दिनभर अपने बेटे के साथ खेलती, उसके फोटो खींचती, लेकिन इस बात का ध्यान रखती कि उसकी वजह से किसी को परेशानी न हो। धीरे-धीरे समय गुजरता रहा। उसका बेटा तीन साल का हो गया। विनीता अब बेटे के एडमिशन के लिए स्कूल ढूंढने लगी। अचानक एक दिन मकानमालिक ने कमरा खाली करने को बोल दिया। बोला कि "हम चार साल से ज्यादा किसी को नहीं रखते।"विनीता को बहुत दुख हुआ। शादी के बाद पहली बार इस घर में आई थी। यहीं उसका बेटा हुआ। उसके बेटे ने यहीं इस घर में चलना सीखा, बोलना सीखा। इस घर को अपने घर की तरह सजाया।रात को जब उसके पति आए, उनसे बात की तो उन्होंने भी यही कहा, "हम कर भी क्या सकते हैं, किराये का घर है। काश अपना भी एक घर होता।"एक महीने से नया घर ढूंढ रहे थे। अच्छा नहीं मिला। कहीं किराया ज्यादा माँग रहे थे। कहीं घर बने हुए अच्छे नहीं थे। किराये पर देने के लिए छोटे-छोटे डिब्बेनुमा घर बना रखे थे। किसी घर में धूप नहीं आती तो किसी में बालकनी नहीं। बिना बालकनी के कपड़े कहाँ सुखायेंगे?बड़ी मुश्किल से तीसरी मंजिल पर एक घर मिला। घर तो अच्छा बना था लेकिन किराया थोड़ा ज्यादा था। विनीता ने इस घर को भी अपना समझकर, सजाया, सँवारा। विनीता ने अपने बेटे का दाखिला पास के ही एक पब्लिक स्कूल में करा दिया था। पहली मंजिल पर मकान मालकिन रहती थी। दूसरी मंजिल पर उनकी बहू और तीसरी मंजिल पर विनीता और उसके पति।विनीता का पति बहुत मेहनत करता। लेकिन उसकी सैलरी नहीं बढ़ रही थी। अपने बच्चों को सारी खुशियाँ देने की कोशिश करता। खुद अपने शौक मारकर भी खुश रहता लेकिन अपने बीवी-बच्चों की हर ख्वाहिश पूरी करता। खुद सस्ते कपड़े पहनता लेकिन अपने बच्चों के लिए हमेशा अच्छे कपड़े लाता। दिल्ली की इस बढ़ती महंगाई में सारी सैलरी घर के खर्च में ही चली जाती। कुछ बचता नहीं। चिंता उसे भी थी अपना घर बनाने की। पर क्या करे, चाहकर भी बचत नहीं हो पाती।विनीता बहुत ही मिलनसार और मृदुभाषी थी। सबकी सहायता करती। बड़ों का सम्मान करती। मकान मालिक की बहू वैशाली से उसकी अच्छी दोस्ती हो गई। दोनों एक-दूसरे से अपनी सारी बातें शेयर करते, साथ बाजार जाते। दोनों के बच्चे एक साथ खेलते। त्योहारों पर खाने के सामान का भी आदान-प्रदान होता। विनीता और वैशाली दोनों ही सगी बहनों की तरह एक-दूसरे की जरूरत बन गए थे। कोई भी समारोह या त्यौहार हो विनीता के बिना पूरा ही नहीं होता। थोड़ी बहुत पाबंदियां यहाँ भी थीं। लेकिन विनीता कभी नहीं भूलती कि वो किरायेदार है। अपनी सीमाएं वो कभी नहीं भूलती। सब कुछ अच्छा चल रहा था। लेकिन मकान मालकिन को विनीता और वैशाली की दोस्ती रास नहीं आई। आते-जाते विनीता को टोकने लगी।"वैशाली से बात मत किया करो। सारे सीढ़ियों पर पोछा लगाया करो, जाते तो सभी सीढ़ियों पर रखकर ही ना। छत पर झाड़ू लगाया कर।"विनीता कुछ ना कहती। वो जानती थी अपनी औकात कि किरायेदार है वो। ये सब तो सुनना ही पड़ेगा। उसने बहुत कोशिश की मकान मालकिन को खुश रखने की। लेकिन किसी ना किसी बात पर वो विनीता से झगड़ा कर लेती और बहुत सुनाती। और एक दिन मकान मालकिन ने यहाँ से भी मकान खाली करने को बोल दिया। विनीता को तो सदमा सा लगा। वो यहाँ एक बेटी की तरह रहती थी। सबका ध्यान रखती। सबकी सेवा करती। लेकिन यहाँ भी तो चार साल हो गए थे, घर तो खाली करना ही पड़ता। कर भी क्या सकते थे।विनीता और दलन ने नया घर ढूंढना शुरू किया। फिर वही मुसीबत। अच्छा घर कम बजट में मिलना अब मुश्किल हो गया था। बच्चे का स्कूल भी अधिक दूर ना पड़े इस बात का भी ध्यान रखना था।सोसायटी में घर बहुत महंगे थे। और मुहल्ले में भी किराया बहुत बढ़ चुका था। कहीं रसोई छोटी मिलती, कहीं बाथरूम छोटा होता तो कहीं बालकनी ही नहीं मिलती। दलन ने दो महीने का समय का माँगा। नया घर ढूंढने के लिए। दो महीने से शहर के अधिकतर घर देखें पर कोई पसंद ही नहीं आया। शादी को आठ साल हो गए पर अभी तक अपना घर नहीं बना पाए।बड़ी मुश्किल से एक घर अपने बजट में पसंद आया। पर वो बहुत पुरानी बनी बिल्डिंग थी। नया बना घर उनके बजट से बाहर था। विनीता को घर इतना पसंद नहीं था लेकिन पति की सैलरी और महंगाई को देखते हुए उसने हाँ कर दी थी। शिफ्टिंग में भी बहुत पैसा लगता है। सामान की भी तोड़-फोड़ हो जाती है। रात को उदास लेटे थे दोनों। विनीता ने ही चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि आखिर कब तक हम ऐसे ही बंजारे की तरह भटकते रहेंगे अपना सामान लेकर। हर बार अपना घर समझकर सजाते हैं। कितने समझौते करने पड़ते हैं। कितना मन को मारना पड़ता है। और फिर भी कोई ठिकाना नहीं। हर चार साल बाद कभी तीन साल बाद मकान खाली करो। कहते-कहते विनीता की आँख से आँसू आ गए। दलन सब समझ रहा था पर इतना ही बोला।  कर भी क्या सकते हैं? किरायेदार हैं हम।——— समाप्त ———डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi 8/6/26