अंश, कार्तिक, आर्यन - 14 Renu Chaurasiya द्वारा क्राइम कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अंश, कार्तिक, आर्यन - 14

शादी के बाद रणजीत की ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई थी।
कभी जो लड़का दुनिया में बिल्कुल अकेला था, आज उसके पास अपना परिवार था।
अब उसके जीवन में श्री मलोत्रा थे—
एक ऐसे पिता, जिन्होंने उसे जन्म नहीं दिया था, लेकिन उससे कहीं बढ़कर प्यार दिया था।
वे उस पर भरोसा करते थे।
जब भी रणजीत किसी मुश्किल में पड़ता, श्याम जी उसके साथ खड़े रहते।
वो उसे सिर्फ व्यापार चलाना नहीं सिखा रहे थे, बल्कि एक अच्छा इंसान बनना भी सिखा रहे थे।
रणजीत अक्सर सोचता था कि अगर उसके असली पिता भी ऐसे होते, तो शायद उसकी ज़िंदगी कभी उस अंधेरे में नहीं जाती।
और अब उसके पास कल्याणी थी।
उसकी पत्नी।
उसका प्यार।
उसकी सबसे बड़ी ताकत।
कल्याणी ने कभी उसके अतीत के लिए उसे जज नहीं किया।
वह हमेशा उसके साथ खड़ी रही।
जब पूरी दुनिया ने उस पर उंगली उठाई थी, तब भी उसने उसका हाथ नहीं छोड़ा।
धीरे-धीरे रणजीत को महसूस होने लगा कि भगवान ने उससे जो कुछ छीन लिया था, शायद अब वही सब उसे वापस मिल रहा था।
एक पिता।
एक घर।
एक परिवार।
एक ऐसा प्यार, जो बिना किसी शर्त के उसके साथ था।
और फिर एक दिन...
उसे वह खबर मिली जिसने उसकी खुशी को और भी बढ़ा दिया।
कल्याणी माँ बनने वाली थी।
जब उसने यह सुना, तो कुछ क्षणों तक उसे विश्वास ही नहीं हुआ।
फिर उसने कल्याणी को अपनी बाँहों में भर लिया।
उसकी आँखें नम थीं।
शायद जीवन में पहली बार ये खुशी के आँसू थे।
उस रात वह देर तक जागता रहा।
अपने होने वाले बच्चे के बारे में सोचता रहा।
वह उसके लिए वो सब करना चाहता था जो उसे कभी नहीं मिला था।
वह चाहता था कि उसका बच्चा कभी डर में न जिए।
कभी अकेला महसूस न करे।
कभी उस दर्द को न जाने, जिसने उसका बचपन निगल लिया था।
समय के साथ रणजीत हर जिम्मेदारी में और भी निपुण होता गया।
व्यापार हो, लोगों का प्रबंधन हो या परिवार—
वह हर काम को पूरी ईमानदारी और लगन से निभाता था।
श्री मलोत्रा अब पहले से कहीं अधिक उस पर भरोसा करने लगे थे।
कई महत्वपूर्ण फैसले अब रणजीत ही लेता था।
लोग उसकी बुद्धिमानी और निर्णय क्षमता की प्रशंसा करने लगे थे।
लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी ताकत...
धीरे-धीरे उसकी सबसे बड़ी समस्या भी बनने वाली थी।
क्योंकि जितना वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ रहा था...
उतना ही वह लोगों की नजरों में आ रहा था।
और दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं...
जो किसी को ऊपर उठते हुए देख नहीं सकते।
उनकी मुस्कान के पीछे ईर्ष्या छिपी होती है।
और उनकी चुप्पी के पीछे षड्यंत्र।
जिस दिन श्री मलोत्रा ने आधिकारिक रूप से अपनी सारी संपत्ति, कारोबार और साम्राज्य का उत्तराधिकारी रणजीत को घोषित किया, उस दिन पूरे शहर में हलचल मच गई।
मलोत्रा साम्राज्य के विशाल दरबार हॉल में शहर के बड़े व्यापारी, राजनेता और प्रतिष्ठित लोग मौजूद थे।
सभी की निगाहें मंच पर खड़े श्री मलोत्रा पर थीं।
श्री श्याम मलोत्रा ने धीरे-धीरे अपनी कुर्सी से उठकर रणजीत को अपने पास बुलाया।
उनकी आँखों में गर्व साफ दिखाई दे रहा था।
उन्होंने सबके सामने रणजीत का हाथ थामकर कहा—
"आज से मेरा बेटा रणजीत मलोत्रा मेरे पूरे साम्राज्य का उत्तराधिकारी होगा।"
कुछ ही क्षणों में पूरे हॉल में फुसफुसाहट फैल गई।
कुछ लोगों के चेहरे उतर गए।
कुछ के दिलों में ईर्ष्या की आग भड़क उठी।
कई लोग वर्षों से इस दिन का इंतजार कर रहे थे।
उन्हें उम्मीद थी कि श्री श्याम के बाद मलोत्रा साम्राज्य बिखर जाएगा।
लेकिन आज...
उनकी सारी उम्मीदें टूट रही थीं।
एक बुजुर्ग शेयर धारक खड़ा हुआ।
"श्री श्याम जी, क्या आपने इस फैसले के बारे में अच्छी तरह सोच लिया है?"
"आखिर रणजीत आपका असली बेटा तो नहीं है।"
हॉल में सन्नाटा छा गया।
सभी श्री श्याम जी के जवाब का इंतजार करने लगे।
श्याम जी मुस्कुराए।
उन्होंने रणजीत के कंधे पर हाथ रखा और बोले—
"बेटा खून से नहीं, कर्मों से बनता है।"
"जिस लड़के को तुम लोग बाहरी समझते हो, उसने मेरे साथ उस समय खड़ा रहना चुना जब अपने भी साथ छोड़ सकते थे।"
एक और आदमी बोला—
"लेकिन आपका अपना वंश?"
श्याम जी की आँखें चमक उठीं।
उनके चेहरे पर दादा बनने की खुशी साफ झलक रही थी।
"मेरा वंश यहीं खत्म नहीं हो रहा।"
उन्होंने गर्व से कहा—
"मेरा पोता आने वाला है।"
यह सुनकर कल्याणी मुस्कुरा उठी।
रणजीत की आँखों में भी चमक आ गई।
श्री श्याम आगे बोले—"मैंने अपनी पूरी जिंदगी काम करते हुए बिताई है।"
"मैंने दौलत कमाई, कारोबार खड़ा किया, दुश्मनों का सामना किया..."
"लेकिन अब मैं थक गया हूँ।"
उनकी आवाज़ पहली बार नरम हो गई।
"अब मैं अपनी बेटी और अपने आने वाले पोते के साथ समय बिताना चाहता हूँ।"
"मैं उसके साथ वो बचपन जीना चाहता हूँ..."
"...जो मुझसे बहुत पहले छिन गया था।"
कुछ क्षणों के लिए उनकी आँखें नम हो गईं।
फिर उन्होंने मुस्कुराकर रणजीत की तरफ देखा।
"और जहाँ तक काम की बात है..."
"अब मेरा बेटा सब संभाल लेगा।"
उन्होंने अपनी कुर्सी की तरफ देखा—
वही कुर्सी जिस पर बैठकर उन्होंने वर्षों तक अपना साम्राज्य चलाया था।
फिर उन्होंने रणजीत का हाथ पकड़कर उसे उस गद्दी पर बैठा दिया।
पूरा हॉल खड़ा हो गया।
तालियों की गूंज चारों तरफ फैल गई।
लेकिन उस भीड़ में कुछ चेहरे ऐसे भी थे...
जो ताली तो बजा रहे थे,
पर उनकी आँखों में नफरत जल रही थी।
क्योंकि उस दिन सिर्फ रणजीत को गद्दी नहीं मिली थी—
उस दिन मलोत्रा साम्राज्य को एक नया राजा मिल गया था।
और कई लोगों की नींद हमेशा के लिए उड़ गई थी। उस दिन के बाद श्री श्याम मलोत्रा ने आखिरकार हमेशा के लिए रिटायरमेंट ले लिया था।
अब उन्हें न मीटिंग्स की चिंता थी,न सौदों की,न कारोबार की। वो जिम्मेदारियाँ अब रणजीत के कंधों पर थीं।सालों तक साम्राज्य खड़ा करने के बाद पहली बार श्याम जी ने खुद के लिए जीना शुरू किया था।
और उनकी नई दुनिया बस दो लोगों के इर्द-गिर्द घूमती थी—
उनकी बेटी कल्याणी
और उनका आने वाला पोता।
कल्याणी की गर्भावस्था का हर दिन उनके लिए किसी त्योहार से कम नहीं था।
वो सुबह उठते ही सबसे पहले कल्याणी का हाल पूछते।
"बेटा, समय पर खाना खाया?"
"दवाई ली?""डॉक्टर ने क्या कहा?"कल्याणी कई बार हँस पड़ती।"पापा, मैं ठीक हूँ।"
लेकिन श्याम जी को चैन कहाँ था।
जब भी वो बाज़ार जाते, खाली हाथ वापस नहीं आते।
कभी छोटे-छोटे कपड़े खरीद लाते।
कभी लकड़ी के खिलौने।
कभी बच्चों की कहानियों की किताबें।
एक दिन तो उन्होंने पूरे कमरे को ही बदलवा दिया।
"पापा, अभी बच्चा पैदा भी नहीं हुआ है।"
कल्याणी हँसते हुए बोली।
श्री श्याम ने गर्व से जवाब दिया—
"तो क्या हुआ? मेरे पोते को किसी चीज़ की कमी नहीं होनी चाहिए।"
उन्होंने हवेली में एक खूबसूरत कमरा तैयार करवाया।
दीवारों पर रंग-बिरंगे चित्र बनवाए।
एक छोटा-सा झूला लगवाया।
लकड़ी का पालना मंगवाया जो खास कारीगरों से बनवाया गया था।
हर शाम वो उस कमरे में जाकर बैठ जाते।
कभी पालने को देखते।
कभी मुस्कुराते।
कभी भविष्य के सपनों में खो जाते।
रणजीत कई बार उन्हें चुपचाप देखता।
उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती।
वो आदमी जिसने पूरी जिंदगी लड़ाइयाँ लड़ी थीं...
आज एक छोटे से बच्चे के आने की खुशी में खोया हुआ था।
एक रात श्री श्याम जी बालकनी में बैठे थे।
हाथ में चाय का कप था।
रणजीत उनके पास आकर बैठ गया।
श्री श्याम ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा—
"जानते हो बेटा..."
"मैंने जिंदगी में बहुत कुछ पाया है।"
"दौलत, इज्जत, नाम..."
फिर उन्होंने मुस्कुराकर रणजीत की तरफ देखा।
"लेकिन जो खुशी मुझे अपने पोते का इंतजार करते हुए मिल रही है..."
"वो मुझे कभी किसी सौदे या जीत से नहीं मिली।"
उनकी आँखों में चमक थी।
"मैं उसके साथ खेलूँगा..."
"उसे कहानियाँ सुनाऊँगा..."
"उसे चलना सिखाऊँगा..."
फिर उनकी आवाज़ थोड़ी भर्रा गई।
"और शायद..."
"उसके साथ मैं अपना वो बचपन भी जी लूँ..."
"...जो समय मुझसे छीन कर ले गया था।"
उस पल रणजीत ने महसूस किया—
श्री मलोत्रा अब साम्राज्य के मालिक नहीं रहे थे।
अब वो बस एक पिता थे...
जो अपनी बेटी से प्यार करता था।
और एक दादा...
जो अपने आने वाले पोते के सपने देख रहा था। 
जैसे-जैसे दिन बीतते गए…
वैसे-वैसे रणजीत की जिम्मेदारियाँ बढ़ती चली गईं।
अब वह सिर्फ श्री मलोत्रा का दत्तक पुत्र या कल्याणी का पति नहीं था—
वह पूरे मलोत्रा साम्राज्य का मुखिया था।
हर सुबह सूरज निकलने से पहले उसका दिन शुरू हो जाता।
मीटिंग्स, व्यापारिक सौदे, नए प्रोजेक्ट, कर्मचारियों की समस्याएँ, निवेशकों से मुलाकात—
उसके पास साँस लेने तक का समय नहीं बचता था।
कई बार तो ऐसा होता कि जब वह घर से निकलता,
तब कल्याणी अभी सो रही होती।
और जब वह लौटता—
तब पूरा घर सो चुका होता।
धीरे-धीरे उसके चेहरे पर थकान दिखाई देने लगी।
आँखों के नीचे हल्के काले घेरे बन गए थे।
लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की।
वह जानता था—
श्री मलोत्रा ने उसे जो भरोसा दिया है,
उसे निभाना उसकी जिम्मेदारी है।
कभी-कभी काम इतना बढ़ जाता कि वह खाना खाना भी भूल जाता।
सिर्फ चाय और कॉफी के सहारे पूरा दिन निकाल देता।
जब कल्याणी को इसका पता चला,
तो वह बहुत नाराज़ हुई।
एक दिन उसने साफ शब्दों में कहा—
"अगर तुमने अपना ध्यान नहीं रखा, तो मैं खुद ऑफिस आ जाऊँगी।"
रणजीत ने मुस्कुराकर बात टाल दी।
लेकिन अगले ही दिन—
कल्याणी सचमुच ऑफिस पहुँच गई।
उसके साथ श्री मलोत्रा  उसके पिता थे।
उनके हाथों में बड़े-बड़े टिफिन थे।
ऑफिस के कर्मचारी हैरान रह गए।
"मिस्टर मलोत्रा?"
श्याम जी ने हँसते हुए कहा—
"अपने बेटे को खाना खिलाने आया हूँ।"
जब रणजीत अपने केबिन से बाहर निकला,
तो सामने कल्याणी और अपने पिताको देखकर चौंक गया।
"आप लोग यहाँ क्यों है ? 
कल्याणी ने भौंहें चढ़ाईं।
पापा कल्याणी तो कुछ भी कहती है पर आप भी उसकी बातों में आ गये।
"हाँ, क्योंकि कोई है जो पिछले  कुछ दिनों से ठीक से खाना नहीं खा रहा।"
श्री श्याम जी ने कहा और हम नहीं चाहते कि हमारे परिवार का मुखिया भूखा रहे ।
उन्होंने ने तुरंत टेबल पर खाना सजाना शुरू कर दिया।ये देखकर रणजीत की आँखे भर आई ।वो चुपचाप अपने पिता को खाना लगते हुए देख रहा था।
कुछ ही देर में ऑफिस का कॉन्फ्रेंस रूम
एक छोटे से पारिवारिक भोजन कक्ष में बदल गया।
तीनों साथ बैठे।
श्री श्याम मलोत्रा हमेशा की तरह बातें करते रहे।
कल्याणी बीच-बीच में रणजीत को डाँटती रही कि वह अपनी सेहत का ध्यान नहीं रखता।
और रणजीत…
बस मुस्कुराता रहा। ओर उस दिन से यही उनकी दिन चर्या हो गई थी दिन में बाप बेटी ऑफिस आते ओर फिर पूरा परिवार साथ मिलकर खाना खाते 
शायद पूरे दिन में वही कुछ पल थे,
जब रणजीत साम्राज्य का मालिक नहीं होता था।वह सिर्फ—एक बेटा था। एक पति था। और जल्द ही…
एक पिता बनने वाला था।
काम चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो,
इन कुछ मिनटों में उसे सुकून मिल जाता।
उसे लगता था—जैसे सारी थकान उतर गई हो।