अंश, कार्तिक, आर्यन - 13 Renu Chaurasiya द्वारा क्राइम कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अंश, कार्तिक, आर्यन - 13

बाल सुधार गृह से निकलने के बाद भी रणजीत ने कभी गलत रास्ते पर चलने के बारे में नहीं सोचा था।उसके अंदर अब भी कहीं न कहीं उसकी माँ की कही बातें आभी भी उसके लिए सच थी।वो शब्द,जीने   बचपन में उसने सैकड़ों बार सुनी थी—“ बेटा ईमानदारी से जीना… किसी का हक मत छीनना… मेहनत की कमाई ही सुकून की रोटी देती है। पर उस एक रात ने उसका  उससे सब कुछ छीन लिया था,लेकिन उसकी माँ की सीख अब भी उसके भीतर बची हुई थी।जब वह बाल सुधार गृह से बाहर निकला तो उसके पास न घर था,न कोई परिवार, न कोई सहारा। फिर भी उसने सोचा था—कि  वो मेहनत करेगा, ओर अपनी मां की दी हुई सीख के रास्ते पर ही चलेगा। वो छोटा-मोटा काम करेगा, और अपनी ज़िंदगी को दोबारा बनाएगा। उसने कई जगह काम माँगा पर उसे छोटी छोटी गलतियों बताकर काम नहीं दिया गया। वह रोज सुबह उठता  फिर से नए काम की तलाश करना शुरु करता पर हमेशा नाकाम होकर लौटता ।  हर दिन यही कहानी थी वो थक हारकर  कभी गोदाम में काम करता  ,कभी दुकान  पर, मजदूरी ।लेकिन हर जगह लोग उसके अतीत को देखकर पीछे हट जाते।“ये वही लड़का है…”“जिसने अपने बाप को मारा था…”“इसे काम पर रखोगे तो मुसीबत आएगी…”कोई उसकी मजबूरी नहीं देखता था।कोई ये नहीं पूछता था कि एक बच्चे ने ऐसा क्यों किया।सबने सिर्फ उसका अपराध देखा…उसका दर्द नहीं।रणजीत हर बार चुपचाप लौट आता।उसने कई रातें भूखे पेट काटीं।फुटपाथ पर सोया।पानी पीकर दिन निकाले।लेकिन फिर भी…उसने चोरी नहीं की।किसी से कुछ  छीना नहीं। कभी गलत रास्ता नहीं चला।वो खुद से बस एक ही बात कहता—“मैं अपने पिता जैसा नहीं बनूँगा।”लेकिन दुनिया ने उसे हर मोड़ पर धक्का दिया।जहाँ उसने दरवाज़ा खटखटाया…वहाँ दरवाज़ा बंद मिला।जहाँ उसने भरोसा माँगा…वहाँ शक मिला।जहाँ उसने काम माँगा…वहाँ तिरस्कार मिला।एक बच्चा…जिसने अपने पिता की हत्या की हो,और जिसका पूरा बचपन बाल सुधार गृह की सलाखों के पीछे बीता हो…क्या दुनिया उसे शराफ़त से जीने देती है?नहीं।दुनिया सच जानने से पहले फैसला सुना देती है।कोई ये नहीं पूछता कि उसने ऐसा क्यों किया।कोई ये नहीं जानना चाहता कि उस छोटे से बच्चे ने क्या देखा था…कैसा दर्द सहा था…किस मजबूरी ने उसके हाथ खून से रंग दिए थे।लोग सिर्फ इतना देखते हैं  कि वो कातिल है।”पर किसी ने उसे एक बार भी नहीं पूछा बेटा तुमने ऐसा क्यों किया ।बस एक शब्द…जो उसकी पूरी कहानी को निगल जाता है। और जब वो बच्चा बड़ा होकर बाहर आता है,तो दुनिया उसे दूसरा मौका नहीं देती।जहाँ काम माँगे—वहाँ शक मिलता है।जहाँ इज़्ज़त माँगे—वहाँ ताना मिलता है।जहाँ सहारा चाहे—वहाँ दरवाज़े बंद मिलते हैं।उसे हर जगह उसके अतीत से पहचाना जाता है,उसकी इंसानियत से नहीं।लोग कहते हैं—“ऐसे लोग कभी नहीं बदलते।”पर कोई ये नहीं सोचता—जिसे बचपन में इंसानियत मिली ही नहीं…वो सीखेगा कहाँ से?दुनिया अक्सर अपराधी पैदा नहीं करती—उन्हें बनाती है। जैसे तैसे उसे एक जगह बोरी उठाने का काम मिला । वो बड़ी मेहनत से कम करने लगा रोज सुबह सबसे पहले काम पर जाता  और  शाम को सबके बाद आता ।आखिर कर एक मालिक मिला उसे जो उसको  उसके अतीत से नहीं उसके काम से पहचानता।उसके साथी लोग उसकी पीठ पीछे बुराई करते  कई ने तो एक दो बार मालिक से शिकायत भी की पर मालिक बहुत ही सुलझे  हुए इंसान थे वे कानों सुनी नहीं  खुद अपनी आंखों देखी बात पर विश्वास करते। उसके मालिक का नाम   श्री श्याम मलोत्रा था । उनके एक बेटी थी  उसका नाम  कल्याणी  मलोत्रा था। मालिक अपनी बेटी को बहुत प्यार करते थे। वो उनकी आंखों का तारा थी उनकी जिंदगी अपनी बेटी से ही शुरू होती और उसी पर खत्म होती थी। रजीब मलोत्रा — एक अलग तरह के आदमी थे। वे उन अमीर लोगों जैसे बिलकुल नहीं थे,जो दौलत मिलते ही इंसानियत भूल जाते हैं।उन्होंने  कभी गरीबी नहीं देखी थी…पर  दर्द देखा था। बहुत कम उम्र में उन्होंने अपने पिता को खो दिया था। कम उम्र में ही पिता का  कारोबार संभालना पड़ा। जब वे महज 13 साल के थे ,तब उनकी बेसहारा मां को रिश्तेदारों ने धोखा दिया, साझेदारों से पैसे खा कर अपनों ने ही उन्हें गिराने की कोशिश की। लेकिन कहते हैं न जब अपने धोखा देते है तब दूसरे साथ देते है। श्री श्याम मलोत्रा को उनके पिता के कुछ वफादार नौकरों ने सहारा दिया जिस वक्त उनकी मां की हालत खराब थी। उन्होंने श्री श्याम को सब कुछ सिखाया ।धीरे-धीरे उन्होंने अपना व्यापार फिर से खड़ा किया। उन्होंने ट्रांसपोर्ट, गोदाम और सप्लाई का काम शुरू किया।दिन-रात मेहनत की।और खुद ट्रकों के साथ सफर किया। मज़दूरों के साथ बैठकर खाना खाया। ओर इसी तरह उन्होंने कर्मचारियों का भरोसा जीत लिया। इसीलिए उनके कर्मचारी उनसे डरते कम…सम्मान ज़्यादा करते थे। जब श्री श्याम बड़े हुए तब उनकी शादी भी एक गरीब लडकी से हुई ।और इसी तरह उन्होंने इंसानों को पढ़ना सिखा। श्री श्याम की पत्नी बहुत पहले गुजर चुकी थीं।उनकी दुनिया अब सिर्फ एक इंसान के आसपास घूमती थी—वो थी उनकी बेटी, कल्याणी। कल्याणी उनके लिए सिर्फ बेटी नहीं थी…उनके जीने की वजह थी। उन्होंने उसे कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी। लेकिन साथ ही उसे घमंडी भी नहीं बनने दिया। वो हमेशा कहते—“इंसान की कीमत उसके कपड़ों या पैसे से नहीं…उसके दिल से होती है।”शायद इसी वजह से जब बाकी लोग रणजीत को उसके अतीत से तौल रहे थे…तब , श्री श्याम उसे उसके व्यवहार से देख रहे थे।उन्होंने पहली बार रणजीत की आँखों में वही चीज़ देखी थी। जो कभी अपनी आँखों में देखी थी—भूख और लाचारी ... वो भूख पैसे की नहीं थी। खुद को साबित करने की थी।  उन्होंने रणजीत को अपने करीब रखना शुरू किया दिया था। वे पहले छोटे काम देखकर उसे परखने लगे। फिर हिसाब-किताब उसके हाथों में देकर उसे संवारने लगे और फिर बड़े सौदे सौंपकर उसे निखारने लगे। रणजीत हर  काम में बेहतर होता गया । उन्होंने उसे अपने घर में रखना शुरू कर दिया था। ये देखकर बाकी लोग विरोध करते थे। सेठ जी, ये लड़का ठीक नहीं…”“इसका अतीत साफ नहीं है…”लेकिन श्री श्याम के कुछ अलग ही विचार थे।बे कहते“जिस इंसान को पूरी दुनिया ठुकरा दे…अगर उसे एक मौका भी न मिले,तो फिर वो बदलेगा कैसे?”समय बीतता गया।और रणजीत… सिर्फ अब कर्मचारी नहीं रहा।वो घर का हिस्सा बनाया। कल्याणी और रणजीत एक ही घर में एक ही छत के नीचे रहते। मुलाकातें बढ़ने लगीं।और धीरे-धीरे— वही हुआ जिसका श्री श्याम को इंतजार था। कल्याणी ने उस खामोश आदमी के अंदर छिपे दर्द को महसूस करना शुरू किया। और रणजीत…जिसने बचपन से सिर्फ नफरत देखी थी…पहली बार  उसे परिवार मिला। किसी के सामने खुद को शांत महसूस करने लगा। उसे भी कल्याणी पसंद थी पर वो कभी भी उसको ये बता नहीं सकता था। वो अपने मालिक को धोखा नहीं दे सकता था। उस इंसान को जिसने उसका तब साथ दिया जब दुनिया ने उसे ठुकरा दिया था। उन्होंने उसे एक घर दिया सम्मान दिया और अपने परिवार का हिस्सा बनाया।जब भी कल्याणी उसकी तरफ एक कदम बढ़ाती वो चार कदम पीछे हट जाता। श्री श्याम सब देख रहे थे। ओर ये देखकर उन्हें सुकून मिला। क्योंकि वो जानते थे—दौलत संभालने के लिए होशियार लोग मिल जाते हैं।लेकिन साम्राज्य संभालने के लिए…वफ़ादार इंसान चाहिए होता है। और वो वफ़ादारी उन्होंने रणजीत में देख ली थी। एक रात… श्री श्याम मलोत्रा ने रणजीत को अपने कमरे में बुलाया। कुछ देर तक चुपचाप उसे देखते रहे। फिर बोले—“खून से रिश्ते बनते होंगे…”“लेकिन भरोसे से परिवार बनता है।”रणजीत चुप रहा। श्री श्याम धीरे से मुस्कुराए।“अगर मैं तुझे अपना नाम दूँ…”“तो क्या तू उसे संभाल पाएगा?” उस पल…रणजीत की आँखों में पहली बार वो चमक आई…जो किसी अनाथ को घर मिलने पर आती है।और उसी रात—श्री श्याम मलोत्रा ने फैसला कर लिया।रणजीत अब सिर्फ उनका वफादार आदमी नहीं रहेगा।वो उनका बेटा बनेगा। कल्याणी का पति।और एक दिन उसके साम्राज्य का बारिश बनेगा। जब कल्याणी और उसकी शादी हुई तब कई लोगों ने विरोध किया पर "श्री श्याम मलोत्रा  कहा मानने वाला था। और जब उन्होंने रणजीत  को अपना मलोत्रा उपनाम  दिया। और उसे अपने साम्राज्य का बारिश घोषित किया तब उनके दोस्तों और दुश्मनों के असली चेहरे  सामने आने लगे।