मल्होत्रा कोई साधारण परिवार नहीं थे। वे तीन पीढ़ियों से चले आ रहे ,काले कामों के बादशाह थे।उनकी जड़ें इतनी गहरी थींकि सच और झूठ की रेखा कब मिट गई हैं किसी को पता ही नहीं चला।शुरुआत छोटे लड़के की जिद ओर जुनून से हुई थी।दादा के समय में ,उन्होंने शहर के अंडरवर्ल्ड में कदम रखा था ।पिता के समय तक—उन्होंने उस अंडरवर्ल्ड पर राज करना शुरू कर दिया। और अब… ये साम्राज्य विक्रम मल्होत्रा के हाथों में है। और उसके हाथों से ये उसके बेटे के हाथों में आयेगा और सत्तरह ये साम्राज्य कभी खत्म नहीं होगा। ये साम्राज्य एक ऐसी ताक़त बन चुका है।जिसे कोई छू भी नहीं सकता था।उनका नाम खुलेआम नहीं लिया जाता है।फुसफुसाकर लिया जाता था। क्योंकि लोग जानते है —जो उनके खिलाफ जाता है…वो ज़िंदा नहीं बचता। ऊपर से वे बिज़नेसमैन है—सम्मानित, प्रभावशाली, सफल । लेकिन अंदर—ज़िंदगी और मौत केसौदागर है। उनका हर रिश्ता फायदे पर टिका होता हैहर फैसला ताक़त के लिए होता था। और हर इंसान…या तो उनका होता था—या खत्म।होता है।विक्रम के दादा, श्री रणजीत मल्होत्रा, एक बेहद गरीब परिवार में पैदा हुए थे। गरीबी…इतनी थी जिसमें सपने भी पेट भरकर खाने के नहीं आते थे। उनके घर में पैसे बहुत कम थे पर मुश्किलें बेहिसाब थी। विक्रम के दादा, श्री रणजीत मल्होत्रा, एक बेहद गरीब परिवार में पैदा हुए थे। उनके घर में कुछ भी नहीं था— न पैसे, न कोई सहारा…बस जिंदगी संघर्ष चलती थी। उनकी माँ…लोगों के घरों में काम करती थीं। वो देखने में बहुत ही सुंदर ओर भली औरत थी। वो सुबह होने से पहले उठ जातीं, थी ,और देर रात तक दूसरों के बर्तन, कपड़े और घर साफ करतीं।अपने हाथों की लकीरों सेवो दूसरों की ज़िंदगी चमकाती थीं…पर अपनी—लकीरें हमेशा धुंधली ही रही। उसका। छोटा-सा रणजीत अक्सर दरवाज़े के कोने पर बैठा उन्हें देखता रहता। कभी थकी हुई, कभी चुप…कभी आँखों में छुपे आँसुओं के साथ।उसे सबसे ज़्यादा दर्द तब होता थाजब लोग उसकी माँ से ऊँची आवाज़ में बात करते।“अरे जल्दी कर!”“ठीक से काम कर!” जैसे वो इंसान नहीं… बस एक कठपुतली हो जो लोगों के इशारे पर नाचती रहे।रणजीत की मुट्ठियाँ उस वक्त खुद-ब-खुद भींच जाती थीं।पर फिर उसे उसकी मां की सीख याद आती, उसकी माँ हमेशा उससे कहती थीं—“ईमानदारी से जीना, बेटा… कभी गलत रास्ता मत चुनना।” रणजीत हर बार सिर हिला देता था…पर उसके छोटे से दिल में अकसर ये खयाल रहता था , कि उसकी माँ इतना काम क्यों करती है । लोग काम करने के बाद भी उनको गालियां क्यों देते है? उनके पिता औरों की तरह काम पर क्यों नहीं जाते?रणजीत की माँ दिन-रात दूसरों के घरों में काम करती थीं…लेकिन घर लौटने पर उन्हें सुकून नहीं मिलता था।क्योंकि घर में…उनके पति रणजीत के पिता—पूरा दिन जुए में डूबे रहते थे। न काम, न जिम्मेदारी। बस एक ही आदत—जुआ। माँ जो भी थोड़ा-बहुत कमा कर लाती… वो सब…रात होते-होते जुए की मेज़ पर हार दिया जाता। कभी पैसे, कभी घर का सामान…दाव पर लगा दीया जाता ।छोटा रणजीत। कोने में खड़ा सब देखता रहता।उसकी माँ के हाथ काँपते थे जब वो पैसे देती थीं। जिनको उसने अपने बच्चे को पेट भर खाना खिलाने के लिए कमांती उसकी आँखों में आँसू होते थे—पर उसके होठों पर आवाज़ नहीं होती । और उसके पिता…दिन भर शराब के नशे में चूर रहते ओर जुआ खेलने के लिए अपनी पत्नी की मेहनत की कमाई को दाब पर लगाता। जब उसकी माँ ने पैसे देने से मना करती तो घर में शोर गूंज उठा। उसके पिता चिल्ला कर पूरे मोहल्ले को इक्ट्ठा कर लेते , और सब के सामने अपनी पत्नी को मारता पीटता। रणजीत वहीं खड़ा होकर सब देखता उसकी आँखों के सामने—उसकी माँ पर अत्याचार होता वो छोटा सा बच्चा रोते हुए डर के मारे एक कोने में सिमट जाता। उस पल…कुछ टूट जाता पर वो क्या कर सकता था।एक दिन…जब उसकी माँ काम से घर लौटी—घर का दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर से शोर आ रहा था—हँसी, ठहाके ओर शराब सिगरेट के धुएं की गंध । जैसे ही उन्होंने अंदर कदम रखा…उनका दिल बैठ गया।कमरे के बीच में—उनका पति बैठा था।कुछ अजनबी लोगों के साथ।सामने बिछी थी जुए की चौपाल। आज बात कुछ अलग थी। उसका पति आज वह सिर्फ जुआ नहीं खेल रहा था… वह पूरी तरह शराब के नशे में डूबा हुआ था। आँखें लाल, हाथ लड़खड़ाते हुए, और आवाज़ भारी।माँ कुछ पल के लिए वहीं खड़ी रह गईं। उनकी आँखों में थकान झलक रहीं थीं। उसने हिम्मत कर कर पूछा “ये क्या हो रहा है?”सब की निगाहें उसकी ओर उठ गई। उसका पति हँस पड़ा—“अरे आ गई तू?” देख“आज किस्मत बदलने वाली है मेरी…”माँ ने गुस्से में कहा—बस करो ये सब!घर है ये… जुए का अड्डा नहीं!”उनकी बात सुनकर बाकी लोग भी हँसने लगे।एक आदमी बोला—“भाभी, आज तो बड़ा दांव चल रहा है…”माँ का दिल घबरा गया। उन्होंने तुरंत इधर-उधर देखा—घर का सामान… गायब था। “तुमने… क्या दांव पर लगाया है?”उनकी आवाज़ काँप गई। उसका पति मुस्कुराया। वो खतरनाक मुस्कान—“सब कुछ…”“जो था… सब हार गया…एक पल का सन्नाटा। “अब आखिरी दांव बचा है…”माँ की साँस अटक गई। तुमने आखरी दाब पर क्या लगाया…?”उसने धीरे-धीरे उनकी तरफ देखा। “तुझे।”कमरा एकदम शांत हो गया। रणजीत दरवाज़े के पीछे खड़ा सब सुन रहा था। उसकी दुनिया उसी पल…टूट गई। माँ के चेहरे से रंग उतर गया। “तुम… पागल हो गए हो क्या?” वो आदमी हँस पड़ा—“खेल तो अब शुरू हुआ है। एक मासूम सा बच्चा अपनी मां के पीछे छुपा हुआ सब देख रहा था।वो…सिर्फ 8 साल का बच्चा था। छोटा-सा, कमज़ोर, अपनी मां की छाया में छुपा हुआ जिस उम्र में… जहाँ बच्चों को डर सिर्फ अंधेरे से लगता है। लेकिन उस बच्चे का डर उसका पिता था । उस रात—उसके सामने। अंधेरा ही खड़ा था। वो कमरे के एक कोने में सिमटा हुआ बैठा था।घुटनों को सीने से लगाए…हाथ काँप रहे थे। उसकी आँखें सब देख रही थीं—पर वो समझ नहीं पा रहा था। उसके पिता…जुए की मेज़ पर बैठे थे।और सामने—उसकी माँ डरी सहमी खड़ी थी। । लोग हँस रहे थे। आज उसकी माँ की ज़िंदगी दांव पर लगी थी। वो बच्चा कुछ नहीं कर पड़ा था ।बस चुपचाप एक कोने से देखता रहा।उस आदमी ने पत्ते टेबल पर फेंके। और हँस पड़ा।“तू हार गया…”एक ही पल में सब खत्महो गया ।उसके पिता कुछ सेकंड तक खाली आँखों से टेबल को देखते रहे। फिर -धीरे हंसे , वो हँसी… नहीं होती।“ठीक है…” उन्होंने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा—“खेल तो खेल है…”वो आदमी लड़खड़ाती हुए खड़ा हुआ , और धीरे - धीरे चलकर अपनी पत्नी के सामने खड़ा हो गया । कुछ देर अपनी पत्नी को देखता रहा उसकी आंखे में थोड़ी भी झिझक नहीं थी। उसने अपनी पत्नी का हाथ कसकर पकड़ लिया। ....माँ घबरा गईं—“ये क्या कर रहे हो…तुम ?”लेकिन उसने आदमी ने कुछ भी नहीं सुना।वो उन्हें खींचते हुए उन आदमियों की तरफ ले गया। उसने नशे में लड़खड़ाते हुए कहा—जा“अब… मेरा कर्ज चुका। और उसने…अपनी पत्नी को उन आदमियों की तरफ धकेल दिया। एक पल में सब कुछ बदल गया। वो लड़खड़ाती हुई आगे गिरीं। उनकी आँखों में डर साफ दिखाई दे रखा था ।पर वो बेबस हाथ जोड़कर खड़ी थी। उन दरिंदों से अपनी इज्जत बचाने की नाकाम कोशिश कर रही थी । पर वो तो उसकी मजबूरी पर हंस रहे थे। उस छोटे-से कमरे में . .. जो कुछ हो रहा था उसे शब्दों में बया नहीं किया जा सकता था। एक के बाद एक उस पर टूट रहे थे।एक 8 साल का बच्चा…कोने में सिमटा हुआ बैठा था।उसकी आँखें खुली थीं—पर वो देख नहीं पा रहा था।उसकी माँ की आवाज़…टूट रही थी। वो कमजोरी सेबिखरी हुई…सिसक रही थी । उसके पर रोने चिल्लाने की भी तथा नहीं थी । जैसे हर पल वो उनसे दूर होती जा रही हो। कमरे में खड़े लोग…हँस रहे थे। उनके लिए वो सब बस एक “खेल” था। लेकिन उस बच्चे के लिए सोचो—वो उसकी पूरी दुनिया थी…जो उसके सामने टूट रही थी। उसने अपने कान बंद कर लिए। आँखें भी कसकर बंद कर लीं। लेकिन…आवाज़ें फिर भी नहीं रुकी। ये दरिंदगी रात भर चली । धीरे-धीरे…अंधेरा हल्का होने लगा। खिड़की से आती हल्की रोशनीकमरे में फैलने लगी। पर उस कमरे में…तब तक वो “खेल”चलता रहा जब तक बे थक नहीं गए । और जब वे रुखे तो , वहाँ कुछ भी पहले जैसा नहीं बचा था।फर्श पर बिखरी कपड़े ..और एक भारी, दम घोंट देने वाला सन्नाटा। उसकी माँ…जमीन पर पड़ी थीं।बिल्कुल शांत। इतनी शांत…कि वो शांति डराने लगी।वो बच्चा…अब भी उसी कोने में बैठा था।… खाली आँखें। सब कुछ देख रहा था ।उसने धीरे-धीरे सिर उठाया। अपनी माँ की तरफ देखा। वो समझ नहीं पा रहा था—क्या खत्म हो गया । कमरे में खड़े लोग जा चुके थे।जैसे कुछ हुआ ही न हो। उसका पिता भी…एक कोने में बैठा था। नशा उतर चुका था—पर अकल पर तो नशे का तला लगा हुआ था । डरते हुए…धीरे-धीरे वो बच्चा खड़ा हुआ माँ। के पास गया ”1 माँ...उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। कोई जवाब नहीं।उसने उनका हाथ छुआ। बहुत ठंडा। उसने फिर पुकारा... माँ। हल्की-सी हरकत हुई। वो…धीरे-धीरे उठीं। उसकी हर हड्डी में दर्द था। ऐसा लग रहा था,जैसे शरीर ही अपना साथ छोड़ रहा हो। उन्होंने ज़मीन का सहारा लिया। काँपते हुए खुद को संभाला।उनकी आँखें खाली थीं— उनमें कहीं बहुत गहराई में अब भी कुछ बाकी था । उन्होंने अपने बिखरे हुए कपड़े समेटे। धीरे-धीरे…एक-एक करके।जैसे सिर्फ कपड़े नहीं—अपनी बची हुई इज़्ज़त भी समेट रही हों। कमरे में चारों तरफ नज़र डाली।सब कुछ बिखरा हुआ था। उनकी नज़र अपने बेटे पर गई। वो अभी भी वहीं खड़ा था।चुप……डरा हुआ।उनकी आँखों में आँसू आए। लेकिन उन्होंने उन्हें गिरने नहीं दिया। वो उसके पास आईं। धीरे से उसके सिर पर हाथ रखा। डर मत…”उनकी आवाज़ बहुत कमजोर थी“मैं हूँ…”उस बच्चे ने उनकी तरफ देखा। उसकी आँखों में सवाल थे—माँ ने गहरी साँस ली। उसका हाथ थामा…चल… यहाँ से चलते हैं।”माँ उसे लेकर अंदर के छोटे से कमरे की तरफ बढ़ीं—जहाँ घर का पुराना शौचालय था।“तू यहीं रुक…”उन्होंने धीमे से कहा।“मैं अभी आती हूँ।”रणजीत ने उनका हाथ कसकर पकड़ लिया—माँ… जल्दी आना…”उन्होंने हल्की-सी मुस्कान दी। बहुत हल्की…हाँ… बेटा।” फिर दरवाज़ा बंद हो गया। बच्चा बाहर खड़ा रहा। कुछ और पल…समय धीरे-धीरे खिंचता गया।“माँ…?”उसने धीरे से आवाज़ लगाई । कोई जवाब नहीं। उसका दिल तेज़ धड़कने लगा।“माँ… दरवाज़ा खोलो…”अब उसकी आवाज़ काँप रही थी। उसने दरवाज़ा खटखटाया।ज़ोर से और ज़ोर से।“माँ…!!”पर अंदर से…सिर्फ सन्नाटा था। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसने पूरी ताक़त से दरवाज़ा धक्का दिया। पुराना दरवाजा टूटा हुआ था धड़ाम। दरवाज़ा खुल गया। और अंदर…जो था—उसने उसकी पूरी दुनिया खत्म कर दी।वो वहीं जड़ हो गया। उसकी आँखें फैल गईं। साँस… रुक गई।उसने…अपनी माँ का निर्जीव शरीर देखा।जो फार्स पर पड़ा हुआ था । कुछ पल के लिए—समय रुक गया।उसकी आँखें फैल गईं…साँस अटक गई…लेकिन अगले ही पल—कुछ अजीब हुआ।उसकी आँखों से डर गायब हो गई । उसने धीरे से सिर घुमाया। पास में…एक पुराना हंसिया पड़ा था।उसने उसे उठाया। उसके छोटे हाथों में वो भारी था…उसके हाथ कांप रहे थे। वो चुपचाप कमरे से बाहर निकला। उसका पिता वहीं बैठा था। आधा होश…आधा नशा…जैसे कुछ हुआ ही न हो।वो छोटा सा बच्चा जिसकी दुनिया पूरी उसकी माँ थी जो इस आदमी की बजाय से चली गई ,और ये यह बैठा है मासूम की तरह। वो उसके सामने जाकर खड़ा हो गया। कुछ सेकंड…दोनों के बीच सन्नाटा छाया रहा।उसके पिता ने ऊपर देखा—“क्या देख रहा है…?”कोई जवाब नहीं। दो ठंडी आँखें जो उस आदमी को घूर रही थी । पहली बार उस आदमी को डर लगा ।वो बच्चा जो उसे हमेशा डरता था , आज पहली बार वो डर नहीं रहा था। रणजीत ने हंसिए को थोड़ा कसकर पकड़ा। उसके हाथ काँप रहे थे। उसके पिता फिर हँसे—“जा सो जा… यहाँ खड़े मत रह…”और उसी पल—रणजीत आगे बढ़ा। एक वार में सब कुछ… खत्म हो गया। कमरे में फिर सन्नाटा छा गया। हंसिया उसके हाथ से छूटकर गिर गया। वो वहीं खड़ा रहा। न खुशी…न पछतावा…बस…खालीपन। फिर उसने धीरे से कहा—“अब कोई…मेरी माँ को नहीं मारेगा।” उस रात के बाद…सब कुछ बहुत जल्दी बदल गया। लोग आए। शोर हुआ। और फिर—उसे ले जाया गया। एक 8 साल का बच्चा…जिसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे। उसे भेज दिया गया—बाल सुधार गृह। नाम था “सुधार” का…पर वहाँ कोई सुधरता नहीं था। वहाँ सिर्फ दो चीज़ें सिखाई जाती थीं—सहन करना…और बदल जाना।शुरुआत पहले दिन—वो चुप रहा। कोई बात नहीं की।कोई सवाल नहीं पूछा। बाकी बच्चे शोर करते थे, लड़ते थे…पर वो नहीं। वो सिर्फ देखता था। हर चेहरा। हर हरकत।हर कमजोरी। दिन बीतते गए…और रणजीत बदलने लगा। उसने सीखा—कौन डरता है कौन डराता है। और कौन सिर्फ दिखावा करता है वो लड़ता नहीं था…पर जब लड़ता—तो सामने वाला उठ नहीं पाता।धीरे-धीरे—बाकी बच्चे उससे दूर रहने लगे। फिर…उसकी बात मानने लगे। नियंत्रण कुछ ही महीनों में—वो उस जगह का हिस्सा नहीं रहा…वो उस जगह को कंट्रोल करने लगा। वार्डन भी समझ गए थे—ये बच्चा…साधारण नहीं है। वो नियम नहीं तोड़ता था—वो नियम बदल देता था। अंदर का बदलाव उसने रोना छोड़ दिया। महसूस करना छोड़ दिया। अब उसके अंदर सिर्फ एक चीज़ थी—ताक़त। और एक लक्ष्य—“कभी फिर से कमजोर नहीं बनूँगा।”अंत साल बीत गए…वो बच्चा जो वहाँ आया था—डरा हुआ…वो अब नहीं था।अब वहाँ से निकला—एक ऐसा इंसान…जो लोगों पर राज करने के लिए ही पैदा हुआ था ।