प्रेम की अमर महक Makvana Bhavek द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्रेम की अमर महक

सेमल के फूल और कस्तूरी की महक

सांझ उतर रही थी।

डूबते सूरज की लालिमा पूरे जंगल पर बिखर गई थी। जंगल के बीचों-बीच खड़ा विशाल सेमल का वृक्ष अपने लाल फूलों के कारण ऐसा लगता था मानो उसकी शाखाओं पर अग्नि जल रही हो।

पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे। हवा में पत्तों की सरसराहट थी। दूर नदी का जल सुनहरी आभा से चमक रहा था।

लेकिन उस विशाल सेमल के नीचे एक कस्तूरी मृगी निश्चल खड़ी थी।

उसकी आँखें डूबते सूरज को देख रही थीं, पर मन कहीं और था।

उसके हृदय में एक अनजाना भय घर कर चुका था।

तभी झाड़ियों के पीछे से उसका प्रिय कस्तूरी मृग धीरे-धीरे चलता हुआ आया।

उसके आते ही हवा में कस्तूरी की हल्की-सी महक फैल गई।

मृग ने मुस्कुराकर पूछा

"आज मेरी प्रिये इतनी उदास क्यों है?"

मृगी ने उसकी ओर देखा।

और अगले ही क्षण उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

"आज सुबह तोते ने समाचार दिया है," वह बोली, "राजमहल में राजकुमार का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। दूर-दूर से राजा आएंगे। बड़ा भोज होगा।"

वह कुछ क्षण रुक गई।

फिर काँपती आवाज़ में बोली

"और उस भोज के लिए जंगल के सबसे सुंदर कस्तूरी मृग का वध किया जाएगा।"

मृग कुछ क्षण मौन रहा।

फिर शांत स्वर में बोला

"तो यही बात तुम्हें भीतर से खाए जा रही है?"

"क्या यह छोटी बात है?" मृगी चीख उठी।

"मेरे लिए तुम ही मेरा संसार हो।"

मृग ने उसकी आँखों में झाँका।

"प्रिये, मृत्यु तो एक दिन सभी को आनी है।"

"लेकिन मैं तुम्हें मरने नहीं दूँगी।"

"और यदि भाग्य ने यही लिखा हो?"

"तो मैं भाग्य से भी लड़ूँगी।"

उस रात दोनों सेमल के वृक्ष के नीचे बैठे रहे।

मृगी बार-बार विनती करती रही

"हम यह जंगल छोड़ देंगे। किसी दूर वन में चले जाएँगे।"

लेकिन मृग नहीं माना।

"अपने घर, अपने जंगल और अपने कर्तव्य से भागना मुझे स्वीकार नहीं।"

रात बीत गई।

भोर हुई।

और तभी जंगल की शांति तलवारों की चमक से टूट गई।

राजा के शिकारी आ चुके थे।

मृगी काँप उठी।

मृग ने अंतिम बार उसके माथे को अपने मुख से स्पर्श किया।

"प्रेम मृत्यु से बड़ा होता है," उसने कहा।

और फिर वह शिकारियों के साथ चला गया।

कुछ देर बाद जंगल में एक अजीब सन्नाटा फैल गया।

पक्षियों ने गाना बंद कर दिया।

हवा थम गई।

और तभी एक झोंका आया।

उसमें कस्तूरी की तीव्र सुगंध घुली हुई थी।

मृगी समझ गई।

उसका प्रिय अब लौटकर नहीं आएगा।

वह वहीं धरती पर गिर पड़ी।

संध्या को जब उसे होश आया, तो संसार बदल चुका था।

अब उसके जीवन में कोई रंग नहीं बचा था।

लेकिन उसके मन में एक अंतिम आशा थी।

वह राजमहल पहुँची।

उत्सव समाप्त हो चुका था।

महारानी अपने पुत्र को गोद में लेकर बैठी थीं।

मृगी उनके सामने झुकी।

"महारानी," उसने कहा, "मेरे प्राणनाथ का वध आपके उत्सव के लिए हुआ है। मैं शिकायत नहीं करती। पर अब मेरा संसार उजड़ गया है।"

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

"एक विनती है। उनके शरीर की कोई निशानी मुझे दे दीजिए। उनकी खाल ही दे दीजिए। मैं उसे सेमल के वृक्ष पर टाँग दूँगी और समझूँगी कि वे अभी भी मेरे साथ हैं।"

महारानी कुछ देर चुप रहीं।

फिर बोलीं

"नहीं।"

"उस खाल से राजकुमार के लिए खंजड़ी बनाई जाएगी।"

यह सुनते ही मृगी का हृदय टूट गया।

वह बिना कुछ कहे लौट पड़ी।

कुछ दिनों बाद राजमहल में खंजड़ी बनकर तैयार हो गई।

राजकुमार उसे बड़े आनंद से बजाता।

जब भी खंजड़ी की खनक जंगल तक पहुँचती, मृगी का हृदय काँप उठता।

उसे लगता

उसके प्रिय की पीड़ा हवा में गूँज रही है।

वह घंटों रोती रहती।

लेकिन एक बात अजीब थी।

समय बीतता गया।

बरसात आई।

सर्दी आई।

फिर वसंत आया।

पर सेमल के वृक्ष के आसपास कस्तूरी की महक कभी समाप्त नहीं हुई।

हर शाम हवा का एक झोंका आता।

और वही परिचित सुगंध उसके आसपास बिखर जाती।

मृगी आँखें बंद कर लेती।

उसे लगता उसका प्रिय उसके पास खड़ा है।

उसकी साँसें सुनाई देती हैं।

उसका स्पर्श महसूस होता है।

वर्ष गुजरते गए।

मृगी बूढ़ी हो गई।

उसकी चाल धीमी पड़ गई।

लेकिन वह प्रतिदिन उसी सेमल के वृक्ष के नीचे आती।

और प्रतीक्षा करती।

एक दिन उसने आकाश की ओर देखा।

सूरज डूब रहा था।

सेमल के फूल पहले की तरह लाल थे।

हवा में फिर वही कस्तूरी की महक थी।

उसके चेहरे पर वर्षों बाद मुस्कान आई।

"तुम कभी गए ही नहीं..." उसने धीरे से कहा।

"तुम तो हर साँस में बसे रहे।"

उसने आँखें बंद कर लीं।

और उसी क्षण एक हल्की हवा चली।

सेमल के कुछ लाल फूल उसके ऊपर आ गिरे।

जंगल के पक्षी मौन हो गए।

हवा में कस्तूरी की महक और गहरी हो गई।

उस दिन लोगों ने कहा

सेमल के वृक्ष के नीचे दो प्रेमी फिर मिल गए।

एक शरीर से।

और दूसरा स्मृति से।

लेकिन जंगल के बूढ़े पक्षी आज भी कहते हैं

जब सांझ के समय सेमल के फूलों के बीच कस्तूरी की हल्की महक महसूस हो, तो समझ लेना कि वह किसी मृग की सुगंध नहीं है।

वह उस प्रेम की खुशबू है जिसे मृत्यु भी कभी मिटा नहीं सकी।