ख़ामोशी के उस पार SHREYA INDUSHREE द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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ख़ामोशी के उस पार

खामोशी के उस पार......

देहरादून की सर्द हवाएँ हर शाम को थोड़ा और सुस्त बना देती थीं।शहर का आसमान यहाँ के लोगों की तरह था ..... सादा, पर अपने भीतर बहुत कुछ छुपाए हुए।
कॉलेज की लाइब्रेरी के बाहर खड़ी आयरा कपूर अपने स्कार्फ को कसकर गले में लपेटने लगी।तीस की उम्र के बाद ज़िंदगी में ठंड कुछ ज़्यादा महसूस होने लगती है अक्सर.....शरीर में नहीं, भीतर। और ऐसा था भी,असल में जिंदगी रुखी और बेरंग सी थी।

वो कॉलेज की हिंदी प्रोफेसर थी।हर दिन किताबों, कविताओं और छात्रों के सवालों के बीच बीत जाता था।बाहर से सलीकेदार, भीतर से थकी हुई।
दो साल पहले हुआ तलाक अब ‘घटना’ नहीं रहा, बस एक पृष्ठभूमि थी , जैसे कोई पुरानी दीवार, जो रोज़ दिखाई देती है, पर अब दर्द नहीं देती। क्योंकि ज़ख्म भर गये थे, लेकिन निशान थे।

उस शाम स्टाफरूम में किसी ने बताया ।“कल एक बिज़नेस सेमिनार है, शहर के नामी उद्योगपति राघव मल्होत्रा मुख्य अतिथि हैं।”

आयरा ने सिर उठाया।नाम जैसे किसी बहुत पुराने गीत की धुन हो , अचानक भीतर कुछ हिला।वो नाम जो कभी उसके कॉलेज के दिनों का हिस्सा था, उसकी हँसी, उसकी चुप्पियों का साक्षी।

वो मुस्कुराई , बस हल्की-सी, जैसे खुद को समझा रही हो,
“सालों बाद भी कुछ नाम दिल को क्यों छू लेते हैं?”

अगले दिन सभागार में भीड़ थी।
राघव मंच पर था , सफेद शर्ट, ग्रे सूट, और वही गहराई भरी आँखें।वो बोल रहा था, पर आयरा सुन नहीं रही थी।उसकी नज़रें बस एक ही सवाल दोहरा रही थीं ।
क्या ये वही है जो कभी मेरी चिट्ठियों का जवाब सिर्फ मुस्कान से देता था?

कार्यक्रम के बाद जब भीड़ छँटी, राघव उसके सामने खड़ा था।
“आयरा?”वो एक शब्द, जिसमें सालों की दूरी, अचरज और गर्माहट सब थे।

आयरा ने धीमे से कहा, “तुम देहरादून कब से रहने लगे?”
“छह महीने हुए। अब कंपनी का हेड ऑफिस यही है,”
राघव ने कहा, फिर कुछ रुककर  बोला, “और तुम... अब भी वही हो। बस थोड़ा और सलीकेदार।”

आयरा हँस दी, लेकिन उस हँसी में झिझक थी।कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो खत्म नहीं होते , बस वक़्त की धूल में ढक जाते हैं।

राघव और आयरा की मुलाक़ातें फिर बढ़ने लगीं।कभी कॉफी, कभी कॉलेज की किसी बैठक के बहाने।देहरादून की शामों में उनके बीच बहुत कुछ कहा और बहुत कुछ अनकहा रहता।

देहरादून की मालसी रोड पर वही पुराना कैफ़े था , “ब्रू & ब्लूम”।राघव वर्षों बाद वहाँ आया था, बस यूँ ही… एक मीटिंग के बीच में थोड़ा वक्त निकालने।बारिश की हल्की बूँदें शीशों पर नाच रही थीं।वहीं कोने की टेबल पर किताबों में खोई हुई एक लड़की बैठी थी…आयरा।

वो पहले जैसी नहीं थी। बाल थोड़े छोटे, नज़रों में गहराई कुछ ज़्यादा।राघव की नज़र जैसे रुक गई।
वो उठी, किताब बंद की, और जैसे ही नज़रें मिलीं , एक पल में बरसों का फ़ासला घुल गया।

आयरा ने धीरे से मुस्कराते हुए कहा “अब भी कॉफी बिना शक्कर?”

“और तुम अब भी अपने शब्दों में मिठास रखती हो।”

दोनों हँस पड़े। वो मुलाकात बिना कहे बहुत कुछ कह गई।

शहर की हवा में ठंडक थी। आयरा को घर लौटते वक्त राघव दिख गया । कार का शीशा नीचे करते हुए वही पुरानी मुस्कान।

“लिफ़्ट दोगी? या अब भी अजनबी समझोगी?”
आयरा ने थोड़ा मुस्कराते हुए कहा ।“लिफ़्ट नहीं दूँगी, पर साथ चल सकती हूँ।”

कार में चुप्पी रही, बस हिमालय की हवा और पुराने दिनों की खुशबू।
राघव ने पूछा नहीं कि वो कैसी है, और आयरा ने बताया नहीं कि वो टूटी है ।पर दोनों जान गए कि वक्त गुज़रा है, एहसास नहीं।

टपकेश्वर के रास्ते में छोटी-सी झील के किनारे आयरा अकेली बैठी थी।राघव ने बिना कुछ कहे उसके पास बैठ गया।कुछ देर खामोशी रही।

“तुम अब भी सब कुछ सँभाल कर रखते हो?”

“तुम्हारे लिखे खत अब भी मेरे डेस्क की सबसे नीचे वाली दराज़ में हैं।”

“और जो कहा नहीं गया था…?”

“वो अब भी वहीं है, दिल में।”

बरसात फिर शुरू हो गई थी। दोनों उठे नहीं। उस शाम, शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ी।

राघव ने एक दिन पूछा,“तुमने फिर शादी नहीं की?”

आयरा ने मुस्कुराकर कहा,“हर कोई नहीं करता... कुछ लोग बस सीखते हैं कि अकेलापन भी एक रिश्ता होता है।”

राघव चुप रहा।वो समझता था , हर जवाब के पीछे एक कहानी होती है।आयरा के चेहरे पर जो शांति थी, वो किसी गहरी चोट के बाद आती है। खुद को दांव पर लगा कर खुद को पाना पड़ता है।

वो देखता था कि कैसे आयरा सबके सामने आत्मविश्वासी लगती है,लेकिन जब शाम को अकेली चलती है, तो उसकी चाल में कोई पुरानी थकान झलकती है।

एक रात राघव ने उसे अपने घर बुलाया।कहने को बिज़नेस पार्टी थी, पर उसके भीतर कुछ और था , शायद एक स्वीकार।

वो घर में दाख़िल हुई , लकड़ी की ख़ुशबू, धीमी रोशनी, और दीवारों पर आयरा की यादों से मिलते रंग।राघव ने धीरे से कहा,
“जानती हो, मैंने यह घर तब लिया जब मुझे लगा कि कुछ चीज़ें लौट आती हैं... अगर हम उन्हें जाने दें।”

आयरा ने आँखें नीची कर लीं।“कभी-कभी चीज़ें लौटती हैं, पर हम नहीं रह जाते उन्हें अपनाने के लिए,”वो बोली ,शांत, जैसे कोई कविता अधूरी छूट गई हो।

राघव ने आगे बढ़कर कहा,“अगर मैं कहूँ कि मैं अब भी तुम्हें वैसे ही चाहता हूँ जैसे तब...”

आयरा ने उसकी बात बीच में ही रोक दी,“राघव, चाहत बुरी नहीं होती। पर डर... वो अब भी वहीं है।”

उनकी आँखों में सन्नाटा था , एक ऐसा सन्नाटा जो चीखता नहीं, बस जीता है।

कुछ दिन तक दोनों नहीं मिले।राघव ने फ़ोन नहीं किया, आयरा ने जवाब नहीं दिया।लेकिन दोनों के भीतर कुछ बदल चुका था , जैसे पहाड़ों पर मौसम, जो बिना बताए ठंडा हो जाता है।

एक सुबह आयरा कॉलेज के रास्ते में थी।सामने वही नीली कार रुकी। राघव उतरा।उसके हाथ में एक किताब थी , पुरानी, “ग़ालिब की शायरी”।

उसने कहा,“यह वही है जो तुमने मुझे कॉलेज में दी थी। मैंने रखी थी... शायद इसी दिन के लिए।”

आयरा ने किताब ली, उसके पन्नों से पुरानी खुशबू आई।
वो मुस्कुराई , हल्के से, जैसे सालों बाद कोई बोझ उतर गया हो।
“राघव,” वो बोली,“शायद मेरी ज़िंदगी फिर से शुरू न हो पाए,
पर अगर तुम साथ चलना चाहो... थोड़ी दूर तक चल सकती हूँ।”
राघव ने कुछ नहीं कहा। बस सिर हिलाया।और दोनों साथ चलने लगे ।बिना वादे, बिना परिभाषा।
बस उस सर्द सुबह की धूप में दो साए ,जो चुपचाप एक-दूसरे को स्वीकार कर चुके थे।

“प्यार लौट कर नहीं आया था...बस वहीं खड़ा था, जहाँ उन्होंने उसे छोड़ा था।फर्क बस इतना था , अब वो दोनों फिर उस जगह लौटने का साहस कर चुके थे।”



"समाप्त।"