अंक दो
(थाने के अन्दर का मैदान। एक मेज़ और दो कुर्सियाँ रखी हैं। वापट खुश होकर चहलकदमी करता है। मेज़ पर फाइल रखी है।)
बापट- मिल गया चोर। दूसरे किसी को क्यों नहीं मिला? बापट सभी कैसे हो सकते हैं? नाचो गाओ, मिल गया चोर।
(नेपथ्य से-कौन बापट?)
बापट- जी सर। (अभिवादन करता है। )
(नेपथ्य से-नाच रहा है क्या?)
बापट- नहीं सर, कदम ताल कर रहा हूँ। मन कदमताल करना माँगता सर।
(सावन्त आ जाता है। )
बापट- (चहकते हुए) सर बीवी कहती है कंगन चाहिए।
सावन्त- किस खुशी में बापट ?
बापट- सर, चोर जो पकड़ा है।
सावन्त- वह तो मेरी बेगम भी एक हीरे के हार की फ़रमाइश कर चुकी हैं।
बापट- ज़रूर लाइए सर........चोर पकड़ना कितना मुश्किल होता है सर........इस खु़शी के मौके पर नहीं लाएँगें तो कब लाएँगे सर ?
सावन्त- बापट, तू बिल्कुल चुगद है। हीरे का हार कहाँ से आएगा? ज्यादा से ज्यादा कप्तान साहब बुलाकर कहेगा ‘मोगैम्बो खु़श हुआ’। मुख्यमंत्री वह भी नहीं कहेगा।
बापट- नहीं सर, मुख्यमंत्री डी.जी. साहब से कहेगा डी.जी..........आई.जी साहब से कहेगा......आई.जी........डी.आई. जी. से...........डी आई जी...........कप्तान साहब से.............और कप्तान साहब आप से कहेगा। खु़शी भी सीढ़ी सीढ़ी उतरती है सर। पर मैं मानिकचन्द जी से हार ले आऊँगा और कंगन भी। बहुत दिलवाला है मानिक चंद, सर। देश दुनिया घूमता रहता है सर। यहाँ का उसका काम तो रतनदास ही देखता है सर। रतनदास भी पैसा पानी की तरह फेंकता है सर।
सावन्त- इतना पैसा आता कहाँ से है बापट? सुना है नोट बोरियों में भरकर रखता है वह।
बापट- नोट वह छूता ही नहीं है सर। उसे नोट छूने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। नोट जैसी छोटी चीज़ वह क्यों छुएगा सर? सरकार उसके सामने भीख माँगती है सर।
अपने मुख्यमंत्री जी हैं न सर। हाथ बाँधे खड़े रहते हैं सर। अख़बार में फोटो देखा है सर............(जेब से निकालकर दिखाता है। सावन्त फोटो देखता है) यह देखिए, मुख्यमंत्री जी कैसे याचक की तरह हाथ जोड़े खड़े हैं और सेठ जी अभयदान की मुद्रा में सर।
सावन्त- पर यह सब अच्छा नहीं लग रहा है बापट। मुख्यमंत्री सेठ के सामने दुम हिलाएगा तो हम लोग क्या करेगा?
बापट- हम लोग साश्टांग करेगा सर। करना ही पड़ेगा। ग़रीब लोग मारा जाएगा सर। ग़रीबी हटाने की बात करेगा पर ग़रीबों को हटा देगा।
सावन्त- रात को जो पैसे बटोरा वह क्या किया बापट ?
बापट- रखे हूँ सर (दौड़कर लाता है) सब चिल्लर है सर। एक सौ चौंतीस लोग फुटपाथ पर मिला था। उसमें से आठ के पास एक भी पैसा नहीं था सर। मुर्गा बना देने पर भी एक पैसा नहीं निकला। उन्हें दो डंडा लगाकर भगाना पड़ा सर। एक सौ छब्बीस से कुल दो सौ बावन रुपया मिला सर।
सावन्त- चिल्लर को नोट में बदलवा ले।
बापट- बदलवा लूँगा सर।
सावन्त- हाँ............सवा दो सौ मेरे घर पहुँचा देना, भूल न करना।
बापट- नहीं सर।
सावन्त- और वह चोर जो पकड़ा है उससे सी.ओ. साहब पूछताछ करेंगे।
बापट- सर, सी. ओ. साहब नए-नए हैं। उनकी पहली पोस्टिंग है। अभी उन्हें कुछ पता नहीं है सर। आप उन्हें समझा देना सर। चोर षातिर है। फुटपाथिया है सर।
(सावन्त जाता है। ) सर समझता है, बापट गावदी है। पर बापट सर का बाप है। दो सौ छब्बीस की जगह सर को एक सौ छब्बीस बताया। दो सौ रुपया बचा लिया न ? नहीं तो साहब लोग हम लोगों का दुःख दर्द कहाँ सुनता है? सर की बीवी ने हार माँगा है न ? मैं भी अपनी बीवी के लिए हार ही लाऊँगा। रतनदास से दो हार माँग लूँगा, सी. ओ. साहब भी चाहेंगे तो तीन ले आऊँगा। चोर पकड़ा है साहब, कोई मजा़क नहीं किया है (गुनगुनाने लगता है) सैंया भए कोतवाल अब डर काहे का......सैंया भए....हाँ हाँ सैंया भए.............................।
सावन्त- (नेपथ्य से) बापट तू फिर गाने लगा। (सावन्त आ जाता है) सी. ओ. साहब आने वाला है डंडा कर देगा.............नया-नया आया है.......अब तक मैं चोर को जेल भेज देता पर मुख्यमंत्री का मामला है। कप्तान साहब चाहते हैं कि ठोंक बजाकर देख लिया जाए। इसीलिए सी.ओ. साहब को लगाया है। गीत गाना मत करना। साफ काम पसन्द करता है वह। (फाइल देखता है) दौड़कर मुंशी से रपट ले आ। तूने चोर तो पकड़ लिया पर रपट?
बापट- लाता हूँ सर। (बापट दौड़ जाता है)
सावन्त- मुख्यमंत्री के यहाँ से सूचना आ गई। सेठ मानिक चंद के यहाँ एक करोड़ की चोरी हो गई। चौबीस घण्टे के अन्दर चोर को हाज़िर करो। सावन्त ने चार ही घण्टे में चोर को हाज़िर कर दिया। ऐसा है अपना यह सावन्त। एक आवाज़ पर सरपट दौड़ने वाला।
बापट- (बापट बदहवास सा दौड़कर आता है) सर रपट तो है ही नहीं।
सावन्त- रपट कहाँ गुम हो गई ?
बापट- रतनदास ने रपट ही नहीं लिखाई।
सावन्त- क्या ?.................रतनदास ने रपट ही नहीं लिखाई !
बापट- हाँ सर............।
सावन्त- क्यों .........? रतनदास ने रपट क्यों नहीं लिखाई ?.......फिर मुख्यमंत्री का आदेश कैसे हो गया ?.........बापट............।
बापट- जी सर.............।
सावन्त- मुख्यमंत्री का आदेश कैसे हो गया ?
बापट- बड़ों की बात बड़े ही जानते हैं सर.................।
मुख्यमंत्री का हुक्म है कि चोर को जल्दी पकड़ो.........पर रतनदास को जैसे कुछ हुआ ही न हो।
सर.................सर ?
सावन्त- क्या सर, सर किए जा रहा है ?
बापट- सर रतनदास बड़ा आदमी है करोड़ दो करोड़ बट्टे खाते में डाल देगा.....................।
सावन्त- पर चोर का क्या होगा ?
मुख्यमंत्री के आदेश का क्या होगा ?
मेरी बीवी को हार कौन देगा ?
बापट- सेठ हार देगा सर...............। सेठ के लिए हार पैर की जूती के बराबर भी नहीं है सर.............।
सावन्त- टीवी, रेडियो चिल्ला रहे हैं कि चोर पकड़ा गया........।
बसवट- ‘आज तक’ वालों ने तो धमाका कर दिया है.............इनाम भी देना चाह रहे हैं।
सावन्त- रतनदास से कहो रिपार्ट लिखा दें।
(बापट मोबाइल से फोन करता है)
बापट- सेठ जी...............(सावन्त को फोन पकड़ाता है।)
सावन्त- नमस्ते.............हुजूर। मजे़ में हैं..............मैं थाने से इन्सपेक्टर सावन्त............अखबार मे सूचना...........जी...........देखा है..........जी........एक दो लाइन की रपट......जी .....ठीक है............जी मुख्यमंत्री कार्यालय..........जी......ठीक है..........हाँ..........जी.........कोई हर्ज़ नहीं............सेठ मानिकचन्द स्विटजरलैण्ड में हवाखोरी कर रहे हैं.......जी...........आपकी कृपा बनी रहे..........जी...........नमस्ते। (मोबाइल की स्विच बन्द करता है।) बापट...............।
बापट- जी सर
सावन्त- रतनदास जी कहते हैं कि मुख्यमंत्री कार्यालय के आदेश को ही रपट मान लिया जाय।
बापट- मान लेते हैं सर........हमारा क्या जाता है ?.........हमें तो हार चाहिए।
(सी. ओ. साहब आते हैं। उम्र 29 वर्श। हाथ में रैकेट। सफेद पैंट और आधी बाँह की कमीज पहने हैं। कंधे पर कोट। सावन्त और बापट अभिवादन करते हैं। सी. ओ. रैकेट को मेज़ पर रखते हैं। कोट को पहन लेते हैं। इसी बीच बापट चिल्लर की थैली अन्दर कर आता है। सी. ओ. कुर्सी पर बैठ जाते हैं। सावन्त और बापट खड़े रहते हैं।)
सी.ओ.- चोर को हाज़िर करो......................।
बापट- अभी लाया सर...........(दौड़ जाता है।)
सावन्त- चोर फुटपाथिया है सर। ऐसे चोर बड़े षातिर होते हैं।
सी.ओ.- फुटपाथिए ने एक करोड़ की चोरी कर ली?
सावन्त- कर लेते हैं सर। एक करोड़ का बंडल दस किलो भी नहीं होता सर। ये फुटपाथिए पूरा बोरा दस-दस माले पर चढ़ा देते हैं सर............कुछ बदज़बान भी होते हैं सर। यह भी कोई मामूली चोर नहीं है सर।
(बापट चोर को लाता है उसके साथ मुरली और हरी भी आते हैं। बापट जोर से डाटता है...............चल हट ‘फुटपाथिए कहीं के।’ दोनों सहम कर लौट जाते हैं।)
सावन्त- यह बहुत षातिर चोर है सर।
सी.ओ.- ठीक है.........मै देखता हूँ। सावन्त तुम थोड़ी देर के लिए बाहर बैठो।
सावन्त- मैं सर...........यह षातिर चोर है सर...........कुछ बदसलूकी कर गया तो...............।
सी.ओ.- मैं देख लूँगा। बापट तुम भी। (सावन्त और बापट दोनों बेमन से जाते हैं) तुम्हारा नाम क्या है ?
अमित- अमित प्रकाश सर।
सी.ओ.- पता ?
अमित- फुटपाथ।
सी.ओ.- फुटपाथ पर कहाँ ?
अमित- सेठ मानिकचन्द की कोठी के सामने।
सी.ओ.- क्या ? सेठ मानिकचन्द की कोठी के सामने...........। और उन्हीं के यहाँ एक करोड़ की चोरी.............?
अमित- मैं चोर नहीं हूँ सर..........। मैंने चोरी नहीं की है।
सी.ओ.- तुम तो पढ़े-लिखे मालूम होते हो। कितना पढ़ा है?
अमित- सर, बी0ए0, एल0एल0बी0 हूँ।
सी.ओ.- वकील होकर भी चोरी करते हो।
अमित- मैंने चोरी नहीं की है सर।
सी.ओ.-(डपटते हुए) तुम चोरी के आरोप में पकड़े गए हो और कहते हो कि.............................।
सावन्त- (प्रवेशकर) सर मैंने बताया न कि षातिर चोर है, कबूलेगा नहीं सर......................।
सी.ओ.- सावन्त तुम अभी बाहर ही बैठो................।
सावन्त- अच्छा सर। मैं यहीं हूँ सर.................। (जाता है)
सी.ओ.- तुम काम क्या करते हो ?
अमित- सालभर से सेठ मानिकचन्द के यहाँ नौकरी।
सी.ओ.- सेठ मानिकचन्द के यहाँ नौकरी?
अमित- हाँ सर।
सी.ओ.- और उन्हीं के यहाँ चोरी............और वह भी एक करोड़ की.........सावन्त ठीक कहता है तुम षातिर चोर हो। अपनी कानून की पढ़ाई का उपयोग तुमने चोरी की बारीकियाँ समझने में किया। नहीं तो एक करोड़ की चोरी कोई आसान काम नहीं है।
(उठकर टहलने लगता है) एक करोड़ की चोरी बी.ए., एल.एल.बी............द्वारा.....................।
अमित- (तेज स्वर में) नहीं सर, मैने चोरी नहीं की है............।
सी.ओ.-(तेज स्वर में ही) चोर कब स्वीकारता है कि उसने चोरी की है ? पर अन्ततः स्वीकार करना ही पड़ता है............तुमने वकालत पढ़ी है चाहते तो वकील बन जाते। रोटी चल ही जाती.........किसी वकील को पेड़ के नीचे रहते नहीं देखा गया...........एक करोड़ ज़रूर नहीं मिलते पर इज्ज़त के साथ रह तो सकते थे। मैं भी कानून का स्नातक हूँं। उसी के बल पर मैं आई. पी. एस. बना।
अमित- यह भी एक तरह की लाटरी ही है सर।
सी.ओ.- क्या कहा लाटरी ?
अमित- हाँ सर..........लाखों अभ्यर्थियों में पाँच-सात सौ की सफलता लाटरी नहीं तो और क्या है?
सी.ओ.- तो तुम बुद्धिमान भी हो........चोरी भी इसीलिए बहुत बुद्धिमानी से करते हो, नहीं तो करोड़ों की चोरी.......।
अमित- मैं चोर नहीं हूँ सर.......................।
सी.ओ.-(थोड़ी उत्तेजना में) चोर नहीं, तो तुम क्या हो ?..........तुम मानिकचन्द के यहाँ क्या करते थे?
अमित- घरेलूूू काम करता था। साग-सब्जी से लेकर झाडू-पोंछा तक।
सी.ओ.- और भी कुछ ?
अमित- इधर छः महीने से नोटों के थैले जहाँ भी रतनदास जी कहते थे, पहुँचा देता था।
सी.ओ.- और इसी में तुमने एक करोड़ मार लिए।
अमित- नहीं सर, मैं चोर नहीं हूँ।
सी.ओ- जानते हो कोई विश्वासपात्र सेवक जब मालिक के यहाँ चोरी कर लेता है तो कितनी सज़ा मिलती है?
अमित- जानता हूँ सर....................।
सी.ओ.- तो तुम जेल की चक्की पीसना चाहते हो ?
अमित- नहीं सर।
सी.ओ.- ‘नहीं सर’ कहने से छुुुट्टी नहीं मिलेगी, हड्डी-पसली तोड़ दी जाएगी। तुम पुलिस के हत्थे चढ़ चुके हो। (टहलता है).....अच्छा सेठ जी देते क्या थे ?
अमित- तीन हज़ार रुपये महीने। लेकिन मैं दो हज़ार रुपये महीने उन्हीं के यहाँ जमा करा देता था। मुझे अपनी बहन की षादी करनी है सर। इसीलिए एक हज़ार में अपना काम चलाकर फुटपाथ पर सोता था सर। मैं बहुत ईमानदारी से काम करता हूँ सर।
सी.ओ.- तुम ईमानदारी से काम करते थे इसीलिए रतनदास के विश्वासपात्र बन गए।
अमित- जी सर।
सी.ओ.- और उसी विश्वास का तुमने फ़ायदा उठाया...........चकमा देकर एक करोड़ की गड्डी रख ली। रतनदास जी ने कहीं भिजवाया होगा। तुम वह गड्डी लेकर चम्पत हो गए। यह तो कहोे सावन्त ने चार घण्टे में ही पकड़ लिया।
सावन्त- (अन्दर आकर) जी सर, बड़ी मुस्तैदी से मैंने इसे पकड़ा। सर अभी मैंने रतनदास से फोन पर बात की है। वह कहते हैं कि अमित प्रकाश बहुत ईमानदारी से काम करता था। सेठ मानिकचन्द के यहाँ एक स्ट्रांग रूम है सर। उसमें नोटों से भरे बंडल-बोरे पड़े रहते हैं। उस कमरे में रतनदास जी इसे ही ले जाते थे औेर किसी को नहीं।
सी.ओ.- और इसी विश्वास को इसने तोड़ दिया।
सावन्त- जी सर..............। मानिकचन्द जी की एक लड़की है एलिसा। पढ़ी-लिखी होशियार। एम0 ए0 पास है सर, यह उससे बहस करता था। रतनदास जी को डाटना पड़ता था। यह आदमी ख़तरनाक है सर। यह देश में क्रान्ति लाना चाहता है। इसीलिए देख रहे हैं सर, कैसे देखता है ?
सी.ओ.- ठीक है, तुम बाहर बैठो। मैं देखता हूँ।
सावन्त- सावधान रहें सर। मैं बाहर हूँ जैसे ही ज़रूरत पड़े मुझे......।
सी.ओ.- तो तुम सामाजिक क्रान्ति लाना चाहते हो, चोरी से। किस दल से जुड़े हो तुम ?
अमित- किसी से नहीं सर।
सी.ओ.- तुम नक्सलाइट तो नहीं हो ?
अमित- आपको क्या लगता है सर ?
सी.ओ.- तुम सवाल पूछने की हिमाकत न करो। जो पूछा जाए उसका जवाब दो। तुम्हारे साथ न्याय होगा यदि सच-सच उगल दोगे।
अमित- बारह घण्टे से देख रहा हूँ सर। पानी तक तो मिला नहीं।