खण्डार जैसी जगह थी वो , किसी टूट चुके महल के अवशेष जैसे , कई बड़े छोटे पत्थर यहां वहां बिखरे हुए थे , ऊंची नीची जमीन उसमे भी बारिश जैसा का मौसम था… हाँ, वही बारिश जो उसे बिल्कुल पसंद नहीं थी।
वो लड़का उसी बारिश से बचकर भाग रहा था… मानो भीग गया तो देह जल जाएगी। तभी कुछ हमउम्र लड़कों ने उसका रास्ता घेर लिया।
“बहुत अच्छाई करने का शौक है न तुझे… अब कैसे बचेगा?” एक लड़के ने तंज कसा।
उसने हल्की सी नजर उठाई, सबकी आँखों में देखा और शांत लेकिन सख्त आवाज़ में बोला,
“हाश… हमें ये बारिश पसंद नहीं, हम भीगना नहीं चाहते… किसी और दिन।”
वो आगे बढ़ा ही था कि रवि नाम का लड़का रोड लेकर झपट पड़ा। लेकिन वो झुका, एक तेज़ घुमाव में रवि की टाँग पर सटीक वार किया — रवि ज़मीन पर गिर पड़ा। माहौल अब तनाव से भर गया।
“शर्मा!!!” चीखते हुए एक और लड़का दौड़ा।
वो — जिसे सब 'शर्मा' कह रहे थे — हल्का सा ठिठका। गर्दन हल्के टेढ़ी की, एक तिरछी मुस्कान उसके चेहरे पर तैर गई। चेहरा क्रूरता से भर उठा था — जैसे अब कोई भी आगे बढ़ा तो जिन्दा नहीं बचेगा।
बारिश अब तेज़ हो चुकी थी। बूँदें उसके बालों से होते हुए चेहरे तक लुड़क रही थीं।
और फिर — युद्ध शुरू हुआ।
लात, घूंसे, वार… वो अकेला था पर हर वार का जवाब जैसे वो वर्षों से साध चुका था। मिट्टी, खून, बारिश सब मिलकर एक युद्धभूमि बना चुके थे। खून की धारें चेहरों से बहती जा रहीं थीं, पर वो लड़का डटा रहा। हर वार उसकी क्रूरता को और गहरा कर रहा था।
“आज नहीं बचेगा तू शर्मा… आज मैं नहीं हारूँगा!” एक लड़का चिल्लाया।
उसके जवाब में 'शर्मा' सिर्फ मुस्कुराया।
धीरे-धीरे… उसका नियंत्रण खत्म होने लगा था।
मन ही मन वो मंत्र जाप करने लगा — खुद को थामने के लिए। लेकिन तभी, एक लड़के ने चाकू निकाल कर उस पर वार कर दिया।
वो चाकू को बीच में ही रोकता है, और अपने हाथ में लेकर वार करने को ही होता है कि—
“अक्षत!!!”
एक तेज़ आवाज़ गूंजी।
वही उम्र का एक और लड़का, शांत, संयमित…' समय।'
उसका हर कदम नियंत्रित था। वो धीरे-धीरे बढ़ता गया। जैसे समय खुद बारिश में उतरा हो उसे रोकने।
अक्षत की आँखों में अभी भी आग थी, पर अब वो थमा… साँसों पर काबू पाते हुए उसने आंखें भींच लीं।
लड़के भाग चुके थे।
“समय…” वो पलटा, थका-सा, भीगा-सा।
“हर बार गलत समय पर ही क्यों आते हो तुम?”
समय हल्के से मुस्कुराया,
“तुम नियंत्रण खो चुके थे कुंवर
…" अति हर चीज़ की हानिकारक होती है। आज सारा हिसाब बराबर था, पर तुमको देख के हम distract क्या हुए — भाग गए सारे…”
“भाषा पर नियंत्रण।”
“हाश… तुम न…”
“आधा घंटा लेट हैं हम कुंवर…”
“सुंदरकांड का पाठ शाम को है, और अभी सिर्फ साढ़े नौ बजे हैं — वो भी सुबह के! और हम बुरी तरह भीग चुके हैं।”
समय की आंखें हल्की घूमीं — “हम लेट हैं क्लास के लिए।”
“थोड़ा और देर से बताते…” — अक्षत ने कहा और पूरी ताकत से दौड़ पड़ा।
क्योंकि अगर आज फिर लेट हुआ… तो शिकायत घर तक जाएगी।
और जहाँ शिकायत गई… वहाँ से घर से निष्कासन तय।
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एक महीना हो चुका था कोचिंग शुरू हुए। सब कुछ अब थोड़ा सेट होने लगा था—रूटीन, दोस्ती, कम्पटीशन… और टेंशन।
हर महीने की तरह इस बार भी मॉन्थली टेस्ट रखा गया था। पर इस टेस्ट की अहमियत कुछ ज़्यादा थी।
इसी के बेस पर तय होने वाला था—कौन किस क्लास में बैठेगा, कौन रहेगा “A1 टॉपर बैच” में और किसका नंबर आएगा पीछे।
इंस्टीट्यूट का माहौल कुछ अलग ही था।
भव्य और ऐतिहासिक शहर आगरा की तरह, ये कोचिंग इंस्टिट्यूट भी गर्व से खड़ा था—ऊँचा, सख़्त और गौरवशाली।
बाहर तेज़ धूप थी, अंदर क्लासरूम में खामोशी पसरी हुई थी।बाहर तेज़ धूप थी, अंदर क्लासरूम में खामोशी पसरी हुई थी।
दीवारों पर मोटिवेशनल कोट्स, “पैशन और परिश्रम से ही परिवर्तन आता है…” जैसी पंक्तियाँ छपी थीं।
स्टूडेंट्स चिंता में परेशान में लखड़े थे, एक-एक कर अपनी रैंक और नई सीटिंग लेने।
“तो बच्चो, एक महीने के बाद ये पहला टेस्ट था। और इसके रिज़ल्ट्स ने साफ बता दिया कि कौन सच में मेहनत कर रहा है और कौन बस टाइम पास… Seating भी उसी आधार पर तय की जाएगी। तो ध्यान से सुनना।” उनके फिसिक्स टीचर मिस्टर त्रिपाठी की आवाज गूंजी , स्वभाव के सख्त त्रिपाठी जी। कौन न डरे।
बच्चों के दिल की धड़कनें तेज़ हो चुकी थीं।
“Fourth rank – Bhavya Jain.”
भव्य खड़ा होता है, चेहरे पर हल्की सी मुस्कान, लेकिन आँखों में जलन छुपी थी।
“Third rank – Gargi Pathak.”
गर्गी खामोशी से खड़ी होती है। लम्बे घुंगराले बालो को कसकर बाँध , अपना रिजल्ट लेने आगे बढ़ती है उसके नाम पर कुछ फुसफुसाहटें होती हैं। उस का नाम न होने से कुछ लोग अभी राहत में थे।
“Second rank – Ishika Singh Thakur.”
पूरा कमरा पलट के उसे देखने लगा।
हलके घुंगराले , कंधे तक छोटे बाल, शांत चेहरा, पर आंखों में वो बात जो शब्दों में नहीं थी—ठाठ, ठहराव और तेज। अपनी भिंची हुई मुट्ठी खोलके वो आगे बढ़ती है उसकी पायलें आवाज करती हैं | , अजीब लगती थी वो सबको , भला मई की गर्मी में कोई शॉल ओढ़ता है , उसने एक हलकी शॉ ल ओढ़ रखी थी ,वो अक्सर ओढ़ती थी |
कुछ लड़कियाँ धीरे से बुदबुदाईं,“
… हर्षिका, देख न इतने पे भी महारानी की शान में कोई कमी नहीं।
" जरुरी चीज़ इज्जत होती है स्वर्ण , जो इसकी कोई नहीं करता " हर्षिका ी आँखों में चिढ़ साफ़ थी
"कैसे इतना सब होने के बाद भी , शी इस स्टिल डोमिनेटिंग "
" बदल तो ये गयी है , वरना स्कूल में इतना सब होने के बाद भी कोई चांस ही नहीं जो इसकी आँखें उठाने की भी हिम्मत हो "
" तन्वी वैसे मज़ा तो इसको रोता देख कर ही आता था , काफी दिन हो गए "
" अभी तो पूरा ड्राप ईयर बाकी है तैयारी का , देखलेंगे " हर्षिका मुस्कुरा दी।
इशिका ने किसी की तरफ देखा तक नहीं। बस हल्का सा सिर झुकाया और फिर सीधा बैठ गई , वो अक्सर शांत रहती थी , अकेली , पर चेहरे पर हल्की फीकी मुस्कान , हमेशा जैसी ।
मिस्टर त्रिपाठी जो अबतक उन बच्चो का उत्साहवर्धन कर रहे थे , जो अपने काम अंको के कारण हताश थे अब अंतिम नाम और प्रथम श्रेणी का नाम बताने को थे ,
" आउट ऑफ़ माय एक्सपेक्टेशन , द नेम , द वन हू स्कोरड हाईएस्ट अमंग ऑल
"अक्षत श्रीनिवास शर्मा "
कहते हुए उनकी नज़र पूरी क्लास में घूमी ही थी की
"प्रेजेंट सर "
अक्षत जो अभी तक बाहर था, उसी वक्त अंदर आता है।
पूरे क्लास में सन्नाटा।
आज तो ये गया , पिछले एक महीने में सब ये तो समझ गए थे की मिस्टर त्रिपाठी और शर्मा का छत्तीस का आंकड़ा है, पर क्यों ?ये बस वही दोनों जानें |
" आई एम सॉरी सर ,वो बारिश की वजह से..... "
" कोई बात नहीं , तु म्हारा रिजल्ट अच्छा है , दिमाग है तुम्हारा पढ़ने में , आज आखिर बार दुबारा कोई अनुशसन विरोधी कार्य किया तो ,माफ़ी नहीं है "
" जी सर दुबारा नहीं होगा ये " उसने धीमी नियंत्रित आज में कहा , और नज़रें पूरी क्लास में घुमाई ,
" उधर मिडिल रो की पहली सीट , रैंक २ के साथ "
अक्षत की आंखें तेज थीं, लेकिन मन अंदर से उलझा हुआ।
उसे सुन रखा था— इशिका के बारे में। बहुत कुछ, बहुत गलत…
और अब उसी के बगल में बैठना है? वो एक पल को रुकता है। फिर आगे आकर पूरी तरह उससे अनदेखा कर बैठ जाता है ||
...........
अक्षत खामोश बैठा था।
आँखें सीधी बोर्ड की तरफ… लेकिन दिमाग कहीं और।
बगल में बैठी वो लड़की—जिसके बारे में उसने जाने क्या-क्या सुन रखा था—आज बिलकुल उलट दिख रही थी।
शांत।
न कोई घमंड, न कोई दिखावा।
बस एक ठंडी हवा की तरह मौजूद—पर असरदार।
उसकी शॉल की खुशबू भी कुछ अलग थी…
जैसे बरसों पुराना कोई संस्कार साथ लिए फिर रही हो।
अक्षत ने एक हल्की सी नजर उसकी ओर डाली, फिर झट से मुँह फेर लिया।
“Don't get swayed…” उसने खुद को टोका।
“तू जानता है उसके बारे में… मत भूल।”
पर फिर भी… |
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घंटी बजी।
एक धीमी सी खनक… और फिर कुछ सेकंडों में पूरा क्लास शोर से भर गया।
बेंचों की खड़खड़ाहट, टिफिन बॉक्स की खनक, और हँसी की झलकें… सबकुछ मिलकर एक जाना-पहचाना माहौल बनाते हैं।
अक्षत उठा, बिना कुछ कहे।
बोतल उठाई और सीधे बाहर निकल गया।
क्लास के गेट के पास से निकलते हुए एक नजर पलटी— इशिकाअब भी अपनी सीट पर बैठी थी, चुप।
टिफिन सामने था, लेकिन न खुला, न खाया गया। अक्षत ने अपना सर झटका और आग बढ़ गया , भला वो क्यों सोचे|
अपने खुद के विचारो में उलझा हुआ अक्षत धीरे-धीरे चल रहा था। मन अब भी बेचैन था… लेकिन फिर अचानक—
ठक!
उसका कंधा किसी से टकरा गया। किताबें ज़मीन पर गिर पड़ीं।
“देख के चलो ना!” एक जानी-पहचानी आवाज़ उसके कानो में पड़ी , सामने
गर्गी खड़ी थी ।
अक्षत का चेहरा सख्त हो गया, उसकी नज़रें कुछ पल के लिए उलझ गईं।
गर्गी झुक कर एक किताब उठाई , फिर उसकी ओर देखा बिना मुस्कान ,बिना शिकायत ,सिर्फ सीधी नज़र " माफ़ी "
इतना कह वो आगे बढ़ी "रुको ,ये गिर गया शयद किताब से ' अक्षत ने वो काला धागा जो शयद जमीन पे गिर गया ,उठा के उससे लौटाया।
" अब भी वही हरकतें , मुँह उठके चलना टकरा जाना ' गार्गी ने हल्की चिढ़ के साथ धीमे से कहा
" और तुम्हारा बड़बड़ाना ,कुछ चीज़े सच में नहीं बदलती " अक्षत ने तीखेपन से पर धीमे कहा जितना सिर्फ गार्गी सुने
"अबतक इससे नहीं फेंका " अक्षत की नज़र ,गार्गी के किताब से झांकते उस मरोड़े हुए कागज़ पे थी
"सब कुछ फेंक ने से मिट ता नहीं "
'रखने से सुलझता नहीं "
"आई गेस , हम दोनों कभी एक दू सरे को माफ़ नहीं कर पायेंगे ' अक्षत ने करवाहट से कहा
"और सुन समझ तो अगले जनम तक भी नहीं पाएँगे, " बोल के
सबकी नज़रे भांप गार्गी आगे बढ़ गयी और गहरी सांस लेके के अक्षत भी |
क्लास के लडके लड़के लड़कियाँ बातो में व्यस्त थे पर कुछ की नज़र इन दोनों पर ,आकृति की भी | उसकी नज़र उस काले धागे पे टिकी थी जो अक्षत ी कलाई में बंधा था ,बिलकुल वैसे ही जैसा गार्गी के पास था | उसने अपने हाथ कस लिए लिए, इतने की सके लांबेे नाख़ून उसके चुभने लगे |
...................
बाहर कैंटीन के कोने में समय पहले से बैठा हुआ था , शान्ति से , बहुत काम ही बोलता था वो लकिन उसकी नज़र बहुत तेज़ | अक्षत के अलावा शा यद ही इन एक महीने में किसी से कुछ बोला हो वो | भाई था अक्षत उसका , बचपन से साथ थे वो , अक्षत आँख बंद करके मानता था समय की हर बात , कुछ महीने ही बड़ा था समय अक्षत से कोई कह ही नहीं सकता की दोनों सगे भाई नहीं हैं ,हाँ सच में नहीं हैं ..... सगे |
"देर हो गयी आज..... " बोलता हुआ अक्षत उसकी बगल में बैठा , समय ने एक नज़र उससे देखदेख फिर चुपचाप खाना खाने लगा |
"फर्स्ट रैंक यार , इम्प्रेससिव, कॉन्ग्रैचुलेशन मेरे भाई " एक उन्ही की उम्र के लड़के ने ने वहा आके अक्षत को हल्का गले लगाया |
उससे देख अक्षत मुस्कुरया ,वही समय ने हल्की चिढ़ के साथ कसकर अपनी आंखें बंद कर ली !
" हाय उपाध्याय "कहकर उस लड़के ने समय की ओर हाथ बाढ़ाया , जिसके जवाब में समय ने उससे पूरी तरह अनदेखा किया |
वो दूसरी ओर कुर्सी खींच के बैठ गया जैसे ये कहानी रोज की है!
'वैसे भाई ये रोज़ाना लेट होकर जाता कहा है कोई। ..''
"समर , कुछ भी ,सच में बारिश की वजह से आज रह गए पर कोई न नाम अनाउंसमेंट तक तो आ गया "
" क्या फायदा बैठना तो उसी के पास पड़ा ,कान्ट बिलीव वो पढाई में इतनी अच्छी निकलेगी "
"इशिका ?"
"और कौन ,उसके साथ जो लोग उसके स्कूल से यहाँ हैं वो सब बस बचते हैं , ोये शर्मा तू थोड़ा फोकस मेन्टेन रखियो , गलत जगह फसा है , पता चले अगले टेस्ट में ना खुद कुछ अच्छा करे और तुझे और डिस्टर्ब कर दे , बिल्कुल अच्छी नहीं एच वो, जो लोग उसके स्कूल से हैं अपने बैच में, उन्होंने सुना था कि 2 बार स्कूल से निकल गई थी, और परिवार भी इसको बहुत पसंद नहीं करती, पता नहीं, बस पढ़ा रहे हैं, बस सबकी अटेंशन चाहिए होती थी इसको, खासकर लड़के और इस चक्कर में पता नहीं क्या-क्या कांड किये हैं "
"देख के लगता नहीं, इतने शांत मासूम चेहरे की ये हरकतें होंगी"
"किसकी शक्ल देख के उसकी असलियत का पता चल जाता है?”
"बिल्कुल रघुवंशी, किसकी शकल देख के उसकी असलियत का पता चलता है!"
कहते हुए समय ने सीधे समर की आंखों में देखा, उसके तरीके से ही पता चल रहा है कि वो इशिका की बात तो बिल्कुल नहीं कर रहा है !
अक्षत ने अपना सर हल्का सा हिलाया पर उसकी पकड़ उसकी चम्मच पर कसती जा रही थी |
" शी ीज़ साइको , एक लड़का जिससे वो अपना भाई बोलती थी ,उससे इतना ऑब्सेस्ड हो गयी की , उसकी अटेंशन के लिए हर लिमिट क्रॉस करने को तैयार , एक लड़की उस लड़के के पा स क्या ख ड़ी हो गयी , इसने उसकी कलाई काट दी , तू लड़के की सोच जिससे वो बहन मान रहा वो तो उसको अलग ही नज़र.... "
कड़ाक , एक तेज आवाज हुई ,
अक्षत की प्लेट उसके हाथो से गिर गयी वही समय के हाथो की नासें तन गयी , पर वो दोनों शांत थे .... अशान्तिमय तरीके से। ....
"खाना , खाना खाते हैं |" समय ने हल्की पर सख्त आवाज में कहा ,
समर ने हलके से अपनी गर्दन को हिलाया " बहुत सारी और भी चीज़े हैं। .. ....
समय ने हल्के से उसे घूरा , समर शांत हो गया ,
पर अक्षत उसके दिमाग में कई चीज़े चल रही थी , जो उसने इशिका बारे मे सुना वैसा ही कुछ "उसके" साथ भी हुआ था ,
नहीं! वो भी गलत थी और ये भी
"ब्लडी अटेन्शन वानटर्स "
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कोलाहल से दूर, शोर-शराबे से परे — एक छोटा सा क्षेत्रीय उत्सव चल रहा था। पूरा बाज़ार रंग-बिरंगी सजावटों से दमक रहा था, पर एक कोना अजीब सी खामोशी ओढ़े हुए था... जैसे तूफ़ान से पहले की शांति।
बादल घिर आए थे। हवा में ठंडक और बेचैनी थी।
भीड़ को चीरता एक लड़का भागता चला गया — इतनी तेज़ी से, जैसे कोई हवा का झोंका।
पीछे सात-आठ हथियारबंद लोग उसका पीछा कर रहे थे।
"कहाँ गया वो? इस बार नहीं बचेगा!"
"आज तो खुद देवता भी उतर आएं, तब भी नहीं बचा सकते उसे!"
लोग उसे पहचानते थे — माहौल में भगदड़ मच गई।
अचानक एक कपड़ा ज़मीन पर गिरा — शायद उसी के हाथ से छूटा था।
"वो रहा! पकड़ो उसे!"
करीब 17 साल का लड़का — साँवला, घुंघराले बाल, आंखों में शरारत।
वो मुड़ा, मुस्कराया... और फिर से दौड़ पड़ा।
मानो उसे पूरा यकीन हो — ये लोग उसे छू भी नहीं सकते।
एक आदमी ने कटार फेंकी — वो झुका और आगे निकल गया , गोलियां चलाई उन लोगो ने , पर वो ितं तेज था की बस !!
खुद को बचाता वो लगातर भाग रहा था ! वो लोग बहुत देर से उसके पीछ थे !1
अचानक से उआकी नज़र सामने रखे ,सजे मटको पर पड़ी और उसी तरफ मवेशी लेके आते एक व्यक्ति पर , वो हलका हँसा और उसी ओर भाग! एक आदमी न उसे देखा और उसके चिल्लाते ही सब उसी तरफ भागे ,यही तो वो चाहता था ! मटको से कुछ पहले वो रुका, और हल्की नज़र से पीछे देखा , वो लोग पूरी ताकत से उसकी ओर आ रहे थे, वो फिर हंसा , फिर वो अचानक दूसरी तरफ कूदा , जिधर मवेशी थे , ऐसे अचानक किसी के कूदने से उस व्यक्ति का संतुलन बिगड़ा और मवेशी समेत ३ घोड़े भी अनियंत्रित हो गए ! "आसान था !" हल्का सा सर झटक वो निश्चिंतता से दूसरी ओर भाग गया ! बाकी का काम मवेशियों ने कर दिया था !
हवा अब और भी तेज़ थी, अंधड़ उठ रहा था।
"अगर आज नहीं पकड़ा तो सरकार जिंदा नहीं छोड़ेगी, धीरा भैया!"
"ढूंढो! कहीं गया नहीं होगा!"
धीरा — उनका मुखिया — उसकी गुस्से से आंखें लाल थीं।
पीछा करते-करते वो लोग दूर निकल आए।
एक खुला मैदान, जहां तालाब कमल से भरा था...
चंपा, मोगरे के पेड़... और उस भीगे माहौल में, महकती ताज़गी।
"हम लोग रुके क्यों हैं, मुझे नहीं लागत की वो यहाँ छिपा होगा , इतना मूर्ख तो नहीं है वो ! "एक व्यक्ति बोला
" इतना तो उसे भी पता है , इतने छोटे से बाग़ में हम उसे खोज लेंगे , वो क्यों ही यहाँ रुक कर छिपेगा | " दूसरे ने सहमति जताई !
" सच ही है यहांरुक कर हम अपना वक्त जाया कर रहे हैं, वो दूर निकल जाएगा |" " सब लोग आगे चलो, किसी हाल में वो बचना नहीं चाहिए!'
अपने हथियार समेत वे सब आगे चले गए !
वहीं एक पेड़ के नीचे खड़ा था वो लड़का।
"मूर्ख!' वो फिर हँसा !!
बारिश अब तेज़ हो गई थी।
उसने बालों को पीछे किया, मुस्कुराया — जैसे उसी पल का इंतज़ार था।
बारिश...
उसे बारिश बहुत पसंद थी।
माँ कहती थी, जब वो पहली बार रोया था, तब भी आसमान यूं ही गरजा था... बारिश अपने शबाब पर थी।
***************
अक्षत खामोशी से खड़ा था, खिड़की के पास, अपनी जगह पर लौटने से पहले कुछ सोचता हुआ। बच्चे क्लास में आ रहे थे, और शोर-गुल धीरे-धीरे थम रहा था।
तभी पीछे से आवाज़ आई — शांत, लेकिन साफ़।
"तुम्हारा पेन गिरा था... डेस्क पर रख दिया है।"
वो पलटा नहीं, बस गर्दन मोड़ी और नज़रें उठाईं।
वो वहीं थी। इशिका।
अजीब था — न पायल की आवाज़, न कोई आहट। जैसे सन्नाटे को चीरती उसकी मौजूदगी आई हो।
"वैसे... थैंक्यू," उसने कहा, होंठों पर एक टेढ़ी मुस्कान के साथ।
"पर इतनी मेहनत की ज़रूरत नहीं थी। खासकर जब इरादे इतने… सच्चे हों। दिखावा थोड़ी ना करना पड़ता है।"
इशिका हल्के से मुस्कराई, पर उसकी आंखें चुप नहीं थीं।
"इरादे उन्हें दिखाने पड़ते हैं जिन पर शक हो। मैं तो बस एक पेन उठा रही थी... भरोसा नहीं माँग रही थी।"
"मुझे लगा ज़रूरी होगा... इसीलिए," उसकी आवाज़ जैसे खुद से भी धीमी थी।
"वैसे छोड़ देतीं, कोई बड़ी चीज़ तो थी नहीं," अक्षत बोला।
"चीज़ छोटी हो या बड़ी... छोड़ना हमारी मर्ज़ी होती है, और संभालना हमारी फितरत," इशिका की आवाज़ में अजीब सी मासूमियत थी — वो मासूमियत जो ज़रा सी गहराई में डूबे तो ख़ौफ बन जाए।
अक्षत के होंठों की मुस्कान गहरी हुई।
"बातें बहुत अच्छी करती हो। इतनी मासूमियत से बोलती हो कि आदमी सोचता है — शायद तुम जैसी कोई हो ही नहीं सकती।
...और यही सबसे बड़ा धोखा होता है, देवी!
पर हाँ — मेरी इतनी फिक्र करने का शुक्रिया। पर संभल जाओ... मेरी फिक्र में लगी रहोगी तो खुद को खो दोगी।"
वो जानती थी अक्षत को ये सब दिखावा लगे गा, या उसका ध्यान पाने की कोशिश !
इशिका की नज़रें झुकीं, लेकिन वो टूटी नहीं। बस अपनी शॉल को थोड़ा और कस लिया।
"वैसे, फिक्शन में जीती हो न तुम? पढ़ाई manage कैसे करती हो? Oh, और हाँ... congrats by the way — second rank."
वो रुकी। एक सांस ली। फिर घूमने लगी, जवाब दिए बिना।
"जवाब नहीं दिया, मैम... आपने," अक्षत ने "आपने" शब्द पर खास जोर दिया।
इशिका थमी। नजर घुमाई — हल्की मुस्कान, हलकी चुभन के साथ।
"जब लोग सवाल कम और राय ज़्यादा देने लगें... तब जवाब देना ज़रूरी नहीं होता। बस मुस्कराकर आगे बढ़ जाना चाहिए। Congratulations आपको भी... ।"
वो जा चुकी थी, पर उसकी मौजूदगी ठहर गई थी।
अक्षत धीरे से अपनी जगह पर बैठा। उसका चेहरा अब मुस्कुरा नहीं रहा था।
क्लास दोबारा शुरू हुई! सब पढ़ने में व्यस्त..... की
ठीक उसी वक्त मोबाइल में बीप हुआ।
"जामधर का पता चल गया है कुंवर, वो किमसार में है। दो दिन बाद उसकी हवेली में एक बड़ा आयोजन है।"
"आयोजन?"
अक्षत की मुस्कान वापस आई — अबकी बार और गहरी!!
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कृपया समीक्षा देके कमियां व अपना नजरिया जरूर बातएं !
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