तीन दिन हो चुके थे। तीनों एक ही घर में थे, एक ही छत के नीचे, पर दिलों के बीच की दूरी किसी खाई से कम नहीं थी।
कबीर और करण आमने-सामने आते तो औपचारिक-सी बातचीत करते,ज़रूरत भर के शब्द, बिना आँखों में देखे। दोनों जानते थे कि दर्द दोनों के पास है, पर कोई भी पहले हाथ बढ़ाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।
घर में अजीब-सी खामोशी रहती।
कभी-कभी ऐसा लगता, जैसे दीवारें भी साँस रोककर सुन रही हों। वहीं श्रेया यह सब देख रही थी। उसका दिल सबसे ज़्यादा टूट रहा था।
उसे साफ़ दिखता था करण उसके सामने होते हुए भी अकेला है। उसकी आँखों के नीचे गहरे साए,
रातों की नींद गायब, और हर मुस्कान के पीछे छिपा हुआ अपराधबोध।
श्रेया (मन ही मन) बोली -
वो मेरे पास हैं… फिर भी मुझसे कितना दूर हैं।
मैं चाहकर भी उनके पास नहीं जा पा रही।
कई बार उसका मन करता कि जाकर बस उसका हाथ पकड़ ले, बिना कुछ बोले उसके पास बैठ जाए, जैसे पहले बैठ जाया करती थी। पर हर बार उसके कदम रुक जाते। डर…बीता हुआ डर,और आने वाले कल का डर।
एक शाम करण बालकनी में खड़ा था।
शहर की रोशनियाँ देख रहा था, पर आँखें खाली थीं।
श्रेया (धीमे से) बोली -
करण जी…
करण ने पलटकर देखा। आवाज़ सुनते ही उसके चेहरे पर हल्की-सी घबराहट आ गई।
करण बोला -
हाँ…?
श्रेया बोली -
आप ठीक हो?
करण हल्का-सा मुस्कुराया, वही झूठी मुस्कान।
करण बोला -
हाँ… मैं ठीक हूँ।
श्रेया जानती थी वह ठीक नहीं है। वह दो क़दम आगे बढ़ी, फिर रुक गई।
श्रेया बोली -
अगर… अगर आपको कभी लगे कि बात करनी है…
तो मैं… मैं सुन लूँगी।
करण की आँखें भर आईं, पर उसने तुरंत नज़रें फेर लीं।
करण बोला -
तुम्हें आराम करना चाहिए।
तुम्हें परेशान नहीं होना चाहिए।
श्रेया (आँखों में नमी लिए) बोली -
पर मुझे आपकी चिंता है।
करण कुछ नहीं बोला। बस सिर झुका लिया। उस पल श्रेया को सबसे ज़्यादा यह समझ आया। वो जिस आदमी से डरती थी, आज वही आदमी खुद से डर रहा था।
और दूसरी तरफ़, कबीर अपने कमरे में बैठा सब महसूस कर रहा था। उसे पता था कि श्रेया किस उधेड़बुन में है, और करण किस हाल में।
कबीर(खुद से) बोला -
हम तीनों एक ही घर में हैं…पर शायद सबसे ज़्यादा दूर भी हम ही हैं।
उस रात कोई रोया नहीं, पर तीनों की आँखें देर तक खुली रहीं। तीन दिल,तीन तरह का दर्द,और एक ही सवाल क्या टूटे रिश्ते फिर से जुड़ पाएँगे,या ये दूरी हमेशा के लिए रह जाएगी?
उस रात श्रेया का दिल अजीब तरह से भारी हो रहा था। वह बिस्तर पर लेटी थी, पर नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। उसका मन बार-बार उसी रात में अटक जा रहा था। उसी पल में…जब उसे अपने चारों ओर अजीब-सी गर्माहट महसूस हुई थी।
श्रेया (मन ही मन) बोली -
कितनी अजीब बात है… उस रात की गर्माहट आज भी महसूस होती है।
फिर अचानक दर्द की याद कौंध गई। पेट का दर्द…शरीर का टूटना…और मन का डर। उसका शरीर सिहर गया। वह सहम गई।
श्रेया (कांपती हुई) बोली -
नहीं… नहीं… वो दर्द…
उसने खुद को बाँहों में समेट लिया।साँसें तेज़ हो गईं।
पर उसी के साथ एक और याद उभर आई। जब वह दर्द में थी…बिलकुल टूट चुकी थी…और करण ने उसे संभाला था। उसे याद आया रात के सन्नाटे में करण का बार-बार उठना, कभी पानी लाना, कभी दवा देना,
कभी बस उसके सिरहाने बैठकर उसे देखते रहना।
करण (यादों में) बोला -
श्रेया… आँखें खोलो… मैं यहीं हूँ।
कुछ नहीं होगा… मैं हूँ न…
श्रेया की आँखें भर आईं। उसे याद आया जब वह पूरी रात दर्द से तड़पती रहती थी, तो करण कैसे अपने आँसू छिपके उसे सीने से लगाए रखता था। कैसे वह खुद भी रोता था…पर श्रेया को कभी महसूस नहीं होने देता।
श्रेया (मन में टूटती हुई) बोली -
वो भी तो कितना रोए थे…मैं अकेली नहीं थी उस दर्द में।
उसे याद आया कई बार करण की हथेलियाँ काँपती थीं, उसकी आवाज़ भर्रा जाती थी, पर फिर भी वह हिम्मत करता था।
करण (यादों में बुदबुदाता हुआ) बोला -
बस थोड़ा सा और सह लो…अगर तुम्हें कुछ हो गया
तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगा…
श्रेया ने तकिए में मुँह दबा लिया। अब उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके आँसू किस लिए हैं डर के लिए,
दर्द के लिए, या उस आदमी के लिए जो खुद टूटकर भी उसे जोड़ने की कोशिश करता रहा।
श्रेया (धीमी आवाज़ में) बोली -
मैं कैसे भूल जाऊँ वो सब…जहाँ डर भी था…और उसी डर के बीच किसी का बेइंतहा ख्याल भी…।
कमरे में सन्नाटा था। पर श्रेया के भीतर शोर मचा हुआ था। एक तरफ़ डर, दूसरी तरफ़ एहसान, और बीच में…वो उलझा हुआ प्यार। जो उसे चैन से साँस भी नहीं लेने दे रहा था। रात और गहरी हो गई। पर श्रेया की आँखों से नींद और भी दूर चली गई।