बारिश और एक मुहब्बत की शुरुआत :
पहली बारिश के उस दिन के बाद से जैसे मौसम ही बदल गया था। हर तरफ फुल खिलने लगी थी और हवाएं गुन गुना रही थी। अब बारिश को देखने का नजरिया भी बदल गया था।
अब हर सुबह आईशा कॉलेज थोड़ा जल्दी आने लगी थी… और आरिफ़ भी थोड़ा देर तक रुकने लगा। वे दोनों अब साथ ही बैठने लगे और उनमें से जो जल्दी आ जाता तो दूसरे के लिए अपने पास जगह खाली रखते थे।
उनकी बातें अब “हेलो” से आगे बढ़कर “कैसे हो?” तक पहुँच चुकी थीं।
और “कैसे हो?” से “तुम्हारे बिना दिन अधूरा सा लगता है…” तक। अब आईशा थोड़ा ज्यादा ही शर्माने लगी थी , और आरिफ़ उसे देख देख कर मुस्कुराता रहता....
एक दिन फिर बादल छाए हुए थे। कैंटीन की खिड़की के पास दोनों बैठे थे। बाहर हल्की बारिश हो रही थी।
“अगर उस दिन बारिश नहीं होती, तो शायद हम बात भी नहीं करते…” आईशा ने चाय का कप हाथ में लेते हुए कहा।
आरिफ़ मुस्कुराया, “तो फिर मुझे हर साल पहली बारिश का इंतज़ार रहेगा।”
“सिर्फ बारिश का?” उसने शरारत से पूछा। “नहीं… तुम्हारा,” उसने धीरे से जवाब दिया।
आईशा की पलकों ने झुककर जैसे उसके इकरार पर मुहर लगा दी। वो दोनों साथ साथ चलने लगे, जैसे एक दूसरे का हाथ पकड़ना चाहते हों लेकिन....
और तभी आईशा का पैर फिसल गया ,वो गिरने वाली ही होती है और तभी आरिफ़ उसका हाथ पकड़ कर उसे थाम लेता है। और फिर वो दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़कर चलने लगते हैं मुस्कुराते हुए...
लेकिन हर कहानी में एक मोड़ आता है।
कुछ दिनों बाद आईशा को पता चलता है कि उसके पापा का ट्रांसफर दूसरे शहर में हो गया है। सिर्फ़ दो ही हफ्ते बचे थे।
उसने ये बात जब आरिफ़ को बताई तो पहली बार उसकी आँखों में डर साफ़ झलकने लगा ।
“तो… अब?” अब क्या करेंगे.." हम फिर दोबारा कब मिलेंगे आईशा...?"आरिफ़ ने भारी आवाज़ में पूछा।
“अब… बारिश का इंतज़ार करना,” आईशा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, लेकिन उसकी आँखें भीगी हुई थीं।
आख़िरी दिन, फिर बारिश हुई। जैसे आसमान भी उन्हें विदा देने आया हो। दोनों उसी बस स्टॉप पर खड़े थे — जहाँ पहली बार मिले थे।
“शायद किस्मत चाहती है कि हमारी हर याद बारिश से जुड़ी रहे,” आरिफ़ ने कहा। आईशा ने अपना छोटा सा पेंडेंट उतारकर उसकी हथेली में रख दिया।
“जब भी बारिश हो… समझना मैं याद कर रही हूँ।”
बस आ चुकी थी लेकिन इस बार छाता नहीं था।
दोनों भीग रहे थे — लेकिन इस बार बारिश ठंडी नहीं, चुभती हुई महसूस हो रही थी। आईशा बस में चढ़ गई। उसने खिड़की से हाथ हिलाया।
आरिफ़ वहीं खड़ा रहा… जब तक बस नज़र से ओझल नहीं हो गई। वो वहीं खड़ा हो कर भीगता रहा , और उसके दिल का दर्द जैसे आसमान बयां कर रहा हो।
एक साल बाद…
फिर वही जुलाई, वही पहली बारिश। आरिफ़ उसी बस स्टॉप पर खड़ा था। हथेली में वही पेंडेंट लिए ।
अचानक पीछे से वही आवाज़ आई — “आप भीग जाएँगे…”। वह पलटा। आईशा… उसी मुस्कान के साथ खड़ी थी।
“ट्रांसफर सिर्फ़ एक साल का था,” उसने आँख मारते हुए कहा।
“और कुछ कहानियाँ अधूरी अच्छी नहीं लगतीं।” बारिश फिर से तेज़ हो गई।
इस बार छाता नहीं था, दूरी नहीं थी, डर भी नहीं था। सिर्फ़ दो दिल थे —
जो पहली मुलाक़ात की बारिश को , अब अपनी मोहब्बत की गवाही बना चुके थे। ☔❤️
(आरिफ़ और आईशा की मुहब्बत कहां तक कामयाब होती है, या कहीं इन दोनों की मुहब्बत को किसी की नजर न लग जाए,,
आगे की कहानी जानने के लिए इस कहानी का अगला भाग जरूर पढ़ें)