भाग 1: अटूट प्रेम और विश्वासघात
बनारस की तंग गलियों और गंगा के घाटों पर गूंजती आरती के बीच, आर्यन और मीरा की प्रेम कहानी शुरू हुई थी। आर्यन एक चित्रकार था जो मीरा की सादगी का दीवाना था, और मीरा, जो एक धनी जमींदार की बेटी थी, आर्यन की कला और उसके नेक दिल पर अपना सब कुछ हार बैठी थी।
उन्होंने सात जन्मों तक साथ रहने की कसमें खाई थीं। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। मीरा का चचेरा भाई, विक्रम, मीरा से विवाह कर उसकी संपत्ति हड़पना चाहता था। जब उसे उनके प्रेम का पता चला, तो उसने एक खौफनाक साजिश रची।
पूर्णिमा की एक रात, जब आर्यन और मीरा गंगा किनारे भागने की योजना बना रहे थे, विक्रम ने आर्यन पर पीछे से वार किया। खून से लथपथ आर्यन ने जब मीरा की ओर हाथ बढ़ाया, तो उसने देखा कि मीरा को भी जहर दे दिया गया था।
मरते समय आर्यन ने मीरा का हाथ थामकर कहा, "इस जन्म में हमारा मिलन अधूरा रह गया मीरा, लेकिन मैं वादा करता हूँ, मैं वापस आऊंगा... तुम्हें ढूंढने और अपना हक मांगने।"
मीरा की आँखों में आँसू थे और होंठों पर एक मुस्कान, जैसे वह अगले जन्म का इंतज़ार कर रही हो।
भाग 2: यादों का साया
पच्चीस साल बीत गए।
मुम्बई के एक आधुनिक विज्ञापन संस्थान में काम करने वाले विहान को अक्सर एक अजीब सा सपना आता था-एक पुराना घाट, आरती की आवाज, और एक लड़की का चेहरा जो धुंधला सा था। उसे अपनी गर्दन पर जन्म से ही एक निशान था, जो बिल्कुल किसी गहरे घाव जैसा दिखता था।
दूसरी ओर, लंदन से अपनी पढ़ाई पूरी कर लौटी 'काव्या' बनारस की एक डॉक्यूमेंट्री बनाने के लिए भारत आती है। जैसे ही उसने बनारस की मिट्टी पर कदम रखा, उसे एक अजीब सी बेचैनी महसूस हुई। उसे लगा जैसे वह यहाँ पहले कभी आ चुकी है।
भाग 3: फिर वही मोड़
विहान और काव्या की मुलाकात बनारस के उसी घाट पर हुई जहाँ सदियों पहले आर्यन और मीरा की कहानी खत्म हुई थी। पहली नजर में ही दोनों को एक गहरा झटका लगा। विहान के दिमाग में स्मृतियों
का सैलाब उमड़ पड़ा।
काव्या ने जब विहान को देखा, तो उसे लगा कि वह सदियों से इसी चेहरे की तलाश में थी। लेकिन इस बार भी दुश्मन मौजूद था। विक्रम अब एक बूढ़ा लेकिन बेहद शक्तिशाली और क्रूर राजनेता बन चुका था। जब उसने काव्या (जो हुबहू मीरा जैसी दिखती थी) को देखा, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
भाग 4: बदला और मिलन
विक्रम ने इस बार भी उन्हें रास्ते से हटाने की कोशिश की। उसने विहान को खत्म करने के लिए अपने गुंडे भेजे। लेकिन इस बार विहान 'आर्यन' नहीं था; उसके पास पिछले जन्म की यादों के साथ-साथ इस जन्म की चतुराई भी थी।
एक रोमांचक संघर्ष के बाद, विहान ने विक्रम के सारे काले कारनामों का पर्दाफाश किया और उसे कानून के हवाले कर दिया। गंगा की लहरों के सामने, उसी स्थान पर जहाँ उन्होंने अपनी आखिरी साँस ली थी, विहान ने काव्या का हाथ पकड़ा।
"मैंने कहा था न मीरा, मैं वापस आऊंगा," विहान ने धीमी आवाज में कहा।
काव्या की आँखों से आँसू छलक पड़े। इस बार प्रेम की जीत हुई थी, विश्वासघात का अंत हुआ था, और एक अधूरी कहानी को उसका मुकम्मल अंजाम मिल गया था।
समाप्त |